Friday, April 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home ब्लॉग

छात्रों पर हमला : पढ़ाई करने और पढ़ाई न करने देने वालों के बीच

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 13, 2020
in ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

मोदी-शाह ने किया छात्रों पर हमला, दुनिया भर में हुई थू-थू

शिक्षा से मोदी-शाह के नफरत का अंदाजा जेएनयू के छात्रों पर अपने नकाबपोश गुंडों को भेजकर किये गये हमलों में साफ दिखाई दिया है. इससे पहले जामिया मिल्लिया के छात्रों पर बकायदा पुलिस भेजकर हमला करवाया गया था, ये अलग बात है कि पुलिस के भेष में संघी गुंडे ज्यादा थे, जिसकी दुनिया भर में थू-थू होने के बाद जेएनयू में पुलिस को न भेजकर नकाबपोश गुंडे भेजे गये और पुलिस का उपयोग इन नकाबपोश गुंडों के सुरक्षित आने, छात्रों को पीटने में किसी भी बाधा को रोकने और फिर सुरक्षित निकल जाने के लिए किया. और इससे भी आगे देश भर के विश्वविद्यालयों में छात्रों पर लगातार हमले चाहे वह जादवपुर विश्वविद्यालय हो, छेड़खानी के विरोध करने पर बीएचयू के छात्राओं पर रात के अंधेरे में हाॅस्टल में घुसकर पुलिसिया तांडव हो, तमाम विश्वविद्यालयों को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया है.

You might also like

रोज़ गाय काटकर खाने वाला शैतान इजराइल दुनिया के पेट पर लात मारा है !

तुर्की के इस्तांबुल में भारतीय दूतावास के सामने विरोध प्रदर्शन: ‘ऑपरेशन कगार बंद करो’ और ‘नरसंहार बंद करो’ की मांग को लेकर नारे और रैलियां

नेपाल : ‘सभी वामपंथी, प्रगतिशील, देशभक्त और लोकतांत्रिक छात्र, आइए एकजुट हों !’, अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र छात्र संघ (क्रांतिकारी)

पिटाई खाने वाले जेएनयू के इन छात्रों की मांग क्या थी: मोदी-शाह के रखैल कुलपति के द्वारा पढ़ाई में लगने वाले फीस को बढ़ा दिया, जिस कारण कैम्पस में पढ़नेवाले 40 प्रतिशत छात्र को पढ़ाई छोड़ना पड़ता क्योंकि कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाले उनके परिजन इस बढ़ी हुई फीस को चुकाने में असमर्थ थे. यही कारण है कि जेएनयू के छात्र इस फीस बढ़ोतरी के खिलाफ लगातार आन्दोलनरत थे. इसमें गौर करने की बात यह है कि ये छात्र मुफ्त शिक्षा की बात नहीं कर रहे थे, केवल फीस बढ़ोतरी का विरोध कर रहे थे, और मोदी-शाह की आपराधिक जोड़ी इन छात्रों को देशद्रोही, अर्बन नक्सली वगैरह कह रहे हैं.

प्रेमचंद जैसे गांधीवादी लेखक तमाम तरह की शिक्षा को मुफ्त करने की बात रहे थे. उनके मुताबिक, ‘मैं चाहता हूं ऊंची से ऊंची तालीम भी सबके लिए मुफ्त हो ताकि गरीब से गरीब व्यक्ति भी ऊंची से ऊंची लियाकत पा सके और ऊंची से ऊंची औहदा हासिल कर सके. विश्वविद्यालय के दरवाजे सबके लिये खुले होना चाहिए. सारा खर्च सरकार पर पड़ना चाहिए. मुल्क को तालीम की उससे कहीं ज्यादा जरूरत है जितनी फौज की.’ हम समझ सकते हैं कि महज फीस बढ़ोतरी का विरोध करने वाले छात्रों को देशद्रोही, अर्बन नक्सल कहने वाली गुंडों की यह सरकार मुफ्त शिक्षा की मांग करने वाले प्रेमचंद को न जाने किस श्रेणी में रखते !!

