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मोदी सरकार की अगुवाई में पूंजीपतियों के लूट में बराबर के साझीदार दैनिक भास्कर का पतन

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 14, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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मोदी सरकार की अगुवाई में पूंजीपतियों के लूट में बराबर के साझीदार दैनिक भास्कर का पतन

संजय श्याम

विदित है कि मजदूरों, किसानों, आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यक हाशियें पर खड़े तमाम मेहनतकशों को हर कालखण्ड के नीति-नियंताओं ने दुत्कारा है और उन्हें साम्राज्यवादी-सामंतवादी-पूंजीवादी व्यवस्था के पैरोकारों-चाटुकारों ने अपने पांव तले रौंदा है. मगर इस कोरोना और महामंदी काल में साम्प्रदायिक ताकतों के निर्देशन में केन्द्र और राज्य सरकार के अविवेकी और अनैतिक निर्णय की वजह से गरीबी की अंतहीन त्रासदी झेल रहे गरीबों-मजलूमों, मेहनतकशों, रोजी-रोटी की खातिर अपनी जन्मभूमि से दूर जाकर जीविकोपार्जन करनेवालों, काम से हटाये गये लोगों को जो दुःख-तकलीफ, दर्द, घुटन और अपमान दिया जा रहा है, वह सिहरन पैदा करनेवाला है. इस भयावह काल में लोगों का भरोसा न्यायालय और मीडिया पर बढ़ जाता है. पर इन दोनों माध्यमों ने अपने क्रियाकलापों से व्यापक जन-समुदाय को बुरी तरह निराश किया है.

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वर्ष 2001 ई0 में मैं और हमारी टीम एक अखबार के रिर्पोटिंग के सिलसिले में बांका-मुगेंर जिले के पहाड़ों के बीच बसे गांवों में गये थे. वहां के लोगों से मिलने और अपने कार्य के बारे में बताने के बाद अपनी दर्दनाक पीड़ा से उन लोगों ने साझा किया. उन्होंने बताया कि ‘हम जंगलों में रहते हैं परन्तु जंगलों से जलावन हेतु लकड़ी तक नहीं तोड़ सकते. यहां रहने वाले हर वयस्क पुरूष ग्रामीण पर दर्जनों केस पुलिस ने दर्ज कर रखे हैं. एक आदमी पर तो सैकड़ा को भी पार करता केस दर्ज हैं. ये सारे केस लूट, डकैती, हत्या आदि के नहीं हैं, वरन् जंगल में लकड़ी तोड़ने के ‘जुर्म’ में केस दर्ज है, जबकि जंगल माफिया ट्रक के ट्रक वृक्षों को काटकर ले जाता है और उसे पुलिस संरक्षण देती है. जबकि यही पुलिस हमारे यहां मुर्गा, बकरी आदि जैसे घरेलू पशु जबरदस्ती छीन ले जाती है. दूध हड़प लेती है. देने में विरोध करने पर मारपीट, इज्जत पर हमला, मुकदमा इत्यादि करती है.’ इन मुकदमों से त्रस्त ग्रामीण अंधेरे होने के बाद अपने घरों में सोने से डरते हैं कि कहीं पुलिस न पकड़ कर ले जाये. इस कारण वे हर रात अपने आशियाने घने जंगलों के बीच वृक्षों के नीचे गुजारने को मजबूर रहते हैं. उन रिर्पोटों को मैंने उन दिनों अपने अखबार में लिखा था परन्तु उन लोगों की पीड़ा का बाद में क्या हुआ यह तो पता नहीं. – रोहित शर्मा

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गये अनेक जनविरोधी फैसलों में से एक को उदाहरणस्वरूप देख सकते हैं, जिसमें हाल ही में दिल्ली के पास 140 किलोमीटर तक फैले करीब 4000 झुग्गी-झोपड़ियों में रह रही बेसहरा जिन्दगी को बेघर करने का निर्णय दिया गया है. साथ ही सख्त हिदायत द्वारा किसी भी कोर्ट को इसके खिलाफ आई याचिका के माध्यम से स्टे आर्डर लगाने से रोक दिया गया है. अधिकांश मीडिया का रोल भी बहुत ही निराश करनेवाला है.

जिस मीडिया को समाज के साथ बेबाक संवाद स्थापित करके सच्चाई को दिखाना चाहिए, सामूहिक हितों के लिए सामुहिक चिंता और चिंतन करना चाहिए, गरीबों के पक्ष में खड़ा होकर उनकी तकलीफों को जुबान देने की कोशिश करनी चाहिए, वह मीडिया इलिट क्लबों में शामिल होकर भ्रष्ट नेताओं और उद्योगपतियों की तरफदारी में रेडिमेड भाषा का उपयोग करते हुए झूठ और फरेब पर टिकी रिपोर्टिंग कर रहा है.

दिनांक 23 अगस्त, 2020 को ‘दैनिक भास्कर’ जैसे मुख्यधारा की दलाल मीडिया ने अपनी दलाली का मिसाल पेश करते हुए अपने भागलपुर संस्करण में एक मनगढ़ंत रिपोर्ट छापा, जिसमें उसने जंगल की बर्बादी और मूल्यवान पेड़ों की कटाई के लिए जिम्मेवार वन विभाग, वन माफिया व पुलिस गठजोड़ को दोषी न बताकर, इसका ठीकरा भूमिहीन खैरा-आदिवासियों, परंपरागत जंगलवासियों पर जा फोड़ा. जिन खैरा आदिवासियों और परम्परागत जंगलवासियों ने जल-जंगल-जमीन की हिफाजत के लिए माफियाओं व उसके गुर्गों का विरोध किया, उनके नापाक इरादों को सार्वजनिक कर सरकार व आम जन को सचेत किया, उन्हें ही इस दलाल अखबार ने भू-माफिया कहकर झूठी और तथ्यहीन खबर छापने में जरा भी लज्जा न आई. यह रिपोर्टिंग दैनिक भास्कर जैसे मीडियाओं के पतन का बेमिशाल उदाहरण है.

