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रेड कॉरिडोर में लाल क्रांति का सपना (पार्ट 1)

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 10, 2018
in गेस्ट ब्लॉग
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रेड कॉरिडोर में लाल क्रांति का सपना (पार्ट 1)

“कामरेड, अब आगे आप क्या करेंगे ?” “वापस जंगल लौट जाऊंगा. कम से कम मरुंगा तो अपनों के बीच.” मां के इलाज के लिये भूमिगत जीवन छोड़ कर शहर पहुंचे कामरेड की मां की मौत के बाद कामरेड के इस जबाब ने मुझे अंदर से हिला दिया. क्या वाकई जंगल इतना हसीन है कि उसकी आगोश में मौत भी आ जाये तो वह शहरी जिन्दगी से बेहतर है. फिर जंगल का मतलब है क्या ? क्या यह माओवादियों की भाषा में दण्डकारण्य और सरकार की नजर में वही रेड कॉरीडोर है, जो आतंक का पर्याय बना हुआ है ?

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एक-दो नहीं बल्कि तेरह राज्यों यानी तमिलनाडु से लेकर बंगाल तक के बीच खींची इस लाल लकीर के भीतर का सच क्या महज इतना ही है कि यहां विकास की कोई लकीर नहीं पहुंची और इसीलिए माओवाद यहां पहुंच गया ? या फिर प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इन इलाकों में विकास के नाम पर ही लूट मची है, इसलिये मुनाफे की थ्योरी में बाजार का आतंक ही राज्य के आतंक में तब्दील होकर ग्रामीण-आदिवासियों को भी आतंकवादी करार देने से नहीं कतरा रहा ? और ऐसे में समूचे रेड कॉरीडोर का जीवन चक्र सिवाय संघर्ष के बचा नही है, और माओवाद इसी में क्राति के सपने बुनने को तैयार है.

सपने कहां किस रुप में मौजूद हैं, जिसे अमली जामा पहनाने के लिये जंगल जिन्दगी की हकीकत बनी हुई है, यह महज बंदूक उठाये पांच से सात हजार माओवादियों के जरीये नहीं समझा जा सकता है. किसके सपने किस रुप में एक बेहतर जीवन के लिये हर संघर्ष के लिये तैयार हैं, इसके दो चेहरे पिछले दो अलग-अलग दौर में उभरे हैं. पहला दौर 1991 का है, जब आर्थिक सुधार ने प्राकृतिक संपदा से भरपूर जमीन हथिया कर विकास की लकीर खिंचने का रोमांच फैलाना शुरु किया. इस दौर ने शहरी जीवन की समझ में सीधी लकीर खींच कर समझदारों को बांट दिया. एक रास्ता विकास के बाजार में मुनाफा कमाने के घेरे में आने को बेताब हुआ, तो दूसरा रास्ता मानवाधिकार के सवालों को लेकर जंगल-जमीन और शहरी जीवन में तारतम्य बैठाने की जद्दोजहद में आर्थिक सुधार को खारिज करने के लिये खड़ा हुआ.

वहीं, दूसरा दौर उस मंदी का है, जो 2008 में आया और वही तबका जंगल-जमीन के सवाल को उठाने के लिये बैचेन हुआ, जिसने 1991 की लहर में मुनाफा कमाने के घेरे में जाने के लिये हर तरह की जद्दोजहद शुरु की थी. नब्बे के दौर में रेड कॉरीडोर के चार राज्य आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उडीसा के सीमान्त पर स्थित पर्वतीय और जंगलात का इलाका सरकार और नक्सली आंदोलन के विकास और राजनीतिक प्रयोग का आखाडा बना. इस क्षेत्र में महाराष्ट्र के गढ़चिरोली, चन्द्रपुर, और भण्डारा जिले, आन्ध्र प्रदेश के आदिलाबाद, खम्मम, पूर्व गोदावरी, विसाखापत्तनम जिले, उड़ीसा का मलकानगिरी जो पुराने कोरापुट के नाम से भी जाना जाता है और मध्य प्रदेश का बस्तर, राजानांदगांव, बालाधाट और मण्डला जिला आते हैं. असल में 1991 से पहले इस क्षेत्र में अंधेरा जरुर था लेकिन प्रकृतिक संपदा और सौन्दर्य ने ग्रामीण आदिवासियों को जिलाये रखा था लेकिन 1991 के बाद से देशी-विदेशी कंपनियों की सांठगांठ में विकास का जो चेहरा खड़ा करने की कोशिश इस इलाके में शुरु हुई उसने, उन्हीं आदिवासियों को उसी जंगल-जमीन से बेदखल करना शुरु किया, जिनकी जिन्दगी का आधार ही वही था. प्राकृतिक संपदा की लूट या ग्रामीण आदिवासियों के सवाल से इतर इन चारों राज्यो में सरकारां की पहल ने ही शहरी जीवन में एक नयी बहस शुरु की, जिसमें राज्य की भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे.