असल में देश की तमाम विश्वविद्यालयों को पुलिस छावनी में बदल देने वाली देश की सत्ता पर काबिज मोदी-शाह की यह आपराधिक जोड़ी शिक्षा को आम लोगों, जिसमें शुद्र, दलित, आदिवासी, औरतों की पहुंच से दूर करना चाह रही है, परन्तु इसके लिए वह अभी जातिगत तरीकों को नहीं अपना सकती क्योंकि विगत 70 सालों से देश के अंदर संविधान के द्वारा शासित होने के कारण इन दमित तबकों की कई पीढियां शिक्षित हो चुकी है अथवा शिक्षित हो रही है. यही वह पहला ‘गड्ढा’ है जिसे मोदी-शाह 70 सालों में बनने की बात करता है.

70 सालों में बने इस ‘गड्ढे’ के कारण इन तबकों को फिर से अशिक्षा और गुलाम बनाए जाने के लिए प्रयास इन गुंडों ने शुरू कर दिया है, जिसका पहला चरण है फीसों में बढ़ोतरी. इस फीस बढ़ोतरी के द्वारा इन दमित तबकों को शिक्षित होने से रोकना क्योंकि आज भी इन तबके के अधिकांश लोग आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक समस्याओं से भी जूूूझ रहे हैं (इसका एक स्पष्ट उदाहरण राष्ट्रपति के पद पर बैठे दलित राष्ट्रपति रामनाथ कोबिन्द तक को इन ब्राह्मणवादियों ने धक्के मार कर मंदिर से बाहर निकाल दिया था), इस आबादी की बड़ी संख्या को अशिक्षित बनाने के लिए तत्काल फीस बढ़ोतरी भर कर देने से ही ये लोग शिक्षा की पहुंच से महरुम हो जायेंगे.

70 साल के इस ‘गड्ढे’ को पाटने, यानी इस विशाल आबादी को अशिक्षित और गुलाम बनाने के लिए मोदी सरकार 50 साल मांग रहा है, क्यों ? सीधा सा जवाब है. अमूमन 20 साल में एक पूरी पीढ़ी बदल जाती है, जो अगली दो पीढ़ी बाद खत्म हो जायेगी. यानी आज की पढ़ी-लिखी जवान पीढ़ी अगले 50 साल बाद मर-खप या नकारा बन जायेगी. अगर आज की पीढ़ी को शिक्षा से वंचित कर दिया जाये तो अगले 50 सालों में देश की शुद्र, दलित, आदिवासी, महिलाओं की विशाल आबादी पैदा हो जायेगी, जो शिक्षा से दूर होगी. हम जानते हैं ऐसे अनपढ़-अशिक्षित लोग न तो सवाल पूछ सकते हैं और न ही अपने अधिकारों के लिए लड़.ही सकते हैं. वह बस जिंदा रहने के लिए चंद टुकड़े को ही अपनी दुनिया मान लेते हैं.

मोदी-शाह की यह आपराधिक जोड़ी इस काम में जुट गई है. एक ओर फीस में बेतहाशा बढ़ोतरी कर दी तो वहीं दूसरी ओर पूरे देश भर में लाखों की तादाद में स्कूलों को बंद कर दिया है. लाखों स्कूलों में शिक्षकों के रिक्त पदों को खत्म कर दिया है. स्थायी शिक्षकों की जगह अस्थायी शिक्षकों को तात्कालिक तौर पर रखा जा रहा है, जिसे कभी भी हटाया जा सकता है. प्रयोगशालाओं और पुस्तकालयों को खत्म किया जा रहा है. पढ़ने वालों को अपराधी और अर्बन नक्सल कह कर बदनाम किया जा रहा है. पढ़ाई-लिखाई को अपमान की बात बताया जा रहा है.

जिस देश में यह कहा जाता था कि पढ़ने और सीखने की उम्र नहीं होती, अब वहां पढ़ने की उम्र तय की जा रही है. अब अनपढ़ रहकर चंद पैसों में काम करने को महान बताया जा रहा है. देश की सीमाओं पर चंद पैसे के लिए मर जाने को महान बनाया जा रहा है, परन्तु, ज्यों ही वह पढ़ने की बात करता है, कोई भी सवाल उठाता है, चाहे यह सवाल सीमाओं पर मर रहे सेना के जवान उठाये, या देश के भीतर के छात्र नौजवान तुरन्त देशद्रोही, अर्बन नक्सल का तगमा मिल जाता है. उसकी हत्या की जाती है, पुलिस और नकाबपोश गुंडों द्वारा जानलेवा हमला करवाया जाता है, फर्जी मुकदमा दर्ज कराया जाता है.