सच्चाई यह है कि वन विभाग रजिस्टर (कागजों) में पेड़-पौधे लगाने की खानापूर्ति करके प्रतिवर्ष लाखों-करोड़ों की अवैध उगाही करता है. बाद में उन काल्पनिक (खानापूर्ति किये गये) पेड़ों की कटाई का फर्जी मुकदमा आदिवासियों और परम्परागत जंगलवासियों पर लगाकर अपने अवैध उगाही पर पर्दा डालता है और इन मजबूर जंगल के असली पहरेदारों को परेशान करता है. इसी अखबार ने आदिवासी नेताओं द्वारा पैसा वसूलने की खबर पूरी तरह से नियोजित, भ्रामक और दिग्भ्रमित करने वाली है, जिसकी हम भरपूर निंदा व विरोध करते हैं.

‘दैनिक भास्कर’ इन्हीं बड़ी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को निष्कंटक, जंगल पर कब्जा दिलाने के लिये जंगलवासियों को अपने चास-बास से अलग रहने की हिदायत दे रहा है और डर दिखा रहा है. इसके प्रभाव में आकर ‘असगुनी’ गांव में कुछ पुलिस अपने चास-बास पर काबिज हो रहे लोगों को अपना घर उजाड़कर भागने की धमकी देने गये तो लोगों ने कहा, ‘आप केस करें, हमलोग फरिया लेंगे.’ वहीं जमुई जिला के लक्ष्मीपुर थाने के विशुनपुर के कुछ दबंग तिलकापुर के दलित, आदिवासी के साथ, पिछले एक महीना से मार-पीट और दबंगई करते आ रहे थे. घर उजाड़कर भागने की धमकी दे रहे थे. तिलकापुर के लोग इसकी शिकायत थाना में करते रहे हैं, लेकिन तारीख 7 सितम्बर, 2020 को तिलकापुर के योगिन्दर पासवान, जो प्रगतिशील दलित संघर्ष मंच के सदस्य हैं, जब जलावन के लिए विशुनपुर गांव के रास्ते से जंगल गये तो लौटकर नहीं आये. खोजबीन करने पर 10 सितम्बर, 2020 को उनकी लाश मिली. गांव के लोगों को आशंका है कि माफियाओं के गुर्गे विशुनपुर के चैधरी यादव और अमीन यादव के इशारे पर भानू यादव ने इस हत्या को अंजाम दिया है. – विभिन्न जनसंगठनों की ओर से जारी एक पर्चे से

ज्ञात हो कि वन माफिया-दबंग-पुलिस गठजोड़ के खिलाफ मूलवासियों द्वारा लगातार विरोध-प्रदर्शन, सभा, गोष्ठी, हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है. यह खबर हक-हकूक व जनवादी अधिकारों के लिए उठ रहे जन-ज्वार के दमन के लिए दबंगों के गठजोड़ द्वारा किये जा रहे नापाक प्रयास का हिस्सा है, पर ऐसी नापाक कोशिशों से जनता का मनोबल टूटनेवाला नहीं है. उनकी एकता, उनका संघर्ष अटूट है, उन्हें भटकाने की कोई भी कोशिश निश्चित ही मूंह के बल गिरेगी.

साम्प्रदायिक-फासीवादी पूंजीपतियों के नीतियों का पैरोकार आरएसएस निर्देशित भाजपा की सरकार ने पर्यावरण से सन्दर्भित पुराने कानूनों को बदल कर नया पर्यावरण प्रभावन आंकलन, 2020 पेश करके पूंजीपतियों को विभिन्न पर्यावरणीय नुकसान के मसले में भारी छूट देता है. यह बिल प्रावधान देता है कि जंगल-पहाड़ आदि में कुछ निश्चित निर्माणों व छोटों निर्माणों हेतु पर्यावरण से सन्दर्भित कोई स्वीकृति पूंजीपतियों को नहीं लेनी होगी, यहां तक कि वहां की जनता से भी स्वीकृति लेने की जरूरत नहीं होगी. इसके साथ ही, जन स्वीकृति के नाम पर एक जन-सुनवाई को ही स्वीकृति के लिए काफी मान लिया गया है.

यह प्रावधान पूंजीपतियों को खासकर जंगल के आदिवासियों के खिलाफ इस्तेमाल करने में मददगार होगा. वहां आदिवासियों की फर्जी सुनवाई करवाकर पूंजीपतियों के मनमाफिक प्रोजेक्ट लगाने का अधिकार हासिल करके मूलवासियों को जंगल से बेदखल करने का अधिकार प्राप्त कर लेंगे. मोदी सरकार, पूंजीपतियों को निर्लज्जता से सारे पर्यावरणीय प्रावधानों में भारी छूट देकर एक ओर भूमि-अधिग्रहण के मसले आसान कर रही है, तो वहीं दूसरी ओर उनकी लूट के रास्ते की सारी संवैधानिक व नैतिक बाधाओं को एक-एक कर हटा रही है.

देश के मीडिया को मोदी सरकार के भयानक लूट के इस जनविरोधी कानूनों के खिलाफ जनता को सचेत करना चाहिए था, पर उसके विपरीत वह भी इस लूट में बराबर के साझीदार बनकर जनता के ही खिलाफ दुश्प्रचार का मोर्चा खोलकर अपनी बची-खुची साख भी गंवाने के लिए तैयार हो गई है.

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