Monday, June 8, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

जरूरत है महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की विरासत को आगे बढ़ाने की

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 23, 2024
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
जरूरत है महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की विरासत को आगे बढ़ाने की
जरूरत है महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की विरासत को आगे बढ़ाने की
मुनेश त्यागी

‘मैं ईसा की तरह सूली पर से यह नहीं कहता- पिता उन्हें क्षमा कर. वे नहीं जानते वे क्या कर रहे हैं. मैं कहता- पिता इन्हें हरगिज क्षमा मत करना. ये कमबख्त जानते हैं कि यह क्या कर रहे हैं.’

ये कमाल के शब्द हैं महान व्यंग्यकार साहित्यकार हरिशंकर परसाई के. हरिशंकर परसाई का जन्म मध्य प्रदेश में इटारसी के निकट जमानी में 22 अगस्त 1924 को हुआ था. उनका निधन 10 अगस्त 1995 को जबलपुर में हुआ था. उनकी पूरी शिक्षा मध्यप्रदेश में हुई थी. उन्होंने हिंदी में एमए किया था. उन्होंने ‘वसुधा’ नामक साहित्यिक मासिक पत्रिका आरंभ की थी. उन्होंने हिंदुस्तान, धर्मयुग आदि पत्रिकाओं आदि में नियमित रूप से लेखन किया था.

You might also like

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

उनकी प्रमुख रचनाएं हैं – हंसते हैं, रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे, रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज, तब की बात और थी, वैष्णव की फिसलन, तिरछी रेखाएं, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, शिकायत मुझे भी है, सदाचार की तारीफ, बेईमानी की परत, भूत के पांव पीछे, पगडंडियों का जमाना.

हरिशंकर परसाई ने अपने जीवन में नौकरी की, अध्यापन किया, 33 वर्ष की उम्र में सरकारी नौकरी छोड़ दी और स्वतंत्र लेखन की शुरुआत की. उस समय उनके पास कोई अनुभव भी नहीं था, बस उनके पास केवल अद्भुत इच्छा शक्ति थी. उन्होंने अपनी व्यंग रचनाओं में उर्दू हिंदी शब्दों का खुलकर प्रयोग किया था. वे व्यंग्य के रूप में लिखते हैं – ‘मैं मरूं, तो मेरी नाक पर सौ का नोट रख देना, शायद उठ जाऊं.’

वे कबीर की तरह खरी-खोटी सुनाने से नहीं हिचकते थे. उन्होंने अपने व्यंग ‘मैं नर्क से बोल रहा हूं’ में लिखा था –

‘हे पत्थर पूजने वालों, तुम्हें जिंदा आदमी की बात सुनने का अभ्यास नहीं है, इसलिए मैं मर कर बोल रहा हूं. जीवित अवस्था में तुम जिसकी ओर आंख उठाकर नहीं देखते थे, उस सड़ी हुई लाश के पीछे जुलूस बनाकर चलते हो. जिंदगी भर तुम जिससे नफरत करते हो, उसकी कब्र पर तुम चिराग जलाने जाते हो. मरते वक्त तक जिसे तुमने चुल्लू भर पानी नहीं दिया, उसके हाड गंगाजी में ले जाते हो. अरे, तुम जीवन का तिरस्कार और मरण का सत्कार करते हो. इसलिए मैं मर कर बोल रहा हूं. मैं नर्क से बोल रहा हूं.’

उनका व्यंग केवल मनोरंजन के लिए नहीं था. उन्होंने अपने व्यंग में पाठकों का ध्यान, समाज में व्याप्त विसंगतियों और कमजोरियों की ओर आकर्षित किया था. उन्होंने अपने लेखन में राजनीतिक और सामाजिक जीवन में फैले शोषण, जुल्म, अन्याय और भ्रष्टाचार पर जोरदार तंज किया था, जो हिंदी साहित्य में अनूठा स्थान रखता है. उनकी मान्यता थी कि सामाजिक अनुभव के बिना वास्तविक और सच्चा साहित्य और लेखन नहीं किया जा सकता.

