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1857 के विद्रोह का परिप्रेक्ष्य – इरफान हबीब

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 28, 2024
in युद्ध विज्ञान
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1857 के विद्रोह का परिप्रेक्ष्य - इरफान हबीब
1857 के विद्रोह का परिप्रेक्ष्य – इरफान हबीब

सबसे पहली बात तो यह है कि मैं 1857 के विद्रोह को औपनिवेशिक शासन के बृहत्तर संदर्भ में रखना चाहूंगा. बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिनमें अनेक इतिहासकार भी शामिल हैं, जो अब यह मानने लगे हैं कि हमारी पाठयपुस्तकों में और इतिहास में औपनिवेशिक शासन की जो आलोचनाएं हैं, उनमें कुछ ज्यादती हुई है. अब से दो-तीन साल पहले, एन.सी.ई.आर.टी. की पाठयपुस्तकों में अनेक इतिहासकारों ने यह बात चलाई भी थी लेकिन, मुझे लगता है कि हम 1857 के विद्रोह को और उसके चरित्र को तब तक नहीं समझ सकते हैं, जब तक हम यह नहीं समझते कि भारत के लिए और वास्तव में किसी हद तक पूरी दुनिया के लिए ही उपनिवेशवाद का क्या अर्थ रहा था और इस औपनिवेशिक शासन के साथ भारत किस तरह जुड़ा हुआ था और खास तौर पर भारतीय सेना के सिपाही उसके साथ किस तरह जुड़े हुए थे.

अव्वल तो उपनिवेशवाद का अर्थ था लगातार भारत के संसाधनों का दोहन कर बाहर ले जाया जाना. प्रसंगत: कह दूं कि एन.सी.ई.आर.टी. ने हाई स्कूल के बच्चों के लिए अब जो पाठयपुस्तकें लगाई हैं, उनमें से व्यावहारिक मायने में यह पहलू गायब ही है. बहरहाल, यह उस समय जीवन का एक तथ्य था. इस तरह निचोड़ा जाने वाला राष्ट्रीय आय का 3-4 फीसद हिस्सा, बेशक छोटा सा लग सकता है. लेकिन, याद रहे कि औद्योगिक क्रांति के दौरान ब्रिटेन में बचतों का स्तर वास्तव में 6 फीसद से ज्यादा नहीं था. इससे कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है कि साल दर साल, कैसी तबाह करने वाली लूट हो रही थी। 1854 से 1855 तक यानी विद्रोह से पहले के दो वर्षों में ही, भारतीय तटकर संबंधी रिकार्डों के अनुसार, भारत के लिए आयातों के मुकाबले निर्यातों की अधिकता यानी यह लूट 5.8 करोड़ रु. की आंकी गई है। उस जमाने की कीमतों के हिसाब से यह बहुत बड़ी रकम थी। इस लूट का मतलब यह है कि हिंदुस्तानी जनता को बढ़ते हुए फालतू कराधान का शिकार बनाया जा रहा था। और कराधान में यह बढ़ोतरी, जो ब्रिटिश शासन के कर बंदोबस्तों के रूप में सामने आई थी, सबसे ज्यादा बोझ उन इलाकों पर डाल रही थी जिन्हें महालवाड़ी इलाकों के नाम से जाना जाता था। करों का यह अतिरिक्त बोझ उतना ज्यादा स्थायी बंदोबस्ती के इलाकों पर और मद्रास प्रेसिडेंसी में रैयतवारी इलाकों पर नहीं पड़ रहा था, क्योंकि यहां पर करों का हिस्सा अपेक्षाकृत ज्यादा अवधि के लिए तय होता था। इसके विपरीत महालवाड़ी इलाकों में अपरिहार्य रूप से करों का यह बोझ ज्यादा था।

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वास्तविक मूल्य का हिसाब लगाएं तो 1819 से 1856 के बीच महालवाड़ी इलाके में, जिसमें उत्तर प्रदेश, मध्य भारत के हिस्से, हरियाणा आदि आते थे, कर के बोझ में पूरे 70 फीसद की बढ़ोतरी हुई थी। इसलिए 1839 से 1859 के बीच, ज्यादातर जिलों में 50 फीसद तक मामलों में जमीनें इस हाथ से उस हाथ चली गई थीं। इसका अर्थ यह है कि किसानों के और जमींदारों के लिए, भूमि की समस्या और कराधान की समस्या बहुत ही नाजुक होती जा रही थी। याद रहे कि यही इलाका विद्रोह का हृदय साबित हुआ था। यही वह क्षेत्र था जहां से बंगाल आर्मी के सिपाही आए थे और उनके बारे में कहा जाता है कि वे बस वर्दी पहने हुए भारतीय किसान थे। ये किसान छोटी-छोटी जमीनों पर मालिकाना हक रखने वाले किसानों के परिवारों से थे, जिस पर मैं जरा आगे चलकर चर्चा करूंगा।

