Monday, June 8, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

एक फोन कॉल की दूरी पर नींबू की मंहगाई

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 11, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
एक फोन कॉल की दूरी पर नींबू की मंहगाई
एक फोन कॉल की दूरी पर नींबू की मंहगाई
विष्णु नागर

महंगाई-महंगाई की चें-चें, पें-पें से मेरा तो अब सिर घूमने लगा है. इधर पेट्रोल-डीजल-गैस की महंगाई का रोना चल ही रहा था कि उधर दवाइयों, सब्जियों, फलों और यहां तक कि नींबू की महंगाई का रोना भी शुरू हो गया है. कहने लगे हैं लोग कि दवाई तो दवाई, साहब मोदी राज में तो नींबू तक तीन-चार सौ रुपये किलो हो गया है. ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था. एक मित्र ने कहा कि पहले मैं चाय में एक नींबू निचोड़ता था, आज आधा ही निचोड़ा. एक ने कहा, मैंने गुस्से में दो नींबू निचोड़़ डाले. अब अफसोस हो रहा है कि हाय ये मैंने क्या कर दिया !

पहली बात समझने कि यह है कि इस वैश्विक संकट के समय नींबू खाना ही क्यों ? सच तो यह है कि रोटी भी खाना क्यों ? उधर यूक्रेन में निर्दोष नागरिक मारे जा रहे हैं और तुमको हाय नींबू, हाय नींबू सूझ रहा है ! शरम करो कुछ. मोदी जी से सीखो, जो आजकल उपवास कर रहे हैं. उनकी जान तो नींबू में अटकी हुई नहीं है और तुम बेशर्मी सै नींबू-नींबू कर रहे हो ! अरे ये वैश्विक संकट गुजर जाने दो, मोदी जी घर-घर नींबू पहुंचाने खुद आएंगे. रोटी मत खाना, फिर नींबू ही खाते रहना ! ब्रेकफास्ट, लंच, डिनर सब उसी का करना ! अब तो खुश ?

You might also like

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

मेरा नींबू प्रेमियों से सीधा सवाल है कि तुमसे किसने कहा था कि नींबू की चाय पिया करो ? मोदी जी ने कहा था ? तुमने नींबू की आदत डालने से पहले मोदी जी से एक बार भी पूछा था ? पूछते कुछ हो नहीं, अपने मन की करते रहते हो और फिर शिकायत करने बैठ जाते हो ! मोदी जी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि मैं सिर्फ़ एक टेलीफोन की दूरी पर हूं. उनको टेलीफोन करोगे नहीं, देश को बदनाम करना शुरू कर दोगे कि बताइए नींबू तो आयात नहीं हो रहा, फिर भी देश की जनता नींबू के लिए तरस रही है. बताओ, यह देशद्रोह नहीं है तो और क्या है ?

वैसे मैं तो चाय में नींबू निचोड़ता ही नहीं. मैंने पहले ही मोदी जी को फोन करके पूछ लिया था कि बताइए रूस-यूक्रेन संकट के समय मुझे क्य-क्या त्याग करना चाहिए ? गाड़ी में पेट्रोल भरवाऊं या नहीं ?उन्होंने मुझे कसकर डांटा, कहा – ‘तुम्हारी और मेरी उम्र लगभग बराबर है मगर अकल तुम्हें आज तक नहीं आई ! तुम्हें खुद ही समझ लेना चाहिए था कि नहीं भरवाना है. दवाइयां महंगी हो जाएंगी, ये भी अभी नहीं खाना है. बाद में सारी एक साथ खा लेना.

‘और सुनो, आज से बता रहा हूं तुम्हें, मगर सबको बताना मत कि नींबू भी बहुत महंगा होने वाला है, जितने खरीद सकते हो अभी खरीद लो. दिन में जितने नींबू मिले उसे भी निचोड़़ लो. मजे कर लो. ये खत्म हो जाएं तो नींबू को भूल जाना. नींबू की चाय पीते हो तो समय रहते छोड़ देना. बाद में कष्ट नहीं होगा. हां याद आया, तुम तो किसान आंदोलन के बड़े समर्थक बनते थे न, तो नींबू खरीदते रहो. नींबू की कीमत बढ़ेगी तो किसान का ही फायदा होगा. करवाओ, उनका फायदा. अब दो, किसानों के असली हितचिंतक होने की परीक्षा ! दोगे ?

‘और सुन लो, मुझे ये रोज-रोज की शिकवा शिकायत पसंद नहीं.’ उनका अगला वाक्य अंग्रेजी में था – ‘आई एम अगेंस्ट इट. यू अंडरस्टैंड ?’ आखिरी वाक्य से मैं समझ गया कि बात जेनुइन है और मैंने अपने प्राण के अलावा सब छोड़ दिया. भाड़ में जाएं किसान. मैंने क्या उनका ठेका ले रखा है ? मैंने तो दवाई लेना तक छोड़ दिया है. सोचा एक न एक दिन तो मरना ही है, कुछ जल्दी मर जाऊंगा तो देश का घाटा नहीं हो जाएगा. देश प्रथम है, व्यक्ति नहीं.

और मोदी जी के बारे में आपके जो भी विचार हों मगर एक बात पक्की है कि वह बहुत उदार हृदय हैं. मैं उन्हें वोट नहीं देता, न दूंगा, ये बात वो जानते भी थे और मैंने उन्हें साफ बता भी दी. उन्होंने कहा, तुम भारतीय तो हो न ? इतना काफी है.  यह बताने के बाद भी मुझे वह सही सलाह दे सकते हैं तो आपको क्यों नहीं देंगे ? वह तो पुतिन और जेलेंस्की को भी सही सलाह देते हैं. करो टेलीफोन अभी. उनके नंबर पर फोन लगाने का पैसा नहीं लगता. करो फोन, करो न !

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

Donate on
Donate on
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

रखैल कौन ?

Next Post

ग्राम्शी के आर्गेनिक जन बुद्धिजीवी के प्रतिमान राहुल सांकृत्यायन

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

by ROHIT SHARMA
June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

by ROHIT SHARMA
May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

by ROHIT SHARMA
May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

ग्राम्शी के आर्गेनिक जन बुद्धिजीवी के प्रतिमान राहुल सांकृत्यायन

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

‘मैं आज भी मजदूर का जीवन जीता हूं !’

May 1, 2024

मेरे हिस्से की धूप

January 15, 2021

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026
Uncategorized

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.