क्योंकि संपदा की लूट को संरक्षण देते हुये राज्यव्यवस्था का एक ऐसा खाका खड़ा हुआ, जिसके खिलाफ जाने का मतलब लोकतांत्रिक मूल्यां के खिलाफ जाना था. संविधान को ना मानने वाला यानि कानून-व्यवस्था के खिलाफ पहल करने वाला होना था, यानी 1991 से पहले किसी भी राज्य में संविधान और कानून के दायरे में मानवाधिकार के सवाल शहरों में उठते थे तो कल्याणकारी राज्य की भूमिका को राजनीतिक दल भी आड़े ले लेते थे. जिससे राज्य की गलत पहल के खिलाफ आवाज उठाने का एक वातावरण बना रहता था. जिससे राज्य सत्ता पर एक तरह से दबाब बना रहता कि वह मनमर्जी न करे. लेकिन आर्थिक सुधार ने इसे नये तरीके से परिभाषित किया, जिसमें पुलिस प्रशासन और सत्ताधारी की भूमिका बदल गयी क्योंकि विकास का जो खाका खड़ा किया गया, वह उस राजनीति पर भी भारी पड़ा जिसके जरिये लोकतांत्रिक मूल्यों का सवाल चुनावी राजानीति में किसी को सत्ता पर बैठाता था तो किसी को बेदखल कर देता था.

1991 के आम चुनाव में देश का करीब आठ सौ करोड खर्च हुआ और रेड कॉरीडोर के इन चारों राज्यों के विधानसभा चुनाव में करीब साढे तीन सौ करोड रुपये का सरकारी आंकड़ा दिया गया. अगर सरकार की बतायी रकम से ज्यादा भी रकम मान ली जाये तो दुगुनी राशि यानी लोकसभा में सोलह सौ करोड़ और राज्यों में सात सौ करोड़ से ज्यादा का खर्च नहीं हुआ होगा. लेकिन 1991 से लेकर 1996 तक के दौर में आर्थिक सुधार की लकीर खींचने के लिये इन चार राज्यों के नक्सल प्रभावित इलाकां में पचास हजार करोड से ज्यादा की रकम राजनीति के खाते में गयी, जिसमें सत्ता और विपक्ष दोनों की राजनीति और राजनेता शामिल थे. जिस संपत्ति की लूट इन इलाकों में शुरु हुई, उसकी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमत पचास लाख करोड़ से ज्यादा की थी. देस के दस टॉप उद्योगपतियों का डेरा उसी दौर में लगा, जो अब प्राकृतिक संपदा का भरपूर लाभ उठाते हुये बदस्तूर जारी है. जंगल में उद्योगपतियों के लाभ को महज इस उदाहरण से भी समझा जा सकता है कि उस वक्त एक पेड़ की कीमत उद्योगपती के लिये तीन पैसे थी, जो अब बढ़ते-बढ़ते नौ पैसे हो गयी है. वहीं बाजार में उस वक्त उस कटे हुये पेड़ की कीमत एक हजार थी, जो अब बढ़कर नौ हजार हो चुकी है.

यह स्थित कमोवेश हर संपदा और मजदूरी से जुड़ा है या कहें लूट और मुनाफे का यह अर्थशास्त्र हर वस्तु के साथ जुड़ा था और है, लेकिन विकास से इतर बड़ा सवाल उस राज्य का था जिसकी भूमिका को लेकर जंगल नहीं शहर परेशान था. पुलिस-प्रशासन के जरिये विकास की इस लकीर को अंजाम देने के लिये जो बजट राज्यों द्रारा बनाया गया, वह राज्य के समूचे बजट से बडा हुआ. महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में तो नक्सल प्रभावित इलाकां के लिये राज्य बजट से इतर एक दूसरा बजट बनाया गया. जो करीब ढाई गुना ज्यादा था. वहीं उडीसा के जिस बस्तर के आदिवासियों की न्यूनतम जरुरतों को लेकर भी पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और खाने को लेकर कोई योजना आजादी के बाद भी नहीं पहुंची, वही संपदा की लूट को संरक्षण देती हुई पुलिस और अधिकारी इस इलाके में लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर बकायदा योजनाओं के साथ जरुर पहुंचे. इनके पीछे भी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में माल पहुंचाने की एवज में राज्य का पैसा ही था, जो कमीशन से मिला था. उडीसा में बतौर कमीशन सबसे ज्यादा धन गया. करीब पांच हजार करोड तक लेकिन इस दौर में नया सवाल राजनीतिक शून्यता का उभरा और लोकतांत्रिक मूल्यों के तहत मानवाधिकार को नये तरीके से परिभाषित करने की राजनीतिक थ्योरी का उभरा. इस प्रक्रिया के विरोध का मतलब व्यवस्था का विरोध था, जिसे राज्य बर्दाश्त नहीं करता. इसका असर प्रभावित राज्यों में दो-तरफा दिखा. एक तरफ कॉलेज से निकल रहे छात्रों के सामने फैलते बाजार का हिस्सा बनकर हर सुविधा को भोगना था तो दूसरी तरफ कॉलेज से काफी पहले निकल कर नौकरी करता हुआ, वह तबका था जो अर्थव्यव्स्था के इस बाजारी चक्र में मानवीयता और राज्य के कल्याणकारी होने के सबब को जगाना चाहता था.

