Saturday, March 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home ब्लॉग

भाड़े के सैनिक (अग्निवीर) यानी जनता पर जुल्म ढ़ाने के लिए तैयार होता एसएस गिरोह

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 29, 2022
in ब्लॉग
0
585
SHARES
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
भाड़े के सैनिक (अग्निवीर) यानी जनता पर जुल्म ढ़ाने के लिए तैयार होता एसएस गिरोह
भाड़े के सैनिक (अग्निवीर) यानी जनता पर जुल्म ढ़ाने के लिए तैयार होता एसएस गिरोह

भारत में आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) ने सैन्य प्रशिक्षित गिरोह के निर्माण का ऐजेंडा अपने हाथ में लिया है. इस सैन्य प्रशिक्षित गिरोह का नामकरण ‘अग्निवीर’ दिया गया है. इस अग्निवीर गिरोह का इस्तेमाल आरएसएस ठीक उसी तरह करने जा रहा है, जिस तरह जर्मनी में हिटलर ने एसएस (स्वयं सेवक) का किया था, यानी बड़े पैमाने पर अपने विरोधियों को खत्म करना. यह एसएस ही था, जिसने लाखों यहूदियों को गैस चैम्बर में डालकर मार डाला था.

भारत में एसएस के निर्माण की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पड़ाव यह ‘अग्निवीर’ है, जो चार साल की सैन्य ट्रेनिंग हासिल करने के बाद समाज में लौटेगा और भाड़े का सैनिक बनकर समाज पर कहर बनकर टूट पड़ेगा. यह लाखों की तादाद में समाज में लौटने वाला वह गिरोह होगा जो आरएसएस के इशारे पर ब्राह्मणवादी मनुस्मृति पर आधारित समाज के निर्माण में योगदान देगा और विरोधियों को खत्म करेगा. ये भाड़े के सैनिक आरएसएस के लिए बेहल ही सस्ते दामों पर सदैव उपलब्ध रहेंगे, ठीक वैसे ही जैसे आज सोशल मीडिया पर संघी ट्रोल गालीगलौज करने के लिए सदैव उपलब्ध रहते हैं.

You might also like

तुर्की के इस्तांबुल में भारतीय दूतावास के सामने विरोध प्रदर्शन: ‘ऑपरेशन कगार बंद करो’ और ‘नरसंहार बंद करो’ की मांग को लेकर नारे और रैलियां

नेपाल : ‘सभी वामपंथी, प्रगतिशील, देशभक्त और लोकतांत्रिक छात्र, आइए एकजुट हों !’, अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र छात्र संघ (क्रांतिकारी)

सीपीआई माओवादी के नेता हिडमा समेत दर्जनों नेताओं और कार्यकर्ताओं की फर्जी मुठभेड़ के नाम पर हत्या के खिलाफ विरोध सभा

इन भाड़े के सैनिक अग्निवीर और सोशल मीडिया पर उपलब्ध संघी गालीबाज ट्रोलरों में अंतर यही होगा कि सोशल मीडिया पर उपलब्ध संघी गालीबाज ट्रोलर केवर गालीगलौज तक ही सीमित रहता है, जबकि यह भाड़े का ‘अग्निवीर’ सीधे घर पर पहुंच कर हत्या और बलात्कार तक में सक्षम होगा. चूंकि यह भाड़े का ‘अग्निवीर’ के लिए सरकार जवाबदेह नहीं होगा, इसलिए उसके हर कुकृत्यों के प्रति भी सरकार उत्तरदायी नहीं होगी.

