Monday, June 8, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

The Next Big Thing : जल का निजीकरण

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 30, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

The Next Big Thing : जल का निजीकरण

गिरीश मालवीय

एक पत्रकार का दायित्व होता है कि वह न केवल हो चुकी घटनाओं का विश्लेषण करें बल्कि यह भी बताए कि क्या होने जा रहा है ? वह ये बताए कि देश व समाज के सामने आने वाले वह खतरे कौन से है, जो निकट भविष्य में सामने आ सकते हैं ? दरअसल सरकारें चाहे वह केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकारें, वह तेजी से जल के निजीकरण पर काम कर रही है.

You might also like

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

कल खबर आई कि राजस्थान में एक बार फिर से पेयजल मीटर लगाने की शुरुआत की जा रही है. जलदाय विभाग पायलट प्रोजेक्ट के नल में स्मार्ट मीटर लगाकर जयपुर से इसकी शुरूआत करने जा रहा है, अब सेंसर के जरिए मीटरों की रीडिंग आ सकेगी. उपभोक्ता रोजाना मोबाइल एप पर ये देख सकेगा कि आज कितना पानी खर्च किया ? जल्द ही पूरे राजस्थान के हर घर मे स्मार्ट मीटर लग जाएंगे. वैसे यह प्रोजेक्ट 2017 का है, जब वहां भाजपा की सरकार थी.

सिर्फ राजस्थान में ही नहीं उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में इसकी शुरुआत हो चुकी है. शिमला शहर में पेयजल कंपनी एएमआर चिप वाले सात हजार नए स्मार्ट मीटर लगाने जा रही है. कंपनी दफ्तर में ही कंप्यूटर पर मीटर की रीडिंग देख सकेगी और बिल जारी करेगी. उत्तराखंड सरकार भी अब राज्य में पेयजल कनेक्शन पर मीटर अनिवार्य करने जा रही है.

इसके पहले मध्यप्रदेश के खंडवा में भी यह योजना लागू की गयी थी और इसका ठेका एक प्राइवेट कम्पनी विश्वा को दिया गया था, पर वहां यह प्रयोग सफल नहीं हुआ. महाराष्ट्र का नागपुर पहला ऐसा बड़ा शहर है जहां की जल व्यवस्था निजी क्षेत्र के हाथों में है.

दरअसल यह सारे प्रोजेक्ट प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप द्वारा चलाए जा रहे हैं. सरकारों को लगता है कि यदि जल स्रोतों के रख-रखाव से लेकर वितरण तक की ज़िम्मेदारी निजी क्षेत्र के हाथ में सौंप दी जाए तो जल प्रबन्धन की समस्या का समाधान किया जा सकता है.

देश के हर शहर कस्बे में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो दो वक्त का भोजन भी बड़ी मुश्किल से जुटा पाते हैं. सरकार ऐसे समूहों को सब्सिडाइज्ड दरों पर जलापूर्ति करती है. यदि निजी क्षेत्रों के हाथ में जल व्यवस्था चली जाती है तो ऐसे लोगों का क्या होगा ?

21वीं शताब्दी में साफ पानी सबसे बड़ी कमोडिटी है. वाटर इंडस्ट्री का वार्षिक राजस्व आज आयल सेक्टर के लगभग 40 प्रतिशत से ऊपर जा पहुंचा है. फ़ॉरच्यून पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार बीसवीं शताब्दी के लिए तेल की जो कीमत थी, 21वीं शताब्दी के लिए पानी की वही कीमत होगी.

सरकारें अब इससे भी मुनाफा कमाना चाहती है. वे चाहती हैं कि पानी का निजीकरण हो ही जाए ताकि मुनाफे का एक हिस्सा सरकारों तक भी पहुंचता रहे. इसकी शुरुआत PPP प्रोजेक्ट के जरिए जल वितरण की व्यवस्था में निजी कम्पनियों की भागीदारी सुनिश्चित कर के की जा चुकी है.

पानी के निजीकरण करने के क्या खतरे हैं ?

यह दक्षिणी अमेरिकी देश बोलिविया से स्पष्ट हो चुका है. साल 1999 में, जब विश्व बैंक के सुझाव पर बोलिविया सरकार ने कानून पारित कर कोचाबांबा की जल प्रणाली का निजीकरण कर दिया. उन्होंने पूरी जल प्रणाली को ‘एगुअस देल तुनारी’ नाम की एक कंपनी को बेच दिया, जो कि स्थानीय व अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों का एक संघ था.

कानूनी तौर पर अब कोचाबांबा की ओर आने वाले पानी और यहां तक कि वहां होने वाली बारिश के पानी पर भी ‘एगुअस देल तुनारी’ कंपनी का हक था. निजीकरण के कुछ समय बाद कंपनी ने घरेलू पानी के बिलों में भारी बढ़ोतरी कर दी. कोचाबांबा में उनका पहला काम था 300 प्रतिशत जल दरें बढ़ाना. इससे लोग सड़कों पर आ गए.

कोचाबांबा में पानी के निजीकरण विरोधी संघर्ष शुरू हुआ था, जो सात से अधिक सालों तक लगातार चला, जिसमें तीन जानें गईं और सैकड़ों महिला-पुरुष जख़्मी हुए. जिस निजी कम्पनी को जल पर नियंत्रण रखने का ठेका दिया गया उसका एकमात्र उद्देश्य था – मुनाफा कमाना. उन्होंने कोई निवेश नहीं किया. वे देश के बुनियादी संसाधनों का उपयोग कर सिर्फ मुनाफा ही कमाना चाहते थे.

बोलिविया के अनुभव से सीख लेते हुए जलक्षेत्र में पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप से हमें बचना चाहिए लेकिन ऐसा होता हमें दिख नहीं रहा है. बिजली तो पूरी तरह से निजी हाथों में जा ही चुकी है अब पेयजल व्यवस्था पर भी निजी क्षेत्र का कब्जा होने जा रहा है.

Read Also –

सत्ता और कारपोरेट का गठजोड़ : आज हमें कहांं ले आए
जल संकट और ‘शुद्ध‘ पेयजल के नाम पर मुनाफे की अंधी लूट
मरती नदियां और बोतलबंद पानी के खतरे
पानी का अर्थशास्त्र
जल, जंगल और ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने की कॉरपोरेट मुहिम के खिलाफ है यह किसान आंदोलन

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]

Previous Post

टूटे जूते

Next Post

भारत देश एक भयानक लूट के दौर से गुज़र रहा है

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

by ROHIT SHARMA
June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

by ROHIT SHARMA
May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

by ROHIT SHARMA
May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

भारत देश एक भयानक लूट के दौर से गुज़र रहा है

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

होलोकॉस्ट : किताबों से शुद्ध होने के बाद, समाज को शुद्ध करने का अभियान

March 2, 2023

स्टेन स्वामी और आत्मतुष्ट खुदगर्ज़ों की जमात

July 7, 2021

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026
Uncategorized

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.