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‘तुम मुझे जेल भेजो, मैं तुम्हें स्कूल भेजूंगा’ – अरविन्द केजरीवाल

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 29, 2022
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'तुम मुझे जेल भेजो, मैं तुम्हें स्कूल भेजूंगा' - अरविन्द केजरीवाल
‘तुम मुझे जेल भेजो, मैं तुम्हें स्कूल भेजूंगा’ – अरविन्द केजरीवाल

भाजपा के पास हर सवाल का जवाब है. आप जब भी उससे सहमत नहीं होंगे और कोई सवाल पूछेंगे तो उसका सीधा जवाब होता है – ‘राज्य/देश छोड़कर चले जाएं.’ पहले वह पाकिस्तान जाने के लिए कहते थे, लेकिन जब से अन्तर्राष्ट्रीय गुणवत्ता में पाकिस्तान को कई मामलों में भारत से बेहतर बताया जाने लगा है, तब से भाजपाई अब युगांडा जाने के लिए कहने लगे हैं. ऐसे ही एक सवाल के जवाब में गुजरात के शिक्षा मंत्री जीतू वघानी ने सीधा कहा – ‘जिसे गुजरात की शिक्षा अच्छी नहीं लगती है, वे राज्य छोड़कर जा सकते हैं. मजेदार है न भाजपाईयों का बयान ?’

मामला शिक्षा व्यवस्था का है. दरअसल देश में तीन तरह के शिक्षा मॉडल काम कर रहे हैं. पहला मॉडल कम्युनिस्ट राज्य केरल का है, जहां संसदीय कम्युनिस्ट पार्टी के शासन तले शिक्षा व्यवस्था चल रही है और शत प्रतिशत साक्षरता दर हासिल है. दूसरा मॉडल आम आदमी पार्टी का दिल्ली मॉडल है, जहां आम आदमी पार्टी के नेतृत्व में शिक्षा व्यवस्था को चलाया जा रहा है. और तीसरा मॉडल है गुजरात का, जहां पिछले 27 साल से राज कर रही भाजपा का शिक्षा मॉडल है, जिसका नेतृत्व नरेन्द्र मोदी सरकार रही है.

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कम्युनिस्टों की केरल वाली शिक्षा पद्धति का विस्तार अपने राज्य के बाहर कम ही होता है, हलांकि यह इन तीनों मॉडल में सबसे बेहतरीन मॉडल है, लेकिन फिलहाल देश के राजनीति के केन्द्र में नरेन्द्र मोदी की गुजरात शिक्षा मॉडल और आम आदमी पार्टी के दिल्ली शिक्षा मॉडल बहस के केन्द्र में है. यह दोनों शिक्षा मॉडल इसलिए मौजूं है कि एक ओर आम आदमी पार्टी अपनी शिक्षा मॉडल के बूते देश के राजनीति की केन्द्र में आ गई है तो वहीं गुजरात मॉडल का हवा दिखाकर नरेन्द्र मोदी केन्द्र की सत्ता पर काबिज हो गया है. यही कारण है कि आज शिक्षा मॉडल देश के राजनीति के केन्द्र में आ गया है.

गुजरात मॉडल
मोदी का फर्जी गुजरात मॉडल

इसमें एक मजेदार बात यह भी है कि गुजरात मॉडल वाली केन्द्र की नरेन्द्र मोदी वाली भाजपाई सरकार आम आदमी पार्टी के शिक्षा मॉडल वाली सरकार के मंत्रियों, विधायकों के यहां सीबीआई, ईडी वगैरह-वगैरह की छापामारी कर फर्जी मुकदमों में जेल भेज रही है तो वहीं आम आदमी पार्टी की शिक्षा मॉडल वाली सरकार गुजरात मॉडल वाली नरेन्द्र मोदी को स्कूल पढ़ने भेज रही है. यानी अब लड़ाई का मुख्य केन्द्र शिक्षा के दिल्ली बनाम गुजरात मॉडल पर आकर टिक गई है. यानी, आम आदमी पार्टी ने शिक्षा को ठीक चुनाव का मुख्य मुद्दा बना दिया है.