देश वाईमर रिपब्लिक बनने की दहलीज़ पर

डरबन सिंह लिखते हैं न्यूरेम्बर्ग रैली की यह मशहूर तस्वीर आपने देखी होगी और सोचा होगा कि सामने यह जर्मनी की फौज है. कतई नहीं. ये रेगुलर फौजी नहीं, एसएस है. आप शाखा के स्वयंसेवक कह सकते हैं. जर्मनी में फ़ौज, रोजगार का एक प्रमुख साधन था. इसके बूते फ्रेडरिक, बिस्मार्क और कैसर ने दुनिया जीतने के ख्वाब संजोए इसलिए प्रथम विश्वयुद्ध के बाद वर्साई की ट्रीटी जर्मनी की फौज पर पाबंदियां लगा दी गयी.

हर दस में से आठ फौजी को जबरन रिटायर किया गया. 1919 से 1930 के दौर में लाखों प्रशिक्षित फौजी सड़कों पर बेकार घूम रहे थे, मजदूरी कर रहे थे. उनका आत्मसम्मान चकनाचूर था. हिटलर ने उन्हें प्राइड दिया. नाजी पार्टी ने एक स्वयंसेवक मंडल बनाया. सारे वेटरन फौजी पकड़े और उन्हें पार्टी की विचारधारा में प्रशिक्षित किया. जाहिर है, इसमें शुद्ध जर्मन नस्ल के लोग ही प्रवेश पा सकते थे. उन्हें यहूदियों पर जुल्म ढाने के लिए खुली छूट मिली. पुलिस और सरकार किंकर्तव्यविमूढ़ थी.

एसएस के गुंडों का एक प्रमुख काम खुद की रैली एफिशिएंटली ऑर्गनाइज करना, दूसरों की बिगाड़ना था. मार पीट, गुंडागर्दी की छूट थी. एकदम सैनिक अनुशासन और फौजी रैंकिंग थी जिसे अवैध कमाई की छूट थी. हारे हताश जर्मनी में पुराने दौर के फौजी जो समाज में अब भी सम्मानित, पूज्य थे, उनका नाजियों को समर्थन जनता में पार्टी की स्वीकृति बढ़ाता था. रिटायर्ड फ़ौजियों के प्रति जनता के सम्मान ने हिटलर की चुनावी राह आसान की.

सत्ता में आने पर एसएस का विस्तार हुआ. हिटलर को देश की सेना और पुलिस का भरोसा नहीं था क्योंकि वे संविधान के लिए प्रतिबद्ध होते थे, जबकि एसएस में हिटलर के प्रति वफादारी की कसम खायी जाती.

आने वाले दौर में सेना, पुलिस, गेस्टापो और तमाम सरकारी संगठनों में एसएस मेम्बर्स को कंट्रक्चुअल नियुक्त किया जाने लगा. इस तरह ब्यूरोक्रेसी के हर सिस्टम में नाजी घुस गए. एक वक्त एसएस के मेंबर्स की तादाद सेना की दस गुनी हो गयी थी. जर्मनी हिटलर की मुट्ठी में था.

यही वह ‘शानदार’ मॉडल था, जिसे पढ़ने मुंजे यूरोप गए थे. इसके बाद भारत मे भी शाखाएं शुरू हुई. स्वयंसेवकों को सैनिक प्रशिक्षण देना शुरू हुआ. सावरकर ने भी हिन्दुओं के सैन्यकरण पर जोर दिया. इस कारण से हिन्दू महासभा और संघ दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान भारतीयों को सेना में अस्थायी प्रवेश लेने वकालत करते रहे. इन्होंने भर्ती रैलियों को फैसिलिटेट किया. ठीक तब, जब गांधी ‘भारत छोड़ो’ की हुंकार भर रहे थे. गांधी हत्या में सजा पाने वाले दो किरदार, ब्रिटिश सेना में अस्थायी कैडर बनकर सैन्य प्रशिक्षित हुए थे- गोपाल गोडसे, और नारायण आप्टे.

