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APMC मंडी सिस्टम पर मक्कार मोदी का आश्वासन कितना भरोसेमंद

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 27, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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इसे लोकतंत्र की गंभीर खामियों में गिना जाना चाहिए जब एक आवारागर्द अनपढ़ गुंडा देश की सत्ता पर काबिज हो जाता है और देश के तमाम संवैधानिक ताने-बाने को अस्त-व्यस्त कर देता है. भारत के लोकतंत्र के साथ इससे ज्यादा भद्दे मजाक की कल्पना नहीं की जा सकती जब सरेआम झूठ बोलकर एक अनपढ़ हत्यारा गुंडा नरेन्द्र मोदी 2014 ई. में देश की सत्ता पर काबिज हो गया और देश को नफरतों के बीच डुबोकर देश के तमाम संवैधानिक संस्थाओं में अपने गुंडों को भेजकर अब देश को निजी कंपनियों की मिल्कियत बना रहा है.

एक अनपढ़ गुंडा अपने संगठित गिरोह के साथ देश को बेचने की कबायद जिस तेजी और ढ़िठाई के साथ कर रहा है, वह जनता के विरोध होने पर उसी निर्लज्जता से झूठ बोलकर पलट भी जाता है. ऐसा ही झूठ उसने एनआरसी-सीएए के मामले में भी बोला था और अब ऐसी ही निर्लज्जता का प्रदर्शन वह किसान विरोधी बिल के संबंध में भी बोल रहा है, जब वह सरेआम झूठ बोल रहा है कि मंडियों को खत्म नहीं किया जायेगा.

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महेन्द्र सिंह मोदी के झूठ पर व्यंग्य करते हुए सोशल मीडिया पर लिखते हैं, ‘प्रधान सेवक (मोदी) ने कहा है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की प्रथा समाप्त नहीं होगी. सब जानते हैं कि प्रधान सेवक अपनी बात पर अडिग रहते हैं. उन्होंने जो कहा है वह पत्थर की लकीर है. फिर चाहे हो पेट्रोल-डीजल के बारे में कहा हो, काले धन के बारे में कहा हो, नोटबंदी के बारे में कहा हो, चीन के बारे में कहा हो, कोरोना के बारे में कहा हो, आधार के बारे में कहा हो, मनरेगा के बारे में कहा हो, जीएसटी के बारे में कहा हो, स्मार्ट सिटीज के बारे में कहा हो, एफडीआई के बारे में कहा हो, एनआरसी के बारे में कहा हो, डिटेंशन सेंटर के बारे में कहा हो. कम से कम उनका भरोसा तो करना चाहिए. जो प्रधान सेवक शिखर धवन की उंगली टूट जाने पर हिल जाता हो, ऐसे संवेदनशील व्यक्ति की बात पर भरोसा करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए ?’

बहरहाल, मक्कार मोदी के APMC मंडी सिस्टम पर कहे गए इस निर्लज्ज झूठ का पर्दाफाश कर रहे हैं, भारत के सबसे विश्वसनीय, मैग्सेसे अवार्ड प्राप्त अंतरराष्ट्रीय पत्रकार रविश कुमार.

APMC मंडी सिस्टम पर मक्कार मोदी का आश्वासन कितना भरोसेमंद

मंडियों को ख़त्म करने के लिए क़ानून की ज़रूरत नहीं है. उनके विकास का बजट बंद कर दो. उनके हाल पर छोड़ दो. तभी तो पिछले साल तक निर्मला सीतारमन साफ-साफ कह रही थी कि राज्यों को समझाया जा रहा है कि वे मंडियां ख़त्म कर दें. निर्मला का यह बयान अपने आप में प्रमाण है कि मोदी सरकार मंडियों को ख़त्म करने का प्रयास कर रही थी. फिर प्रधानमंत्री को यह नहीं कहना था कि मंडियों को ख़त्म करने की बात झूठ है.