इन चारों राज्यों में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों से जुड़े करीब साढ़े तीन लाख से ज्यादा शहरी व्यक्तियों को सरकारी तंत्र ने उन मामलों में घेरा जो जंगल जमीन के मद्देनजर सरकार की नीतियों का विरोध करने अलग-अलग जगहों पर सडक पर उतरे. मसलन नागपुर से करीब सवा सौ किलोमीटर दूर तोतलाडोह के मेलघाट में टाइगर प्रोजेक्ट 1993 में लाया गया. पूरा इलाका रिजर्व फॉरेस्ट में ले आया गया, जहां पेड़ की एक डाली काटने का मतलब था पचास रुपये का चालान और नदी में एक मछली पकडने का मतलब था सौ रुपये का जुर्माना. संकट जंगल में रहने वाले आदिवासियों और मधुआरों पर आया. करीब बीस हजार ग्रामीण आदिवासी जायें कहां और उनकी रोजी-रोटी कैसे चलेगी ? इसप र जब महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ शहर के सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से जुडे लोग सडकों पर उतरे तो उन पर नकेल कसने के लिये प्रशासन ने पहले इलाके को नक्सली प्रभावित वाला करार दिया. फिर सभी पर उस दौर में आतंकवादी निरोधक कानून टाडा लगाने की प्रक्रिया शुरु कर दी. इसके साथ ही जब टाइगर प्रोजेक्ट से नक्सल शब्द जुड़ा तो नक्सल उन्मूलन के बजट का बडा हिस्सा भी यहां पहुंचा. 1995 में पहुंचे बीस करोड का क्या हुआ ? इसकी जानकारी राजनीति ने ही ठंडे बस्ते में डाल दी. यह इलाका अब के कांग्रेसी सांसद मुकुल वासनिक के इलाके में आता है. लेकिन उस दौर में शहर के करीब तीन हजार लोगों पर पुलिस ने अलग-अलग धारायें लगायी और 75 आदिवासियों पर टाडा की धारायें लगाकर जेल में बंद कर दिया. शहर के आंदोलनकारियों को समझ नहीं आया कि वह आदिवासियों के हक का सवाल कैसे उठायें ?

वहीं आदिवासियों को समझ नहीं आया कि अपने हक के लिये खड़े होते ही उन्हें नक्सली मान कर जेल में ठूंस दिया गया तो उनके सामने रास्ता क्या है ? लेकिन टाइगर प्रोजेक्ट पर सरकार की इस नायाब पहल ने प्रोजेक्ट को कितना आगे बढाया, यह 2009 में केन्द्र सरकार की रिपोर्ट से समझा जा सकता है कि मेलघाट टाइगर परियोजना में एक भी टाइगर नहीं है. वहीं इस क्षेत्र के दस आदिवासी अभी भी टाडा के तहत् जेल में बंद है और 25 आदिवासी टाडा की धाराओं का जबाब देने के लिये हर महीने अदालत की चक्कर लगाते रहते हैं. दरअसल, यह स्थिति अलग-अलग परियोजनाओं के तहत हर इलाके में आयी. पावर प्रोजेक्ट से लेकर सीमेंट-स्टील फैक्ट्री और कागज फैक्ट्री से लेकर खनन परियोजनाओं के तहत भी आदिवासियों पर बंदिशें लगायी गयी. ऐसे में आदिवासियों के विरोध को आदिवासियों तक ही सिमटाया जाता तो मानवाधिकार के मामले के तहत सरकारें फंस सकती थी. लेकिन इनके हक में सांस्कृतिक संगठन, दलित रंगभूमि से लेकर आह्वान नाट्य मंच तक के कलाकारों को पहले इन इलाकों में आदिवासियों की आवाज उठाने के लिये उसी राजनीति ने प्रेरित किया, जिसने बाद में आपसी गठबंधन कर सभी को नक्सली मान कर पुलिसिया कार्रवाई को उचित ठहराया.

यानि एक पूरा तंत्र इस बात को साबित करने में लगा कि हर वह जगह जहां योजनायें पहुंच रही हैं, वहां नक्सली पहले पहुंचते हैं और योजनाओं को रोक देते हैं इसलिये लड़ाई विकास और विकास विरोधी सोच की है लेकिन 1991 में खींची यह लकीर 2008 में मंदी के साथ कैसे बदली ? यह भी इन इलाकों के विस्तार के साथ समझा जा सकता है.
(जारी…………)

  • पुण्य प्रसून वाजपेयी के ब्लॉग (http://prasunbajpai.itzmyblog.com/) से साभार 

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