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अल्पसंख्यकों के दुश्मन मोदी का एक और कारनामा

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 18, 2019
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अल्पसंख्यकों के दुश्मन मोदी का एक और कारनामा

पं. किशन गोलछा जैन, ज्योतिष, वास्तु और तंत्र-मंत्र-यन्त्र विशेषज्ञ

अबकी बार मोदी-कहर के लपेटे में एंग्लो-इंडियंस आये हैं ! ज्ञात रहे आज़ादी के बाद से ही यानि 72 सालों से भारत के संविधान में एंग्लो-इंडियन समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिये लोकसभा और विधानसभा में कुछ सीटों को नामित किया जाता रहा है लेकिन मोदी सरकार ने इसमें भी चुपचाप संशोधन पास कर लोकसभा और विधानसभाओं में एंग्लो-इंडियन समुदाय के सदस्यों को नामित करने के प्रावधान को ख़त्म करने का विधेयक भी पारित कर दिया है.

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जब विपक्ष ने विरोध किया तो रविशंकर प्रसाद ने झूठ कहा कि ‘भारत में अब सिर्फ 296 ही एंग्लो-इंडियन बचे हैं और पश्चिम बंगाल में सिर्फ 9 ही लोग एंग्लो-इंडियन समुदाय के हैं जबकि पश्चिम बंगाल से नामित सदस्य बेरी ओ ब्रायन के घर में ही 18 लोग हैं (मने झूठ बोलने की हद है और ये लोग तो संसद में भी सरेआम झूठ बोल रहे हैं). हकीकतन लगभग हर नामित सीट वाले विधान सभा में लगभग 30-40 हजार और पुरे देश में 4-5 लाख लोग इस समुदाय के रह रहे हैं.

असल में एंग्लो-इंडियन वो समुदाय है जिनके पूर्वज किसी न किसी तरह से ब्रिटेन के नागरिक रहे हैं और यह कोई पिछड़ा समुदाय नहीं है बल्कि अच्छे-खासे धनवान और उच्च शिक्षित लोग हैं और इनकी मूल भाषा अंग्रेजी है तथा धर्म से ईसाई हैं (असल में यह संशोधन इसलिये किया गया है क्योंकि इनकी सीटें नामित होती है लेकिन ये किसी पार्टी को जीता नहीं सकते लेकिन पार्टी के आंकड़ों में एक सीट जरूर कम हो जाती है. और बीजेपी ने यही सोचकर संशोधन किया है कि लोकसभा में इनकी दो सीट और विधान सभा में 14 राज्यों में एक-एक सीट है, जो खत्म करने से बीजेपी के काम आ सकती है).

संशोधन लोकसभा में तो बीजेपी का बहुमत होने से पास हो ही चुका है और अगर ये राज्यसभा में भी पास हो जाता है तो फिर लोकसभा और 14 विधानसभाओं में एंग्लो-इंडियन समुदाय के सदस्य नामित नहीं हो सकेंगे और ये समुदाय अपनी बात किसी भी तरह सरकार तक नहीं पहुंचा सकेगा. जबकि संविधान के अनुच्छेद 331 के तहत लोकसभा में एंग्लो-इंडियन समुदाय के दो लोगों को संसद के लिये नामित किया जा सकता है, वहीं अनुच्छेद 333 के तहत इस समुदाय के सदस्यों को विधानसभा में जगह दी जा सकती है.

इस समय लोकसभा की दोनों सीटे खाली है और 14 राज्यों की विधानसभाओं में एक-एक एंग्लो-इंडियन सदस्य हैं, जिसमें आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल शामिल है.

विश्व के किसी भी देश में जब किसी समुदाय को छोटा (अल्पसंख्यक) माना जाता है तो वहां की सरकारें उस समुदाय को विशेष फ़ायदा देती है. लेकिन वर्तमान मोदी सरकार अल्पसंख्यकों को खत्म करने पर तुली हुई है. उसे यहांं की बहुसंख्यक आबादी के लोगों (जो पडोसी देशों में अल्पसंख्यक है) की तो चिंता है, लेकिन देश में रह रहे अल्पसंख्यक नागरिकों की कोई चिंता नहीं है. जबकि देश के संविधान में उन्हें विशेष अधिकार दिया है लेकिन मोदी सरकार उनके अधिकारों पर अतिक्रमण कर रही है.

ब्रिटिश लोगों के जाने के समय फ़्रैंक एंथोनी नामक एंग्लो-इंडियन लेखक ने एक किताब लिखी थी ‘ब्रिटेन्स बिटरेल इंडिया’ (ब्रिटेन का भारत से विश्वासघात) और जो अब हो रहा है वो ‘सेकंड बिटरेल इंडिया’ (भारत के साथ दूसरा विश्वासघात) है, जो मोदी सरकार आम जनता के साथ कर रही है. उस समय तो बाहर के लोगों ने धोखा दिया था लेकिन आज हमारी सरकार ही हमारे साथ विश्वासघात कर रही है.

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