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हिंदू में मौलिक कुछ नहीं, बौद्ध परम्परा ही सिर के बल है !

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 30, 2024
in गेस्ट ब्लॉग
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हिंदू में मौलिक कुछ नहीं, बौद्ध परम्परा ही सिर के बल है !
हिंदू में मौलिक कुछ नहीं, बौद्ध परम्परा ही सिर के बल है !

बौद्ध परम्परा का पतन नहीं रूपांतरण हुआ है, बस जरा गौर करने की जरूरत है. बौद्ध ही हिंदू और हिंदू ही बौद्ध हैं. गणेश-लक्ष्मी प्रतीक है, बुद्ध व उनकी माता महामाया के. बोधिसत्व अष्ट विनायक, प्रथम पूज्य बुद्ध हैं. बोधिसत्व अवलोकितेश्वर का एक रूपांतरण शिव (अर्धनारीश्वर) एवम दूसरे रूप विष्णु में होता है.

बोधिसत्व विनायक, हमारे गणेश हैं. बुद्ध की माता महामाया हमारी महालक्ष्मी हैं. बज्रयान की देवी तारा से सरस्वती, काली, दुर्गा अवतरित होती हैं. स्तूप धीरे-धीरे शिवलिंग में परिवर्तित हो जाता है. हमारी सनातन (बुद्ध) परम्परा चल रही है. बस, हमने उसे सिर के बल खड़ा कर दिया है.

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बुद्ध के लिए जगत सत्य था और बाद में यही ब्रह्म सत्य और जगत मिथ्या हो गया. दीपावली में महामाया को लक्ष्मी के रूप में और गौतम बुद्ध के जन्म का प्रतीक हाथी को गणेश के रूप में याद किया जाता है.

माता रुम्मन देई को स्वप्न आता है. उस स्वप्न में हाथी होता है. इसीलिए महामाया की मूर्ति पर दोनों ओर से हाथी अभिनंदन करते दिखाई देते हैं. यही बुद्ध की माता महामाया (अर्थात बड़ी माता) आगे चलकर महालक्ष्मी बन जाती हैं.

हाथी, आगे बज्रयान में अष्ट विनायक बोधिसत्व की मूर्तियां बनने लगती हैं. यही अष्टविनायक बोधिसत्व हमारे गणेश हैं. दीपावली पर गणेश लक्ष्मी के पूजन में बुद्ध और उनकी माता उपस्थित रहते हैं. सांची स्तूप, भरहुत के बौद्ध स्तूप, एलोरा की गुफाओं, विक्रमादित्य की स्वर्ण मुद्राओं पर महामाया, लक्ष्मी के रूप में दिखाई देती हैं.

19वीं शताब्दी के अंत में मशहूर कलाकार राजा रवि वर्मा ने सबसे पहले महालक्ष्मी की पेंटिंग बनाई. हमारे घरों में जो कैलेंडर पर महालक्ष्मी दिखाई देती हैं, वह राजा रवि वर्मा की देन है.

बाल्मीकि रामायण में बुद्ध को गाली दी गई है. इससे एक बात तो साबित हो ही गई कि रामायण बुद्ध के बाद ही लिखी गई है. बड़ी छोटी कहानी है जंबूदीप में सम्यक् सभ्यता हुआ करती थी, फिर ये सम्यक् सभ्यता पूरे एशिया सहित यूरोप, अमेरिका तक पहुंच गई थी. एशिया के तमाम देश बुद्धिस्ट जातक कथाओं का अनुवाद करके अपने अपने देश में ले गये.

दशरथ जातक कथा जिसके नायक बोधिस्तव राम थे, वो कहानी भी दूसरे बुद्धिस्ट देशों में पहुची. नाम भी बदलकर रामायण हो गया यानी बोधिसत्व राम का आयन यानी राम का पथ. सभी ने कहानियो को अपने अनुसार थोड़ा मोड़ा मॉडीफ़ाइड कर लिया लेकिन राम बोधिसत्व ही रहे.

उदाहरण के तौर पर इंडोनेशिया में योगेश्वर कृत रामायण का काविन, कंपूचिया में रामकेर्ती, थाईलैण्ड में रामकियेन, लाओस में राम जातक, वर्मा में रामवत्थु, मलेशिया में हिकायत सेरी राम, फ़िलीपींस में महालादिया लावन, तिब्बत में राम कथा, चीन में दशरथ कथानम और अनामक जातकम, खोतान में राम कथा, मंगोलिया की राम कथा, जापान की राम कथा, श्रीलंका की राम कथा, नेपाल में भानुभक्तकृत रामायण.

इंडोनेशिया, फ़िलीपींस, मलेशिया देशों में तो बुद्ध का इस्लामिकरण हो गया और भारत में ब्राह्मणीकरण. नतीजा यह हुआ कि मुस्लिम होने के वावजूद इंडोनेशिया, फ़िलीपींस, मलेशिया ने बोधिसत्व राम कथा को बचाये रखा, हालाँकि कहानी का भी थोड़ा बहुत इस्लामीकरण हो गया.

उसी तरह भारत में भी दशरथ जातक कथा रामायण बना, लेकिन बौद्ध के बाद क़ब्जा ब्राह्मणवादियों का हो गया और बोधिसत्व राम अब हिंसक राम बन गये.

क्या आपको नहीं लगता पूरी दुनिया में जहां जहां भारत से बुद्ध जातक कथाये गई, वहां के रामकथा में राम बोधिसत्व है, जबकि भारत में बोधिस्तव राम का ब्राह्मणीकरण करके ब्राह्मणवादी राम दिखाने के लिए बाल्मीकि रामायण, अयोध्याकांड सर्ग 108 में बुद्ध को गाली देनी पड़ी ?

  • जे. पी. शुक्ला

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