मुंजे ने यूरोप से वापस आने के बाद पुणे में ‘भोसले मिलिट्री स्कूल’ खोला था. वह स्कूल आज भी है. अब साधारण सीबीएसई क्युरिकुलम पढ़ाता है क्योकि नव नाजियों को प्रशिक्षित कर, एसएस में बदलने काम अब भारतीय सेना को आउटसोर्स किया जा चुका है. हमारी आंखों के सामने इंडियन आर्मी अब विशाल शाखा में तब्दील होने जा रही है. आपके बच्चे, षड्यंत्र के इस अग्निपथ पर ढकेले जा चुके हैं.

भाड़े के सैनिक बने फायदे का व्यापार

सेना में भाड़े के सैनिक रखने का यह ट्रेंड पिछले दशक में ही सामने आया है. पहले गल्फ वॉर (1990) में जहां ऐसे सैनिक कुल अमेरिकी सेना का सिर्फ एक फीसदी थे, वहीं इराक में तैनात कुल 1,30,000 अमेरिकी सैनिकों में 20,000 (करीब 15 फीसदी) सैनिक भाड़े के थे. ‘बिजनेस ऑफ वॉर’ कहा जाने वाला यह नया बिजनेस इतना फल फूल रहा है कि इसके जरिए हर साल 100 अरब अमेरिकी डॉलर का व्यापार होता है. यही नहीं, किराए के सैनिक मुहैया कराने वाली कंपनियों ने बीते साल अमेरिकी बजट में एक तिहाई हिस्सेदारी निभाई.

पीटर सिंगर नेअपनी किताब ‘कॉरपोरेट वॉरियर्स-राइज ऑफ द प्राइवेटाइज्ड मिलिट्री इंडस्ट्री’ में सबसे पहले वॉर के व्यवसायीकरण पर सवाल उठाए और अमेरिकी सेना में बढ़ते भाड़े के सैनिकों का जिक्र किया. आखिर अमेरिका को इस तरह किराए पर सैनिक लेने की जरूरत क्यों आन पड़ी ? दरअसल, अमेरिका ने एक साथ कई देशों में मोर्चे खोल रखे हैं, जिनकी वजह से सैनिकों की कमी पड़ रही है. वैसे पेंटागन की इस बारे में कोई स्पष्ट पॉलिसी भी नहीं है.

प्राइवेट सैनिकों में सिविलियनों से लेकर मिलिट्री के रिटायर्ड जवान होते हैं. इनका काम ज्यादा जोखिम भरा नहीं है. ये लोग आमतौर पर संदेश भेजने, खुफिया सेवाएं मुहैया कराने, रेग्युलर सैनिकों के रहने और खाने का इंतजाम करने, एयरपोर्ट व दूसरे महत्वपूर्ण स्थानों की सुरक्षा करने, ऐडमिनिस्ट्रेशन की मदद करने से लेकर इराक की नई फौजों को ट्रेनिंग देने जैसे काम ही ज्यादा करते हैं. इन सैनिकों को खतरा कम होने के बावजूद रेग्युलर सैनिकों से ज्यादा पगार मिलती है. इन्हें एक दिन में 500 से लेकर 1,500 डॉलर तक सैलेरी मिल जाती है.

‘भाड़े के सैनिकों’ का ट्रेंड बढ़ने के पीछे सत्ता में बैठे लोगों का स्वार्थ है. अभियान के दौरान इनमें से अगर कोई दुश्मन का शिकार हो जाए तो उसकी गिनती सैनिकों में नहीं होती. इससे एक तो घोषित हताहतों की संख्या कम रहती है, दूसरे जनमत के सरकार के खिलाफ होने की संभावना भी कम हो जाती है. इनके हताहत होने पर सेना को भारी मुआवजा नहीं देना पड़ता. भाड़े के सैनिक अगर गलती करें तो इन्हें रेग्युलर सैनिकों की तरह सजा नहीं दी जा सकती. वैसे ये भी जिनेवा संधि और मानवाधिकार नियमों के घेरे में आते हैं.

