Friday, July 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

सवालों से भागना और ‘जय हिन्द’ कहना ही बना सत्ता का शगल

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 13, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

सवालों से भागना और ‘जय हिन्द’ कहना ही बना सत्ता का शगल

पुण्य प्रसून वाजपेयी

चीनी और जापानी देश लौटते हैं. नागरिकता छोडते नहीं. अपने देश के लिये काम करते हैं. पर दुनिया में फैले भारतीयों की तादाद लगातार बढ़ रही है और ये तादाद ना लौटने के लिये बढ़ रही है. तो क्या लोकतंत्र के नाम पर भारत खुद को ही नये तरीके से गढ़ रहा है ? जहां गांव से रास्ता छोटे शहर, छोटे शहर से बडे शहर, बडे शहर से महानगर और महानगर से देश छोड़कर जाने का रास्ता ही भारत की पहचान हो चुकी है. जो राजनीति सत्ता देश को चलाने के लिये बैचेन रहती है, वह भी अब विदेशी जमीन पर अपने होने का राग गा रही है क्योंकि देश के भीतर का सिस्टम या तो पूंजी पर जा टिका है या पूंजीपतियों पर, जो सत्ता को भी गढ़ते हैं और सत्ता के जरिये खुद को भी.

You might also like

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

मेहुल चोकसी ने भारतीय नागरिकता छोड दी. उससे पहले जांच के लिये भारत लौटने से ये कह कर इंकार कर दिया था कि भारत में उनकी लिचिंग हो सकती है. विजय माल्या ने पहले भारतीय जेल को अमानवीय बताया और अब स्विस बैंक से कहा आप मेरे अकाउंट की जानकरी भारतीय जांच एंजेसी सीबीआई को कैसे दे सकते हैं, जो खुद ही दागदार है, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रही है. भारत के राष्ट्रीयकृत बैंकों से जनता के पैसे को कर्ज लेकर ना लौटाने वाले कॉरपोरेट व उद्योगपतियों की कतार करीब 900 तक पहुंच चुकी है और आंकडा बारह हजार करोड रुपये पार कर चुका है.

इसी दौर में देश पर बढता कर्ज 80 लाख करोड का हो चुका है और ऑक्सफाम की ताजा रिपोर्ट बताती है कि भारत के टॉप मोस्ट सिर्फ नौ लोगों की आमदनी – कमाई या संपत्ति का कुल आंकडा देश के 65 करोड लोगों की आय संपत्ति या आमदनी के बराबर है. दुनिया में भारत को लेकर तमाम चकाचौंध बिखराने के बावजूद दुनिया भर से भारत के बाजार में डॉलर झोंकने वाले बढ़ क्यों नहीं रह है ? ये सवाल अब भी अनसुलझा-सा बना दिया गया है.

2017 में 40 बिलियन डॉलर का निवेश हुआ तो 2018 में 43 बिलियन डॉलर का निवेश भारत में हुआ जबकि ब्राजील सरीखे देश में 59 बिलियन डॉलर का विदेशी निवेश 2018 में हो गया, जहां की सत्ता ने दुनिया घूमने पर सबसे कम खर्च किया और चीन में 142 बिलियन डॉलर का निवेश 2018 में हो गया. तो भारत की दौड में किस देश से हो सकती है ? ये सोचने-समझने से पहले इस हकीकत को भी जान लें कि यूपी में निवेश को लेकर जब योगी-मोदी ने बाइब्रेट गुजरात की तर्ज पर सम्मेलन किया तो निवेश का भरोसा देने वाले एक विदेशी कॉरपोरेट ने पिछले दिनों अध्ययन कर पाया कि कृषि अर्थव्यवस्था पर टिके यूपी में किसानों को अब अपनी फसल बचाने के लिये गाय के लिये बाड़ बनाने से जुझना पड़ रहा है और बाड़ लगाने के लिये किसानों के पास पैसे नहीं है और राज्य सरकार गायों की बढ़ती तादाद के लिये गौ-चारण की जमीन तक की व्यवस्था तो दूर कोई व्यवस्था तक करने में सक्षम नहीं है.




दिल्ली की एक संस्था से मदद लेकर भारत के मेडिकल क्षेत्र में निवेश की योजना बनाने वाली विदेशी कंपनी ने पाया कि भारत में प्राइवेट अस्पताल खोलना सबसे फायदे का धंधा है और सरकारी अस्पताल में न्यूनतम जरुरतें तो दूर 70 फीसदी बीमार और ज्यादा बीमारी लेकर अस्पताल से लौटते हैं. यानी अस्पताल साफ-सुथरे रहे सिर्फ ये काबिलियत ही प्राइवेट अस्पताल को लायक होने का तमगा दे देती है. फिर भारत का अनूठा सच शिक्षा से भी जुडा है. जहां स्कूल जाने वाले 50 फीसदी से ज्यादा बच्चे जोड-घटाव तक नहीं कर सकते. अंग्रेजी तो दूर की गोटी है, हिन्दी भी पढ़ नहीं पाते यानी सामने वाला जो बोल रहा है, उसे सुन कर जो सही-गलत समझ में आये उसे ही सच मान कर देश की आधी आबादी जिन्दगी जी रही है. और इस जिन्दगी को चलाने वाले नेताओं की कतार सिर्फ बोलती है क्योंकि बोल कर वोट पाने का लाइसेंस उन्हीं के पास हो और लोकतंत्र का तकाजा यही कहता है कि जो खूब शानदार बोल सकता है, वहीं देश की सत्ता को संभाल सकता है यानी सारे सवाल उस दायरे में आकर सिमट जाते हैं, जहां 2014 में 10 जनपथ तक जीरो-जीरो लगाते हुये करोडों के घोटाले-घपले का आरोप नेहरु-गांधी परिवार पर नरेन्द्र मोदी लगाकर सत्ता पाते हैं और 2019 में नरेन्द्र मोदी को चौकीदार चोर है कि उपमा दे कर राहुल गांधी अब परिपक्व नजर आने लगते हैं क्योंकि उनकी अगुवाई में कांग्रेस कई राज्यों में लौट आती है.