हम बारी-बारी से दोनों मॉडल की विशेषताओं को यहां समझने की कोशिश करते हैं. पहले हम नरेन्द्र मोदी के हवाई गुजरात मॉडल को देखते हैं.

मोदी के शिक्षा का गुजरात मॉडल

  • अमीर और गरीब बच्चों के लिए अलग-अलग स्कूल
  • गुजरात के प्राइवेट स्कूलों में 44 लाख बच्चे पढ़ रहे हैं. 53 लाख बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं.
  • 700 सरकारी प्राइमरी स्कूलों में एक-एक शिक्षक सभी विषयों को पढ़ा रहे हैं. ये सभी स्कूल कक्षा 1 से कक्षा 7 तक हैं.
  • छात्रों द्वारा प्राथमिक स्तर पर स्कूल छोड़कर जाने की सबसे बड़ी वजह यह है कि स्कूलों में शिक्षकों का नहीं होना है.
  • पिछले दो वर्षों में गुजरात में 86 प्राथमिक स्कूल बंद कर दिए गए हैं. वहीं 491 को अन्य स्कूलों के साथ मर्ज कर दिया गया.
  • यूडीआईएसई (UDISE) की साल 2018-19 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में गुजरात मॉडल वाली नरेन्द्र मोदी की सरकार ने 50 हजार से अधिक सरकारी स्कूलों को बंद कर दिया. इस रिपोर्ट के अनुसार सरकारी स्कूलों की संख्या जो 2018-19 में 1,083,678 थी, 2019-20 में घटकर 1,032,570 हो गई. यानी कि नरेन्द्र मोदी की सरकार ने देश भर में 51,108 सरकारी स्कूल बंद कर दिया. यह संख्या सबसे अधिक भाजपा के रामराज्य वाली उत्तर प्रदेश में घटी जहां सरकारी स्कूलों की संख्या में 26,074 स्कूलों को बंद कर दिया गया. वहीं गुजरात में 6,000 सरकारी स्कूलों को बंद किया गया.

इसका परिणाम यह निकला कि अब जब गुजरात के चुनाव में आम आदमी पार्टी ने शिक्षा के दिल्ली मॉडल को मुख्य केन्द्र में ले आया है तब गुजरात में भारी संख्या में स्कूलों के बंद होने के कारण नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के स्कूलों को ढ़ूढ़ने निकले तो उन्हें उसके प्रचार के लिए कोई भी स्कूल नहीं मिला. तब अन्त में एक टेंट में फ्लैक्स से एक फर्जी स्कूल और पांच बच्चों, एक शिक्षिका का इंतजाम कर तस्वीर खीचकर गुजरात मॉडल का प्रचार समूचे देश में किया गया, जिसकी कलई अगले ही दिन खुल गई जब पत्रकारों का दल उस स्कूल को ढ़ूंढ़ने निकला तो वह गायब हो चुका था.

यानी, नरेन्द्र मोदी का गुजरात शिक्षा मॉडल बकवास है. यह आम आदमी को स्कूलों से दूर रखकर अगली पीढ़ियों को अनपढ़ बनाने की एक प्रतिक्रियावादी कोशिश है, जैसा कि हम अन्य मामलों में गुजरात के हवाई विकास को देख चुके हैं.

अरविन्द केजरीवाल का दिल्ली शिक्षा मॉडल

अरविन्द केजरीवाल का दिल्ली शिक्षा मॉडल

अरविन्द केजरीवाल के दिल्ली शिक्षा मॉडल का दृष्टिकोण इस विश्वास पर आधारित है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करना देश के सभी नागरिकों का अधिकार है. इस प्रकार दिल्ली में शिक्षा के एक ऐसे मॉडल को विकसित किया गया है, जो मुख्यतः 5 प्रमुख घटकों पर आधारित है.

