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Home गेस्ट ब्लॉग

चीन-अमरीका ट्रेड वार के बीच जोकर मोदी सरकार

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 27, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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चीन-अमरीका ट्रेड वार के बीच जोकर मोदी सरकार

Subroto Chaterjiसुब्रतो चटर्जी
सिर्फ़ एक ही हालत में चीन भारत युद्ध हो सकता है, अगर चीन मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने की ठान ले तो.

अमरीका और 68 यूरोपीय देशों के साथ मिलकर कोरोना के उद्गम स्थल चीन के विरुद्ध जांंच की सहमति देना भारत को भारी पड़ रहा है. हालिया सीमा विवाद इसी का नतीजा है. दूसरा महत्वपूर्ण कारण मोदी सरकार का ट्रेड वार में चीन के विरुद्ध अमरीका का साथ देना है.

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मोदी सरकार चीन अमरीका ट्रेड वार की असली वजह को नहीं समझ कर चीन के विनिर्माण क्षेत्र को अपने देश में लाने के लोभ में भारत ने चीन को भड़का दिया है. उसके पहले, विदेशी कंपनियों के द्वारा भारत में निवेश की शर्तों को अमरीका के इशारे पर बदल कर भारत ने पहले ही चीन को भड़का चुका है.

मोदी सरकार यह समझने में असमर्थ रही कि चीन से उठकर कोई भी मैन्युफ़ैक्चरर भारत जैसे देश में कभी नहीं आएगा. कारण स्पष्ट है. विदेशी पूंंजीपति इतने मूर्ख नहीं होते कि उस देश में जाएंं जहां सरकार सांप्रदायिक दंगे करवाती हो और आम जनता के जीने के अधिकार के भी ख़िलाफ़ हो.

लॉकडाउन की साज़िश सामाजिक ताने बाने को छिन्न कर मज़दूरों को पूरी तरह से भिखारी बनाने का है. इसी क्रम में सीएए और एनआरसी जैसे ग़ैर-क़ानूनी फ़ैसलों को चुनौती देने वालों को जेल में यूएपीए जैसे काले क़ानून के तहत सड़ाने का षड्यंत्र भी है.

संविधान और क़ानून की धज्जियांं उड़ा कर और सुप्रीम कोर्ट को जेब में रख कर जिस फ़ासिस्ट एजेंडा को लागू करने की फ़िराक़ में मोदी सरकार है, पश्चिमी जगत उस पर थूकता है. दस हज़ार भाड़े के गुजरातियों से हाऊडी मोदी करवाना एक अलग बात है, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इज़्ज़त पाना दूसरी बात है. श्रम और फ़ैक्ट्री क़ानूनों में संशोधन को भी पश्चिमी जगत बुरा मानता है.

मोदी सरकार को इतना भी नहीं मालूम कि अंतर्राष्ट्रीय श्रम क़ानूनों को नहीं पालन करने वाली संस्थाओं और फ़ैक्टरियों के माल, सेवा या उत्पादों को यूरोप और अमरीकी कंपनियांं नहीं खरीद सकती. उनके अपने देश का क़ानून ही इसके विरुद्ध है. यही कारण है कि अज़ीम प्रेमजी और कई अन्य उद्योगपतियों ने इन बदलावों का विरोध किया है. सेवा क्षेत्र और मैन्यूफ़ैक्चरिंग क्षेत्र से जुड़ी ऐसी इकाइयांं जो निर्यात पर निर्भर हैं, वे इसलिए इन बदलावों के ख़िलाफ़ हैं.

एक तरफ़ ये सरकार विदेशी उद्योगपतियों को निमंत्रण दे रही है और दूसरी तरफ़ ऐसे क़ानून बना रही है जिनके चलते यहांं कोई आ ही नहीं पाएगा. धीरे धीरे जब बात समझ आई तो एक तरफ़ अपनी सरकार के श्रम मंत्रालय से इन बदलावों का विरोध करवाया गया और दूसरी तरफ़ आत्मनिर्भरता का राग शुरू किया गया, चेहरा बचाने के लिये ये ज़रूरी था.

अब सरकार बुरी तरह से फंस चुकी है. शहर और औद्योगिक, विनिर्माण क्षेत्र मज़दूरों से ख़ाली हो गए. जीडीपी माइनस में आ गई. कोरोना कॉंट्रोल नहीं हुई और मध्यम वर्ग भी तबाह हो गया.

अब भी अगर सरकार सोचती है कि सप्लाई साईड इकोनोमिक्स और क्रोनी कैपिटलिज्म के सहारे टिकी रह सकती है , तो वह मूर्खों की दुनिया में जी रही है. पिछले साल मैंने लिखा था कि अपनी ग़लत आर्थिक नीतियों के चलते यह सरकार पांंच साल नहीं पूरा कर पाएगी, जिसे मैंने सुबह पोस्ट भी किया था, आज वह सच होता दिख रहा है.

चलते चलते चीन और अमेरिका के बीच ट्रेड वार की असली वजह बता दूंं. इसकी असली वजह है चीन द्वारा विकसित Semi Conductor Technology, जिसके बगैर उद्योग में 5G Technology का प्रयोग संभव नहीं है. साधारण भाषा में यह रोबोट के ज़रिए खानों और फ़ैक्टरियों में काम करने की तकनीक है.

चीनी कोयला खानों में इसके सफल प्रयोग के बाद वहांं की फ़ैक्टरियों में भी इस तकनीक का सफल परीक्षण किया गया. जापान, यूरोप और अन्य देशों में इसकी भारी मांंग से अमरीका बौखलाया हुआ है इसलिए, कोरोना के बहाने चीन पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने के लिए वह दुनिया पर दवाब बना रहा है.

प्रसंगवश यह भी बता दूंं कि गूगल के सीईओ सुंदर पिचई ने भी artificial intelligence या कृत्रिम बौद्धिकता की दिशा में बहुत काम किया है, लेकिन जब उन्होंने देखा कि इस प्रक्रिया में रोबोट अपने आप ही समस्या और उसके समाधान ढूंंढने लगे तो उन्होंने इस प्रयोग को रोक दिया, उनको दूसरा Frankenstein नहीं चाहिए था.

चीन यहीं पर बाज़ी मार गया और अमेरिका को अपदस्थ कर एक मात्र महाशक्ति बनने की राह पर चल पड़ा. उसे रोकना अब नामुमकिन है. अमरीका ने भारत के आत्ममुग्ध मूर्ख शासक को बड़ी चालाकी से भारत के ही खर्च पर चीन के विरुद्ध उलझा दिया, यही हासिल रहा नमस्ते ट्रंप का.

ख़ैर, चीन भारत युद्ध नहीं होगा. डिप्लोमेसी की भाषा में चीन जो सीमा पर अभी कर रहा है उसे muscle flexing कहा जाता है. वैसे भी भारत की खोखली सेना के पास युद्ध लड़ने के लिए दस दिनों का गोला बारूद है, सरकारी एजेंसियों के अनुसार.

सिर्फ़ एक ही हालत में युद्ध हो सकता है, अगर चीन मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने की ठान ले तो. सवाल ये है कि क्या चीन अमरीका के साथ-साथ भारत के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलना चाहेगा ? मुझे नहीं लगता.

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