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जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 4, 2026
in गेस्ट ब्लॉग
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जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं
जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

तकरीबन 3 दशक पहले से ही लोहिया के सारे लुहार त्रिशूल गढ़ने में लग गये थे. लोकनायक जयप्रकाश नारायण का खिचड़ी विप्लव अंततः संघ (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) और जनसंघ (आज की भाजपा) के लिए सामाजिक – राजनीतिक वैधता हासिल करने के अचूक अवसर के रूप में खलास हुआ. तब एक नारा भी चल निकला – ‘गांधी, लोहिया, दीनदयाल जिंदाबाद .. जिंदाबाद.

केवल पंडित नेहरू और साम्यवादियों के विरोध से ही विकसित किसी आंदोलन का यही हस्र होना था. समाजवादी आंदोलन का बहुत नुकसान और तकरीबन सफाया उसकी अपनी ही विसंगतियों से हो गया. अविवेक पूर्ण कांग्रेस – नेहरू और कम्युनिस्ट विरोध समाजवादी आंदोलन को अंततः दक्षिणपंथियों और वाणिज्यिक पूंजी के वर्चस्व वाले लोकतंत्र और जाति की क्यारियों में लेता गया.

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आज का धर्म और राजनीति के सांघातिक घालमेल और कारपोरेट वर्चस्व का संस्थागत आतताई चेहरा इसी खिचड़ी विप्लव की देन है. आज समझ में आता है कि लोहिया का गैर कांग्रेसवाद कितनी आत्मघाती पहल थी. लोकनायक में तो इतना वैचारिक विचलन था कि कोई पद न लेने से ही वह बच गए वरना इतिहास उन्हें सर्वाधिक ‘कन्फ्यूज’ या ‘अवसरवादी’ के रूप में दर्ज करता. वह अंत तक ‘सम्पूर्ण क्रांति’ परिभाषित न कर सके. लोहिया के लोगों ने उसे ‘लोहिया की सप्त क्रांति’ कहकर उनकी जान बचाई जो राजनीति में संघ और जनसंघ के घुसपैठ की सरपट राह हो गयी.

कुछ बहुत सीनियर पत्रकारों ने जार्ज को भुना भी लिया, ख़ासकर बिहार के एक पत्रकार ने. कुछ अपवाद छोड़ ज्यादातर समाजवादी अंततः संघी या भाजपाई क्यों हो जाते हैं, नहीं समझ सका. जो सीधे भाजपा में नहीं गए अन्ना आंदोलन से होते आम आदमी पार्टी का सफऱ तय करते अब कांग्रेस की देहरी पर खडे हैं.

टाइम ऐनेलाइजर, प्रो. देवेश दुबे ने बाबू गेदा सिंह, रामधारी शास्री, उग्रसेन, मोहन सिंह जैसे समाजवादियों को विनम्र श्रद्धांजलि देते कहा है – ‘ये आज के लोगों की तरह नहीं थे, जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं.’

जेल का फाटक टूटेगा
जार्ज फर्नांडीज छूटेगा
(कुछ उत्साही भाई जांडीस फांडीश कहते थे)

बिखरे बाल, खादी का तुड़ा – मुड़ा – चिमुड़ा कुर्ता – पायजामा , टूटे तल्ले की घिसी हुई चप्पल और चश्मे में जार्ज साहब (जार्ज फर्नांडीज) सम्मोहित कर लेने वाले खांटी पॉलिटिकल एक्टिविस्ट दिखते थे.

29 जनवरी 2019 को उनका देहावसान हुआ था. इस अनथक विद्रोही (रिबेल विदआउट ए पॉजका आज 3 जून ( 1930 ) को जन्मदिन है.

खूब याद है 2018. उनसे मिल कर उन्हें जन्मदिन की बधाई देना चाहता था लेकिन नहीं जान पाया था कि वह किस हाल और कहां हैं. सुना था उनकी याददाश्त जा चुकी थी. वह पूरी तरह बिस्तर पर थे, दिमाग ने शरीर के किसी हिस्से को कोई संकेत देना बंद कर दिया था. फिर बधाई किसे देता उन्हें, उनकी अबतक की संघर्ष यात्रा को या अपनी स्मृतियों को ?

जार्ज साहब से मेरी अंतिम मुलाकात सम्भवतः 2007 या 06 की है. उस समय तक उनके चेहरे पर खूबसूरत रासायनिक आग की लपट जिसमें नीले रंग की धारी होती है, बची थी. बरोब्बर (बराबर) संसद और सड़क गरमाते रहने की कूवत और थोड़ी खुरदुरी रूमानियत जार्ज की खूबी रही है. तब उन्होंने स्वेटर की जगह कुर्ते पर एक शाल ओढ़ रखा था.

मैंने कुछ पूछ दिया था – ‘… हां एक लाल सा स्वेटर था … तुमने देखा होगा, उसी पर पूरी इमरजेंसी काट ली. … स्नेहलता रेड्डी ने दिया था. (फिर लंबी चुप्पी)…मछली अच्छी बनी है. थोड़ा नमक लाना …’.

मेरे सामने प्रणयी जार्ज थे. सिनेमा पर बात होने लगी – ‘…बलराज साहनी से मेरा अच्छा रिश्ता था. … और राजकपूर … उसकी तो सारी फिल्में रंगीन सेल्युलाइड पर नेहररूवीयन समाजवाद का ट्रांसलेशन थीं …’.

