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सुप्रीम कोर्ट से कोई उम्मीद नहीं बची – कपिल सिब्बल

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 13, 2022
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सुप्रीम कोर्ट से कोई उम्मीद नहीं बची - कपिल सिब्बल
सुप्रीम कोर्ट से कोई उम्मीद नहीं बची – कपिल सिब्बल

‘सुप्रीम कोर्ट से कोई उम्मीद नहीं बची,’ यह तो देश की आवाम पहले से ही जानती और समझती है लेकिन इस बार खुले मंच से यह कहने वाले हैं सुप्रीम कोर्ट में 50 साल तक वकालत कर चुके सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल. राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने हाल ही में पारित हुए सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों पर बयान दिया है. सिब्बल ने कहा कि उन्हें कोर्ट से अब कोई उम्मीद नहीं बची है. अगर आपको लगता है कि आपको सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलेगी, तो आप बहुत गलत हैं. यह बात सुप्रीम कोर्ट में 50 साल का अनुभव पूरा करने के बाद कह रहा हूं.

कपिल सिब्बल ने अपने संबोधन की शुरुआत यह कहकर की कि ‘भारत के सुप्रीम कोर्ट में 50 साल तक प्रैक्टिस करने के बाद संस्थान में उनकी कोई उम्मीद नहीं बची है.’ उन्होंने कहा कि ‘भले ही एक ऐतिहासिक फैसला पारित हो जाए, लेकिन इससे शायद ही कभी जमीनी हकीकत बदलती हो.’

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कपिल सिब्बल एक पीपुल्स ट्रिब्यूनल में बोल रहे थे, जो 6 अगस्त 2022 को नई दिल्ली में न्यायिक जवाबदेही और सुधार अभियान (सीजेएआर), पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) एंड नेशनल अलायंस ऑफ पीपल्स मूवमेंट्स (एनएपीएम) द्वारा ‘नागरिक स्वतंत्रता के न्यायिक रोलबैक’ पर आयोजित किया गया था. ट्रिब्यूनल का फोकस गुजरात दंगों (2002) और छत्तीसगढ़ आदिवासियों के नरसंहार (2009) पर सुप्रीम कोर्ट के 2022 के फैसले पर था.

सिब्बल ने गुजरात दंगों में मारे गए गुजरात के कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी की विधवा जकिया जाफरी का सुप्रीम कोर्ट में प्रतिनिधित्व किया था. उन्होंने कहा कि अदालत में बहस करते हुए उन्होंने केवल सरकारी दस्तावेजों और आधिकारिक रिकॉर्डों को रिकॉर्ड किया और कोई निजी दस्तावेज नहीं रखा था. उन्होंने कहा कि दंगों के दौरान कई घर जला दिए गए. स्वाभाविक रूप से खुफिया एजेंसी इस तरह की आग को बुझाने के लिए फायर ब्रिगेड बुलाएगी.

एडवोकेट सिब्बल के अनुसार खुफिया एजेंसी के दस्तावेज या पत्राचार से पता चलता है कि किसी फायर ब्रिगेड ने फोन नहीं उठाया. उन्होंने कहा कि यह तर्क दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एसआईटी ने ठीक से पूछताछ नहीं की कि फायर ब्रिगेड ने कॉल क्यों नहीं उठाया ? और इसका मतलब यह था कि एसआईटी ने अपना काम ठीक से नहीं किया.

सिब्बल ने कहा कि इन सबमिशन के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने कुछ नहीं किया. उन्होंने कहा कि एसआईटी ने कई लोगों को केवल उन लोगों द्वारा दिए गए बयानों पर भरोसा करते हुए छोड़ दिया, जो खुद आरोपों का सामना कर रहे थे. हालांकि इन पहलुओं को सुप्रीम कोर्ट को बताया गया था, लेकिन कुछ भी नहीं किया गया. उन्होंने कहा कि कानून का छात्र भी जानता होगा कि किसी आरोपी को सिर्फ उसके बयान के आधार पर छोड़ा नहीं जा सकता.

2009 में छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियानों के दौरान सुरक्षा बलों ने 17 आदिवासियों को मार दिया था और एक डेढ़ साल के बच्चे की यह कहते हुए हाथ की ऊंगलियां काट दी कि यह बड़ा होकर माओवादी बनेगा. इस घटना की स्वतंत्र जांच की मांग वाली याचिका को भी खारिज कर दिया गया. यह सभी फैसले जस्टिस ए. एम. खानविलकर की अध्यक्षता में लिए गए थे, जो अब रिटायर्ड हो चुके हैं.

