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केवल साल ही तो बदला है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 1, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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केवल साल ही तो बदला है
Mayank mahi ka quote
गुरूचरण सिंह

सबके लिए हाथों में ‘चिरागां के कई ख़्वाब’ उठाए जगह जगह अंधेरों से टकराते दुष्यंत कुमार की अपने ही हिंदुस्तान से मुलाकात हो गई थी, कुछ ऐसा लगा था उसे :

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए ,
ये हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है.
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए ,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है.

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क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

इन्हीं ‘खास सड़कों’ का प्रतीक है दिल्ली का वह राजमार्ग जो हमेशा से जनपथ को काट कर ही बढ़ता रहा है सत्ता के गलियारे केंद्रीय सचिवालय और राष्ट्रपति भवन की ओर. इसी कटते जनपथ की तरह आम जनता का कटना और बंटना भी तय है; नियति है हमारे ‘चू चू के मरब्बे’ इस लोकतंत्र की जिसे कुलीनतंत्र बनते देर नहीं लगती. इसलिए राज तो यहां वही करेगा जो बांटेगा, जो काटेगा भले ही वह मजहब के नाम पर हो, जाति के नाम पर हो या किसी क्षेत्रीय पहचान के नाम पर हो ! कटती तो जनता ही है, बंटती तो जनता ही है ! कोई चौहत्तर साल पहले अपने ही ‘नसीब से मुलाकात’ तय हुई थी हमारी मुलाकात (Tryst with Destiny),उसी का नतीजा है यह चिथड़ों में लिपटा, सर्दी से ठुठुरता, भूख और बीमारी से बिलबिलाता मरता हिंदुस्तान ! तिहत्तर साल पहले सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक बराबरी का हल्फ उठा कर स्वीकार की गई थी संविधान नाम की एक ‘पवित्र किताब’ हमने अपने लिए. लेकिन स्वीकार करते समय मालूम नहीं था कि वह पवित्र धार्मिक ग्रंथों की तरह पूजी तो जा सकती है, उसकी कसम भी खाई जा सकती है लेकिन उसमें जो भी लिखा है, धर्मग्रंथों की तरह उस पर भी, अमल तो हरगिज़ नहीं किया जा सकता !

इसका एक सीधा साधा कारण है कि चीथड़े पहने यह हिंदुस्तान तैयार ही नहीं था लोकशाही की इस बादशाहत का ताज अपने सर पर रखने के लिए ! बस ख्वाब देखने वाले कुछ हाथों ने यूं हीं रख दिया गया था इसे हर एक के सिर पर गाजे बाजे के साथ यह ताज. फिर भला इस ताज की, इसके साथ मिले वोट की ताकत और अहमियत हम भला कैसे समझ पाते !! सदियों से तो एक गुलाम मानसिकता का जुआ अपने कंधों पर ढोते चले आए थे हम. भले ही गाड़ीवान चैन की नींद सो रहा हो या कुछ और कर रहा हो, हमें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हमें तो हमारे गले में बंधी बजती गुलामी की घंटी की आवाज सुन कर ही बंधी-बंधाई लीक पर चलते रहने की आदत जो हो गई है ! आजादी की कीमत (कुछ बेशकीमती जवानियों की कुरबानी को छोड़ कर) हमने चुकाई ही कब है, जो हर हाल में इसे बचाए रखने के लिए तैयार रहें !! तभी तो देश की बागडोर ऐसे हाथों में तीन तीन बार सौंपते हुए हमें जरा सी भी हिचक नहीं हुई जो आजादी की जंग का कभी हिस्सा ही नहीं थे; जंग का हिस्सा होना तो दूर, वे तो दुश्मन के खेमें में बैठ कर हमारी ही जंग के खिलाफ साजिशें रच रहे थे.

सामंती मानसिकता वाले इस देश (असल में 562 देशों का समूह है) में राजे-रजवाड़े, नवाब अपनी प्रशंसा सुनने के लिए भाट या दरबारी कवि रखा करते थे. उनकी जगह आज के अखबारों के पत्रकारों और टीवी चैनलों के ऐंकरों ने ले ली है. उन भाटों, दरबारी कवियों का लिखा और कहा ही इतिहास बन जाया करता था, बिना विचार किए कि वे तो बस जिसकी खाते उसकी ही बजाते थे. सम्यक् दृष्टि से उनका क्या लेना ! छोटा-सा सामंत छत्रसाल भी अकबर से कहीं बड़ा होता था उनके लिए ! नायक को महानायक बना देने वाले भी यही लोग ही तो थे !! लाख समझाओ इन्हीं भाटों की औलादों को कि ऐसी व्यक्तिपूजा संविधान का एक तरह से अपमान है, लोकतंत्र की तौहीन है, आप लोगों की पेशेवर प्रतिबद्धता के खिलाफ है ! लेकिन वो मानें तब न !! वे भी जिसकी खाते हैं उसकी ही बजाते हैं.

