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जनसंख्या नियंत्रण कानून : मुसलमानों के नाम पर हिन्दुओं और स्त्रियों के खिलाफ कानून

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 18, 2021
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देश में उत्तर प्रदेश के निर्वंश मुख्यमंत्री अजय कुमार बिष्ट के नेतृत्व में विधायक और सांसद बने आठ आठ बच्चों के बाप भूखमरी, बेरोजगारी, मंहगाई की मार से आठ आठ आंसू बहा रही उत्तर प्रदेश की जनता के नियंत्रण के लिए जनसंख्या नियंत्रण का कानून ला रही है. निर्वंश मुख्यमंत्री के इस कानून पर देश भर में चर्चाओं का बाजार गर्म है, ताकि इस बहाने बढ़ती गरीबी, बेरोजगारी, मंहगाई जैसे बुनियादी सवालों को किनारे सरका कर चुनावी बैतरणी को पार किया जा सके.

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शासक वर्ग इस बुनियादी तथ्यों को अच्छी तरह जानता है कि बड़ी आबादी एक बड़ा बाजार बनाता है, जो बड़ी तादाद में टैक्स व अन्य माध्यमों से देश का खजाना भरता है, जिससे शासकों का आलिशान महल और ऐश्वर्य की तमाम सुविधाओं का बंदोबस्त होता है. समस्या तब खड़ी होती है जब यह बदहाल आबादी सरकारी और निजी उद्यमों द्वारा इस कदर लूट ली जाती है कि जमा खजाना शासकों के ऐश्वर्य के लिए कम पड़ने लगती है और दूसरी ओर बदहाल बदहवास जनता विद्रोह का स्वर उठाने लगती है.

अशफाक अहमद अपने सोशल मीडिया पेज पर लिखते हैं जनसंख्या नियंत्रण की बात करना दरअसल लोगों का ध्यान असली समस्या से हटाकर दूसरी ओर लगा देना जैसा है. देश की तेजी से बढ़ती जनसंख्या को लेकर चिंतित होना, वैचारिक धरातल पर इसके लाभ-हानि पर चर्चा करते हुए लोगों में जागरुकता लाना अलग बात है, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण के लिए बकायदा कानून बना देना और सख्ती से उन्हें लागू करने की बात करना अलग बात है.

जब सरकारें शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ ही साथ रोजगार के अवसर मुहैया कराने में फेल होने लग जाती हैं तो जनसंख्या विस्फोट और जनसंख्या नियंत्रण जैसी बातें की जाने लगती है. इनका मकसद दरअसल लोगों का ध्यान असली समस्या से हटाकर दूसरी ओर लगाना होता है.

आज के हालात में जनसंख्या नियंत्रण की बात करना सिर्फ पोलिटिकल माइलेज लेने जैसा है क्योंकि किसी भी देश की आबादी को स्थिर रखने के लिए होमो सेपियंस की कुल प्रजनन दर 2.1 होनी चाहिए और भारत अब इसके बहुत करीब है, क्योंकि कई राज्यों में कुल प्रजनन दर 2.1 से नीचे है. इसका अर्थ है कि भारत जनसंख्या को स्थिर करने की राह पर है इसीलिए जनसंख्या नियंत्रण को सुनिश्चित करने के लिए अब दंडात्मक उपायों पर जोर दिया जाना गलत है.

योगी आदित्यनाथ कोई अनोखी घोषणा नहीं कर रहे हैं.
उत्तर प्रदेश से पहले मध्य प्रदेश, राजस्‍थान, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्य ऐसी नीतियां ला चुके हैं, लेकिन इससे जनसंख्या नियंत्रण में न कोई लाभ हुआ, न हानि. जहां जनसंख्या नियंत्रण कानून लागू थे, उन राज्यों में भी जनसंख्या 20% बढ़ी, जहां कानून नहीं था वहां भी औसत 20% की वृद्धि हुई.