इस पीपुल्स ट्रिब्यूनल में पूर्व न्यायाधीश जस्टिस ए. पी. शाह ने छत्तीसगढ़ मुठभेड़ मामले पर अपनी प्रारंभिक टिप्पणी देते हुए कहा कि आदिवासियों के साहस की सराहना करने और स्वतंत्र जांच का आदेश देने के बजाय सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस द्वारा की गई जांच पर आदिवासियों को दंडित किया, जहां पुलिस खुद मुकदमे में आरोपी थी.

उन्होंने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपनाए गए रूख पर दु:ख जताया. उन्होंने कहा कि नरसंहार की घटना विवाद में नहीं थी और भले ही पीड़ित के आरोप कि पुलिस और सुरक्षा बलों ने उन पर हमला किया था, उस पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए, फिर भी आपराधिक न्यायशास्त्र के लिए एक निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच अनिवार्य है.

उन्होंने आगे जोर दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने उस संघर्ष को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया जिसके माध्यम से दुर्भाग्यपूर्ण आदिवासी पीड़ित इस अदालत तक पहुंचने में कामयाब रहे और जांच के लिए एसआईटी बनाने के बजाय, याचिकाकर्ता नंबर 1 पर 5 लाख रुपए का जुर्माना लगाया.

यह कैसा आपराधिक न्याय था ? जस्टिस शाह ने निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि वह स्वयं एक न्यायाधीश रहे हैं और उन्होंने ऐसी कई कार्यवाही देखी हैं लेकिन स्वतंत्र जांच से इनकार करने और याचिकाकर्ताओं पर जुर्माना लगाने की प्रवृत्ति एक स्वस्थ संकेत नहीं है.

सिब्बल ने यह भी आरोप लगाया कि संवेदनशील मामले केवल चुनिंदा जजों को ही सौंपे जाते हैं, इसके चलते आमतौर पर पहले से पता होता है कि फैसले का परिणाम क्या होगा. मैं ऐसी अदालत के बारे में बात नहीं करना चाहता, जहां मैंने 50 साल तक अभ्यास किया, लेकिन अब बोलने का समय आ गया है. अगर हम नहीं बोलेंगे तो कौन आवाज उठाएगा ?

सिब्बल ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि कोर्ट में जो जज बिठाए जाते हैं, वह केवल समझौता की प्रक्रिया होती है. सुप्रीम कोर्ट में जहां यह तय करने की कोई व्यवस्था ही नहीं है कि किस मामले की अध्यक्षता किस बेंच द्वारा की जाएगी, जहां भारत के चीफ जस्टिस तय करें कि किस मामले को कौन सी बेंच कब निपटाएगी, वह अदालत कभी भी स्वतंत्र नहीं हो सकती. लोग अपनी मानसिकता नहीं बदलेंगे तो स्थिति नहीं बदलेगी.

स्वतंत्रता तभी संभव है जब हम अपने अधिकारों के लिए खड़े हों.
भारत में माई-बाप संस्कृति है. लोग शक्तिशाली के पैरों में गिरते हैं लेकिन समय आ गया है कि लोग बाहर आएं और अपने अधिकारों की सुरक्षा की मांग करें. स्वतंत्रता तभी संभव है जब हम अपने अधिकारों के लिए खड़े हों और उस स्वतंत्रता की मांग करें.

कपिल सिब्बल के इस बयान से बार एसोसिएशन भड़क गया है और कहा है कि कपिल सिब्बल की यह टिप्पणी अवमाननापूर्ण है. विदित हो कि कपिल सिब्बल खुद भी कभी सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. इस बार एसोसिएशन कपिल सिब्बल को गलत ठहराने के लिए तर्क दिया है कि ‘अगर कपिल सिब्बल की पसंद का फैसला नहीं दिया गया है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि न्यायिक प्रणाली विफल हो गई है. सिब्बल न्याय व्यवस्था का एक अभिन्न अंग हैं. अगर वह वास्तव में संस्था में भरोसा खो चुके हैं तो वह अदालतों के सामने पेश नहीं होने के लिए स्वतंत्र हैं.’

लेकिन इस बार एसोसिएशन ने अपने तर्क में यह नहीं बताया है कि सत्ता के समर्थन से किया जाने वाला गुजरात नरसंहार और छत्तीसगढ़ में 17 आदिवासियों की नृशंस हत्या करने वाली पुलिस के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने के कारण याचिकाकर्ताओं को गिरफ्तार कर जेल में डालना और 5 लाख का जुर्माना लगाना कैसे और कहां से न्यायपूर्ण हो गया ?

