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ट्रम्प और मोदी : दो नाटकीयता पसंद, छद्म मुद्दों पर राजनीति करने वाले राजनेता

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 24, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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ट्रम्प और मोदी : दो नाटकीयता पसंद, छद्म मुद्दों पर राजनीति करने वाले राजनेता

हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

आज ट्रम्प साहब की धूम है. वे सपरिवार हमारे देश में आए हैं. किसी ‘ट्रम्प अभिनंदन समिति’ की ओर से उनका भव्य स्वागत किया जा रहा है और इस पर अकूत खर्च भी हो रहा है. अच्छी बात है. हमारे देश में मेहमानों के हार्दिक स्वागत की परंपरा रही है और गृहस्थ लोग घर में रखे अनाज को भी बेच कर मेहमान के लिये मिठाई लाने को तत्पर रहते हैं.

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लेकिन, सवाल यह तैर रहा है कि यह ‘ट्रम्प अभिनंदन समिति’ है क्या ? इसके पीछे कौन लोग हैं और करोड़ों का यह खर्च कहांं से आ रहा है ? बहुत कुछ अभी अस्पष्ट है. डोनाल्ड ट्रम्प और नरेंद्र मोदी की यह जुगलबंदी कौन से गुल खिलाएगी, यह तो भविष्य बताएगा. लेकिन ट्रम्प की इस यात्रा, उनके स्वागत और इस पर आने वाले खर्च को लेकर जो धुंध छाई है वह इन दोनों की राजनीतिक शैली के अनुरूप ही है.

ट्रम्प और मोदी वैश्विक राजनीति की बदलती प्रकृति और बदलते प्रतिमानों के प्रतीक पुरुषों में गिने जाते हैं. आज से ठीक 5 महीने पहले 24 सितम्बर को मैंने इन दोनों की राजनीति की प्रकृति और बदलते राजनीतिक प्रतिमानों पर एक पोस्ट लिखा था. आज यह पोस्ट फिर प्रासंगिक है क्योंकि आज खबरों में इन दोनों की जुगलबंदी ही छाई है. पढ़िए –

डोनाल्ड ट्रम्प की सरकार को नाओम चोम्स्की ने ‘अमेरिका के लोकतांत्रिक इतिहास की सर्वाधिक मानवद्रोही सरकार’ की संज्ञा दी है. जीवित किंवदन्ती बन चुके, अमेरिका में रह रहे वयोवृद्ध विचारक चोम्स्की जब कुछ बोलते हैं तो दुनिया गम्भीरता से उन्हें सुनती है.

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की सरकार के कार्यकलापों को लेकर भी चोम्स्की के कुछ ऐसे ही विचार हैं. जब मोदी केंद्र की सत्ता में आए थे तो चोम्स्की ने इसे ‘भारत के लिये अंधेरा समय’ की संज्ञा दी थी. और अभी हाल में एक इंटरव्यू में उन्होंने मोदी सरकार पर ‘देश की संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को नष्ट करने’ के आरोप लगाते हुए कहा कि ‘इसने लोकतंत्र और मानवाधिकार के लिये खतरा उत्पन्न कर दिया है.’

ट्रम्प प्रशासन पर भी संस्थाओं की गरिमा को चोट पहुंचाने के गम्भीर आरोप लगते रहे हैं और इस कारण अमेरिका में संवैधानिक पदों पर आसीन अनेक स्वाभिमानी लोगों ने बीते दिनों इस्तीफा दे दिया है.

ट्रम्प ने ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा दे कर राष्ट्रवाद के जिस नकारात्मक रूप को प्रस्तुत किया है, उसने मानवीय त्रासदियों और व्यापारिक संकटों के नए सिलसिलों की शुरुआत कर दी और इन्हें लेकर पूरी दुनिया में चिन्ताएं व्यक्त की जा रही हैं. इधर, मोदी का राष्ट्रवाद भारतीयता की अवधारणा के विरुद्ध सिर उठा रही उन लंपट शक्तियों का मनोबल बढ़ा रहा है, जिनकी अराजक कारगुजारियों के समक्ष संवैधानिक तंत्र लाचार नजर आ रहा है.

