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सवालों से भागना और ‘जय हिन्द’ कहना ही बना सत्ता का शगल

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 13, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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सवालों से भागना और ‘जय हिन्द’ कहना ही बना सत्ता का शगल

पुण्य प्रसून वाजपेयी

चीनी और जापानी देश लौटते हैं. नागरिकता छोडते नहीं. अपने देश के लिये काम करते हैं. पर दुनिया में फैले भारतीयों की तादाद लगातार बढ़ रही है और ये तादाद ना लौटने के लिये बढ़ रही है. तो क्या लोकतंत्र के नाम पर भारत खुद को ही नये तरीके से गढ़ रहा है ? जहां गांव से रास्ता छोटे शहर, छोटे शहर से बडे शहर, बडे शहर से महानगर और महानगर से देश छोड़कर जाने का रास्ता ही भारत की पहचान हो चुकी है. जो राजनीति सत्ता देश को चलाने के लिये बैचेन रहती है, वह भी अब विदेशी जमीन पर अपने होने का राग गा रही है क्योंकि देश के भीतर का सिस्टम या तो पूंजी पर जा टिका है या पूंजीपतियों पर, जो सत्ता को भी गढ़ते हैं और सत्ता के जरिये खुद को भी.

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मेहुल चोकसी ने भारतीय नागरिकता छोड दी. उससे पहले जांच के लिये भारत लौटने से ये कह कर इंकार कर दिया था कि भारत में उनकी लिचिंग हो सकती है. विजय माल्या ने पहले भारतीय जेल को अमानवीय बताया और अब स्विस बैंक से कहा आप मेरे अकाउंट की जानकरी भारतीय जांच एंजेसी सीबीआई को कैसे दे सकते हैं, जो खुद ही दागदार है, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रही है. भारत के राष्ट्रीयकृत बैंकों से जनता के पैसे को कर्ज लेकर ना लौटाने वाले कॉरपोरेट व उद्योगपतियों की कतार करीब 900 तक पहुंच चुकी है और आंकडा बारह हजार करोड रुपये पार कर चुका है.

इसी दौर में देश पर बढता कर्ज 80 लाख करोड का हो चुका है और ऑक्सफाम की ताजा रिपोर्ट बताती है कि भारत के टॉप मोस्ट सिर्फ नौ लोगों की आमदनी – कमाई या संपत्ति का कुल आंकडा देश के 65 करोड लोगों की आय संपत्ति या आमदनी के बराबर है. दुनिया में भारत को लेकर तमाम चकाचौंध बिखराने के बावजूद दुनिया भर से भारत के बाजार में डॉलर झोंकने वाले बढ़ क्यों नहीं रह है ? ये सवाल अब भी अनसुलझा-सा बना दिया गया है.

2017 में 40 बिलियन डॉलर का निवेश हुआ तो 2018 में 43 बिलियन डॉलर का निवेश भारत में हुआ जबकि ब्राजील सरीखे देश में 59 बिलियन डॉलर का विदेशी निवेश 2018 में हो गया, जहां की सत्ता ने दुनिया घूमने पर सबसे कम खर्च किया और चीन में 142 बिलियन डॉलर का निवेश 2018 में हो गया. तो भारत की दौड में किस देश से हो सकती है ? ये सोचने-समझने से पहले इस हकीकत को भी जान लें कि यूपी में निवेश को लेकर जब योगी-मोदी ने बाइब्रेट गुजरात की तर्ज पर सम्मेलन किया तो निवेश का भरोसा देने वाले एक विदेशी कॉरपोरेट ने पिछले दिनों अध्ययन कर पाया कि कृषि अर्थव्यवस्था पर टिके यूपी में किसानों को अब अपनी फसल बचाने के लिये गाय के लिये बाड़ बनाने से जुझना पड़ रहा है और बाड़ लगाने के लिये किसानों के पास पैसे नहीं है और राज्य सरकार गायों की बढ़ती तादाद के लिये गौ-चारण की जमीन तक की व्यवस्था तो दूर कोई व्यवस्था तक करने में सक्षम नहीं है.