मध्य प्रदेश में 2001 से दो बच्चों की नीति लागू है. 2002 में राजस्थान सिविल सर्विसेज (पेंशन) रूल्स 1996, सेक्शन 53 (ए) लागू हुआ था. इसमें दो से ज्यादा बच्चों वाले नागरिक सरकारी नौकरी के लिए पात्र नहीं माने जाते थे. महाराष्ट्र में सिविल सर्विसेज (डिक्लेरेशन ऑफ स्मॉल फैमिली) रूल्स 2005 के तहत दो से ज्यादा बच्चा पैदा करने वाले को राज्य सरकार की नौकरियों के लिए अपात्र माना जाता है. बिहार में भी ऐसे नियम थे, लेकिन 2020 में पंचायत चुनाव के वक्त दो बच्चों वाले कानून में ढील देनी पड़ी.

किसी देश में युवा तथा कार्यशील जनसंख्या की अधिकता तथा उससे होने वाले आर्थिक लाभ को जनसांख्यिकीय लाभांश के रूप में देखा जाता है. भारत में मौजूदा समय में विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या युवाओं की है. चीन ने भी कुछ समय पहले अपनी टू चाइल्ड पॉलिसी को त्याग दिया क्योंकि इस नीति के परिणामस्वरूप सेक्स-चयनात्मक गर्भपात, गिरते प्रजनन स्तर, जनसंख्या के अपरिवर्तनीय रूप से बूढ़े होने, श्रमिकों की कमी और आर्थिक मंदी जैसे अवांछनीय परिणाम सामने आए.

यूरोप के कई देशों में जनसंख्या को अब एक संपन्न संसाधन के रूप में देखा जाता है. जनसंख्या एक विकास करती अर्थव्यवस्था की जीवन शक्ति है. इसे समस्या और नियंत्रण की शब्दावली में देखना और इस दृष्टिकोण से कार्रवाई करना, राष्ट्र के लिये अनुकूल कदम नहीं होगा. यह दृष्टिकोण अब तक कि प्रगति को बाधित कर देगा और एक कमज़ोर व बदतर स्वास्थ्य वितरण प्रणाली के लिये ज़मीन तैयार करेगा.

झोले से निकाले नये आइटम की तरह यूपी में जनसंख्या नियंत्रण कानून लाया जा रहा है, जिसकी जरूरत इस नजर से थी कि जो भक्तों को पट्टी पढ़ा रखी है कि मुस्लिम चार बीवी चालीस बच्चे रखते हैं, उन पर रोक लगाई जा सके जबकि ऐसा कुछ जमीन पर था नहीं और जनसंख्या वृद्धि दर आलरेडी स्थिरांक की तरफ बढ़ रही थी. लेकिन चुनावी नजरिये से दिखाना जरूरी था कि मुल्ले टाईट कर रहे हैं तो लाना भी जरूरी था.

बहरहाल, गोबरबुद्धि लोगों को छोड़ कर इसे अपने नजरिये से देखें तो यह हिंदू समाज के लिये ही परेशानी का कारण बनने वाला है, मुस्लिमों पर इससे खास फर्क नहीं पड़ता.

इस कानून में सबके नजरिये से एक अच्छाई तो है कि एक बच्चे वाले उन लोगों को, जो इसके बाद आपरेशन करा लेंगे, उन्हें तमाम तरह की राहतें और सहूलियतें दी जायेंगी. दी जायेंगी या नहीं, वह भविष्य के गर्भ में है लेकिन लोग प्रोत्साहित होंगे तो यह अच्छा ही है.

इसके सिवा एक नुकसान दो से ज्यादा बच्चे वालों को सब्सिडी रोकना है तो इसमें थोड़ा मुसलमानों का नुकसान जरूर है कि पांच किलो वाला राशन नहीं मिल पायेगा लेकिन इसमें भी आलरेडी मुसलमानों की तमाम आबादी तकनीकी अड़चनें पैदा करके बाहर की जा चुकी है और ऐसा भी नहीं कि वे इसी राशन पर पल रहे हों. इसके सिवा और कोई ऐसी सब्सिडी नहीं जिसका सीधा लाभ लिया जा रहा हो.