सवाल पूछने के लिए पढ़ना जरूरी है, अगर पढ़ाई ही बंद हो जाये तो सवाल स्वतः बंद हो जायेगा. यही कारण है कि भाजपा-संघी देश की विशाल आबादी को अनपढ़ बनाये रखना चाहती है क्योंकि अनपढ़ या अशिक्षित कोई सवाल नहीं करता. वह बेहतर गुलाम होता है. ( सवालों से देश की आपराधिक जोड़ी मोदी-शाह को कितनी नफरत है कि मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद कभी पत्रकारों के सवालों का जवाब नहीं दिया. जिस पत्रकारों ने गंभीर सवाल पूछने शुरू किये, उनको नौकरी से निकलवाने, हत्या करने, या संघी गुंडों द्वारा धमकाने जैसे कुकृत्य किये जाने लगे हैं). चंद रुपयों के लिए मालिकों खातिर जान गवां देने वाला मूर्ख होता है. और सबसे बढ़कर वह अपनी इस मूर्खता पर गर्व भी करता है. यह हम आये दिन मरने वाले सेना के जवानों में खूब देखते हैं, जहां वे पूंजीपतियों के मुनाफा के लिए बलि चढ़ते हैं, या अपने ही समान भाई-बंधुओं की हत्या करते हैं. मनुस्मृति इसकी बेहतर व्यवस्था करता है.

मनुस्मृति स्पष्ट रूप से शुद्रों, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं को शिक्षा देने के खिलाफ है. संविधान लिखे जाने से पहले संविधान और संवैधानिक अधिकारों के लिए तत्कालीन राजनेताओं की विचार बेहद भयावह थे –
1. लोकमान्य तिलक के अनुसार, ‘ये तेली, तंबोली, कुर्मी, कुम्हार, चमार संसद में जाकर क्या हल चलाएंगे.’
2. महात्मा गांधी का विचार था, ‘अगर अंग्रेज शूद्रों को भी आजादी देते हैं, तो मुझे ऐसी आजादी नहीं चाहिए. मैं शूद्रों को आजादी देने के पक्ष में नहीं हूं.’ वहीं वे शुद्रों को पृथक आरक्षण देने के खिलाफ थे.
3. सरदार पटेल डॉ अंबेडकर के खिलाफ थे. वे कहते थे, ‘डाॅ. अम्बेदकर के लिए संविधान सभा के दरवाजें ही नहीं, खिड़कियां भी बंद कर दी है, देखता हूं, डॉ अंबेडकर कैसे संविधान सभा में आता है.’
4. आरएसएस ने डॉ अंबेडकर साहब के द्वारा भारत का संविधान लिखने के बाद संविधान को लागू नहीं करवाने के लिए डॉ अंबेडकर साहब के पूरे देश में पुतले जलाये गये.

ये तो संविधान लिखे जाने के पहले तत्कालिक राजनेताओं के विचार थे. 70 सालों के ‘गड्ढ़े’ बनने के बाद भी राजनेताओं के विचार नहीं बदले हैं, जो आज देश की सत्ता पर काबिज हैं –

1. प्रधानमंत्री मोदी जी कहते हैं, ‘दलित मंदबुद्धि होते हैं.’
2. संघ प्रमुख मोहनभागवत कहते हैं, ‘आरक्षण जाति आधारित नहीं होना चाहिए, अतः आरक्षण की समीक्षा की जाएं.’

3. केन्द्रीय मंत्री वी. के. सिंह कहते हैं, ‘दलित कुत्ते होते हैं.’
4. भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी कहते हैं, ‘हम यानि भाजपा आरक्षण को निर्रथक कर देंगे.’
5. भाजपा के केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ऐलान करते हुए कहते हैं, ‘हम यानि भाजपा सत्ता में संविधान बदलने आये हैं.’
6. केन्द्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े साफ कहते हैं, ‘व्यक्ति की पहचान जाति से होनी चाहिए.’
7. धर्मगुरु स्वरूपानंद सरस्वती साफ करते हैं, ‘हम संविधान को नहीं मानते हैं.’

