Friday, April 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

गरीब को सैनिकों की कोई ज़रूरत नहीं होती

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 19, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

गरीब को सैनिकों की कोई ज़रूरत नहीं होती

हिमांशु कुमार, सामाजिक कार्यकर्त्ताहिमांशु कुमार, प्रसिद्ध गांधीवादी कार्यकर्त्ता

आज हम अति सैन्यवाद के बारे में बात करेंगे. सैनिक का मतलब सिर्फ सेना नहीं है. हर सरकारी बंदूकधारी सेना कहलाती है, चाहे वह पुलिस हो अर्ध सैनिक बल या पूर्ण सेना. जब सरकार किसी इलाके की समस्या को बातचीत से हल करने की बजाय ताकत के दम पर उस इलाके के लोगों की मांग को दबाना चाहती है तो सरकार उस इलाके में अपने सैनिक भेज देती है. इस तरह से किसी इलाके में सैनिकों की तैनाती अलग-अलग समय के लिए हो सकती है. कभी कुछ दिनों के लिए भी किसी इलाके में सैनिक भेजे जा सकते हैं, या कभी कई बरस के लिए सैनिकों की तैनाती कर दी जाती है.

You might also like

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

भारत में कश्मीर, पूर्वोत्तर के राज्यों और अब आदिवासी इलाकों में कई सालों से सैनिकों की तैनाती जारी है. जब किसी इलाके में सैनिकों की तैनाती की जाती है तो उस इलाके में नई समस्याएं उत्पन्न हो जाती है. मैं एक बार एक बड़ी जाति के गांव में लोगों से बात कर रहा था. उन्होंने मुझे बताया कि उनके गांव के बाहर पुलिस थाना खोला जाना था लेकिन गांव के बाहर ज़मीन नहीं मिली तो एक छोटे अफसर ने गांव के बीच में थाना खोलने का निर्णय लिया, लेकिन जिले के पुलिस अधीक्षक ने यह कह कर मना कर दिया कि गांव के बीच में दारू पीकर कोई पुलिस वाला किसी औरत को छेड़ देगा तो नया बबाल खड़ा हो जाएगा. लेकिन ऐसा ख्याल हर गांव में नहीं रखा जाता. मुझे लगता है ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वह सवर्ण बहुल गांव था और सरकार के लिए सवर्णों का विरोध मुश्किल हो सकता है.

ये है 15 दिसंबर का वीडियो। इसमे आप देख सकते हैं के जामिया के old reading hall मे पुलिस घुसती है और बगैर किसी कारण के शान्ति से पढ़ रहे बच्चों को पीटने लगती है। शर्म करो दिल्ली पुलिस। ये फरमान मिला था? pic.twitter.com/oSOe4FL1cu

— Abhisar Sharma (@abhisar_sharma) February 16, 2020

उदाहरण के लिए जंगल महल में जिंदल के लिए सेज (SEZ) बनाना था तो वहां सीआरपीएफ को तैनात करना शुरू कर दिया. सैनिकों और गांव वालों के झगड़े शुरू हुए. बलात्कार, हत्या, अपहरण शुरू हुआ. अंत में गांव वालों ने पुलिस संत्रास प्रतिरोध समिति बनाई. सरकार ने इस समिति के अध्यक्ष को धोखे से पकडा और जेल में डाल दिया और उस इलाके पर ऐसा हमला किया, जैसा किसी दुश्मन देश पर किया जाता है. यानी एक शांत इलाके में अगर आप सैनिकों को रख देंगे तो एक साल में ही वह इलाका अशांत हो जाएगा.