उन्होंने सामाजिक विसंगतियों पर जोरदार प्रहार किया. उन्होंने अपने सारे जीवन संघर्ष किया, मगर कलम का कभी समझौता नहीं किया. उन्होंने सीधा और सच्चा लेखन किया. उन्होंने गोलमोल भाषा का प्रयोग कभी नहीं किया. उन्होंने लिखने के लिए पढ़ना हमेशा जारी रखा. वह पढ़ाई को जीवन और संघर्ष की आधारशिला समझते थे. हरिशंकर परसाई ने अपने लेखन से हिंदी साहित्य में व्यंग्य विधा को नया रूप, रंग और पहचान दी. हिंदी संसार सदैव ही उनका कर्जमंद रहेगा.

हरिशंकर परसाई अगर आज होते तो वे ‘भिखारी’, ‘साहेब’, ‘सरकार’, ‘कुछ का विकास गरीबों का विनाश’, ‘विश्व गुरु’, ‘अपना-अपना समाजवाद’, ‘मनुवाद’, ‘शोषण’, ‘अन्याय’, ‘भेदभाव’, ‘जुल्मो सितम’ के सनातनी रूप और रंग, किसी को भी नहीं बख्शते. उनके व्यंग्यकारी बाण इन सनातनी विसंगतियों को अबाध गति से, बिना चूके ही बेधते रहते.

भारत की आजादी के बाद वे शोषण, अन्याय, संप्रदायवाद, साम्राज्यवाद, पाखंड, अनीति, अनाचार और अत्याचार के खतरों से जीवन पर्यंत लड़ते रहे और उनके खिलाफ लिखते रहे. वे अपनी सारी जिंदगी एक विद्रोही बन कर रहे. उनके पसंदीदा लेखक और शायर थे – कबीर, ग़ालिब, प्रेमचंद, निराला, फैज अहमद फैज और मुक्तिबोध.

उनके कुछ व्यंग्य गजब के हैं, उन पर एक नजर डालते हैं –

‘तारीफ करके आदमी से बडी से बडी बेवकूफी करायी जा सकती है.’

‘चूहा दानी के मुंह से छोटी से छोटी चुहिया घुस सकती थी, मगर उसके पीछे का दरवाजा इतना बड़ा बनाया गया था कि उससे बड़े से बड़ा चूहा भी बड़ी आसानी से बाहर निकल सकता था.’

‘जब धर्म, धंधों से जुड़ जाये तो इसे योग कहते हैं.’

‘धर्म अच्छे को डरपोक और बुरे को निडर बना देता है.’

‘सड़ा हुआ विद्रोह, एक रुपए में चार आने के हिसाब से बिक जाता है.’

‘दानशीलता, सीधापन, भोलापन, असल में एक तरह का इन्वेस्टमेंट हैं.’

‘अर्थशास्त्र, जब धर्मशास्त्र के ऊपर चढ़ बैठता है तो गौरक्षा आंदोलन के नेता, पंडित जूतों की दुकान खोल लेते हैं.’

महान साहित्यकार हरिशंकर परसाई, सच्चाई से परिपूर्ण विचारधारा के प्रचार प्रसार करने पर जोर देते थे. उन्होंने कहा था – ‘सत्य को भी प्रचार चाहिए, अन्यथा वह मिथ्या मान लिया जाता है.’ मुक्ति के बारे में उन्होंने कमाल की कल्पना की थी. उन्होंने कहा था –

‘मुक्ति अकेले-अकेले नहीं मिलती. अलग से अपना भला नहीं हो सकता, मनुष्य की छटपटाहट है मुक्ति के लिए, सुख के लिए, न्याय के लिए, पर यह बड़ी लड़ाई अकेले-अकेले नहीं लड़ी जा सकती. अकेले वही सुखी है जिसे कोई लड़ाई नहीं लड़नी.’

‘आवारा भीड के खतरे’ में हरिशंकर परसाई कहते हैं –

‘दिशाहीन, बेकार, हताश, नकारवादी, विध्वंशवादी, बेकार युवकों की यह भीड़ खतरनाक होती है. इसका प्रयोग महत्वाकांक्षी खतरनाक विचारधारा वाले व्यक्ति और समूह कर सकते हैं. इस भीड़ का उपयोग हिटलर और मुसोलिनी ने किया था. यह भीड़ धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगती है.