1. स्कूल के बुनियादी ढांचे में परिवर्तन

दिल्ली के शिक्षा मॉडल का पहला घटक स्कूल के बुनियादी ढांचे में परिवर्तन से संबंधित है. बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे स्कूल न केवल प्रशासन और सरकार की उदासीनता को दर्शाते हैं, बल्कि इनसे पढ़ने एवं पढ़ाने को लेकर छात्रों तथा शिक्षकों के उत्साह में भी कमी आती है. इस समस्या से निपटने के लिये दिल्ली सरकार ने सर्वप्रथम स्मार्ट बोर्ड, स्टाफ रूम, ऑडिटोरियम, प्रयोगशाला और पुस्तकालय जैसी आधुनिक सुविधाएँ प्रदान की. इसके साथ ही दिल्ली के अधिकांश विद्यालयों में आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित नई कक्षाओं का निर्माण किया गया.

आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली सरकार ने वर्ष 2017-18 में दिल्ली के विद्यालयों में कुल 10,000 कक्षाओं का निर्माण कराया था. ज्ञात हो कि दिल्ली सरकार ने अपने बजट का 25 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा के क्षेत्र में निवेश किया है. इसके अलावा सरकार ने प्रधानाध्यापकों और शिक्षकों से स्कूलों की स्वच्छता, रख-रखाव और मरम्मत आदि के बोझ को कम करने के लिये सभी स्कूलों में एक प्रबंधक की नियुक्ति की है. इस प्रकार के अधिकांश प्रबंधक सेवानिवृत्त सैनिक हैं.

2. शिक्षकों और प्रधानाध्यापकों का क्षमता निर्माण

शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था दिल्ली के शिक्षा मॉडल का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष है. इसके तहत शिक्षकों को उनके विकास के अवसर भी प्रदान किये गए. दिल्ली के सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और IIM अहमदाबाद जैसे उत्कृष्ट संस्थानों में कार्यरत विद्वानों से सीखने का अवसर प्रदान किया गया.

वर्ष 2016 में प्रधानाध्यापक नेतृत्व विकास कार्यक्रम की शुरुआत की गई. इस कार्यक्रम के तहत 10 प्रधानाध्यापकों का एक समूह प्रत्येक माह में एक बार विद्यालय में नेतृत्त्व संबंधी चुनौतियों पर चर्चा करते हैं और संयुक्त स्तर पर उनसे निपटने के लिये उपायों की तलाश करते हैं.

3. विद्यालय प्रशासन को जवाबदेह बनाना

दिल्ली के सरकारी विद्यालय मुख्य रूप से अपनी अनुशासनहीनता के लिये काफी प्रसिद्ध थे, इस चुनौती से निपटने के लिये दिल्ली सरकार ने त्रि-स्तरीय निगरानी एवं निरीक्षण तंत्र स्थापित किया, जिसमें शिक्षा मंत्री ने स्वयं विद्यालयों का निरीक्षण किया. इसके अलावा शिक्षा निदेशालय (DoE) के ज़िला अधिकारियों ने अपने ज़िलों के अंतर्गत आने वाले स्कूलों के प्रबंधन की निगरानी और ट्रैकिंग भी की.

अंतिम और सबसे महत्त्वपूर्ण स्तर पर स्कूल प्रबंधन समितियों (School Management Committees – SMC) का पुनर्गठन किया गया. मौजूदा समय में सभी SMCs का वार्षिक बजट लगभग 5-7 लाख रुपए है. साथ ही SMCs को यह छूट दी गई है कि वे इस धन को किसी भी सामग्री या गतिविधि पर खर्च कर सकते हैं.

