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Home गेस्ट ब्लॉग

राम के नहीं बख़्तावर के चेले हैं ये

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 8, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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राजीव कुमार मनोचा

इस देश के सभी सिद्धांतवादी स्कूल घटिया हो चुके हैं. वैसे भी सिद्धांतों में बंधे लोग अक्सर उस स्कूल को घटिया बनाने को अभिशप्त होते हैं क्योंकि सैद्धांतिक आवरण के पीछे तो व्यक्ति हुआ करते हैं, जिनकी अपनी-अपनी ढपली होती है, जिस पर थोड़ी देर के लिए वे दूसरों के सिखाए राग गाने लगते हैं. किन्तु अंत में ‘निज चरित्र’ बाहर निकल आता है और सिद्धांत विकृत होता जाता है.

भारत का सैद्धांतिक अखाड़ा इस खेल के लिए शायद सर्वाधिक बदनाम है. इस देश के जितने ‘वादी’ और ‘ist’ हैं, अंततः इसी अधोगति को प्राप्त हुए, चाहे साम्यवादी हों, सेक्युलरवादी हों, नारीवादी हों या फिर इस्लामवादी और हिंदुत्ववादी. इनकी बातें ऊपर से चमकदार किन्तु अंदर से इनके ‘व्यक्ति’ की तरह खोखली हैं और इन सब ने इस देश को ही नहीं, अपने शुभचिंतकों को भी बेहद निराश किया है.

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गुजरात के बजरंगी बदमाशों ने दिखाया कि क्यों ‘हिन्दू राष्ट्र’ का सैद्धांतिक लक्ष्य नकारात्मक ही नहीं निम्न स्तरीय भी है. इस हवाई परिकल्पना के पीछे कोई ज्ञानी, मनीषी अथवा दूरदर्शी लोग नहीं बल्कि घोर अज्ञानी, लम्पट और ग़ैर दूरंदेश छिछोरे हैं, जो इस देश की आधुनिक प्रगति को ही नहीं महान ऐतिहासिक विरासत को भी डुबो डालेंगे.

भारत देश इसलिए महान नहीं कि यहां तथाकथित मानवतावादी, आदर्शवादी और साम्यवादी रहते हैं. ये सब तो पश्चिम के दिये सुंदर से वैचारिक छाते उठाए बैठे हैं, जिनके तले इनकी दुकानें चलती आईं. और ये बड़बोले मुफ़्त की वाहवाही बटोरते आए, बिना किसी बड़ी उपलब्धि के. यह देश इसलिए महान है कि इसकी जड़ें चार्वाक, सांख्य, बुद्ध, महावीर, पराशर और पतंजलि जैसे महामनीषियों द्वारा रोपी गईं, जिन्हें न तो मध्ययुग के बर्बर हमलावर नष्ट कर सके और न ही अंग्रेज़ों की पदार्थवादी वैचारिकता. अगर यह देश गांधी, सुभाष जैसे लोग पैदा कर सका तो उनकी रूह में भी पुरातन सभ्यता के सूत्र ही थे, अंग्रेज़ी शिक्षा केवल ऊपरी हथियार थी.

कामसूत्र के प्रणेता महर्षि वात्स्यायन भारत की ही नहीं वरन पूरे विश्व की वह अन्यतम विभूति हैं जिन्होंने पहली बार उस विषय को छेड़ा जिसे छेड़ने में आज भी एशिया और अफ़्रीका के बड़े बड़े आचार्य सकुचाते हैं. वह प्राचीन दौर जब यूरोप में भी औरतें-मर्द सेक्स का ज़िक्र तक नहीं कर सकते थे, भारत ने खजुराहो की गुफाएं उकेरीं, महर्षि वात्स्यायन जैसों ने काम क्रीड़ा को बाक़ायदा ज्ञान का दर्जा देते हुए ‘कामसूत्र’ लिखा. पूरे विश्व को बताया कि भारत की खुली सोच और उन्मुक्तता का कोई जवाब नहीं.

