Friday, April 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

भारतीय कृषि को रसातल में ले जाती मोदी सरकार

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 12, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

भारतीय कृषि को रसातल में ले जाती मोदी सरकार

मोदी सरकार के पिछले पांच वर्षों के दौरान कृषि-अर्थव्यवस्था अभूतपूर्व संकट के दौर में जा फंसी है. नतीजतन पूरे देश में किसान बड़े पैमाने पर आंदोलित हुए हैं. मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, नई-दिल्ली और ऐसी जगहों पर आन्दोलन कर रहे किसानों की छवि अभी तक ताज़ा है. कई दिनों तक आन्दोलन करने वाले किसान सड़कों पर रहें, जिसकी वजह से उन्हें अपने गांवों में मिलने वाली दिहाड़ी मजूरी छोडनी पड़ी, तो उनके विरोध की भावना इतनी तीव्र थी. इसके बाद भी शासक वर्ग 2019 के चुनाव में 59% (2016 के आंकड़ों के अनुसार)[1] कामगार जनसंख्या से जुड़े असल मुद्दों पर बात करने से कतरा रहा है. इसके स्थान पर वो देश में एक झूठे राष्ट्रवाद का भाव थोपने में व्यस्त हैं और इस बात पर बहस कर रहे हैं कि ‘मंदिर वहीं बनेगा’. पुलवामा में 40 जवानों कि मृत्यु पर नाटक करना उनके लिए महत्त्व रखता है, लेकिन इस बात पर उनका कोई ध्यान नहीं जाता कि 35 किसान हर रोज सरकार की संरचनात्मक नीतियों की विफलता की वजह से आत्महत्या कर रहे हैं (2015 के उपलब्ध तथ्यों के आधार पर)[2] हालांकि इस संख्या को काफी कम कर आंका गया है.[11]

You might also like

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास




नव-उदारवादी एजेंडे के तहत झूठे वादे करना, दोषपूर्ण नीतियांं बनाना और कृषक समुदाय को मूर्ख बनाते रहना, मोदी सरकार का प्रमुख लक्षण बन गया है. 2014 के चुनाव प्रचार में इस देश के किसानों से बीजेपी सरकार ने वादा किया था कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य C2 के कुल मूल्य का 50 प्रतिशत बढ़ाएगी. यहांं C2 का मतलब किसानों के कुल लागत मूल्य से है, जिसमें जमीन का किराया, जमीन को पूंजी मानकर उस पर सूद और बाकी कृषि लागत शामिल हैं. केंद्र की बीजेपी सरकार ने इसका दावा किया कि पिछले साल उसने अपने वादे पूरे किये हैं जबकि थोड़ा नजदीक से विश्लेषण[3] किया जाए तो इस बात का खुलासा होता है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य A2+Fl से 50% अधिक तय किया गया C2>A2+Fl से. इससे यह बात साफ हो जाती है कि घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य, वादे से काफी कम है. कुछ मामलों में पिछला न्यूनतम समर्थन मूल्य A2+Fl से 50% अधिक पाया गया.

2016 में बीजेपी ने इस बात कि घोषणा की थी कि 2022 तक किसानों की आमदनी दुगुनी कर दी जाएगी. किसानों की आमदनी दुगुनी करने के लिए कमेटी तो गठित की गयी, पर ज़मीनी स्तर पर परिणाम देखने को नहीं मिला. कमेटी ने इस बात का उल्लेख किया कि 2022 में निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए 10.4% की मिश्रित वार्षिक विकास दर की जरुरत है.[4] जिसके बाद सरकार ने किसानों की बढ़ी आमदनी का कोई भी आंकड़ा प्रस्तुत नहीं किया है. वायदे की इस अवास्तविक प्रकृति का अनुमान 2011 से 2016 के मध्य वास्तविक अवधि में नीति आयोग की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है, जो कहता है कि देश में किसानों की आमदनी में प्रतिवर्ष 0.44% की बढ़ोतरी हुई है [5].




2018-19 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के पिछले पांंच वर्षों में भारतीय कृषि-बजट दुगुना होकर 57,600 करोड़ रूपए हो गया, जो कि सच्ची बढ़ोतरी की जगह महज अंकों का मायाजाल है. सबसे पहले सरकार का ये दावा जिस तथ्य पर आधारित है वह यह है कि बढ़ोत्तरी की सामान्य गणना ही की गयी है, जिसमें मुद्रास्फीति की गणना शामिल नहीं थी. दूसरे, सब्सिडी के एक हिस्से को, जिसे वित्त-मंत्रालय द्वारा सूद के रूप में दिया जाता है, कृषि-बजट के रूप में दिखाया गया है. अतः प्रतिशत के रूप में देखें तो कुल केन्द्रीय बजट का जितना प्रतिशत कृषि पर खर्च किया जाता था, उतना ही रह गया है, जो कुल बजट का 1.75% है.[6] यह निश्चित रूप से काफी कम है.