4. पाठ्यक्रम में सुधार

वर्ष 2016 के आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली के सरकारी विद्यालयों में 9वीं कक्षा में असफलता दर 50 प्रतिशत से भी अधिक है. आधारभूत कौशल के अभाव को सर्वसम्मति से इसका मुख्य कारण स्वीकार किया गया. नियमित शिक्षण गतिविधियों की शुरुआत की गई, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी बच्चे पढ़ना, लिखना और बुनियादी गणित का कौशल सीखें.

इसी प्रकार नर्सरी से कक्षा 8 तक के बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य हेतु ‘हैप्पीनेस पाठ्यक्रम’ की शुरुआत की गई है. कक्षा 9 से 12 तक के बच्चों में समस्या-समाधान और विचार क्षमताओं को विकसित करने के लिये ‘उद्यमशीलता पाठ्यक्रम’ की शुरुआत की गई है.

5. निजी विद्यालयों की फीस में स्थिरता

उल्लेखनीय है कि उक्त चारों घटकों ने केवल दिल्ली के सरकारी विद्यालयों को प्रभावित किया जबकि दिल्ली के निजी विद्यालयों में भी काफी अधिक संख्या में विद्यार्थी मौजूद हैं. पहले अक्सर यह देखा जाता था कि दिल्ली के सभी निजी स्कूल वार्षिक आधार पर अपनी फीस में 8-15 प्रतिशत की वृद्धि करते थे. दिल्ली सरकार ने सभी निजी विद्यालयों के लिये यह अनिवार्य किया कि वे फीस प्रस्ताव को लागू करने से पूर्व किसी भी एक अधिकृत चार्टर्ड एकाउंटेंट (CA) से उसकी जांच कराएंगे.

अरविंद केजरीवाल के शिक्षा मॉडल के खास 10 महत्वपूर्ण विशेषता

  • भारत में सबसे अधिक शिक्षा बजट दिल्ली का शिक्षा बजट है, जिसने पिछले छह सालों के लिए सरकार के कुल बजट का 25 प्रतिशत खर्च स्कूल पर करता है, जो कि पूरे देश में सबसे ज्यादा है.
  • सिर्फ छह सालों में दिल्ली के स्कूलों में कक्षाओं की संख्या 17,000 से बढ़ कर 37,000 हुई.
  • विश्वस्तरीय आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे स्विमिंग पूल, ऑडिटोरियम, प्रयोगशालाएं, लाइब्रेरी आदि से अब बच्चों को अपने स्कूल में पढ़ते हुए अच्छा लगता है.
  • दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में कैम्ब्रिज, सिंगापुर, फ़िनलैंड में दिल्ली के सरकारी स्कूलों के शिक्षक प्रशिक्षित होते हैं और अपनी प्रशिक्षण को दिल्ली के बच्चों को पढ़ाने में इस्तेमाल करते हैं.
  • राजनीतिक नेतृत्व का सीधा जुड़ाव: मुख्यमंत्री केजरीवाल व्यक्तिगत रूप से सरकारी स्कूलों के बच्चों, शिक्षकों और अभिभावकों के साथ नियमित रूप से बातचीत करते हैं, जिससे उनका मनोबल बढ़ता है. पिछले साल ही उन्होंने प्ज्व् में दिल्ली सरकार के एक स्कूल में पैरेंट-टीचर मीटिंग में भाग लिया था. डिप्टी मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी नियमित रूप से स्कूलों का दौरा करते हैं और सारे घटनाक्रम पर नजर रखते हैं.
  • विशेषज्ञ सलाहकार: ऑक्सफोर्ड-शिक्षित सलाहकार और आम आदमी पार्टी विधायक आतिशी के नेतृत्व में, दिल्ली सरकार की कोर एजुकेशन टीम ने गैर-सरकारी संगठनों और अन्य मॉडल स्कूलों से सर्वश्रेष्ठ टैलेंट और शिक्षा सुधारों को दिल्ली के सरकारी स्कूलों में लाई, जिससे दिल्ली के बच्चों को लाभ हुआ.
  • मेगा पैरेंट टीचर मीटिंग: दिल्ली सरकार बच्चों के प्रदर्शन को बेहतर करने के लिए उनके माता-पिता को बहुत करीब से शामिल करने में विश्वास करती है. दिल्ली एकमात्र राज्य है जो बड़े निजी स्कूलों के समान नियमित रूप से मेगा पैरेंट-टीचर मीटिंग का आयोजन करते हैं, जिससे बच्चों के माता-पिता को शिक्षकों से उनके बच्चों के प्रदर्शन के बारें में नियमित रूप से पता चलता रहे.
  • एस्टेट मैनेजरों के रूप में पूर्व-सेना अफसर: दिल्ली के बड़े निजी स्कूलों की तरह, हर सरकारी स्कूल का मैनेजमेंट पूर्व-सेना अफसरों के हाथों में है, जिन्हें मुख्यमंत्री केजरीवाल द्वारा एस्टेट मैनेजर के रूप में भर्ती किया जाता है. स्कूल के प्रिंसिपल केवल स्कूल के शिक्षाविदों की देखभाल करते हैं, जबकि एस्टेट मैनेजर अन्य पहलुओं की देखभाल करते हैं.
  • दिल्ली सरकार के स्कूल अपने छात्रों में स्पेशल स्किल्स विकसित करने के लिए कईं नए तरह के कार्यक्रम चला रहे हैं. उदाहरण के लिए, यह सुनिश्चित करने के लिए कि हर बच्चा पढ़ने और लिखने में सक्षम हो, स्कूलों ने मिशन चुनौती और मिशन बुनियाद शुरू किया. इसी तरह, कई अन्य नए तरह के कार्यक्रमों को अपनाया जाता है.
  • तकनीकी सुविधा: सभी दिल्ली सरकार के स्कूलों के शिक्षक छात्रों को पढ़ाने के लिए मोबाइल टैबलेट का उपयोग करते हैं. डिजिटल शिक्षा की सुविधा के लिए अधिकांश उच्च कक्षाओं में प्रोजेक्टर का उपयोग किया जाता है, ताकि बच्चों को दुनिया के ज्ञान से अवगत कराया जा सके.

