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गरीब को सैनिकों की कोई ज़रूरत नहीं होती

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 19, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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गरीब को सैनिकों की कोई ज़रूरत नहीं होती

हिमांशु कुमार, सामाजिक कार्यकर्त्ताहिमांशु कुमार, प्रसिद्ध गांधीवादी कार्यकर्त्ता

आज हम अति सैन्यवाद के बारे में बात करेंगे. सैनिक का मतलब सिर्फ सेना नहीं है. हर सरकारी बंदूकधारी सेना कहलाती है, चाहे वह पुलिस हो अर्ध सैनिक बल या पूर्ण सेना. जब सरकार किसी इलाके की समस्या को बातचीत से हल करने की बजाय ताकत के दम पर उस इलाके के लोगों की मांग को दबाना चाहती है तो सरकार उस इलाके में अपने सैनिक भेज देती है. इस तरह से किसी इलाके में सैनिकों की तैनाती अलग-अलग समय के लिए हो सकती है. कभी कुछ दिनों के लिए भी किसी इलाके में सैनिक भेजे जा सकते हैं, या कभी कई बरस के लिए सैनिकों की तैनाती कर दी जाती है.

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भारत में कश्मीर, पूर्वोत्तर के राज्यों और अब आदिवासी इलाकों में कई सालों से सैनिकों की तैनाती जारी है. जब किसी इलाके में सैनिकों की तैनाती की जाती है तो उस इलाके में नई समस्याएं उत्पन्न हो जाती है. मैं एक बार एक बड़ी जाति के गांव में लोगों से बात कर रहा था. उन्होंने मुझे बताया कि उनके गांव के बाहर पुलिस थाना खोला जाना था लेकिन गांव के बाहर ज़मीन नहीं मिली तो एक छोटे अफसर ने गांव के बीच में थाना खोलने का निर्णय लिया, लेकिन जिले के पुलिस अधीक्षक ने यह कह कर मना कर दिया कि गांव के बीच में दारू पीकर कोई पुलिस वाला किसी औरत को छेड़ देगा तो नया बबाल खड़ा हो जाएगा. लेकिन ऐसा ख्याल हर गांव में नहीं रखा जाता. मुझे लगता है ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वह सवर्ण बहुल गांव था और सरकार के लिए सवर्णों का विरोध मुश्किल हो सकता है.

ये है 15 दिसंबर का वीडियो। इसमे आप देख सकते हैं के जामिया के old reading hall मे पुलिस घुसती है और बगैर किसी कारण के शान्ति से पढ़ रहे बच्चों को पीटने लगती है। शर्म करो दिल्ली पुलिस। ये फरमान मिला था? pic.twitter.com/oSOe4FL1cu

— Abhisar Sharma (@abhisar_sharma) February 16, 2020

उदाहरण के लिए जंगल महल में जिंदल के लिए सेज (SEZ) बनाना था तो वहां सीआरपीएफ को तैनात करना शुरू कर दिया. सैनिकों और गांव वालों के झगड़े शुरू हुए. बलात्कार, हत्या, अपहरण शुरू हुआ. अंत में गांव वालों ने पुलिस संत्रास प्रतिरोध समिति बनाई. सरकार ने इस समिति के अध्यक्ष को धोखे से पकडा और जेल में डाल दिया और उस इलाके पर ऐसा हमला किया, जैसा किसी दुश्मन देश पर किया जाता है. यानी एक शांत इलाके में अगर आप सैनिकों को रख देंगे तो एक साल में ही वह इलाका अशांत हो जाएगा.

सबसे पहले तो ज़मीन का संघर्ष शुरू होता है. किसान अपनी ज़मीन देना नहीं चाहते लेकिन सैनिकों के लिए जबरदस्ती ज़मीन पर कब्ज़ा किया जाता है. फिर उस इलाके के प्राकृतिक साधनों पर लड़ाई शुरू हो जाती है. अगर नहाने का कोई तालाब है जिस पर गांव वाले नहाते-धोते हैं तो उस तालाब पर सैनिक कब्ज़ा कर लेते हैं. अगर वहां जंगल है तो सैनिक वहां से बड़ी मात्रा में लकड़ियां लाते हैं, उससे गांव वालों के लिए लकड़ियां मिलना मुश्किल हो जाता है. अक्सर सेना के अधिकारी जंगल से कीमती लकड़ी कटवाकर, फर्नीचर बनवाकर अपने घर भेजवा देते हैं. कश्मीर और बस्तर में ऐसे बहुत सारे मामले हैं, अपनी ‘सुरक्षा’ के लिए भी सैनिक जंगल साफ़ कर देते हैं. बीजापुर छत्तीसगढ़ में मैंने खुद ऐसे जंगलों की कटाई देखी है.