2016 में मोदी सरकार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लेकर आई. इस नयी योजना को इस तरह प्रचारित किया गया कि इसमें पिछली योजनाओं की तमाम अच्छाइयांं शामिल है और कमियों को दूर कर दिया गया है.[7] जबकि, बीमा नीतियांं पूर्ववत अपना काम बखूबी कर रही हैं. मसलन, सार्वजनिक धन का इस्तेमाल बीमा कंपनियों को लाभ पहुंचाने में करना, कार्पोरेशनों को अनुमति देना कि स्टॉक मार्केट में इन बीमा कंपनियों द्वारा निवेश किये गये पैसों से भरपूर लाभ उठायें, जबकि गरीब किसानों के न्यायोचित मुआवजे को भी देने से इनकार करना. सरकार ज्यादातर मामलों में कृषि के लिए किसानों द्वारा लिए गये लोन के मामले में प्रिमियम भुगतान के सिलसिले में इन्हीं नीतियों को किसानों पर थोपती है.[8]




कृषि क्षेत्र में भी नोटबंदी का सुस्पष्ट प्रभाव महसूस किया गया. चूंकि कृषि क्षेत्र अपने चरित्र के लिहाज से लगभग पूरी तरह अनौपचारिक क्षेत्र है जहांं कारोबार मुख्यतः नगदी के जरिए ही होता है. अतः किसानों को सबसे ज्यादा भुगतना पड़ा. इसने न केवल समय पर उनके तमाम कृषि लागतों से जुडी खरीदारी को प्रभावित किया, बल्कि उनके लिए उनकी पैदावार बेचने में भी मुश्किलें पैदा की. कृषि मंत्रालय को ये स्वीकार करने में दो साल लग गए कि ये आपदा विमुद्रीकरण के आने से पैदा हुई.[9]

मोदी सरकार की किसान-विरोधी नीतियों का सिलसिला कभी ख़त्म होने वाला नहीं है. पर इसके पूरे प्रभाव को उत्तरोत्तर समझना मुश्किल होता जा रहा है. 2016 में सरकार ने किसानों की आत्महत्या से संबंधित आंकड़े छापने पर रोक लगा दी. इसी साल सरकार एक नयी नियमावली लेकर आई, जो सूखे की स्थिति की व्याख्या करती थी,जिसने किसी जगह की सूखे की स्थिति को समझना और भी मुश्किल कर दिया, जो कि बड़ी संख्या में प्रभावित किसानों को राहत मुआवजे से वंचित कर रहा है.[10]

ये तो तय है कि ये सब भारतीय राज्य द्वारा लागू की जा रही नव-उदारवादी नीतियों का ही विस्तार है, जिसे 90 के दशक में स्वीकार किया था. ये नीतियां दरअसल IMF, विश्व बैंक और US ट्रेजरी के प्रत्यक्ष देख-रेख में तैयार वाशिंगटन आम सहमति के इशारे पर तैयार की गईं थीं. पर जिस हमलावर मानसिकता के साथ मोदी सरकार आम लोगों की ज़िंदगी की कीमत पर कॉरपोरेट पूंंजी के तलवे चाट रही है, उसकी मिसाल भारत के हाल के इतिहास में खोजना मुश्किल है. आज हम इसके नतीजों के रूप में देख रहे हैं कि कृषि संकट का आकार कितना बड़ा और गहरा हुआ है, जीविका की तलाश में गांव से शहर की ओर जाने वाली किसान आबादी काफी बढ़ी है और सचमुच ही एक श्रमिकों की विशाल फौज सामने आयी है, जो औद्योगिक क्षेत्र में शोषण को बढ़ाते जाने के लिए जरूरी है.[12]




Read Also –

 

जीडीपी के झूठे आंकड़े दे रही है मोदी सरकार ?
धन का अर्थशास्त्र : मेहनतकशों के मेहनत की लूट
सेना अमीरों के मुनाफे के लिए युद्ध लड़ती है
नोटबंदी से अर्थव्‍यवस्‍था को लगा झटका कितना बड़ा ?
किसानों को उल्लू बनाने के लिए बहुत ज़रूरी हैं राष्ट्रवाद के नारे
44 जवानों की हत्या के आड़ में फर्जी राष्ट्रवादियों की गुण्डागर्दी




[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]




Previous Post

बनारस में जवान और किसान vs मोदी

Next Post

साध्वी प्रज्ञा : देश की राजनीति में एक अपशगुन की शुरुआत

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

साध्वी प्रज्ञा : देश की राजनीति में एक अपशगुन की शुरुआत

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

हैरी और गांधी : कपल चैलेंज…आखरी नॉवल है, आखरी पन्ने

April 13, 2024

स्त्रियां : मोदीकाल में मुगलकाल से भय

May 25, 2020

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

March 28, 2026
कविताएं

विदेशी हरामज़ादों का देसी इलाज !

March 22, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.