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‘व्यक्तिगत नुकसान’ क्या हो सकता है भला ? किसी को कोई आईडिया है ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 13, 2025
in गेस्ट ब्लॉग
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'व्यक्तिगत नुकसान' क्या हो सकता है भला ? किसी को कोई आईडिया है ?
‘व्यक्तिगत नुकसान’ क्या हो सकता है भला ? किसी को कोई आईडिया है ?

क्या आपको पता है कि भारत के झारखंड राज्य में कोयले के सबसे बड़े भंडार हैं, फिर भी इसी स्टेट में एक ऐसा कोयला-बिजली संयंत्र है, जिसकी खपत के लिए कोयला 9000 किमी दूर ऑस्ट्रेलिया से आता है, धामरा बंदरगाह पर उतरता है, फिर 600 किमी के रेलवे ट्रैक से गोड्डा शहर में पहुंचाया जाता है. आखिर क्यों ?

पीएम बनने के बाद हमारे महात्मा जी ने अगले ही वर्ष बांग्लादेश का दौरा किया था और शेख हसीना से बात कर अपने ‘खास दोस्त’ के कोयला बिजली पॉवर प्लांट से बिजली निर्यात का सौदा पटवाया था. फिर गोड्डा में दोस्त जी ने प्लांट लगाया, जिसके अल्ट्रा-क्रिटिकल तकनीक पर आधारित होने के कारण कम राख और हाई कैलोरिफिक वैल्यू वाले कोयले की आपूर्ति के लिए दोस्त को ऑस्ट्रेलिया में कारमाइकल खदान दिलवाई गयी.

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तत्कालीन नियमों के अनुसार भारत की कोई कंपनी तभी बिजली निर्यात कर सकती थी, जब उसका उत्पादन सरप्लस में हो. सौदे के समय दोस्त जी इस स्लैब में नहीं थे पर फिर भी उन्हें विशेष छूट दी गयी. एक नियम यह भी था कि 25% बिजली घरेलू उपभोक्ताओं के लिए खर्च की जाएगी पर झारखंड भाजपा सरकार ने नियमों में बदलाव कर दोस्त जी को 100% बिजली निर्यात करने की छूट दे दी. उसके बाद तमाम पर्यावरण कारणों को ताक पर रख कर पानी आपूर्ति के लिए चिरु नदी की बजाय 100 किमी दूर से गंगा नदी तक पाइपलाइन बिछाने की अनुमति दी गयी.

अब ऑस्ट्रेलिया से कोयला आएगा तो जाहिर सी बात है कि बिजली की लागत बढ़ेगी. इससे बचने के लिए दोस्त की कंपनी को ‘विशेष आर्थिक क्षेत्र’ अर्थात SEZ का दर्जा देकर कस्टम, जीएसटी, कार्बन टैक्स, अलाना टैक्स, फलाना टैक्स इत्यादि माफ किये गए. 5 साल के लिए आयकर से 100% छूट. मोटा-माटी दोस्त जी को एक अरब डॉलर की सरकारी रियायत प्रदान की गई.

अब दोस्त जी की चतुराई देखिए. दोस्त जी बांग्लादेश को बिजली भुगतान का जो बिल थमाते हैं, उसमें वे तमाम टैक्स वसूले जाते हैं, जिनकी रियायत वे भारत सरकार से प्राप्त कर रहे हैं. कुल मिलाकर अन्य कंपनियों के मुकाबले बांग्लादेश को दोस्त जी से खरीदी गई बिजली 27 से 63 परसेंट महंगी पड़ती है.

दोस्त जी चालाक इतने हैं कि शेख हसीना से पहले ही 25 साल का एग्रीमेंट करवा लिए थे कि कैपेसिटी चार्ज के नाम पर हर साल 4 हजार करोड़, मतलब 25 साल में एक लाख करोड़ दोस्त जी वसूलेंगे ही वसूलेंगे, भले ही इस दौरान कोई बिजली न खरीदी जाए.