यह देश इतना उदार है कि सेक्स पर सार्वजनिक चर्चा छेड़ सकता है, उसकी विभिन्न मुद्राओं को ‘ज्ञान’ का दर्जा देता है, अश्लीलता का नहीं. साथ ही भारतवर्ष की उदारता इस क़दर विस्तीर्ण है कि यहां नास्तिकता के प्रणेता ‘चार्वाक’ अनीश्वरवाद के प्रणेता ‘महावीर’ और कामसूत्र के प्रणेता ‘वात्स्यायन’ ऋषियों मनीषियों का दर्जा पाते हैं. यदि ये लोग अरब या मध्य एशिया में जन्मते तो इन्हें सरेआम पत्थरों से पीट-पीट कर मार डाला गया होता.

दकियानूसी सिद्धांतों को आधार बना अहमदाबाद में की गई बदमाशी क्या संदेशा देती है ? जी, समझ लीजिए भारत के अरबीकरण की शुरुआत है यह. अब तक जो हो रहा था वह लुच्चपना था. कल जो हुआ वह उसी सोच को बल देता है, जो हर प्रकार के आदर्शप्रेम और सिद्धान्तवाद को ‘रिस्की’ मानती आई है क्योंकि आदर्श और सिद्धांत कब नकारात्मक गली की ओर मुड़ जाएं, कब एक वैचारिक बदमाशी बन जाएं, पता ही नहीं चलता.

वैसे जनता चाहे तो इसे एक चेतावनी सिग्नल भी मान सकती है. अब तक जो लोग सोच रहे थे कि कट्टर हिंदुत्व केवल मुसलमानों के लिए ख़तरा है, अब सब कुछ अच्छी तरह परख लें. अपने घर बार धंधा रोज़गार सब लुटा कर जिन घटिया लोगों और टुच्ची मानसिकता को वे सींच रहे हैं, एक दिन वह इन्हीं की गौरवशाली जड़ों को काट डालेगी. यदि आज वात्स्यायन का कामसूत्र जला तो कल पराशर का ‘होरा शास्त्र’ भी फूंका जा सकता है क्योंकि वह देसी टोंटको के ख़िलाफ़ खड़ा भारत का वैज्ञानिक ज्योतिष है. इसी कड़ी में चार्वाक के नास्तिकतावादी सिद्धांत भी निंदित हो सकते हैं, कोई बड़ी बात नहीं.

ये कथित हिन्दू राष्ट्र वाले मध्ययुगीन हिन्दू हैं, जो कट्टर इस्लाम की प्रतिक्रिया में पैदा हुए हैं. भारत की महान गौरवशाली संस्कृति और साहित्य के प्रति इनका नज़रिया वैसा ही घटिया है जैसा कट्टर मुसलमानों और सेक्युलर बुद्धिविलासियों का. ये जाहिल हिन्दू इन्हीं दोनों की तरह अतिवादी संतान हैं और अपने ही देश की छाती पर पनपती एक पनौती हैं.

याद रखना, जिन्हें तुम अपना धर्मरक्षक समझ रहे हो, ये तुम्हारे रिलिजन में बचे खुचे धर्म को भी मिट्टी में मिला देंगे. ये रिलिजस गुण्डे राम के भक्त नहीं, औरंगज़ेब और बख़्तावर ख़िलजी का हिन्दू संस्करण हैं. तुम्हारी सभ्याचारक आत्मा में बसे ‘नालंदाओं’ को फूंक डालेंगे ये !

काश ये शिक्षाएं भी ले पाते हम !

हमारे बुज़ुर्ग हमें कितना कुछ सिखा कर जाते हैं, पर हम फिर भी नहीं सीख पाते क्योंकि कुछ गुण नैसर्गिक होते हैं, स्वभाव से जुड़े, इनकी दाद तो दी जा सकती है पर इन्हें अपने अंदर समाहित कर पाना बेहद कठिन होता है.