सिंगर के मुताबिक अबूगरीब जेल में इराकी कैदियों पर अत्याचार करने वालों में दो प्राइवेट सैनिक भी थे, लेकिन उनके खिलाफ मिलिट्री कोड के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकी और वे छूट गए. अब जहां इराक में कानून व्यवस्था बुरी तरहलड़खड़ाई हुई है, वहां इन्हें सजा मिलने की उम्मीद करना बेमानी है. बहरहाल, इतना तो तय है कि अमेरिका फिलहाल जिन नीतियों के तहत काम कर रहा है, उससे आने-वाले वक्त में ‘भाड़े के सैनिकों’ का ट्रेंड और फलेगा-फूलेगा.

नागरिकों पर अत्याचार के मामलों में कुख्यात है ये भाड़े के सैनिक

UN की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है कि भाड़े पर सैनिक देने वाली अमेरिकी कंपनी के पूर्व प्रमुख ने लीबिया में सरकार गिराने के लिए 600 करोड़ में डील की थी. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सहयोगी और भाड़े के सैनिक उपलब्ध कराने वाली अमेरिकी कंपनी ब्लैकवाटर के पूर्व प्रमुख प्रिंस एरिक ने लीबिया में सरकार को गिराने का प्रयास किया. एरिक ने एक लीबियाई कमांडर को हथियार देने का प्रस्ताव दिया था, यह संयुक्त राष्ट्र के नियमों का खुला उल्लघंन है.

यूएन की एक गोपनीय जांच रिपोर्ट में यह बात कही गई है. इराक युद्ध में अमेरिका प्राइवेट मिलिट्री या सेना के निजीकरण का कॉन्सेप्ट लेकर आया. इसके तहत ब्लैकवाटर जैसी सिक्योरिटी कॉन्ट्रैक्टर कंपनियों ने युद्ध में अमेरिका को ठेके पर सैनिक और अन्य युद्ध सहायता मुहैया कराई. इन सैनिकों द्वारा आम नागरिकों की हत्या और अत्याचार के बाद इस प्रयोग पर सवाल उठे. इराक में 17 आम नागरिकों की हत्या का मामला अमेरिकी कोर्ट में चला, इसमें ब्लैकवाटर दोषी पाई गई थी.

अब यूएन की इस जांच रिपोर्ट के बाद फिर से सेना के निजीकरण के दुष्परिणाम पर चर्चा होने लगी है. रिपोर्ट में कहा गया है कि एरिक 2019 में लीबिया के एक सैन्य कमांडर को भाड़े के विदेशी सैनिक, अटैक एयरक्राफ्ट, गनबोट और साइबर युद्ध की क्षमता देने की डील कर रहा था. यह सौदा करीब 600 करोड़ रुपए में हो रहा था. इसमें चुनिंदा लीबियाई कमांडरों को मारने और उन पर नजर रखने की योजना थी ताकि लीबिया की अन्तरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को गिराया जा सके.

अमेरिकी कोर्ट द्वारा ब्लैकवाटर को प्रतिबंधित करने के बाद कंपनी ने अपना नाम बदल लिया. एरिक ने पिछले दशक में खुद को हमलों का सौदा करने वाले एग्जिक्यूटिवी के रूप में रिलॉन्च कर लिया. यह सौदे कभी-कभी खनिजों के लिए तो कभी मिलिट्री फोर्स के लिए होते थे लेकिन ज्यादातर सौदे संसाधनों से धनी और अफ्रिकी देशों में होते थे.

इराक युद्ध के बाद एरिक प्रिंस प्राइवेट अमेरिकी मिलिट्री का पोस्टर ब्वॉय बन गया. यहां प्रिंस की कंपनी ने 17 आम नागरिकों की हत्या की और आम लोगों पर अत्याचार किए, युद्ध नियम तोड़े. एरिक प्रिंस एक पूर्व नेवी सील है. एरिक का भाई डेवोस ट्रम्प का एजुकेशन सेक्रेटरी था. साथ ही, ट्रम्प के रूस कनेक्शन की जांच में भी एरिक शामिल है.