‘यह भीड़ किसी भी ऐसे संगठन के साथ हो सकती है जो उन्माद और तनाव पैदा कर दें. फिर इस भीड़ से विध्वंशक कम कराई जा सकते हैं. यह भीड़ फ़ासिस्टों का हथियार बन सकती है. हमारे देश में यह भीड़ बढ़ रही है. इसका उपयोग भी हो रहा है. आगे इस भीड़ का उपयोग राष्ट्रीय और मानव मूल्यों के विनाश के लिए, लोकतंत्र के नाश के लिए करवाया जा सकता है.’

हरिशंकर परसाई लेखकों को सलाह देते हैं कि उन्हें अहंकारी बनने की जरूरत नहीं है. वे कोई बहुत बड़ा काम नहीं कर रहे हैं. वे लेखकों का आह्वान करते हैं कि वे लोगों के संघर्षों में शामिल हों और एक बेहतर व्यवस्था और बेहतर इंसान बनाने की कोशिश करें. ‘माटी कहे कुम्हार से’ की भूमिका में हरिशंकर परसाई कहते हैं –

‘अपने लेखन के बारे में मुझे गलतफहमी नहीं है. अनुभव ने सिखाया है कि लेखक का अहंकार व्यर्थ है. हम कोई युग परिवर्तन नहीं हैं. हम छोटे-छोटे लोग हैं. हमारे प्रयास छोटे-छोटे होते हैं. हम कुल इतना कर सकते हैं कि जिस देश, समाज और दुनिया के हम हैं और जिनसे हमारा सरोकार है, उनके उस संघर्ष में भागीदार हों जिससे बेहतर व्यवस्था और बेहतर इंसान पैदा हों.’

हरिशंकर परसाई जनता के लेखक थे. वे जनता से मिलते थे, जनता की बात करते थे, जनता के दुख दर्द दूर करने की कोशिश करते थे और जनता के दुःख दर्दों पर जमकर लिखते थे. आतताईयों को खरी खोटी सुनाते थे. उनके विरोधियों ने उन पर व्यक्तिगत हमले किए, उनके साथ मारपीट की, मगर उन्होंने उनकी परवाह नहीं की.

वे इतने कमाल के लेखक थे कि जनता ने उनके पीछे लामबंद होकर, उनके लेखन का समर्थन किया और उनकी रक्षा की और उन्हें कई हमलों से बचाया. आज हमें भी सच्चे साहित्यकार बनकर, जनता के साहित्यकार बनाकर, हरिशंकर परसाई के नक्शे कदम पर चलने की जरूरत है, जनता की मुक्ति के लेखक बनने की जरूरत है.

Read Also –

क्रांतिकारी कवि वरवर राव की नजरबंदी त्रासदपूर्ण अन्याय रही !
31 जुलाई : महान कथाकार प्रेमचंद के जन्मदिन पर हमलावर होते अतियथार्थ के प्रदूषण
सदी का सबसे बेचैन कवि : मुक्तिबोध
पुलिसिया खाल में जनकवि व लेखक विनोद शंकर के घर गुंडा गिरोह के हमले का विरोध करो !
कलम का सिपाही : तीन कहानियां निजी दायरे में
रूढ़िबद्धताओं और विचारधारा से भी मुक्त है नामवर सिंह की विश्वदृष्टि 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
G-Pay
G-Pay
Previous Post

जाति और धर्म के समाज में प्रगतिशीलता एक गहरी सुरंग में फंसा है

Next Post

अंधविश्वासों के खिलाफ जागरूकता बेहद जरूरी है

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

by ROHIT SHARMA
June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

by ROHIT SHARMA
May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

by ROHIT SHARMA
May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

अंधविश्वासों के खिलाफ जागरूकता बेहद जरूरी है

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

बल्ख न बुखारे, जो बात छज्जू के चौबारे

February 11, 2023

युद्ध भूमि

December 31, 2023

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026
Uncategorized

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.