अब जनता की खून पसीने की कमाई पर जिन लोगों को ऐश करने की आदत हो गई है, वो तो चाहेंगे ही कि उनको ‘मसीहा’ समझा जाए, भले ही उसकी औकात एक साधारण गृहस्थ बनने की भी न हो ! आप ही जरा बताइए, आज तक किस ‘मसीहा’ या ‘देवता’ ने अपने लिए कुछ किया या मांगा है ? लेकिन ये मसीहा तो जो भी करते हैं, खुद के लिए ही करते हैं और तो और दान भी अगर देते हैं तो वह भी जनता के पैसे से. किसान की कर्जमाफी हो या कर्मचारियों, मजदूरों को कुछ देना हो तो जैसे इनकी जान ही निकल जाती है, सौ किस्म के मीन मेख निकालते हैं उसमें. अगर कभी कुछ किया भी तो ऐसे जैसे कोई एहसान कर दिया हो उन पर, जैसे बाप-दादा की कमाई में से कुछ दे दिया हो. अब सारे लोग तो लोहिया के चेले राजनारायण जैसे नहीं होते न कि अपने ही पिताजी की जिमीदारी में खेतिहरों को उकसा कर बगावत करवा दें और अपना ही घर लुटा कर उन्हें जमीन का मालिक बनवा दें.

लाख बताइए अपने लोगों को कि एहसान जताने की यही प्रवृत्ति तो मानसिकता की पैदावार है लेकिन अपने छोटे-छोटे स्वाथों में उलझे अपने ही पैसे की लूट-खटूस में लगे हम लोग जो खुद को ‘लोकशाही के पहरुए’ कहते हैं, कुछ समझना ही नहीं चाहते. अज्ञानी को समझा सकते हैं, जानबूझकर नादान बने आदमी को नहीं; सोए हुए आदमी को जगा सकते हैं, सोने का नाटक कर रहे आदमी को नहीं ! ऐसे ‘महान लोग’ अगर किसी नेता को अपने स्वार्थ के चलते बेतहाशा चाहने वाले लोग उसकी नीतियों या कारनामों की आलोचना करने वाले लोगों को भी बरदाश्त ही नहीं कर पाते, उन्हें गद्दार कहते हैं. कई बार तो उनका राम नाम सत्य ही कर डालते हैं ! एक पट्टी-सी बंधी रहती है उनकी आंखों पर, उसका झूठ भी उन्हें सच ही लगता है.

किसी भी सियासी पार्टी का मकसद जब सिर्फ सत्ता हासिल करना बन जाए और देश समाज की समस्याएं उस सत्ता को हासिल करने का एक जरिया तो फिर कुछ ऐसी ही स्थिति मानने आ खड़ी होती है, जैसी आज दरपेश है. कोई भी पार्टी ऐसी नहीं जो बुनियादी बदलाव की बात करे, जो गुलामी की इस मानसिकता को बदलने के लिए प्रतिबद्ध हो. कोई भी पार्टी ऐसी नहीं जो सड़कों, बड़े-बड़े फ्लाईओवरों, मंगल मिशनों, बुलेट ट्रेनों की जगह शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं में बुनियादी सुधारों की बात करे. न्याय सहित समूची व्यवस्था को बदलने की बात करे. घिन आने लगी है अब तो इन सियासी पार्टियों से !

कोई दलित की बात करती है, कोई पिछ़ड़ों का पैरोकार होने का दम भरती है, कोई सिखों, मुसलमानों या इसाइयों की पार्टी होने की बात करती है, कोई क्षेत्रीयता की पैरोकार बन जाती है, कोई धर्मनिरपेक्षता की बात तो जरूर करती है लेकिन सबसे अधिक सांप्रदायिक व्यवहार भी वही करती है, और कोई-कोई तो सिर्फ सांप्रदायिक राजनीति ही करती है. मगर असल मकसद इन सबका सत्ता हासिल करके अपनों-अपनों में रेवड़ियां बांटना ही होता है. बात विचारधारा की नहीं, बदलाव लाने की नहीं, बस सरकार बनाने तक ही सीमित होती गई है. कहते रहिए आप इसे देशभक्ति, मैं तो भैया स्वार्थ ही कहूंगा !

तभी तो कहता हूं साल ही नया है हम लोग तो पुराने ही हैं !

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