अन्य राज्य सरकार की प्रतिक्रिया

तेलंगाना

अभी कुछ समय पहले ही तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव, जो अरविन्द केजरीवाल के दिल्ली शिक्षा मॉडल को देखने आये थे, ने मीडिया से बात करते हुए कहा था कि –

‘शिक्षा के मामले में दिल्ली सरकार का जो प्रयास हुआ है, वो बहुत ही प्रशंसनीय है. उसके नतीजे भी देखने को मिल रहे हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि अन्य राज्यों में छात्रों के मॉर्क्स पर अधिक ध्यान दिया जाता है, लेकिन दिल्ली सरकार ने मार्क्स से हटकर बच्चों को बिजनेस करने, उनको इंटरप्रिंयोर बनाने प्रयास किया है और बच्चों को नौकरी तलाशने की बजाय नौकरी देने का रास्ता बताने का काम किया है. मैंने बच्चों से बात भी की.
‘सरकार के इन प्रयासों से उनको काफी कामयाबी भी मिली है. बच्चों की सोच और विचार ही बदल गया है. इस प्रकार का सरकार द्वारा प्रयास आमतौर पर देश में नहीं हो रहा है. दिल्ली सरकार द्वारा जो कुछ भी किया है, आगे चलकर इसका परिणाम बहुत ही अच्छा मिलेगा. कुछ दिन पहले, संभवतः दिल्ली विधानसभा का चुनाव के दौरान कुछ मीडिया वाले कनॉट प्लेस में आम महिलाओं से इंटरव्यू ले रहे थे. वो लोग कह रहे थे कि बिना किसी फिक्र के अब वो लोग अपने बच्चों का दाखिला दिल्ली सरकार के स्कूलों में करा सकते हैं. हमारा खर्चा भी कम पड़ेगा और हमारे बजट में बचत हो जाएगी. उस दिन यह सुनकर बड़ी प्रसन्नता मिली.
‘दिल्ली सरकार में वाकई में बहुत ही सराहनीय, प्रशंसनीय और अदभुत कार्य हुआ है, मैं इसके लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जी को तहे दिल से बधाई देता हूं. दिल्ली के नागरिक खुशकिस्मत हैं कि इतनी अच्छी सेवाएं उनको मिल रही है. ऐसे प्रयास हर जगह होने चाहिए. अगर ऐसा हो जाए, तो हमारे हिन्दुस्तान का कल्याण हो जाए. दिल्ली सरकार ने काफी अच्छा प्रयास किया है. दिल्ली सरकार को शिक्षकों को ट्रेनिंग देने के लिए अन्य देशों में भेजना पड़ा. दिल्ली सरकार ने करिकुलम, एक्टिविटिज और बच्चों को एंटरप्रिंयोर बनाने के तौर-तरीके सीखने के बारे में काफी प्रयास किया है. अब हम कम खर्चे में दिल्ली से ही ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे. जो दिल्ली के स्कूलों में काम हुआ है, वैसा पूरे देश के स्कूलों में होना चाहिए.’