हम चाहते हैं कि राज्य APMC मंडियों को ख़त्म कर दें – वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन. हेडलाइन सही है. डेटलाइन थोड़ी पुरानी है. यानी यह ख़बर इन दिनों की नहीं, 12 नवंबर, 2019 की है. हिन्दू बिज़नेसलाइन में छपी थी. दिल्ली में नाबार्ड के छठे ग्रामीण और कृषि वित्त के छठे विश्व कांग्रेस में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन बोल रही थी. वित्त मंत्री साफ़-साफ़ कह रही हैं कि APMC की मंडियां ख़त्म हो जानी चाहिए, इसके लिए सरकार राज्यों को समझा रही है. निर्मला सीतारमन का यह बयान यू -ट्यूब पर है, जिसे ब्लूमवर्ग क्विंट ने प्रसारित किया था. उनके बयान के उस हिस्से का अंग्रेज़ी में शब्दश: पेश कर रहा हूं और फिर हिन्दी अनुवाद भी दूंगा.

अंग्रेज़ी भाषण: 

I want to place emphasis on eNAM…It is being pushed by the union govt and many States have agreed to take it up at their level. Together with this we are also making sure that the states are cajoled to reject the APMC – it has severed its purpose at one point, no doubt. But today there are many difficulties with it. And at every state level it has become not so efficient. There are other things associated with but I will not go into in full detail. But I wish many states – and we are talking with states – to dismantle that and move to eNAM for farmers.”

हिन्दी अनुवाद:

मैं ई-नाम पर ज़ोर देना चाहती हूं. केंद्र सरकार इसका प्रचार कर रही है और कई राज्यों ने इसे अपने स्तर पर शुरू करने के लिए रज़ामंदी दे दी है. इसके साथ ही हम ये सुनिश्चित कर रहे हैं कि राज्यों को समझाया जाए कि APMC को रिजेक्ट कर दें. एक समय पर एपीएमसी ने अपना काम किया है, इस बात में कोई शक नहीं है, मगर आज इसमें कई परेशानियां हैं. और राज्य के स्तर पर भी ये इतना कारगर नहीं है. (इसमें और भी चीज़ें शामिल हैं मगर मैं बहुत ज़्यादा डिटेल में नहीं जाना चाहती हूं) मगर मैं चाहती हूं कि राज्य – और हम उनसे बात कर रहे हैं – इसे ख़त्म करें और किसानों के लिए ई-नाम को अपनाएं. (निर्मला सीतारमन, 12 नवंबर 2019)

केंद्र सरकार ने खेती को लेकर तीन कानून बनाए हैं. इस कानून को लेकर किसानों के बीच कई तरह के सवाल हैं. उनकी पहली आशंका यही है कि मंडी सिस्टम ख़त्म किया जा रहा है. सरकार की तरफ से प्रधानमंत्री आगे आते हैं और कहते हैं कि विपक्ष झूठ फैला रहा है कि मंडी सिस्टम ख़त्म किया जा रहा है. प्रधानमंत्री को भी पता नहीं होगा कि उनकी वित्त मंत्री 10 महीने पहले कह चुकी हैं कि राज्यों को समझाया जा रहा है कि APMC मंडी सिस्टम ख़त्म कर दिया जाए.

प्रधानमंत्री अख़बार को चाहिए कि वे पहले अपने वित्त मंत्री से पूछें कि किन राज्यों से APMC ख़त्म करने की बात चल रही थी, बातचीत की प्रगति क्या थी ? तब उन्हें अख़बारों में अपने नाम के साथ विज्ञापन देना चाहिए कि मंडियां ख़त्म नहीं होंगी. वित्त मंत्री के निजी राय कह कर खंडन करने से पहले ठीक से अपने बयान को सुन लें. वे साफ-साफ कह रही हैं कि ‘APMC की उपयोगिता समाप्त हो चुकी है. राज्यों को समझाया जा रहा है कि वे इसे ख़त्म कर दें.’ अगर सरकार की यह राय थी तो दस महीने बाद प्रधानमंत्री ने किस आधार पर गारंटी दी है कि मंडियां ख़त्म नहीं होंगी. किसान कैसे किसी पर आसानी से भरोसा कर ले ?

