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Home गेस्ट ब्लॉग

लुंपेन भारत में आपका स्वागत है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 21, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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6 नवम्बर, 1992 से भारत में लुंपेन संस्कृति का आगाज हुआ. आईये, लुंपेन भारत में आपका स्वागत है.

लुंपेन भारत में आपका स्वागत है

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Suboroto Chaterjeeसुब्रतो चटर्ची

वैसे तो 1990 के दशक में तथाकथित आर्थिक सुधारों के साथ-साथ लुंपेन ईंडिया की नींव डाल दी गई थी लेकिन, 2014 में इसके लिए जो भव्य तोरणद्वार बनाया गया, उसकी मिसाल सिर्फ़ हिटलर की जर्मनी और मुसोलिनी की ईटली में मिलती है.

बाज़ारवाद, उपभोक्तावाद की तरह ही एक लुंपेन व्यवस्था है, जिसमें आदमी और वस्तु का भेद धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है. जितना उन्मुक्त बाज़ार उतनी उन्मुक्त प्रतिस्पर्धा, जितनी ज़्यादा प्रतिस्पर्धा, उतना ज़्यादा मुनाफ़ा.

मुनाफ़ा कमाने की इस होड़ में डॉक्टर को अपने चेंबर में आता हुआ मरनासन्न रोगी भी एक दो हज़ार के नोटों का बंडल दिखता है. इसी तरह, सड़क पर अकेली चलती लड़की एक माल बन जाती है. नारी भोग्या वसुंधरा तो हमारी संस्कृति, इतिहास, साहित्य और तथाकथित मनोरंजन के ज़रिए स्थापित हज़ारों वर्षों से किया जाता रहा है, रही सही कसर बलात्कारियों के चरणों में बिछे देश के प्रधानमंत्री, फूल माला से स्वागत करते उनके मंत्री और उनके समर्थन में तिरंगा यात्रा निकालते लुंपेन प्रधानमंत्री के समर्थक एक अनुकरणीय नज़ीर पेश करते हैं.

इसी कड़ी में हत्यारों का महिमामंडन होता है, और अपने को सबसे सशक्त कहने वाला एक गली छाप लुंपेन प्रधानमंत्री गांंधी जी के हत्यारे के सामने हाथ जोड़े किसी घिनौने कुत्ते-सा बिछे रहते हैं.

अब तो सुप्रीम कोर्ट भी लुंपेन बन चुका है. एक गैर-इरादतन हत्या के आरोपी की व्यक्तिगत स्वाधीनता की चिंता में मरे जा रहे ‘मी-लॉर्ड’ को बरवरा राव जैसे हज़ारों देशप्रेमियों की न्यायिक हत्या पर ख़ामोश रहते हैं. सिर्फ़ यही नहीं, राफाएल से लेकर नोटबंदी तक और सीएए, एनआरसी से लेकर धारा 370, अनुच्छेद ए को हटाने की ग़ैर सांविधानिक फ़ैसलों पर मीलॉर्ड की शर्मनाक चुप्पी भी अब कोई रहस्य नहीं रह गया है.

नेता, अभिनेता टोकरी में सज कर बिक रहे हैं. बाज़ार है भाई, यहांं सब कुछ और सब कोई बिकता है. रेड लाईट एरिया सोनागाछी और जीबी रोड से निकल कर पूरे देश को निगल चुका है. हम सब, गाहे-बगाहे इस विशाल रेड लाईट एरिया के दलाल बनने को अभिशप्त हैं. हर वह शख़्स जिसे इस व्यवस्था से उम्मीद है, इस व्यवस्था का पोषक है.

दुनिया में मानव सभ्यता का इतिहास बस दो ही ग्रुप में बंटा है – एक क्रिश्चियन और दूसरा पैगन. यहांं इन शब्दों को किसी धर्म से न जोड़ें. क्रिश्चियन का अर्थ यहांं एक व्यवस्थित उदात्त मूल्यबोध वाली जीवन पद्धति से है, जिसमें करुणा, दया , प्रेम, सहानुभूति, समानुभूति , वैज्ञानिक सोच, शिक्षा, जनवादी साहित्य संस्कृति और नि:स्वार्थ प्रेम से है.

इतिहास और भूगोल के विभिन्न काल और विश्व खंडों में, विभिन्न धर्मों, राजनीतिक, सामाजिक व्यवस्थाओं में इस जीवन शैली को अपनाने की कोशिश चलती रही है, वाम और दक्षिण के विभाजन से परे.

दूसरी तरफ़ है पैगन जीवन शैली. यह उस आदिम सोच का विस्तार है जिसके मुताबिक़ अस्तित्व बनाए रखने की लड़ाई, संवादात्मक प्रतिक्रिया और निर्बाध सेक्स की तलाश शामिल है. आंंख के बदले आंंख की धारणा भी इसी सोच का प्रतिस्फलन है.

मैंने पहले कहा कि इनको किसी धर्म से जोड़ कर मत देखिए, क्योंकि आप भ्रमित होंगे. क्यों और कैसे ? एक उदाहरण दे कर समझाता हूंं. यह सर्वविदित तथ्य है कि अपनी लाख ख़ामियों के वावजूद, इस्लाम दुनिया का सबसे उन्नत धर्म है. अब बात जब शरीयत क़ानून पर आती है तो चोरी की सज़ा हाथ काटने की होती है. एक धर्म जिसके मूल में शांति और मानव प्रेम है, कैसे इस पैगन न्याय के सिद्धांत को लेकर चलता है, सोचने वाली बात है.

मुख्य विषय पर लौटते हुए, कहना होगा कि समाजवादी व्यवस्था से बाज़ारवादी व्यवस्था में अधोपतन क्रिश्चियन से पैगन होने की प्रक्रिया के सिवा कुछ नहीं है. बाज़ारवादी व्यवस्था में सरकार का कोई जनसरोकारी योजना नहीं होती. सबकुछ निजी हाथों में होता है. सरकार का काम महज़ टैक्स वसूलना और निजी पूंंजी के हित में क़ानून बनाने से लेकर उनके लिए फ़ौज का, अदालत का और अन्य सांविधानिक संस्थाओं का क्रिमिनल इस्तेमाल करना होता है.

क्या यही सब क्रिमिनल लोगों की सरकार द्वारा आज नहीं किया जा रहा है ? मानसिक कोढ़ से ग्रस्त लोग जब मरते हुए भी धर्म और जाति के नाम पर अपने हत्यारों को वोट देते हैं, तब वे भी हत्यारों को माला पहनाने वाले बन जाते हैं.

आप इसे लोकतंत्र की ख़ूबसूरती या लोकतंत्र का त्योहार कह सकते हैं, लेकिन मेरी नज़र में चुनाव एक लुंपेन संस्कृति को प्रतिष्ठित करने का महज़ औज़ार भर रह गया है भारत में, स्थापित तो यह बहुत पहले ही किया जा चुका है.

भारत की लुंपेन संस्कृति में अधोपतन की गाथा 6 दिसंबर 1992 के इतिहास के एक मूक दर्शक गुंबद के ढाहने से शुरु हुई. यह एक ऐसी जीवंत चित्र है जिसे सीने में दफ़्न किए बरवरा राव जैसे करोड़ों इस अभागे देश से कूच कर जाएंंगे. खुश रहो अहले वतन, हम तो सफ़र करते हैं. लुंपेन भारत में आपका स्वागत है.

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