बिहार

इसी बिहार में जबसे सत्ता परिवर्तन के बाद राजद-जदयू के गठबंधन की सरकार बनी है, आम आदमी पार्टी के शिक्षा का दिल्ली मॉडल को अपनाने की ओर ध्यान आकृष्ट हुआ है. बिहार के नवनियुक्त शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर ने दिल्ली स्कूल मॉडल के लिए मुख्यमंत्री केजरीवाल की तारीफ की और कहा कि बिहार में भी स्कूल शिक्षा प्रणाली में आमूल-चूल बदलाव की जरूरत है और इसके लिए उनकी सरकार दिल्ली और अन्य राज्यों की शिक्षा प्रणालियों का अध्ययन करने के लिए एक टीम भेजेगी.

राष्ट्रीय जनता दल के नेता सह बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर ने कहा था, ‘लोग राष्ट्रीय राजधानी में अरविंद केजरीवाल के शिक्षा मॉडल की तारीफ कर रहे हैं. हम अपने अधिकारियों को दिल्ली समेत कुछ खास राज्यों में उनकी सफल शिक्षा प्रणाली का अध्ययन करने के लिए भेजेंगे.’

तमिलनाडु

दिल्ली के शिक्षा मॉडल को अब तामिलनाडु ने भी अपनाया है. दिल्ली के शिक्षा मॉडल से प्रभावित होकर तमिलनाडु सरकार ने स्कूल ऑफ एक्सीलेंस और मॉडल स्कूल स्थापित करना शुरू कर दिया है. तमिलनाडु के शिक्षा मंत्री ने दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को स्कूल ऑफ एक्सीलेंस और मॉडल स्कूलों के शुभारंभ अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि शामिल होने के लिए निमंत्रित किया है. केजरीवाल ने तमिलनाडु सरकार के शिक्षा मंत्री के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया है.

और अंत में …

आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के जिस शिक्षा मॉडल पर अथक व अबाघ गति से काम कर रही है, उसकी प्रशंसा न केवल देश के अन्दर बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर की जा रही है. यही कारण है कि नरेन्द्र मोदी के विकृत व प्रतिगामी गुजरात मॉडल अरविन्द केजरीवाल के दिल्ली शिक्षा मॉडल के सामने कहीं नहीं टिकता, और उसे फर्जी स्कूल बनाकर अपना प्रचार या कुप्रचार करना पड़ता है.

अरविन्द केजरीवाल और उनकी सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य के सवाल पर जिस तरह पूरी दृढता से कार्य कर रही है, यदि यह आगे भी कायम रह सका तो केजरीवाल की दिल्ली मॉडल समूचे देश में लागू होगी और भारत का एक नया नक्शा दुनिया के सामने होगी.

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