दरअसल, 2014 के बाद सत्ता पर काबिज संघी ऐजेंट नरेन्द्र मोदी ने देश के तमाम संवैधानिक पदों पर अपने दलालों को बैठाने की कबायद तेज कर दिया था, इसी कड़ी में सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति भी अपने दल्लों को जज बना दिया और मनमाफिक फैसला सुप्रीम कोर्ट से आने लगा. इसी संदर्भ में एक उदाहरण देते हुए पत्रकार गिरीश मालवीय लिखते हैं – सोहराबुद्दीन शेख और तुलसी प्रजापति एनकाउंटर मामले में अमित शाह के वकील रहे यूयू ललित सुप्रीम कोर्ट के अगले चीफ जस्टिस होने जा रहे हैं. उनकी सुप्रीम कोर्ट में एंट्री की कथा दिलचस्प है.

साल 2014 में कॉलेजियम ने गोपाल सुब्रमण्यम का नाम बतौर जज नियुक्त किए जाने के लिए भेजा था लेकिन सरकार ने उनके नाम पर अपनी सहमति देने से इनकार कर दिया था. गोपाल सुब्रह्मण्यम सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर मामले में न्याय मित्र थे, एमिकस क्यूरी थे और उनकी सिफारिश पर ही इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए थे. इस मामले में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह मुख्य आरोपित थे.

दरअसल सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने सर्वोच्च अदालत में जजों की नियुक्ति के लिए चार नामों की सिफारिश सरकार को भेजी थी, उसमें गोपाल सुब्रह्मण्यम का नाम भी शामिल था. सरकार के विरोध के बाद सुब्रह्मण्यम ने अपना नाम वापस ले लिया. सुब्रह्मण्यम ने कहा कि ‘न्यायाधीश के पद की एक गरिमा होती है. एक जज को शक, संदेह से परे और निष्कलंक होना चाहिए. मुझ पर लगे आरोप बेबुनियाद हैं लेकिन मैंने पद की गरिमा को ध्यान में रखते हुए इसे नहीं स्वीकार करना ही सही समझा.’

गजब की बात यह थीं कि गोपाल सुब्रमण्यम का नाम ख़ारिज होने के बाद मोदी सरकार द्वारा उसी मामले में अमित शाह के वकील रहे यूयू ललित को सुप्रीम कोर्ट के जज के लिए नामित किया गया. गोपाल सुब्रह्मण्यम के मामले पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा भी केंद्र सरकार पर जमकर बरसे थे. उन्होंने सरकार के कदम को एकतरफा करार देते हुए अपनी नाराजगी जताई. साथ ही पूर्व सॉलिसिटर जनरल के नाम को अलग करने पर कार्यपालिका के रुख को अनुचित बताया.

मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि शीर्ष न्यायपालिका इस मसले पर बहुत गंभीर है. उन्होंने कहा कि चीफ जस्टिस के तौर पर मैंने और मेरे चार वरिष्ठ सहकर्मियों की कॉलेजियम ने चार सबसे हुनरमंद लोगों को चुना था. हमने सरकार को इन चार नामों को नियुक्त करने के लिए भेजा था। लेकिन सरकार ने एकतरफा तरीके से एक नाम अलग कर दिया. बाद में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस चेलामेश्वर ने भी मोदी सरकार पर खुलकर यह आरोप लगाया है कि वह जजों की नियुक्ति में मनमानी कर रही है.

जैसा कि पहले से ही स्पष्ट है न्यायालय खासकर सुप्रीम कोर्ट लोगों का विश्वास मौजूदा व्यवस्था में बनाये रखने का एक औजार होता है, जिससे लोगों का आक्रोश बाहर निकल जाता है, दूसरे शब्दों में न्यायपालिका खासकर सुप्रीम कोर्ट मौजूदा व्यवस्था को बचाये रखने का एक सेफ्टी वॉल्व है, जो लोगों के आक्रोश को बाहर निकालता है. अगर सुप्रीम कोर्ट अपना (सेफ्टी वॉल्व) का यह काम भी नहीं कर रहा है तो समझ लो यह पूरी व्यवस्था फटने को आतुर है.

यही कारण है कि अंजना प्रकाश, जे. (सेवानिवृत्त) ने पूरे पैनल के लिए बोलते हुए कहा कि ‘सुप्रीम कोर्ट ने वास्तव में अपने दो फैसलों से पीड़ितों के साथ अन्याय किया है. जो भी स्थिति हो, न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट का सहारा लेना हमारा दायित्व था और अधिकांश मामलों में न्यायालय अपना कर्तव्य पूरा करता है. हम सामंती व्यवस्था में नहीं रहते हैं और यह करदाताओं का पैसा है, जो हर संस्थान को चलाता है और इसलिए, सभी संस्थान लोगों को न्याय देने के लिए बाध्य हैं.’ अब, बिल्कुल ! न्यायपालिका कितना न्याय कर रही है जानना बहुत जरुरी हो गया है अब.

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