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यस बैंक : भारत की बैंकिंग प्रणाली इतिहास का सबसे बड़े संकट

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 13, 2020
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यस बैंक : भारत की बैंकिंग प्रणाली इतिहास का सबसे बड़े संकट

गिरीश मालवीय, पत्रकार

आरबीआई द्वारा नियुक्त येस बैंक के नए कर्ता-धर्ता प्रशांत कुमार ने कुछ दिनों पहले कहा कि बैंक पूर्व घोषित कार्यक्रम के मुताबिक 14 मार्च को दिसंबर तिमाही के नतीजे घोषित करेगा. अभी तक यस बैंक ने तीसरी तिमाही के नतीजे घोषित नही किये हैं. अभी ये भी नही पता है कि कितना एनपीए हो गया है और एसबीआई को बलि का बकरा बनाया जा रहा है. कई विशेषज्ञ अनुमान जता रहे हैं कि बैंक का वास्तविक एनपीए 30 प्रतिशत से भी ऊपर पहुंच गया है. यह एक भयानक आंकड़ा है.

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कुछ ही देर में कैबिनेट और सीसीईए की बैठक होनी है. सूत्र कह रहे हैं कि इस बैठक के दौरान कैबिनेट में यस बैंक के रिस्ट्रक्चरिंग प्लान को मंजूरी दे दी जाएगी. इस प्लान के ही तहत स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने कल गुरुवार को 7,250 करोड़ रुपए में यस बैंक के शेयर खरीदने का ऐलान किया है, जबकि कुछ दिनों पहले एसबीआई के चेयरमैन रजनीश कुमार कह रहे थे कि स्टेट बैंक, यस बैंक में अधिकतम 10 हजार करोड़ रुपये का निवेश कर सकता है. मजे की बात यह है कि जब यस बैंक के धड़ाम होने की खबर आयी थी तो अगले दिन स्टेट बैंक 12 हजार करोड़ डालने के प्लान बना रहा था.

यानी अब एसबीआई भी बड़ी रकम निवेश करने से पीछे हट रहा है. उसके शेयरों के दाम भी गिरते जा रहा है. कल रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का बड़ा बयान सामने आया. उन्होंने कहा कि यस बैंक ने अपनी दिक्कतों के बारे में कई बार सूचित किया था और इन दिक्कतों को दूर करने की योजना बनाने के लिये पर्याप्त समय उपलब्ध था लेकिन उचित कदम नही उठाए गए.

राणा कपूर ने जिस तरह यस बैंक की बैलेंस शीट को कमजोर किया, उसमें गड़बड़ी की और कई आवश्यक जानकारियां छिपाने की कोशिश की थी, उसे देखते हुए बहुत पहले उनकी विदाई हो जानी चाहिए, लेकिन मोदी सरकार सिर्फ आंखों पर पट्टी बांधकर बैठी रही.

रिजर्व बैंक ने भी राणा कपूर के मामले में ढुलमुल रवैया अपनाया. अगस्त, 2018 में कपूर को हटाए जाने के लिए 31 जनवरी, 2019 तक की समय सीमा तय करना रिजर्व बैंक के लचर प्रशासनिक फैसले का ही एक उदाहरण था. यहां तक कि आरबीआई की तरफ से यस बैंक को पिछले साल फरवरी में फंड डायवर्जन और प्रॉविजनिंग के मामले में क्लीन चिट तक दे दी गई. जब वित्त वर्ष 2018-19 में भी यसबैंक ने करीब 3,277 करोड़ रुपये के एनपीए को छिपा लिया, तब आरबीआई को होश आया और उसने अपने एक पूर्व डिप्टी गवर्नर आर. गांधी को बैंक के बोर्ड में भेजा लेकिन रिजर्व बैंक का धैर्य तब टूटा जब अक्टूबर-दिसंबर, 2019 के तिमाही नतीजे जारी करने में यस बैंक की ओर से देरी की जाने लगी. उसने 14 मार्च की तारीख दे दी लेकिन उसकी कोई तैयारी नही होती देख आरबीआई को निर्णायक फैसला लेना पड़ा.

जे. पी. मॉर्गन के एक अनुमान के मुताबिक बैंक का फंसा कर्ज 45,000 हजार करोड़ रुपये तक बढ़ सकता है. बैंक का 36 फीसदी कैपिटल बैड लोन में फंसा हुआ है. अभी बैंक के लोन डूबने की आशंका ज्यादा है. यस बैंक का 10 बड़े कारोबारी समूहों से जुड़े लगभग 44 कंपनियों के पास कथित तौर पर 34,000 करोड़ रुपये का कर्ज फंसा हुआ है. अनिल अंबानी समूह की नौ कंपनियों ने 12,800 करोड़ रुपये तथा एस्सेल ग्रुप ने 8,400 करोड़ रुपये का कर्ज ले रखा है. इसके अलावा डीएचएफएल ग्रुप, इंडिया बुल्स, जेट एयरवेज, कॉक्स ऐंड किंग्स तथा भारत इन्फ्रा ने भी यस बैंक से अच्छा-खासी रकम लोन ले रखी है.

यह इधर कुआं और उधर खाई वाली स्थिति है. आरबीआई को भी अच्छी तरह से पता है कि यदि तीन जुलाई से पहले जमाकर्ताओं में यह भरोसा नहीं बैठाया गया कि यस बैंक में जमा उनकी रकम सुरक्षित है तो उसमें जमा करीब दो लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम निकालने की होड़ मच जाएगी. और जिस तरह से मार्केट के हाल है यह होना अवश्यंभावी है. भारत की बैंकिंग प्रणाली इतिहास के सबसे बड़े संकट का सामना कर रही है.

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Tags: आरबीआईयस बैंक
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