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राहुल गांधी को वैचारिक तौर पर स्पष्ट और आक्रामक होना होगा

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 17, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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राहुल गांधी को वैचारिक तौर पर स्पष्ट और आक्रामक होना होगा

हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

राहुल गांधी जिन विचारों के साथ भविष्य की राजनीति में आगे बढ़ना चाहते हैं उन्हें तो भारत में कब का अप्रासंगिक ठहराया जा चुका है और इसमें खुद उनकी कांग्रेस पार्टी की बड़ी भूमिका रही है लेकिन, यही वह वैचारिक राह है जिस पर चल कर राहुल अपने को प्रासंगिक बना सकते हैं. जरूरत है इस देश के युवाओं के साथ बेहतर तरीके से कम्युनिकेट करने की, जिसमें अब तक वे बहुत सफल नहीं रहे हैं.

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याद कीजिये 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान रवीश कुमार को दिए गए राहुल गांधी के इंटरव्यू को. उन्होंने कहा था कि ‘भारत में सरकारी संस्थानों को ही उदाहरण बनना होगा और प्राइवेट संस्थानों को उनके पीछे चलना होगा,’ यानी, सरकारी विश्वविद्यालयों, बैंकों, बीमा कंपनियों सहित सार्वजनिक क्षेत्र की अन्य कंपनियों को मजबूत बनाना होगा.

यह वैचारिक राह अब इतनी आसान नहीं रही, लेकिन बात अगर भारत के विशेष परिप्रेक्ष्य में की जाए तो इस राह का कोई विकल्प भी नहीं. अंध निजीकरण की होड़ में विशाल वंचित तबके के हितों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है और उभरता ‘न्यू इंडिया’ भले ही चमक-दमक से भरा हो, अपनी प्रकृति में ही वंचित विरोधी साबित हुआ है.

भारत में नवउदारवाद की राजनीति कांग्रेस ने ही शुरू की थी और विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने इसे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन दिया था. फिर, जब अटल जी के नेतृत्व में भाजपा सत्ता में आई तो विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस का समर्थन उसे मिलता रहा. याद करें सरकारी कर्मचारियों के पेंशन के खात्मे की, जिसमें कांग्रेस ने तत्कालीन भाजपा सरकार का समर्थन किया था. सरकारी कंपनियों के विनिवेश के खिलाफ तब विपक्ष में रही कांग्रेस हल्ला तो मचाती थी लेकिन इसमें नाटक अधिक था वास्तविक विरोध कम था.

बात अगर आर्थिक नीतियों की हो तो 1990 के बाद कांग्रेस और भाजपा एक ही सिक्के के दो पहलू रहे. मनमोहन सिंह के 10 वर्षों के राज में राहुल गांधी अप्रत्यक्ष तौर पर बेहद प्रभावी भूमिका में रहे लेकिन जिन वैचारिक आग्रहों के साथ वे आज की राजनीति में बदलाव के हिमायती हैं, वैसा तब नजर नहीं आया.

मान सकते हैं कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ राजनीति में बने रहने के लिये उन्होंने यह वैचारिक सिरा पकड़ा हो, लेकिन उन्हें इस सिरे को मजबूती के साथ थामे रखना होगा वरना अब तो खुद राहुल गांधी के ही अप्रासंगिक बन जाने का खतरा उत्पन्न हो गया है.

नरेंद्र मोदी कार्पोरेटवाद के साहसी ध्वजवाहक हैं और आर्थिक नीतियों के धरातल पर ‘एक ही सिक्के के दो पहलू’ बने रहने से कांग्रेस तो अब कहीं की नहीं ही रहेगी, राहुल का बियाबान में खो जाने का खतरा अधिक है.

1990 के दशक में आर्थिक उदारवाद की राह पर चलना समय की मांग थी लेकिन तीन दशकों की इसकी यात्रा ने जो सामाजिक-आर्थिक निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं वह भारत की जटिल सामाजिक-आर्थिक संरचना के साथ बहुत उत्साहजनक तालमेल बिठाने का उदाहरण प्रस्तुत नहीं करते.

विकास के चमकते द्वीपों से आप चकाचौंध तो महसूस कर सकते हैं लेकिन दृष्टि को व्यापक करने पर तलहटी में पसरते अंधेरे आपको नजर आने लगेंगे. इस देश की दो तिहाई आबादी इसी अंधेरी तलहटी में रहने को अभिशप्त बना दी गई है, जहां उनके बच्चों के लिये गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बीमारों के लिये उचित इलाज का घोर अभाव है.