तो सवाल कई है. मसलन, क्या भारत को बनाना रिपब्लिक बनाकर सत्ता पाना ही लोकतंत्र हो चुका है ? क्या भारतीय ही भारत को लूट कर गणतंत्र होने का तमगा सीने से लगाये हुये हैं ? क्या भारतीय राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता का मोल-भाव सत्ता बनाने या बिगाडने में जा सिमटा है ? क्या संविधान को भी सत्ता का और बनाकर सत्ताधारी देश से खेलने में हिचक नहीं रहा है ? क्या देश में खुली लूट कर देश छोड़कर भागना बेहद आसान है क्योंकि सत्ता पाने की तिकडम (चुनाव के तौर तरीके) ही एक ऐसी पूंजी पर जा टिकी है जो ईमानदारी से बटोरी नहीं जा सकती और बेइमानी किये बगैर लौटायी नहीं जा सकती.

क्या दुनिया में भारत इसलिये आकर्षण का केन्द्र है क्यांकि भारतीय बाजार से कमाई सबसे ज्यादा है या फिर जिस तरह दो जून की रोटी तले आस्था के समंदर में देश के 80 करोड लोग गोते लगाते हैं, उसमें दुनिया की कोई भी फिलॉस्फी फेल होने के बाद भारत आकर आंनद ले सकती है या फिर भारत धीरे-धीरे खुद को उस पुरातन अवस्था में ले जा रहा है, जहां विकसित या विकासशील होने-कहलाने का मार्ग नहीं जाता बल्कि अतीत के गौरवमयी हालातों को धर्म की चादर में लपेट कर सत्ता सुला देना चाहती है ? यानी मिजाज लोकतंत्र का हो या परिभाषा आजादी की गढ़ी जाये या फिर आस्था के आसरे राष्ट्रवाद और देशभक्ति के नारे लगाये जाये, भारत कैसे सत्ता की लूट और विज्ञान के आसरे विकसित होने की तरफ ध्यान ही ना दें, इसके उपाय भी लगातार खोजे जा रहे हैं क्यांकि शिक्षा-प्रोफेशनल्स-रोजगार को लेकर दुनिया में फैले विदेशियों की तादाद में भारत का नंबर चीन – जापान के बाद आता है.




चीनी और जापानी देश लौटते हैं. नागरिकता छोडते नहीं. अपने देश के लिये काम करते हैं. पर दुनिया में फैले भारतीयों की तादाद लगातार बढ़ रही है और ये तादाद ना लौटने के लिये बढ़ रही है. तो क्या लोकतंत्र के नाम पर भारत खुद को ही नये तरीके से गढ़ रहा है ? जहां गांव से रास्ता छोटे शहर, छोटे शहर से बडे शहर, बडे शहर से महानगर और महानगर से देश छोड़कर जाने का रास्ता ही भारत की पहचान हो चुकी है. जो राजनीति सत्ता देश को चलाने के लिये बैचेन रहती है, वह भी अब विदेशी जमीन पर अपने होने का राग गा रही है क्योंकि देश के भीतर का सिस्टम या तो पूंजी पर जा टिका है या पूंजीपतियों पर, जो सत्ता को भी गढ़ते हैं और सत्ता के जरिये खुद को भी. फिर सियासत डगमगाने लगे तो देश की नागरिकता छोड भारतीय व्यवस्था पर ही सवाल उठाने से नहीं चुकते और सत्ता कहती है ‘जय हिन्द !’

(पुण्य प्रसून वाजपेयी के ब्लॉग से साभार)




Read Also –
महागठबंधन एक मजबूरी है वैकल्पिक राजनैतिक ताकत का, पर जरूरी है
जब सरकार न्याय और सच्चाई की बातें बनाती है तो मैं चुपचाप मुस्कुरा कर चुप हो जाता हूं-हिमांशु कुमार
झूठ के आसमान में रफाल की कीमतों का उड़ता सच – द हिन्दू की रिपोर्ट
106वीं विज्ञान कांग्रेस बना अवैज्ञानिक विचारों को फैलाने का साधन





[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]



Tags: चौकीदारविदेशी निवेशस्विस बैंक
Previous Post

ईवीएम और हत्याओं के सहारे कॉरपोरेट घरानों की कठपुतली बनी देश का लोकतंत्र

Next Post

संविधान जलाने और विक्टोरिया की पुण्यतिथि मानने वाले देशभक्त हैं, तो रोजी, रोटी, रोजगार मांगने वाले देशद्रोही कैसे ?

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

by ROHIT SHARMA
July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

लोकतंत्र के अंतिम किले का पतन : भाजपा की ढाल बना चुनाव आयोग

by ROHIT SHARMA
June 16, 2026
Next Post

संविधान जलाने और विक्टोरिया की पुण्यतिथि मानने वाले देशभक्त हैं, तो रोजी, रोटी, रोजगार मांगने वाले देशद्रोही कैसे ?

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

चाकू से पसलियों की गुज़ारिश तो देखिये !

January 18, 2024

मुर्गी और काजी का इंसाफ

September 8, 2020

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
Uncategorized

‘ऑपरेशन कगार के खिलाफ और भारत में जनयुद्ध के समर्थन में लामबंदी जारी रखें’ – ICSPWI इटली

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

July 20, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.