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भारत में नेहरू से टकराता फासीवादी आंदोलन और फासीवादी रुझान

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 14, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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भारत में नेहरू से टकराता फासीवादी आंदोलन और फासीवादी रुझान

Manmeetमनमीत, सब-एडिटर, अमर उजाला

भारत में इस समय कथित तौर पर राष्ट्रवादी सरकार है. राष्ट्रवादी सरकार है तो वाजिब बात है कि 90 फीसद मीडिया भी राष्ट्रवादी है. हर ओर राष्ट्रवाद का उफान है. राष्ट्रवादियों की मुठियां तनी हुई है. भौहें सख्त है और जबड़ा कसा हुआ है.

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राष्ट्रवाद है तो लाज़िम है कि नफरत के लिए एक दुश्मन भी चाहिए, लिहाजा, बाहरी दुश्मन पाकिस्तान और चीन तो पहले से थे ही, अब नेपाल भी घोषित हो गया है. देश के भीतर तो कौन राष्ट्रवादियों के दुश्मन है, सबको मालूम है ही.

जिस राष्ट्रवाद की लहर में हमारे देश में एक राष्ट्रवादी राजनीतिक दल सरकार बना लेती है, वो ही राष्ट्रवाद यूरोप में घृणा की नजरों से देखा जाता है. मतलब, यूरोप के किसी देश मे अगर कोई राजनीतिक दल राष्ट्रवाद की भावनाओं पर सवार होता है, तो उसको अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता.

असल में, इस राष्ट्रवाद की बड़ी कीमत चुकाई है यूरोप ने. कभी यूरोप भी राष्ट्रवादी था, जिससे नस्लों के आधार पर उसके इतने टुकड़े हुये, जिस कारण यूरोप आज छोटे-छोटे भूगौलिक टुकड़ों में बंटा हुआ है. इसको Balkanization Of Europe भी कहते हैं.

यूरोप के इसी राष्ट्रवाद के कारण पूरी दुनिया को दो-दो विश्व युद्ध झेलने पड़े, जिसमें करोड़ों युवा खपे. करोडों नवविवाहिता विधवा हुई. करोड़ों मां बाप बिना बच्चों के रह गए. इन बातों से ही सबक लेकर यूरोप के लोग आपस में प्यार से और मिल-जुल कर रहते हैं. उनके यहां बॉर्डर विवाद जैसा कुछ नहीं होता क्योंकि जब होता था तो उसकी बड़ी कीमत उन्होंने चुकाई.

17वीं और 18वीं सदी में जैसा यूरोप था, वैसा ही 19 वीं सदी में भारत भी था. अलग-अलग धर्म, अलग-अलग भाषा, बोलियांं, भूगोल, रहन-सहन, खानपान आदि. सब अलग-अलग रियासतें थी. अपने-अपने हिसाब से सब रहते थे. जिस प्रकार यूरोप में ग्रीक, रोमन, ओटोमन आदि साम्राज्य के अधीन सभी नस्ल, अलग-अलग भाषाई इलाके और धर्म शाषित एक ही शासक से शासित होते थे, वैसे ही भारत में अलग-अलग भाषाई, धर्म और नस्लों से संबंधित रियासतें अंग्रेजों द्वारा शासित होती थी.

अंग्रेज़ों को पता था, जिस दिन उन्होंने भारत को आज़ादी दे दी, उसी दिन से भारत में ग्रह युद्ध छिड़ जायेगा इसलिए देश की आज़ादी से पहले अंग्रेज़ भारत के लिए बालकनाइजेशन ऑफ इंडिया (Balkanization Of India) की बात किया करते थे क्योंकि उस वक्त तक हिन्दू राष्ट्र और मुस्लिम राष्ट्र की अवधारणा को लेकर दो धार्मिक राष्ट्रवादी संगठन सामने आ गए थे.

अंग्रेज़ों ने पूरी कोशिश की, कि भारत का Balkanization हो जाये लेकिन, उस वक्त में हमारे देश में जो संविधान तैयार किया गया, उसने पूरे भारत की एक मजबूत बुनियाद रख दी. ऐसा वैज्ञानिक समाजवाद को मानने वाली सरकार ही कर सकती थी. ऐसा कोई धर्म नहीं था, ऐसी कोई भाषा नहीं थी या ऐसा कोई अल्पसंख्यक समुदाय नहीं था, जिसे संविधान ने सम्मान न दिया हो या प्रतिनिधित्व न दिया हो.

लिहाजा, देश एकजुट हो गया और दुनिया में ये साबित भी हो गया कि, कई धर्म, भाषा, नस्लें, भूगौलिक स्मिताएंं साथ मिलकर रह सकती है. दुनिया ने भारत के संविधान की प्रशंसा की और उसका सम्मान भी किया.