सैनिकों के कारण उस इलाके में वेश्यावृत्ति बढ़ जाती है. स्थानीय प्रशासन के ऊपर सैनिक अफसर हावी हो जाते हैं. वे जिस काम को मना कर देते हैं, वह नहीं किया जाता. सैनिकों द्वारा आस-पास के नागरिकों को अपना शत्रु समझा जाता है. सैनिकों द्वारा उस इलाके में नागरिकों के घरों में घुस कर तलाशी लेना, लोगों की पिटाई करना, गोली मार देना, बलात्कार करना जैसी घटनाएं होने लगती है. अभी सुप्रीम कोर्ट के सामने मणिपुर के बारह सौ ऐसी मृत्य के मामले लाये गए जिन्हें सेना द्वारा मारा गया है. सुप्रीम कोर्ट ने उनमें से छह मामलों की जांच करवाई गई, वह छहों मामले फर्जी मुठभेड़ के पाए गए. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ‘हां इन सभी मामलों की जांच की ज़रूरत तो है.’ लेकिन भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि ‘ऐसा आदेश मत दीजिये इससे सैनिकों के मनोंबल पर असर पड़ेगा.’ उसके बाद से इस मामले पर कोई अंतिम फैसला नहीं आया.

इसके अलावा उस इलाके में कोई भी लोकतान्त्रिक गतिविधि करना भी असम्भव हो जाता है. बस्तर में जब भी आदिवासी अपनी ज़मीन बचाने के लिए या अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों के बारे में कोई सभा या रैली करना चाहते हैं, अर्ध सैनिक बलों के सैनिक उन्हें गांव में ही रोक देते हैं. इसके अलावा एक ही इलाके में पुलिस और अर्ध सैनिक बल एक साथ मौजूद होते हैं तो उनमें आपस में अंदरूनी झगड़ा और कमाई पर कब्जे की लड़ाई होती है. पुलिस बाहर से आये हुए अन्य अर्ध सैनिक बलों के सैनिकों को पसंद नहीं करती. सुकमा छत्तीसगढ़ में तो एक बार विशेष पुलिस अधिकारियों और सीआरपीएफ के बीच बाकायदा गोलीबारी और बमों का प्रयोग किया गया था. इस विषय में सीबीआई द्वारा सुप्रीम कोर्ट में भी शिकायत की गयी थी.

कई बार उस इलाके में लोगों को कानून में छूट देने के लिए रिश्वत लेने का काम भी सैनिक करते हैं. अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर तैनात अफसरों द्वारा रिश्वत लेकर बार्डर पार कराया जाता है. उस इलाके में तैनात सैन्य बलों द्वारा स्थानीय युवकों को अपना मुखबिर बनाया जाता है. अक्सर युवाओं को ऐसा काम करने के लिए डरा कर या धमकी देकर तैयार किया जाता है. अक्सर ऐसे युवा आन्दोलनकारियों और सैनिकों के बीच फंस जाते हैं और मारे जाते हैं.

किसी भी इलाके के लोग अपने बीच में सैनिकों की उपस्थिति नहीं चाहते. यहां तक की सैनिक भी नागरिकों के साथ नहीं रहना चाहते लेकिन सरकार उन्हें मजबूर करती है. सरकार हमेशा ताकतवर तबके के फायदे के लिए सैन्यवाद बढ़ाती है. गरीब को सैनिकों की कोई ज़रूरत नहीं होती. हमें लोकतंत्र को विकसित करके ऐसा बनाना होगा जिसमें नागरिकों को दबा कर रखने के लिए सैनिकों की ज़रूरत ही ना पड़े.

आज अरनपुर गांव के समीप आदिवासी जमा हुए और उन्होंने एक रैली की. रैली इस बात के लिए थी कि पोटाली नाम के गांव में पुराने एसपीओ का नाम बदलकर डीआरजी रख दिया गया है और उन्हें बंदूके दे दी गई है. यह डीआरजी के सिपाही आदिवासियों के घरों में घुसकर लूटपाट करते हैं और मारपीट करते हैं. ग्रामीणों ने एक प्रेस कांफ्रेंस भी की थी. कई बार पुलिस और प्रशासन को चिट्टियां लिखीं.

पुलिस जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए आदिवासियों की हितैषी बनने का नाटक करती है और उन्हें कंबल या चावल का पैकेट बंदूक के दम पर देती है और फोटो खींचकर अखबारों में छपवाती है और कहती है कि देखो पुलिस कितनी अच्छी है, वह आदिवासियों की सेवा कर रही है. लेकिन आज जब आदिवासियों ने अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ रैली की तो अरनपुर थाने के सामने आदिवासियों से भरे हुए तीन ट्रैक्टर पुलिस ने रोक लिए और अरनपुर थाने के थानेदार ने आदिवासियों को पीटा और उन्हें बुरी-बुरी गालियां दी तथा रैली में शामिल नहीं होने दिया.

आदिवासियों ने फैसला किया है कि वे पुलिस के द्वारा जबरदस्ती दिखावे के लिए दी गई सारी चीजें कलेक्टर ऑफिस के सामने आकर सत्याग्रह करके वापस करेंगे और पुलिस दमन के खिलाफ अपना सत्याग्रह जारी रखेंगे लेकिन मेरी एक नेक सलाह पुलिस को और प्रशासन को यह है कि अगर आप सोचते हैं कि आप मारपीट कर आदिवासियों को डराकर, इस इलाके में शांति ले आएंगे तो यह आपका वहम है. इससे पहले भी बहुत सारे लोगों ने दमन के द्वारा शांति लाने की कोशिश की लेकिन वह सब असफल हो गए. दमन से अशांति बढ़ती है, सलाह मान लीजिए आदिवासियों पर अत्याचार बंद कर दीजिए.

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