पोस्ट-ट्रूथ पॉलिटिक्स के अध्येताओं ने ट्रम्प और मोदी, दोनों की चुनावी जीत को ‘वास्तविकताओं के स्थान पर कृत्रिम सत्य के प्रतिस्थापन का नकारात्मक निष्कर्ष’ बताया. 2014 में नरेंद्र मोदी और 2016 में डोनाल्ड ट्रम्प की जीत के बाद ‘पोस्ट-ट्रूथ’ शब्द की इतनी चर्चा हुई कि ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने इस शब्द को 2016 का ‘वर्ड ऑफ द ईयर’ घोषित कर दिया.

जब ट्रम्प राष्ट्रपति उम्मीदवार बने और फिर जीत भी गए तो पूरी दुनिया का बौद्धिक तबका हक्का-बक्का रह गया क्योंकि अमेरिकी लोकतंत्र की परिपक्वता को लेकर आमतौर पर एक आश्वस्ति का भाव रहा है. ट्रम्प की जीत को अमेरिका की राजनीतिक संस्कृति में मानवीय आदर्शों के पतनोन्मुख होने का स्पष्ट संकेत माना गया. कहा गया कि यह जीत अप्रत्याशित है और इसके लिये अमेरिका में बढ़ते नस्लभेद, कमजोर वर्गों के साथ ही स्त्री विरोधी मानसिकता को मुख्य रूप से जिम्मेदार माना गया.

नरेंद्र मोदी की जीत अप्रत्याशित तो बिल्कुल नहीं थी लेकिन इस जीत के परिणामों को लेकर भारत सहित दुनिया भर के बौद्धिक हलकों में गहरे संदेह व्यक्त किये गए. नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित आयरिश विचारक मैरीड मेग्योर ने मोदी की जीत को ‘मानवीय मूल्यों के संदर्भ में अत्यंत निराशाजनक परिणाम’ कहते हुए इसे ‘भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के विरुद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक अराजकताओं को आमंत्रण’ बताया.

ट्रम्प और मोदी दोनों बौद्धिकता विरोधी नेता हैं और अपने इस रुख को छिपाने में दोनों को ही कतई यकीन नहीं है. उन्हें पता है कि दुनिया का बौद्धिक तबका अगर उनको संदेह की नजरों से देखता है तो इस तबके को ठेंगे पर रख कर ही वे अपनी राजनीति को आगे बढ़ा सकते हैं. दोनों के समर्थन आधार में भी बौद्धिक व्यक्तियों के प्रति हिकारत और बौद्धिकता के प्रति निषेध के भाव मुखर रहे हैं.

सतह की निचली परतों में बढ़ती सड़ांध के बावजूद जहां मोदी ‘न्यू इंडिया’ के नारे के साथ आम लोगों को भरमाने में सफल हो रहे हैं वहीं ट्रम्प बढ़ती सामाजिक अराजकताओं और बुरी तरह बढ़ती आर्थिक विषमताओं के बावजूद ‘बदलते अमेरिका’ का राग अलापते रहते हैं.

प्रभावी रूप से झूठ बोलने में दोनों को ही महारत हासिल है. बतौर शासनाध्यक्ष, नीतियों और सरकारी कार्यकलापों से जुड़े झूठ ये दोनों बोलते ही रहते हैं. अंतर यही है कि जहां ट्रम्प को अमेरिका में खूब एक्सपोज किया जाने लगा है, वहीं मोदी के झूठ को सच मानने और मनवाने में उनके समर्थक सोशल मीडिया से लेकर चाय की दुकानों तक अत्यंत सक्रिय रहते हैं. एक और अंतर यह है कि मोदी युग में जहांं भारत में ‘मीडिया का भक्तिकाल’ चल रहा है वहीं अमेरिका में प्रमुख मीडिया संस्थान ट्रम्प के झूठ को उजागर करने में कोई कोताही नहीं बरत रहे.

अभी हाल में ‘वाशिंगटन पोस्ट’ ने ट्रम्प के निरन्तर झूठ बोलने पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है. अखबार के ‘फैक्ट चेकर्स डेटाबेस’ के मुताबिक राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प अपनी जनता से और पत्रकारों से 10 हजार 796 बार झूठ और गुमराह करने वाली बातें बोल चुके हैं. बहरहाल, मोदी के झूठों की फेहरिस्त बनाना उतना आसान नहीं क्योंकि उनके नेतृत्व में देश का सत्ता तंत्र झूठ की खेती करने में जिस तरह लगा हुआ है, उससे सिर्फ भ्रम ही उपज सकता है, उपज भी रहा है.