दूसरी परेशानी कि दो से ज्यादा बच्चे वाले चुनाव नहीं लड़ सकते, सरकारी नौकरी के लिये आवेदन नहीं कर सकते और नौकरी में हैं तो प्रमोशन नहीं पा सकते. इनसे अव्वल तो मुसलमानों का कोई खास लेना-देना ही नहीं. चुनाव लड़ने, सरकारी नौकरी करने में वे हैं ही कितने ! मुस्लिम कैंडीडेट जीत सकने वाली सीट पर नेताजी बेटा बहू को लड़ा लेंगे, नौकरी के बजाय अपना रोजगार या हाथ के हुनर वाले कामों में हैं तो वहां कोई ऐसी रोक नहीं है.

वैसे नौकरी में आवेदन से रोकना जानी लीवर टाईप लाफ्टर स्ट्रोक है कि देश में इतने धनी बेरोजगार हैं कि आवेदन भी तीन बच्चे पैदा कर चुकने के बाद कर सकते हैं. दूसरे यह नियम बस सरकारी नौकरी के लिये है, जो हैं ही कितनीं और जो हैं भी वे खत्म की जा रही हैं निजीकरण के प्रताप से.

ज्यादा बच्चे पैदा करने की वजह धर्म नहीं बल्कि गरीबी, अशिक्षा और गैर-जागरूकता है. उस पर तो कोई काम होना नहीं क्योंकि वह इनके बस का नहीं लेकिन कानून बना कर रोकना है तो पता होना चाहिये कि गरीब, अशिक्षित और गैर-जागरूक वर्ग में जनसंख्या अनुपात के हिसाब से मुसलमान मुट्ठी भर मिलेंगे जबकि हिंदू थैले भर मिलेंगे, खासकर ओबीसी, एससी, एसटी…,
तो इससे प्रभावित भी वही ज्यादा होंगे.

और ऐसा भी नहीं कि सवर्ण हिंदू इससे सुरक्षित रहेंगे बल्कि ज्यादातर नौकरियों में वही हैं और आगे जाना भी उन्हीं को है तो उन्हें जरूर इस जाल में फंसना है कि पहली बेटी हो गयी तो वंश कौन चलायेगा ? मुखाग्नि कौन देगा कि चिंता में सोनोग्राफी करते, बच्ची हुई तो अबार्शन कराते फिरेंगे. लड़का लड़की का अनुपात आलरेडी खराब है जो इसके बाद और खराब होने की गुंजाइश है.

मुसलमानों का क्या जा रहा है. पढ़े लिखे जागरूक और समर्थ मुस्लिम हैं, जो इस कानून की जद में आ सकते हैं, वे पहले से ही दो बच्चों की सोच वाले हैं और गरीब, कम पढ़े लिखे या गैरजागरूक मुस्लिम इस कानून के फंदे में आते ही नहीं, सिवा इसके कि जो राशन पा रहे थे, वह नहीं पा सकेंगे.

अब देश हित के नाम पर इतनी कुर्बानी तो वे दे ही लेंगे. तो मुसलमानों को चाहिये कि कोई इस बारे में पूछे तो एक कदम आगे बढ़ कर स्वागत करें. चिढ़ना और खीजना तो सामने वालों को है, वही खुद अपना मामला समझेंगे.

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश के बिष्ट सरकार मुसलमानों को टाईट करने के नाम पर असल में हिन्दुओं खासकर पिछड़ी जातियों को खत्म करने, उसको नियंत्रित करने का कानून है. यही कारण है कि सोशल मीडिया पर एक मैसेज वायरल हो रहा है, जिसका आशय यह है कि मुस्लिम समुदाय इस कानून पर शांत रहे, इसका विरोध तो खुद हिन्दू ही करेगा. वायरल मैसेज इस प्रकार है –

भाजपा की पिच पर खेलने से बचे मुसलमान. समझदारी से काम ले और जनसंख्या नियंत्रण बिल के मुद्दे पर खामोश रहे.