ठीक है, दोस्त तरक्की करें, अच्छी बात है पर कुछ नियम-कायदा-समाज देखना पड़ता है. आज बांग्लादेश में इस परियोजना की समीक्षा कर इसे रद्द किए जाने की मांग उठ रही है. शेख हसीना के खिलाफ जब बगावत हुई तो विद्रोह के कई कारणों में एक बड़ा कारण ‘दोस्त जी की बिजली परियोजना’ भी थी, जिसके आधार पर शेख हसीना पर विदेशी कंपनियों को अनुचित लाभ पहुंचाने के आरोप लगे. तख्तापलट पलट हुआ. भारत विरोधी स्वर गूंजे. प्रतिशोध के नाम पर तमाम हिंदुओं को प्रताड़ित किया गया.

अब हिंदुओं के लिए तो महात्मा जी के मुंह से कभी एक शब्द निकला नहीं, अलबत्ता जैसे ही हसीना जी बांग्लादेश छोड़ कर भागी, महात्मा जी को अंदेशा हो गया कि भविष्य में दोस्त की परियोजना खतरे में अवश्य आएगी. इसलिए हसीना के बांग्लादेश छोड़ने के मात्र एक हफ्ते के अंदर भारत सरकार ने अपने नियमों को फिर से बदल कर दोस्त जी को निर्यात करने की बजाय घरेलू खपत की भी अनुमति दे दी. है न कमाल बात ?

जगजाहिर है कि वर्तमान सरकार में एक उद्योगपति के लिए तमाम नियम बदल दिए जाते हैं. सरकारी स्तर पर उसे ठेके दिलवाए जाते हैं. वो डूबता है तो सरकारी कंपनियों के तीस हजार करोड़ उसे दिलवाए जाते हैं. आखिर ये विशेष कृपा एक आदमी पर क्यों ?

चलिए, देश का आदमी तरक्की करे तो अच्छी बात है पर बांग्लादेश से लेकर श्रीलंका, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और तमाम मुल्क – जहां जहां इस दोस्त ने पांव पसारे हैं, पता करिये कि वे लोग किस तरह भारत विरोध के सुर अलाप रहे हैं. स्थानीय समुदाय, अधिग्रहण, पर्यावरण, कार्बन एमिशन इत्यादि को ताक पर रख कर एक आदमी की जेब भरी जा रही है.

भ्रष्टाचार और घूसखोरी के तमाम आरोप लगते रहे हैं. एक फ़ाइल तो अमेरिका में खुली हुई है, जिसमें दोस्त जी पर घूसखोरी और भ्रष्टाचार के पुख्ता सबूत भी हैं. अमेरिका तो वैसे भी जासूसी में महारथी है. न जाने कौन-कौन से राज ट्रंप दबोचे बैठा है. खुल कर ‘पॉलिटिकल कैरियर खत्म कर देने’ जैसी बात एक देश का मुखिया ऐसे ही कह देगा क्या ?

तो बेसिकली मैं कहना यह चाहता हूं कि बार-बार अपमानित होने के बाद भी हमारे महात्मा जी ट्रंप का नाम अपनी जुबान पर नहीं लाते, टोटल सरेंडर किए बैठे हैं, उस गली में जाना ही छोड़ दिये – जहां ट्रंप आ सकता हो तो ये सब ऐवई नहीं है. हो सकता है कि महात्मा जी दोस्ती का फर्ज निभाते हुए ही चुप हो – उनका पुराना रिकॉर्ड है।

पर एक बात आज तक समझ न आई. एग्रीकल्चर सेक्टर में अमेरिका की एंट्री को लाल झंडी दिखाने और टैरिफ लगने से एक दिन पहले महात्मा जी ने जब पहली और आखिरी बार इस बाबत बयान दिया था तो ये क्यों कहा था कि – मेरा ‘व्यक्तिगत नुकसान’ हो जाएगा ? व्यक्तिगत नुकसान क्या हो सकता है भला ? किसी को कोई आईडिया है ?

  • विजय सिंह ठकुराय

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