कभी वह विक्टोरियन अंग्रेजी तो कभी भोजपुरी भी बोलने लगते थे. वह हिंदी, अंग्रेजी, लैटिन, तमिल, मराठी, कन्नड़, उर्दू, मलयामी आदि भाषाओं के अच्छे जानकार थे. केंद्रीय मंत्रिमंडल में वह रक्षा मंत्री, संचार मंत्री, उद्योग मंत्री और रेल मंत्री रहे. लेकिन जार्ज का कोई अपना चुनावी इलाका नहीं रहा. उनकी कोई चुनावी जाति नहीं थी. वह परम्परागत कुटुंब तक नहीं जी सके. उन्हें चन्द्रशेखर जी की तरह कोई बड़ा मनोनुकूल प्लेटफार्म नहीं मिला, कोई संगठित काडर भी नहीं था, फिर भी वह अंतरराष्ट्रीय हैसियत रहे थे.

हवा मथते रहे, फिजा बनाते रहे. भारत की अबतक की राजनीति के बेमिसाल मजदूर नेता, अद्वितीय पार्लामेंटेरियन, अर्थशास्त्री और कभी के बहुत गरम खून जार्ज को आज जन्मदिन पर विनम्र श्रद्धांजलि. आंख में आंसू है.

जार्ज 1998 से 2004 तक अटल जी की सरकार में रक्षा मंत्री थे. राजग ने उन्हें अपने बैरिस्टर के तौर पर भरपूर इस्तेमाल कर लिया था. लगभग निचोड़ लिया था.

दरअसल 1996 से ही उनके क्रांतिकारी या विद्रोही व्यक्तित्व का क्षरण होने लगा. लालू प्रसाद की अकड़ गड़ रही थी. शरद की फब्तियां चुभ रही थीं. मुलायम सिंह यादव से बन नहीं रही थी. समाजवादी पार्टी का ढांचा उनके लिए तंग पड़ रहा था. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी उन्हें अलग – थलग कर दिया था. लिहाजा उन्होंने समता पार्टी बना ली. बाद में तो भाजपा को अंतरराष्ट्रीय फोरम पर भी जार्ज जैसा वक्ता और अच्छा वकील मिल गया.

जार्ज ने निर्णायक लड़ाइयां लड़ीं तो झुक कर समझौते भी कम नहीं किये. गलत तो डॉ. लोहिया का गैर कांग्रेसवाद भी साबित हुआ जो जनसंघ और आज की भाजपा के लिए राजनीतिक वैधता पा जाने का अचूक अवसर बन कर खलास हुआ. जाने लोहिया जैसे दूरदर्शी राजनेता से यह भूल कैसे हो गयी. वह वामपंथियों से दूर और जनसंघ के करीब आते गये. मुझे याद आता है जब 1977 में जनसंघ के लोगों ने एक नया नारा गढ़ा – गांधी, लोहिया, दीन दयाल …

उग्रसेन जी के मानस पुत्र, मेरे मित्र प्रखर समाजवादी स्व. रामायण शुक्ल जेल में संघ स्वयंसेवकों से इसी नारे पर भिड़ गये थे. पटका – पटकी भी हुई. समाजवादियों को अब खैर अक्ल आ गयी, नहीं कह सकता. नेहरू विरोध आज भी उनमें ग्रंथि है.

मैंने जार्ज, लिमये, किशन पटनायक, जनेश्वर, प्रो. मधु दण्डवते और उग्रसेन की शागिर्दी की है. मेरा मानना है कि सामाजिक न्याय की ताकतों, दलित विमर्शकारों, समाजवादियों और मध्यवाम का सर्वाधिक मुफीद मंच कांग्रेस रही है. कांग्रेस को भी वैचारिक समृद्धि, गति और बहुल संस्कृतियों वाले भारत का सही मायनों में प्रतिनिधित्व करने का अवसर उसमें शामिल समाजवादियों – कम्युनिस्टों और ऐसे लोगों से ही मिला. नेहरू से इंदिरा काल तक कांग्रेस इसीलिये मजबूत और अपराजेय रही.

जार्ज साहब को जन्मदिन पर मेरी बधाई अगर उचित जगह नहीं भी पहुंची तो हवाओं और आकाश में कहीं से कहीं की यात्रा तो करती ही रहेगी या संचार तंत्र के वृहद आकाश में अपनी कोई छवि ग्रहण कर ही लेगी.

खिलेगा ही फूल और सभी देखेंगे. याद आ रहे हैं छात्र नेता जगदीश लाल. देवरिया के रामलीला मैदान में उनकी सभा मैंने ही आयोजित कराई थी. मैं रिक्से पर लाउडस्पीकर से प्रचार करते पूरे शहर में घूमा था – ‘आज शाम चार बजे रामलीला मैदान में सुनिये जार्ज फर्नांडीज की कहानी जगदीश लाल की ज़ुबानी’.

वह शाम भी याद है जब जार्ज साहब को मुजफ्फरपुर जाना था. हवा में हल्की सी ठंड थी. देवरिया रेलवे स्टेशन पर उनके साथ मैं और रामायण शुक्ल थे. जार्ज साहब को ठंड लग रही थी. रामायण शुक्ल भाग कर कहीं से एक स्वेटर लाये थे जिसे फिलहाल गोलिया कर जार्ज साहब ने तकिया बना लिया और कहकहा लगाते काठ की बेंच पर पसर गये.

थोड़ी ही देर बाद हवा में गर्मी आ गयी. बहुत आंच थी जार्ज साहब में. कहा — अपना स्वेटर रख लो.

जार्ज को जन्मदिन की बधाई. कभी हमने भी नारा लगाया
था – जेल का फाटक टूटेगा, जार्ज फर्नांडीज छूटेगा. बाद में समाजवादी भी नारा लगाने लगे – मंदिर वहीं बनाएंगे. शरद यादव, रामविलास पासवान, नितीश कुमार को याद करते जार्ज के जन्मदिन पर समाजवादियों के पतन की शर्म भी सोख रहा हूं.

  • राघवेंद्र दुबे भाऊ
    मोबाइल : 7355590280

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