योगी, संघ और भाजपा वाले चाहते हैं कि मुसलमान दो बच्चे वाले कानून का विरोध करें ताकि वह बहुसख्यक वर्ग में य़े संदेश दे सकें कि देखिये मुसलमानों को तकलीफ हो रही है. और वह हिन्दू मुस्लिम करके चुनाव जीत जायें.

मुसलमान यदि समझदारी से काम लेकर इस कानून पर खामोश रहा तो योगी भाजपा / संघ की हवा बिलकुल निकल जायेगी. वैसे भाजपा और संघ के अन्दर ही इस कानून का विरोध करने वाले बहुत हैं, उन्हें करने दीजिये. मुसलमान खामोश रहें.

सबसे बड़ी दिक्कत य़े है की कुछ तथाकथित मुस्लिम नेता इस मुद्दे पर ताली बजवाने के लिए बोल कर योगी और भाजपा/संघ के खेल को कामयाब करना चाहते हैं. मुसलमानों को इन तथाकाथित बेवकुफ मुसलमानों से होशियार रहना चाहिए. वैसे भाजपा और संघ ने गोदी मीडिया और उनके पत्तलकारों को इस पूरे मुद्दे को हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर अपना एजेंडा चलाने के लिए पहले से ही सुपारी दे रखीं है.

यदि मुसलमान खामोश रहा तो य़े भाजपा और संघ के तरकश का आखिरी तीर भी फुस्स हो जायेगा. वैसे ही पहले से भाजपा और संघ अपना इकबाल खो चुकी है, य़े ऊनका आखिरी दाव साबित होगा.

मुसलमानों को भड़काने के लिए जनसंख्या नियंत्रण एक एक ऐसा प्रश्न है, जिसका स्वयं मुसलमानों से ज्यादा हिन्दुओं के लिए जीवन-मरण का है. ऐसा क्यों है इसका एक जवाब हरिशंकर परसाई कुछ इस प्रकार देते हैं. हरिशंकर परसाई एक प्रश्न कि ‘हिन्दुओं को एक से अधिक पत्नी रखने का अधिकार नहीं है, पर मुसलमान 3-4 पत्नियां रख सकता है, ऐसे में एक दिन हिन्दू अल्पसंख्यक नहीं हो जाएंगे ?’ के जवाब में कहते हैं –

जो आप कह रहे हैं वह ‘विश्व हिन्दू परिषद्’ और ‘आरएसएस’ का प्रचार है. आपको कई भ्रमों में फंसा लिया गया है. इस देश पर सात सौ साल मुसलमानों का शासन रहा है, फिर भी हिन्दू कम नहीं हुए. अभी हिन्दू 85 फीसदी हैं. मगर हिन्दू हैं कौन ? अछूत तथा नीची जाति के लोग क्या हिन्दू हैं ? ये हिन्दू हैं तो ऊंची जाति के लोग इन्हें छोटे क्यों नहीं ? इन्हें सामूहिक रूप से क्यों मारते हैं ? इनके झोपड़े क्यों जलाते हैं ? हिन्दू कोई नहीं है – ब्राह्मण हैं, कायस्थ हैं, अग्रवाल हैं, बढई हैं, नाई हैं, भंगी हैं, चमार हैं.

एक बात सोचिये, हज़ारों सालों से इस देश में हिन्दू हमेशा करोड़ों रहे हैं और हमला करने वाले सिर्फ हज़ारों, मगर हारे हिन्दू ही हैं. नादिरशाह के पास सिर्फ एक हज़ार सिपाही थे, अगर हिन्दू पत्थर मारते तो भी वे मर जाते. दस हज़ार अंग्रेज़ तीस करोड़ भारतीयों पर राज करते रहे हैं. संख्या से कुछ नहीं होता.

आप सौ मुसलमानों का यूं ही पता लगाइए, इनमें कितनों की 3-4 बीवियां हैं ? आपको किसी की नहीं मिलेगी. हज़ारों में कोई एक मुसलमान एक से ज्यादा बीवी रखता है बाकि सब एक बीवी ही रखते हैं. मुसलमान नसबंदी कराते हैं. मुसलमान औरतें भी ऑपरेशन कराती हैं. अभी संख्या ज़रूर कुछ कम है.