सबसे पहले तो ज़मीन का संघर्ष शुरू होता है. किसान अपनी ज़मीन देना नहीं चाहते लेकिन सैनिकों के लिए जबरदस्ती ज़मीन पर कब्ज़ा किया जाता है. फिर उस इलाके के प्राकृतिक साधनों पर लड़ाई शुरू हो जाती है. अगर नहाने का कोई तालाब है जिस पर गांव वाले नहाते-धोते हैं तो उस तालाब पर सैनिक कब्ज़ा कर लेते हैं. अगर वहां जंगल है तो सैनिक वहां से बड़ी मात्रा में लकड़ियां लाते हैं, उससे गांव वालों के लिए लकड़ियां मिलना मुश्किल हो जाता है. अक्सर सेना के अधिकारी जंगल से कीमती लकड़ी कटवाकर, फर्नीचर बनवाकर अपने घर भेजवा देते हैं. कश्मीर और बस्तर में ऐसे बहुत सारे मामले हैं, अपनी ‘सुरक्षा’ के लिए भी सैनिक जंगल साफ़ कर देते हैं. बीजापुर छत्तीसगढ़ में मैंने खुद ऐसे जंगलों की कटाई देखी है.

सैनिकों के कारण उस इलाके में वेश्यावृत्ति बढ़ जाती है. स्थानीय प्रशासन के ऊपर सैनिक अफसर हावी हो जाते हैं. वे जिस काम को मना कर देते हैं, वह नहीं किया जाता. सैनिकों द्वारा आस-पास के नागरिकों को अपना शत्रु समझा जाता है. सैनिकों द्वारा उस इलाके में नागरिकों के घरों में घुस कर तलाशी लेना, लोगों की पिटाई करना, गोली मार देना, बलात्कार करना जैसी घटनाएं होने लगती है. अभी सुप्रीम कोर्ट के सामने मणिपुर के बारह सौ ऐसी मृत्य के मामले लाये गए जिन्हें सेना द्वारा मारा गया है. सुप्रीम कोर्ट ने उनमें से छह मामलों की जांच करवाई गई, वह छहों मामले फर्जी मुठभेड़ के पाए गए. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ‘हां इन सभी मामलों की जांच की ज़रूरत तो है.’ लेकिन भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि ‘ऐसा आदेश मत दीजिये इससे सैनिकों के मनोंबल पर असर पड़ेगा.’ उसके बाद से इस मामले पर कोई अंतिम फैसला नहीं आया.

इसके अलावा उस इलाके में कोई भी लोकतान्त्रिक गतिविधि करना भी असम्भव हो जाता है. बस्तर में जब भी आदिवासी अपनी ज़मीन बचाने के लिए या अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों के बारे में कोई सभा या रैली करना चाहते हैं, अर्ध सैनिक बलों के सैनिक उन्हें गांव में ही रोक देते हैं. इसके अलावा एक ही इलाके में पुलिस और अर्ध सैनिक बल एक साथ मौजूद होते हैं तो उनमें आपस में अंदरूनी झगड़ा और कमाई पर कब्जे की लड़ाई होती है. पुलिस बाहर से आये हुए अन्य अर्ध सैनिक बलों के सैनिकों को पसंद नहीं करती. सुकमा छत्तीसगढ़ में तो एक बार विशेष पुलिस अधिकारियों और सीआरपीएफ के बीच बाकायदा गोलीबारी और बमों का प्रयोग किया गया था. इस विषय में सीबीआई द्वारा सुप्रीम कोर्ट में भी शिकायत की गयी थी.

कई बार उस इलाके में लोगों को कानून में छूट देने के लिए रिश्वत लेने का काम भी सैनिक करते हैं. अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर तैनात अफसरों द्वारा रिश्वत लेकर बार्डर पार कराया जाता है. उस इलाके में तैनात सैन्य बलों द्वारा स्थानीय युवकों को अपना मुखबिर बनाया जाता है. अक्सर युवाओं को ऐसा काम करने के लिए डरा कर या धमकी देकर तैयार किया जाता है. अक्सर ऐसे युवा आन्दोलनकारियों और सैनिकों के बीच फंस जाते हैं और मारे जाते हैं.