दो ग़ज़ब के गुण थे हमारे पिताश्री में. मैंने ये दो महागुण बड़े-बड़े धुरंधरों में नहीं देखे. उन उच्च शिक्षित सयानों में भी नहीं जिनसे मैं बहुत प्रभावित रहा. पहला गुण, किसी बड़ी से बड़ी बात का भी क्रेडिट नहीं लेना. मेरा छोटा भाई इसे बड़ी उम्दा ज़बान में कहता है – ‘डैडी का उसूल था, काम ख़त्म बात ख़त्म.’ फिर उसका कोई जिक्र, उल्लेख या यशगान कुछ नहीं. लोग आजकल एक नेता से बड़े प्रभावित हैं, जो अपने तो छोड़िए दूसरे के कामों का भी क्रेडिट लेने से नहीं चूकता. तभी मुझे बार-बार लगता है कि क्या फ़ायदा इतने ऊंचे पदों ओहदों पर पहुंचने का ? आप से तो कई आम आदमी ज़्यादा अच्छा स्टैंडर्ड भी रखते हैं और बेहतर आत्मा भी.

दूसरी ख़ूबी इससे भी अधिक लाजवाब थी. कभी किसी की निन्दा-बुराई न करना. मैंने बहुतों को यह कहते सुना कि हम से किसी की निन्दा बुराई नहीं होती. दरअसल यह उनका अहं बोल रहा होता है. वक़्त पड़ने पर ऐसे लोगों को मैंने बाक़ायदा पंचम सुर में निन्दागान गाते सुना है. लेकिन डैडी मेरी दुनिया में वाहिद ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने गॉसिप के नाते निन्दा करना तो दूर कभी उन लोगों को भी बुराई का एक शब्द न बोला जो सदा उनकी निन्दा में लिप्त रहे.

मैं तरस गया कि कभी वे भी किसी के व्यक्तित्व या किसी आदत पर कोई प्रतिक्रिया दें, पर वह कभी नहीं आई. मैं मानता हूं कि उनकी यह ज़बरदस्त क्वालिटी मेरे अंदर कॉम्प्लेक्स पैदा करती थी क्योंकि मैं चाह कर भी यह सब न कर पाया. शायद मैं अपने अहं की तुष्टि के लिए भी चाहता था कि वे भी कभी इस कमज़ोरी का परिचय दें, कभी तो किसी पर कोई टिप्पणी करें !

पर एक बार मेरे हाथ गोल्डन चांस लग ही गया. हमारे एक बहुत नज़दीकी रिश्तेदार थे, मम्मी की तरफ़ के. डैडी के शायद सबसे बड़े निंदक वही थे. कथित शरीफ़ टाइप के घरू बंदे. अब आप तो जानते ही हैं कि ये कथित शरीफ़ बंदे क्या आइटम होते हैं ? इधर ये शरीफ़ुद्दौला तो उधर हमारे पिताश्री, अपने ससुराल वालों में खलनायकी का साक्षात मानव रूप !

दुनिया की ऐसी कौन सी उलटी सीधी राह थी, जिस पर वे नहीं चले. तो ये जनाब उन्हें जम कर कोसते. बस डैडी का ज़िक्र होना चाहिए, हुज़ूर के पास कोई न कोई अप्रिय दास्तान मौजूद रहती, कभी कभी तो उनकी कल्पनाओं द्वारा गढ़ी हुई. ऐसे ही एक दिन बातों बातों में बड़ा ही आपत्तिजनक इल्ज़ाम डैडी पर मढ़ दिया. मैं मन ही मन सुलग गया पर कुछ बोल न सका. पता नहीं क्यों हमें ऐसे संस्कार दिए जाते हैं कि हम अपने बड़ों से अपने बाप तक की निन्दा सुन कर भी चुप रह जाते हैं.

मैने पचासियों बार डैडी के लिए उनका निन्दागान सुना था. मैं सोचता कि शायद मेरी मां से हमदर्दी की वजह से यह झुंझलाहट निकलती होगी या फिर नेचर का टकराव होगा. छोड़ो, जाने दो, बड़े हैं लेकिन वह आरोप इतना बेहूदा था कि मैं रोष से भर उठा. और भी ज़्यादा ग़ुस्सा इस बात का था कि यह सब अपने बच्चों के सामने कहा क्योंकि वे अपने अंकल, हमारे पिताश्री के बड़प्पन की तारीफ़ कर रहे थे.