14 अप्रैल, 2016 को मंडियों को एक प्लेटफार्म पर लाने के लिए ई-नाम की योजना लाई गई. चार साल में 1000 मंडियां ही जुड़ पाई हैं, जबकि देश में करीब 7000 मंडियां हैं. मंडियों के ख़त्म करने के वित्त मंत्री के बयान के एक महीना बाद 12 दिसंबर, 2019 को हुकूमदेव नारायण की अध्यक्षता वाली कृषि मामलों की स्थायी समिति अपनी एक रिपोर्ट पेश करती है. हुकूमदेव नारायण बीजेपी के सांसद थे.

इस रिपोर्ट के अनुसार – इस वक्त 469 किलोमीटर के दायरे में कृषि बाज़ार है जबकि हर पांच किलोमीटर की परिधि में एक मंडी होनी चाहिए. इस तरह भारत में कम से कम 41 हज़ार संयुक्त कृषि बाज़ार होने चाहिए, तभी किसानों को सही मूल्य मिलेगा. अगर इस ज़रूरत के चश्मे से देखेंगे तो पता चलेगा कि 2014 से लेकर 2020 तक मोदी सरकार ने किसानों के बाज़ार के लिए कितनी गंभीरता से काम किया है. 13 मई, 2020 की विवेक मिश्रा की रिपोर्ट आप देख सकते हैं जो डाउन टू अर्थ के हिन्दी संस्करण में छपी है.

सरकार मंडियों के विकास पर कितना खर्च कर रही है, इसे समझने के लिए 2018 और 2019 के बजट में जाकर देखिए. बजट में एग्रीकल्चर मार्केटिंग के लिए राशि दी जाती है. एग्रीकल्चर मार्केटिंग में बीज ख़रीदने से लेकर फ़सल बेचने तक वो सब क्रियाएंं शामिल हैं, जो फ़सल को खेतों से उपभोक्ता तक पहुंंचाती हैं. इसमें मंडियों की व्यवस्था, स्टोरेज, वेयरहाउस, ट्रांसपोर्ट आदि सब शामिल होते हैं.

2018 के बजट में एग्रीकल्चर मार्केटिंग के लिए 1050 करोड़ का प्रावधान किया गया था. संशोधित बजट में 500 करोड़ कर दिया गया. आख़िर में मिले 458 करोड़ ही.
एग्रीकल्चर मार्केटिंग के लिए 2019 के बजट में 600 करोड़ का प्रावधान किया गया था. संशोधित बजट में यह राशि घटाकर 331 करोड़ कर दी. यानी 50 प्रतिशत कम हो गई.

ज़रूरत के हिसाब से 1050 करोड़ का बजट भी कम है, उसमें से भी 50 प्रतिशत कम हो जाता है. किसान नेताओं का कहना है कि नए कानून के अनुसार जो प्राइवेट सेक्टर की मंडियां खुलेगी, उनमें टैक्स नहीं लगेंगे. सरकारी मंडी में तरह-तरह के टैक्स लगते हैं और उस पैसे से मंडियों का विकास होता है. यानी मंडियों के विकास का पैसा हमारा किसान भी देता है. इससे तो दो तरह की मंडियां हो जाएंगी. एक में टैक्स होगा, एक में टैक्स नहीं होगा. ज़ाहिर है जिसमें टैक्स होगा वो मंडी खत्म हो जाएगी.

इसलिए किसानों को चाहिए कि वे मंडियों को लेकर सरकार से और सवाल करें और सरकार को चाहिए कि वे किसानों के सवालों के जवाब और स्पष्टता से दे लेकिन उसके पहले मोदी जी अपने वित्त मंत्री से सवाल करें कि किसकी इजाज़त से उनकी सरकार के भीतर मंडियों को ख़त्म करने की कवायद चल रही थी ? अब आप ये मत कहिएगा कि इतने बड़े मामले में सरकार पहल कर रही है और मोदी जी को ख़बर नहीं है.

नोट – निर्मला सीतारमन के भाषण का लिंक यहां दे रहा हूं आप खुद भी सुन लें और हिन्दू बिज़नेस लाइन की रिपोर्ट भी पढ़ लें.

https://www.thehindubusinessline.com/…/article29953045.ece

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