‘अग्निवीर’ यानी भाड़े के सैनिक योजना

अब भारत इतना मोदी निर्भर है कि पूरावक्ति सैनिकों की भर्ती नहीं कर पा रहा है लेकिन भाजपा के लिए पेड पूरावक्ती सम्मानजनक पगार पर लाखों जमीनी लठैत और साइबर लठैत भर्ती कर लिए हैं. सैनिकों की भर्ती से अधिक जरुरी है आरएसएस-भाजपा में लठैत भर्ती. यह एकदम अफगानिस्तान मॉडल है.

ठेके पर सैनिक भर्ती की प्रणाली कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां चलाती हैं और वे अमेरिका के तमाम सैन्य अभियानों के लिए लैटिन अमेरिका से लेकर अफगानिस्तान तक भाड़े के सैनिक मुहैय्या कराते रहे हैं. मोदी सरकार तुरंत संविदा सैनिक भर्ती की योजना पर रोक लगाए और सीधे सैनिक भर्ती करे. सेना के लिए फुलटाइम सैनिक चाहिए, पार्ट टाइम या ठेके पर सैनिक नहीं चाहिए.

Read Also –

आखिर यह अग्निपथ/अग्निवीर योजना सेना में आई कैसे ?
अग्निवीर : अदानियों की प्राईवेट आर्मी, जो देश की जनता पर कहर बरपायेगी
अग्निवीर भर्ती के समानान्तर बस्तर में एसपीओ भर्ती पर सुप्रीम कोर्ट
बिना पथ का अग्निपथ – अग्निवीर योजना़ 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

Donate on
Donate on
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

‘तुम मुझे जेल भेजो, मैं तुम्हें स्कूल भेजूंगा’ – अरविन्द केजरीवाल

Next Post

बिहार में गठबंधन की सरकार और संसदीय वामपंथियों का संकट

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

ब्लॉग

तुर्की के इस्तांबुल में भारतीय दूतावास के सामने विरोध प्रदर्शन: ‘ऑपरेशन कगार बंद करो’ और ‘नरसंहार बंद करो’ की मांग को लेकर नारे और रैलियां

by ROHIT SHARMA
December 22, 2025
ब्लॉग

नेपाल : ‘सभी वामपंथी, प्रगतिशील, देशभक्त और लोकतांत्रिक छात्र, आइए एकजुट हों !’, अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र छात्र संघ (क्रांतिकारी)

by ROHIT SHARMA
November 25, 2025
ब्लॉग

सीपीआई माओवादी के नेता हिडमा समेत दर्जनों नेताओं और कार्यकर्ताओं की फर्जी मुठभेड़ के नाम पर हत्या के खिलाफ विरोध सभा

by ROHIT SHARMA
November 20, 2025
ब्लॉग

‘राजनीतिक रूप से पतित देशद्रोही सोनू और सतीश को हमारी पार्टी की लाइन की आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है’ : सीपीआई-माओवादी

by ROHIT SHARMA
November 11, 2025
ब्लॉग

आख़िर स्तालिन के अपराध क्या था ?

by ROHIT SHARMA
November 6, 2025
Next Post

बिहार में गठबंधन की सरकार और संसदीय वामपंथियों का संकट

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

युवा किसान की मौत से बौखलाए संयुक्त किसान मोर्चा का देशव्यापी ऐलान – ‘दिल्ली चलो’

February 23, 2024

लोटा और कलश

December 8, 2024

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

February 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

February 24, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

February 14, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

टीकेपी-एमएल का बयान : ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेतृत्व में लड़ रही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की 25वीं स्थापना वर्षगांठ को लाल सलाम !’

March 1, 2026

‘संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में गाजा और वेस्ट बैंक में जातीय सफाए की संभावना’ – जीन शाउल (WSWS)

March 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.