फाइव स्टार निजी स्कूलों और सेवेन स्टार निजी अस्पतालों से विकास तो झलकता है लेकिन यह एकायामी विकास है. जब तक सरकारी शिक्षा और चिकित्सा तंत्र को सुदृढ़ नहीं किया जाएगा, वंचित तबकों का कल्याण हो ही नहीं सकता. 

विकास की अवधारणा को लेकर ही बहस की जरूरत है और राहुल गांधी अगर इस बहस को आगे बढाने में जितना सक्षम हो सकेंगे, उतनी ही उनकी प्रासंगिकता भी बढ़ती जाएगी. अपने अनेक बयानों से उन्होंने इस देश पर अप्रत्यक्ष तरीके से राज कर रहे कारपोरेट प्रभुओं को कहीं न कहीं नाराज किया है और ये सब उनकी राह में बाधा खड़ी करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.

कर्नाटक विधानसभा चुनावों के दौरान राहुल गांधी ने कहा था कि नरेंद्र मोदी की सरकार 14-15 बड़े कारपोरेट घरानों के लिये काम कर रही है. यह एक साहसिक बयान था जो मोदी के बहाने उन शक्तिशाली घरानों को निशाने पर ले रहा था, जो सत्ता पर हावी हैं.

ऐसे दौर में, जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा देश को नवउदारवाद की राजनीति के नए और आक्रामक स्तर पर ले आई है, राहुल गांधी को भी वैचारिक तौर पर स्पष्ट और आक्रामक होना होगा. उनकी पार्टी में कारपोरेट के एजेंट भरे पड़े हैं, जो उनकी राह कभी आसान नहीं होने देंगे.

जाहिर है, अगर राहुल गांधी वैचारिक दृढ़ता दिखाने की कोशिश करेंगे तो उन्हें दोहरी लड़ाई लड़नी होगी. पहली लड़ाई तो उन्हें अपनी पार्टी के खुर्राट कारपोरेट भक्तों से ही लड़नी होगी जो कांग्रेस को आर्थिक नीतियों के धरातल पर भाजपा की बी टीम बनाए रखने पर तुले हैं.

अगर राहुल इस देश के युवाओं से कम्युनिकेट कर सके तो उनकी पार्टी के खुर्राट नेता उनकी राह में अधिक अवरोध खड़े करने में सफल नहीं हो पाएंगे. उनके सामने उदाहरण है उनकी दादी इंदिरा गांधी का, जिन्होंने तत्कालीन कांग्रेस के अनेक दिग्गजों को एक साथ सलटा दिया था. वे ऐसा तभी कर पाई थी जब उन्होंने जनता के साथ बेहतर तरीके से खुद को संप्रेषित करने में सफलता पाई थी.

राहुल गांधी को लेकर जितने मजाक बने हैं, उनमें स्वतःस्फूर्त कम हैं प्रायोजित अधिक हैं. इन्हें कौन और क्यों प्रायोजित करता रहा है यह कोई छिपी बात नहीं. वैचारिक तौर पर भारत अब दोराहे पर खड़ा है. यहां से किधर…?

एक रास्ता नरेंद्र मोदी का है जिसमें सरकारी विश्वविद्यालयों को दिए जाने वाले फंड में कटौती की जा रही है और अजन्मे जियो युनिवर्सिटी को ‘इंस्टीच्यूशन ऑफ एक्सेलेंस’ का अवार्ड दिया जा रहा है, जिसमें सरकारी अस्पतालों को सुदृढ़ करने के बजाय गरीबों के लिये स्वास्थ्य बीमा योजना लाकर प्राइवेट अस्पतालों की आमदनी बढ़ाने के उपाय किये जा रहे हैं, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र की तमाम कंपनियों को निजी हाथों में सौंपने की मुहिम चल रही है, जिसमें पैसेंजर और जेनरल रेलगाड़ियों की संख्या बढ़ाने के बजाय सुविधासंपन्न निजी और महंगी रेलगाड़ियां चलाने को वरीयता दी जा रही है.

यानी, ‘भारत’ की कीमत पर ‘न्यू इंडिया’ को आगे बढाने की मुहिम जारी है. न्यू इंडिया की चमक के आगे तलहटी के अंधेरों में डूबते भारत की खोज खबर न राजनीति ले रही है, न मीडिया ले रहा है.

जो राजनीति तलहटी के इन अंधेरों को एड्रेस कर सकेगी, इन अंधेरों में रहने को अभिशप्त बड़ी आबादी को एड्रेस कर सकेगी, वही भविष्य की राजनीति होगी. अब यह राहुल गांधी पर निर्भर है कि वे वैचारिक तौर पर कितने स्पष्ट, मुखर और सक्रिय हो सकेंगे. उनके लिये अब अधिक वक्त नहीं बचा है.

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