दिल्ली की एक संस्था से मदद लेकर भारत के मेडिकल क्षेत्र में निवेश की योजना बनाने वाली विदेशी कंपनी ने पाया कि भारत में प्राइवेट अस्पताल खोलना सबसे फायदे का धंधा है और सरकारी अस्पताल में न्यूनतम जरुरतें तो दूर 70 फीसदी बीमार और ज्यादा बीमारी लेकर अस्पताल से लौटते हैं. यानी अस्पताल साफ-सुथरे रहे सिर्फ ये काबिलियत ही प्राइवेट अस्पताल को लायक होने का तमगा दे देती है. फिर भारत का अनूठा सच शिक्षा से भी जुडा है. जहां स्कूल जाने वाले 50 फीसदी से ज्यादा बच्चे जोड-घटाव तक नहीं कर सकते. अंग्रेजी तो दूर की गोटी है, हिन्दी भी पढ़ नहीं पाते यानी सामने वाला जो बोल रहा है, उसे सुन कर जो सही-गलत समझ में आये उसे ही सच मान कर देश की आधी आबादी जिन्दगी जी रही है. और इस जिन्दगी को चलाने वाले नेताओं की कतार सिर्फ बोलती है क्योंकि बोल कर वोट पाने का लाइसेंस उन्हीं के पास हो और लोकतंत्र का तकाजा यही कहता है कि जो खूब शानदार बोल सकता है, वहीं देश की सत्ता को संभाल सकता है यानी सारे सवाल उस दायरे में आकर सिमट जाते हैं, जहां 2014 में 10 जनपथ तक जीरो-जीरो लगाते हुये करोडों के घोटाले-घपले का आरोप नेहरु-गांधी परिवार पर नरेन्द्र मोदी लगाकर सत्ता पाते हैं और 2019 में नरेन्द्र मोदी को चौकीदार चोर है कि उपमा दे कर राहुल गांधी अब परिपक्व नजर आने लगते हैं क्योंकि उनकी अगुवाई में कांग्रेस कई राज्यों में लौट आती है.




तो सवाल कई है. मसलन, क्या भारत को बनाना रिपब्लिक बनाकर सत्ता पाना ही लोकतंत्र हो चुका है ? क्या भारतीय ही भारत को लूट कर गणतंत्र होने का तमगा सीने से लगाये हुये हैं ? क्या भारतीय राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता का मोल-भाव सत्ता बनाने या बिगाडने में जा सिमटा है ? क्या संविधान को भी सत्ता का और बनाकर सत्ताधारी देश से खेलने में हिचक नहीं रहा है ? क्या देश में खुली लूट कर देश छोड़कर भागना बेहद आसान है क्योंकि सत्ता पाने की तिकडम (चुनाव के तौर तरीके) ही एक ऐसी पूंजी पर जा टिकी है जो ईमानदारी से बटोरी नहीं जा सकती और बेइमानी किये बगैर लौटायी नहीं जा सकती.

क्या दुनिया में भारत इसलिये आकर्षण का केन्द्र है क्यांकि भारतीय बाजार से कमाई सबसे ज्यादा है या फिर जिस तरह दो जून की रोटी तले आस्था के समंदर में देश के 80 करोड लोग गोते लगाते हैं, उसमें दुनिया की कोई भी फिलॉस्फी फेल होने के बाद भारत आकर आंनद ले सकती है या फिर भारत धीरे-धीरे खुद को उस पुरातन अवस्था में ले जा रहा है, जहां विकसित या विकासशील होने-कहलाने का मार्ग नहीं जाता बल्कि अतीत के गौरवमयी हालातों को धर्म की चादर में लपेट कर सत्ता सुला देना चाहती है ? यानी मिजाज लोकतंत्र का हो या परिभाषा आजादी की गढ़ी जाये या फिर आस्था के आसरे राष्ट्रवाद और देशभक्ति के नारे लगाये जाये, भारत कैसे सत्ता की लूट और विज्ञान के आसरे विकसित होने की तरफ ध्यान ही ना दें, इसके उपाय भी लगातार खोजे जा रहे हैं क्यांकि शिक्षा-प्रोफेशनल्स-रोजगार को लेकर दुनिया में फैले विदेशियों की तादाद में भारत का नंबर चीन – जापान के बाद आता है.




चीनी और जापानी देश लौटते हैं. नागरिकता छोडते नहीं. अपने देश के लिये काम करते हैं. पर दुनिया में फैले भारतीयों की तादाद लगातार बढ़ रही है और ये तादाद ना लौटने के लिये बढ़ रही है. तो क्या लोकतंत्र के नाम पर भारत खुद को ही नये तरीके से गढ़ रहा है ? जहां गांव से रास्ता छोटे शहर, छोटे शहर से बडे शहर, बडे शहर से महानगर और महानगर से देश छोड़कर जाने का रास्ता ही भारत की पहचान हो चुकी है. जो राजनीति सत्ता देश को चलाने के लिये बैचेन रहती है, वह भी अब विदेशी जमीन पर अपने होने का राग गा रही है क्योंकि देश के भीतर का सिस्टम या तो पूंजी पर जा टिका है या पूंजीपतियों पर, जो सत्ता को भी गढ़ते हैं और सत्ता के जरिये खुद को भी. फिर सियासत डगमगाने लगे तो देश की नागरिकता छोड भारतीय व्यवस्था पर ही सवाल उठाने से नहीं चुकते और सत्ता कहती है ‘जय हिन्द !’

(पुण्य प्रसून वाजपेयी के ब्लॉग से साभार)




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