किसी भी इलाके के लोग अपने बीच में सैनिकों की उपस्थिति नहीं चाहते. यहां तक की सैनिक भी नागरिकों के साथ नहीं रहना चाहते लेकिन सरकार उन्हें मजबूर करती है. सरकार हमेशा ताकतवर तबके के फायदे के लिए सैन्यवाद बढ़ाती है. गरीब को सैनिकों की कोई ज़रूरत नहीं होती. हमें लोकतंत्र को विकसित करके ऐसा बनाना होगा जिसमें नागरिकों को दबा कर रखने के लिए सैनिकों की ज़रूरत ही ना पड़े.

आज अरनपुर गांव के समीप आदिवासी जमा हुए और उन्होंने एक रैली की. रैली इस बात के लिए थी कि पोटाली नाम के गांव में पुराने एसपीओ का नाम बदलकर डीआरजी रख दिया गया है और उन्हें बंदूके दे दी गई है. यह डीआरजी के सिपाही आदिवासियों के घरों में घुसकर लूटपाट करते हैं और मारपीट करते हैं. ग्रामीणों ने एक प्रेस कांफ्रेंस भी की थी. कई बार पुलिस और प्रशासन को चिट्टियां लिखीं.

पुलिस जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए आदिवासियों की हितैषी बनने का नाटक करती है और उन्हें कंबल या चावल का पैकेट बंदूक के दम पर देती है और फोटो खींचकर अखबारों में छपवाती है और कहती है कि देखो पुलिस कितनी अच्छी है, वह आदिवासियों की सेवा कर रही है. लेकिन आज जब आदिवासियों ने अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ रैली की तो अरनपुर थाने के सामने आदिवासियों से भरे हुए तीन ट्रैक्टर पुलिस ने रोक लिए और अरनपुर थाने के थानेदार ने आदिवासियों को पीटा और उन्हें बुरी-बुरी गालियां दी तथा रैली में शामिल नहीं होने दिया.

आदिवासियों ने फैसला किया है कि वे पुलिस के द्वारा जबरदस्ती दिखावे के लिए दी गई सारी चीजें कलेक्टर ऑफिस के सामने आकर सत्याग्रह करके वापस करेंगे और पुलिस दमन के खिलाफ अपना सत्याग्रह जारी रखेंगे लेकिन मेरी एक नेक सलाह पुलिस को और प्रशासन को यह है कि अगर आप सोचते हैं कि आप मारपीट कर आदिवासियों को डराकर, इस इलाके में शांति ले आएंगे तो यह आपका वहम है. इससे पहले भी बहुत सारे लोगों ने दमन के द्वारा शांति लाने की कोशिश की लेकिन वह सब असफल हो गए. दमन से अशांति बढ़ती है, सलाह मान लीजिए आदिवासियों पर अत्याचार बंद कर दीजिए.

Read Also –

‘अगर देश की सुरक्षा यही होती है तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है.’
माओवादियों की मुखबिरी में इस्तेमाल ग्रामीणों पर पुलिसिया कहर
‘मेरी मौत हिंदुस्तान की न्यायिक और सियासती व्यवस्था पर एक बदनुमा दाग होगी’ – अफजल गुरु
ब्लडी सन-डे : जामिया मिल्लिया के छात्रों पर पुलिसिया हैवानियत की रिपोर्ट
गरीब आदिवासियों को नक्सली के नाम पर हत्या करती बेशर्म सरकार और पुलिस
 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

जज लोया की मौत पर चुप्पी साधने वाला सुप्रीम कोर्ट आखिर इतना मुखर क्यों ?

Next Post

नक्कारखाने में तूती की क्या बिसात !

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

नक्कारखाने में तूती की क्या बिसात !

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

पुंसवादी मोदी का पापुलिज्म और मीडिया के खेल

October 15, 2023

यातायात नियमों के नाम पर सरकार का तुगलकी फरमान

January 3, 2018

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

March 28, 2026
कविताएं

विदेशी हरामज़ादों का देसी इलाज !

March 22, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.