दोनों ही बातें लम्बी-लम्बी करते हैं लेकिन दोनों के शासन काल में उनके समाजों में परस्पर असहिष्णुता में बढ़ोतरी हुई है. दोनों ने ही अपने-अपने देशों की अर्थव्यवस्थाओं के कायाकल्प का वादा किया था, लेकिन दोनों इस संदर्भ में विफल रहे हैं और अपनी इस विफलता को ढंकने के लिये तरह-तरह के भ्रामक तथ्यों का सहारा लेते हैं.

ट्रम्प अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अपेक्षाओं के अनुरूप गतिशीलता नहीं ला सके वहीं मोदी ने तो भारत की अर्थव्यवस्था का बंटाधार करने में कोई कसर नही छोड़ी है. बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने सनसनी फैलाने के लिये नोटबन्दी का अचानक बिना आगा-पीछा सोचे निर्णय लिया, उसने भारतीय अर्थव्यवस्था, खास कर असंगठित क्षेत्र को जिस तरह बर्बाद किया, उसे मानने के लिये आज भी न वे और न उनका थिंक टैंक तैयार हैं.

समकालीन वैश्विक राजनीति में दोनों एक दूसरे को वैधता देते हैं, एक दूसरे की प्रशंसा करते हैं और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीके से एक दूसरे के राजनीतिक छद्म को सहयोग देते हैं.

अमेरिका के ह्यूस्टन शहर में जो प्रायोजित तमाशा हुआ उसमें ट्रम्प की मौजूदगी ने मोदी की छवि निर्माण की राजनीति को बढावा दिया और यह बिल्कुल स्वाभाविक था. आम तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपतियों से ऐसी उम्मीद नहीं की जाती, लेकिन ये तो डोनाल्ड ट्रम्प हैं जो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के नैतिक और राजनीतिक मानदंडों की ऐसी-तैसी करने में कोई संकोच नहीं करते… बात अगर चुनावी फायदे की हो तब तो बिल्कुल नहीं. अगले साल उन्हें राष्ट्रपति चुनाव में फिर उतरना है और अमेरिका में दिन ब दिन मजबूत और प्रभावी होती जा रही भारतीय लॉबी का समर्थन उनके बहुत काम आ सकता है.

इसलिये, भारत में भयंकर मानवीय त्रासदी का रूप लेती जा रही बेरोजगारी और आर्थिक विफलताओं के बावजूद नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी शहर में जो फूहड़ तमाशा आयोजित किया उसमें उन्होंने ‘भारत में सब कुछ अच्छा चल रहा है’ कह कर बेरोजगार भारतीय नौजवानों और नौकरी खोते जा रहे कामगारों का खुलेआम मजाक उड़ाया. उधर, ट्रम्प ने भी मोदी के साथ अपनी दोस्ती की कसमें खाते हुए यह कह कर उनकी हौसला अफजाई की कि ‘मोदी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं.’

नाटकीयता में दोनों का कोई सानी नहीं है और ट्रम्प के नाटक के बाद उसी नाटकीय अंदाज में मोदी ने भी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के स्थापित मानदण्डों की धज्जियां बिखेरते हुए, हवा में हाथ लहराते हुए ‘अबकी बार, ट्रम्प सरकार’ का जब नारा लगाया तो यह भारत के प्रधानमंत्री की गरिमा के नितांत विरुद्ध होते हुए भी नरेंद्र मोदी के लिये स्वाभाविक ही था.

यद्यपि, भारत नामक देश ट्रम्प के नेतृत्व वाले अमेरिका से वास्तविक हितैषी होने की अगर उम्मीद करता है तो यह बेकार की उम्मीद ही साबित होगी. ह्यूस्टन का तमाशा दो देशों की नहीं, दो नाटकीयता पसंद, छद्म मुद्दों पर राजनीति करने वाले राजनेताओं की सार्वजनिक जुगलबंदी का एक उदाहरण मात्र है, जिससे किसी सार्थक और सकारात्मक परिणाम की अपेक्षा करना बेमानी है.

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