अच्छा हिन्दू बढ़ाने के लिए संतति निरोध बंद कर देते हैं और हर हिन्दू को 3-4 पत्नियां रखने का अधिकार दे दें तो बेहिसाब हिन्दू पैदा होंगे. पर आम हिन्दू के 15-20 बच्चे होंगे इन्हें वो कैसे पालेगा ? क्या खिला सकेगा ? कपड़े पहना सकेगा ? शिक्षा दे सकेगा ? ये भुखमरे, मरियल, अशिक्षित करोड़ों हिन्दू होंगे या कीड़ें और केचुएं ? क्या कीड़ें और केचुएं से किसी जाति की उन्नति होती है ? (पूछो परसाई से, अंक दिनांक: 5 फरवरी 1984).

वहीं, दूसरी ओर यह जनसंख्या नियंत्रण कानून सीधे तौर महिला विरोधी है. एक अन्य वायरल मैसेज बताता है कि –

हां, आप जनसंख्या नियंत्रण कानून का समर्थन कर सकते हैं, बशर्ते आप या तो पुरुष हैं या फिर एक आर्थिक, सामाजिक रुप से सशक्त महिला. आप समर्थन‌ कर सकते हैं क्योंकि इसके नतीजे आपको नहीं पता है और ना ही आपको lack of bodily autonomy से डील करना है. ना ही लड़का ना पैदा कर पाने के लिए आपका बार बार गर्भपात करवाया जाएगा (क्योंकि परिवार भी छोटा रखना है और कम से कम एक बेटा भी चाहिए).

ना अस्थायी या स्थायी कांट्रासेपशन (नसबंदी) का बोझ आपको उठाना है, इसलिए आप इस बिल को सपोर्ट कर सकते. लेकिन बतौर एक जागरूक महिला और डाक्टर मैं इस बिल को सपोर्ट नहीं कर सकती.

आपको स्त्रियों का भला करना है और देशहित भी साधना है तो स्त्रियों के आर्थिक, सामाजिक सशक्तिकरण के लिए संघर्ष करें, उनकी शिक्षा के लिए संघर्ष करें, उनके खुद के शरीर पर नियंत्रण होने, उनकी bodily autonomy के लिए संघर्ष करें. उनके दोयम दर्जे के नागरिक होने के खिलाफ संघर्ष करें. उनके सुरक्षित मातृत्व के लिए संघर्ष करें. उनकी संतानों की मृत्यु दर कम करने के लिए संघर्ष करें. यानि उन सब कारणों पर नियंत्रण करें जो एक स्त्री को ज़्यादा बच्चा पैदा करने की मशीन, वंश बढ़ाने की मशीन बनाते हैं. स्त्री को किसी सरकारी जनसंख्या कानून का मोहरा ना बनाएं.

जनसंख्या नियंत्रण कानून न केवल बकबास है अपितु यह देश की तमाम समस्याओं, जिसका बढ़ाने या बनाने में संघी देशद्रोही ताकतों का सीधा हाथ है, को उसकी जिम्मेदारियों से मुक्त करना है. पहले वह हर समस्याओं का कारण नेहरु को बताता था, और अब वह देश की जनसंख्या को बताता है, और ये संघी देशद्रोही स्वयं दूध से धुले हैं.

यह समझना बेहद समीचीन होगा की जनसंख्या कभी भी बोझ नहीं होती. जनसंख्या का गरीबी और समस्याओं से कोई संबंध नहीं होता, वरना विश्व की सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश आज भिखारी होता. इस जनविरोधी कानूनों या तो निष्प्रभावी हो जायेगा या इसे खत्म कर देना होगा. केवल अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य ही बेहतर समाज का निर्माण करता है, जिसे नस्तेनाबूद करने की संघी सरकार पिछले सात सालों जीतोड़ कोशिश कर रही है.

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]

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