विदित हो कि देश के संविधान को बनाने में अंग्रेजों का योगदान था, जिसका प्रमुख उस समय डाॅ. अम्बेदकर को बनाया गया था. इस संविधान के लिखे जाने वक्त समूचा आवाम एकजुट था अंग्रेजों के खिलाफ जंग ने लोकयुद्ध का स्वरूप ग्रहण कर लिया था. तमाम जाति के लोग इस युद्ध में शामिल हो गया था. शुद्र, दलित, आदिवासी, महिलाओं सहित अधिकांश लोग शामिल थे. इस संविधान को लिखने वक्त तक देश में भगत सिंह, आजाद का खून इस देश की मिट्टी में सन चुका था, जिस कारण लोग जागरूक हो गये थे, प्रगतिशील सोच हर जगह विद्यमान था, जिस कारण संविधान में भी अनेक प्रगतिशील चीजें जोड़ दी गई थी, परन्तु अब जब देश की सत्ता पर झूठ बोल-बोलकर गद्दार आरएसएस और उसकी अनुषांगिक शाखा भाजपा ने देश की सत्ता हथिया लिया है, तब वह मनुस्मृति को एक बार फिर लागू कर रही है. देश की विशाल आबादी शुद्र, दलित, आदिवासियों, महिलाओं को अनपढ़ बनाने की योजना में जुट गई है. यही कारण है कि आज देश के तमाम शिक्षण संस्थानों को बंद करने, छात्रों-बुद्धिजीवियों को खत्म करने, विश्वविद्यालयों के नाम पर जियो जैसी फर्जी विश्वविद्यालयों को स्थापित किया जा रहा है और संविधान को ही खत्म करने का प्रयास शुरू हो गया है.

तुम्हे नफरत है
किताबो से
शिक्षण संस्थानों से
शिक्षकों से
आवाज़ उठाने वालों से
किसानों से

तुम्हे पसन्द है,
खून से लतपथ बेटियां
मार खाते स्टूडेंट्स
मरते किसान
बेरोजगार युवा
बच्चों की लाश धोते मा बाप
लीचिंग करते गुंडे

पर याद रखना
ये तख्त भी उछलेगा और ताज भी उछलेगा
हम देखेंगे….

— Kavish aziz (@azizkavish) January 11, 2020

Read Also –

तुष्टिकरण की राजनीति सांप्रदायिकता की सौतेली मां होती है
आपको क्या लगता है कि द्रोणाचार्य सिर्फ कहानियों में था ?
श्रेष्ठता का दंभ
धन्नासेठों और सवर्णों का धर्म है संघ का हिन्दुत्व

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]

Previous Post

देश बदल रहा है और सोच भी

Next Post

ये बहुत बुरे दौर का अंदेशा है…

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

ब्लॉग

रोज़ गाय काटकर खाने वाला शैतान इजराइल दुनिया के पेट पर लात मारा है !

by ROHIT SHARMA
March 22, 2026
ब्लॉग

तुर्की के इस्तांबुल में भारतीय दूतावास के सामने विरोध प्रदर्शन: ‘ऑपरेशन कगार बंद करो’ और ‘नरसंहार बंद करो’ की मांग को लेकर नारे और रैलियां

by ROHIT SHARMA
December 22, 2025
ब्लॉग

नेपाल : ‘सभी वामपंथी, प्रगतिशील, देशभक्त और लोकतांत्रिक छात्र, आइए एकजुट हों !’, अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र छात्र संघ (क्रांतिकारी)

by ROHIT SHARMA
November 25, 2025
ब्लॉग

सीपीआई माओवादी के नेता हिडमा समेत दर्जनों नेताओं और कार्यकर्ताओं की फर्जी मुठभेड़ के नाम पर हत्या के खिलाफ विरोध सभा

by ROHIT SHARMA
November 20, 2025
ब्लॉग

‘राजनीतिक रूप से पतित देशद्रोही सोनू और सतीश को हमारी पार्टी की लाइन की आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है’ : सीपीआई-माओवादी

by ROHIT SHARMA
November 11, 2025
Next Post

ये बहुत बुरे दौर का अंदेशा है...

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

हिंडनबर्ग रिपोर्ट : अडानी का जहाज़ डूबने वाला है ?

January 26, 2023

छत्तीसगढ़ के कर्रेगुट्टा की पहाड़ी पर खूंखार पुलिसियों का बड़ा हमला

May 3, 2025

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दस्तावेज़ :  ईरान की तुदेह पार्टी का संक्षिप्त इतिहास

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

अगर अमेरिका ‘कब्ज़ा’ करने के मक़सद से ईरान में उतरता है, तो यह अमेरिका के लिए एस्केलेशन ट्रैप साबित होगा

March 28, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ईरान की तुदेह पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक का प्रस्ताव

March 28, 2026
कविताएं

विदेशी हरामज़ादों का देसी इलाज !

March 22, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

March 28, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.