लेकिन, फिर भारत में राष्ट्रवाद की लहरें उफान मारने लगी. 80 और 90 के दशक में सत्ता प्राप्त करने के लिए छोटे स्तर पर ही बच्चों को स्कूली शिक्षा के जरिए नस्लवादी या राष्ट्रवादी बनाने की रणनीति तैयार की जाने लगी. कालांतर में बहुमत के भीतर यह बीज डाल दिए गए कि देश के अल्पसंख्यक उनकी रोजी-रोटी के लिए नासूर हैं. मौजूदा वक्त में देश के युवा राष्ट्रवादी होने की कसमें खाते है, जो राष्ट्रवादियों की लाइन में खड़ा होने से इंकार कर दे, उसको देशद्रोहियों की लाइन में खड़ा माना जाता है.

ऐसा ही कभी जर्मनी में हिटलर ने किया था. ऐसा ही कभी इटली में मुसोलिनी ने किया था. इसी तरह, 1921 में ऑस्ट्रिया में हाइमरवाद, 1925 में हंगरी में हरी कुर्ती वाले जलासी और एरोक्रोसवाद, 1931 में स्पेन में जोन्सवाद, हॉलैंड में 1935 में मुसर्ट और बेल्जियम में फ्लेमिश नाजी पार्टी ने अपने-अपने देशों में राष्ट्रवाद का सहारा लेकर सत्ता पर लोकतांत्रिक तरीकों से कब्जा किया. ये तो कुछ यूरोप के उद्धाहरण है, बाकी दुनिया के भी अपने-अपने फासीवाद या राष्ट्रवादी दौर रहा है.

भारत भी फासीवादी आंदोलन और फासीवाद रुझानों से अलग नहीं रहा. वस्तुतः इटली में फासीवाद के सत्तारूढ़ होने के कुछ वर्ष बाद ही हमारे देश में यह आंदोलन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के रूप में शुरू किया गया. बाद में खाकसार, राजकार, आनंद मार्ग और जमाते इस्लामी इस आंदोलन के मैदान में आये.

आखिर में पिछले कुछ दशक के अंदर खुद इंडियन नेशनल कांग्रेस ने फासीवाद के रास्ते पर तेज़ी के साथ चलना शुरू किया और देश के कुछ भागों में अर्ध फासीवादी राज्य स्थापित किये. कालांतर में भाजपा ने राष्ट्रवाद या फासीवाद का पूर्ण चेहरा लागू किया और सत्ता प्राप्त की.

अब सवाल उठता है कि किसी देश के लिए राष्ट्रवाद या फासिज्म क्यों खतरनाक होता है ? लेकिन, उससे पहले ये जानना भी जरूरी है कि राष्ट्रवाद को जड़ जमाने में कौन से देश ज्यादा माकूल रहते हैं ? यूरोप में जिन देशों में राष्ट्रवाद आया था, मसलन जर्मनी, इटली, पोलैंड आदि में, वहां की उस समय की सामाजिक तानेबाने को अगर देखा जाए तो उससे कई प्रश्नों के जवाब मिल जाते हैं.

फासीवादी दर्शन उन लोगों को जल्दी चपेट में लेता है, जो बेरोजगार, अशिछित, साक्षर होते है. ऐसे लोगों को मुगली घुट्टी पिलाई जाती है कि उनके तमाम दुःख दर्द की वजह देश की अल्पसंख्यक जनता है. ऐसे लोगो के आंंखों में फासीवाद का मजबूत चश्मा लगाया जाता है, जिसके बाद वो अपने देश के अल्पसंख्यक समुदायों को उसी नजर से देखतें हैं, जैसे कभी हिटलर के भक्तों ने यहूदियों को, सर्बिया में मुस्लिमो को और अमेरिका में निग्रोस को देखा जाता था.

असल में, राष्ट्रवाद महज नस्लवाद या धार्मिक उन्माद के जरिये जनता के जेहन में यात्रा करता है. इसका नशा इतना खतरनाक हो सकता है, कि जनता बुनियादी मुद्दों को छोड़ युद्ध उन्माद, अल्पसंख्यकों के साथ हिंसा, मारपीट पर उतर आती हैं. अंत में देश उस आगार पर खड़ा हो जाता है, जहांं कभी जर्मनी विश्व युद्ध के बाद खड़ा हो गया था.

नोट – Balkanaization क्या होता है ? असल मैं दक्षिणी यूरोप के युगोस्लाविया, रोमानिया, हंगरी, चेकोस्लोवाकिया आदि देश बालकन देश होते थे. बाद में नस्लों के आधार पर ये टूट गए. इनके टूटने को Balcanaization कहा जाता है. उसके बाद जो भी देश टूटता था, उसे इसी शब्द से नवाजा जाता था.

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