इन जनाब के कुंठित, ईर्ष्यालु स्वभाव से अपने मानसशत्रु की प्रशंसा सुनी न गई और ये वाहियात बात कर गए. जाने क्यों मुझे उसी समय आभास हो गया था कि यह सब उनकी कल्पनाशीलता की उपज है, सच नहीं क्योंकि मैं अपने पिता और उनके दोस्तों के इतना नज़दीक रहा कि उनका कोई गुण अवगुण अथवा विवादित बात मुझसे शायद ही छुप सकी.

फिर भी मुझे लगा कि मम्मी से कन्फ़र्म किया जाए. मैंने बात की तो अवाक रह गईं वे ! पति की आलोचक अवश्य थीं पर अपनी नारीसुलभ शिकायतों के चलते, यों ही नहीं. बोलीं, ‘किसने कहा ?’ मैंने कहा, ‘जाने दो, बस यह बताओ कि क्या इसमें कुछ सच है ?’ उन्होंने साफ़ मना कर दिया और इस बात को बेहूदा बकवास करार दिया.

दो दिन बाद की बात है. हम दोनों बाप बेटा दफ़्तर में लंच कर रहे थे. रोज़ की तरह डैडी अपने हिस्से की दो रोटियां खा कर फलाहार कर रहे थे. मेरा खाना अभी चल रहा था. मैंने कहा, ‘डैडी आप फ़लां बंदे को थोड़ा लताड़ते क्यों नहीं ? कोई मौक़ा माहौल नहीं देखता, कुछ भी बोल डालता है आपके ख़िलाफ़. मैं उम्र के लिहाज़ में कुछ बोल नहीं पाता, और आप ने क़सम खा रखी है हर बकवास पर मुंह फेरने की.’

‘हुम’, इतना कह कर डैडी आराम से ख़रबूज़े का मज़ा लेने लग पड़े.

‘डैडी, इतनी भी मस्ती अच्छी नहीं होती. इसी वजह से कुछ ज़बानें हमेशा हद पार करती रही हैं. आपके आगे इनकी घिग्गी बंधी रहती है, हमारे सामने भड़ास निकालते हैं. आपको बुरा नहीं लगता ?’

कोई रिएक्शन नहीं, श्रीमान जी मज़े से ख़रबूज़े की अगली फांक गपकने लग पड़े. इस आत्मतोषी बंदे के मुंह से निंदावाक्य सुनने का गोल्डन चांस स्लिप होता देख मैं भी कमीनेपन पे उतर आया. पूरी बात बता दी. कैसे चली कहां ख़त्म हुई, सब कुछ. अब बोलो, है कि नहीं बुरी बात.

डैडी महाशय ने ख़रबूज़े का छिलका प्लेट में रखते हुए कुछ सेकंड अपलक मुझे देखा, शायद मेरा स्टैंडर्ड तोलते हुए. फिर आराम से उठे और बाहर धूप में रखी कुर्सी पर बैठ गए. मैंने हताशा में अंदर से आवाज़ दी, ‘यार कुछ तो बोलो डैडी, ये कोई तरीक़ा है !’

डैडी तब तक अपनी सिगरेट सुलगा चुके थे. अपने चिर परिचित अन्दाज़ में एक लम्बा कश लिया, ऊपर की ओर मुंह करते हुए मस्ती से धुआं उड़ा दिया.

अपने बेटे और अपने चिर निंदक दोनों को उत्तर दे दिया था उन्होंने. वह आदमी जो जीवन भर जाने कितने अल्फ़ाज़, कितने जुम्ले और कितनी कल्पनाएं उनकी बुराई में ख़र्च करता रहा, बदले में कोई प्रतिक्रिया न पा सका. डैडी ने अपने महानिंदक को एक ‘शब्द’ का भाव देने लायक़ भी न समझा था, हमेशा की तरह !

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