दूसरा घटना विकास था, उस चीज का विकास जिसे मुक्त बाजार का साम्राज्यवाद कहते हैं। 1833 के चार्टर कानून के बाद तो अंगरेजी और औद्योगिक विनिर्माता, भारत में व्यावहारिक मायने में शुल्क माफी के साथ ही आ रहे थे। इसका अर्थ यह है कि बड़े पैमाने पर भारतीय सूत कातने वालों और बुनकरों का रोजगार छिन रहा था। कार्ल मार्क्स ने इसकी ओर ध्यान खींचा था और जहां तक भारतीय बुनकरों का सवाल है, उनके लिए तो इसे मार्क्स ने मानव जाति का सफाया ही करार दिया था। भारत के कपड़े के कुल उपभोग के चौथाई हिस्से से ज्यादा की पूर्ति अब ब्रिटेन से होने वाले आयातों से हो रही थी और यह आंकड़ा उस भारत के लिए है, जो कपास के उत्पादन में सिरमौर माना जाता था। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हिंदुस्तानी शहरी आबादी और खास तौर पर कताई करने वालों और बुनकरों पर कितनी भारी मार पड़ रही होगी। इस मुकाम पर हमें यह याद रखना चाहिए और हम जरा आगे चलकर इसका जिक्र भी करेंगे कि किस तरह अंगरेज लेखकों ने बुनकरों को, 1857 के विद्रोह में शामिल हुए असैनिकों में से सबसे कट्टर विद्रोहियों के रूप में यूं ही पेश नहीं किया है।

तीसरे, मुक्त व्यापार के साम्राज्यवाद के साथ ही साथ, 1843 से 1856 के बीच नए-नए इलाकों के हड़पे जाने की नीति को भी लागू किया जा रहा था। इस नीति के तहत, हिंदुस्तान के अनेक हिस्सों को हड़प कर ब्रिटिश शासित क्षेत्र में मिला लिया गया था, ताकि मुक्त व्यापार की छतरी को और फैलाया जा सके। 1843 से 1856 के बीच ही पंजाब, अवध, सतारा, नागपुर और झांसी को हड़पा गया था। इन वर्षों के दौरान ही हिंदुस्तानी भू-भाग का करीब पांचवां हिस्सा, ब्रिटिश शासन के इलाके में जोड़ा गया था। इस तरह हड़पे जाने का हर एक कदम, बड़े पैमाने पर बेरोजगारी भी पैदा करता था क्योंकि पुराने शासनों में काम कर रहे बहुत से लोगों को, नई व्यवस्था में अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ता था। इसी प्रकार, दस्तकारों को बड़ी संख्या में रोजगार से हाथ धोना पड़ रहा था। मिसाल के तौर पर 1856 में लखनऊ की आबादी 6 लाख पचास हजार से ऊपर आंकी गई थी। यह विद्रोह से सिर्फ साल भर पहले, 1856 में अवध को हड़पे जाने के बाद की बात है। वास्तव में एक अंगरेज ने, जो विद्रोह फूटने के समय लखनऊ में ही था, पहले ही यह भविष्यवाणी जैसी कर दी थी कि लखनऊ की जनता को अंगरेजों के खिलाफ उठ खड़ा होना चाहिए और ऐसा होने की संभावना है। उसने लिखा था कि ‘हमने ऐसा शायद ही कुछ किया होगा, जिससे हमें उनका प्यार मिल सकता हो।’ उसने इसका विवरण दिया है कि किस तरह लोगों को रोजगार से हाथ धोने पड़े थे और किस तरह ब्रिटिश सरकार साधारण जनता से बहुत ज्यादा कर निचोड़ रही थी। अवध आदि इलाकों के अंगरेजी राज द्वारा हड़पे जाने की नीति ने आम लोगों की तकलीफें और बढ़ा दी थीं।

आखिरी नुक्ता यह कि मुक्त व्यापार के साम्राज्यवाद की कीमत खून से चुकानी पड़ रही थी और यह ऐसा पहलू है जिसे अकसर अनदेखा ही कर दिया जाता है। बंगाल आर्मी, जिसमें 1 लाख 35 हजार हिंदुस्तानी सैनिक थे, युध्द की तमाम आधुनिक पध्दतियों में प्रशिक्षित सेना थी और यह एशिया की सबसे बड़ी आधुनिक सेना थी। यही उस समय ब्रिटिश साम्राज्यवाद की मुख्य सेना थी। 1839 से लगातार इसी सेना ने भारत में और दुनिया भर में, ब्रिटिश साम्राज्यवाद के हमलावर युध्दों की तलवार की तरह काम किया था।

ऐसा पहला युध्द जिसमें इस सेना के हजारों लोग मारे गए थे, अफगानिस्तान का युध्द था। इसी तरह, 1843 में ग्वालियर के खिलाफ लड़े गए युध्द को अब भुला ही दिया गया है। पंजाब के और बर्मा में, दो बहुत ही खून-खराबे भरी लड़ाइयां हुई थीं और बंगाल आर्मी के हिंदुस्तानी सिपाहियों को फ्रांस और इंगलैंड के लिए लड़ने के लिए, क्रमश: केन्या और रूस भेजा गया था। इसके बाद इसी सेना के सिपाहियों को इंगलैंड के लिए अफीम युध्द में लड़ने के लिए, 1840 से 1857 तक चीन में झोंका गया था, जहां विद्रोह फूटा था। बाद में 1856 में इसी सेना को लड़ने के लिए ईरान भेजा गया था।

इन लड़ाइयों का कोई अंत ही नजर नहीं आता था। लेकिन तभी बंगाल आर्मी ने ही विद्रोह का बिगुल बजा दिया। इस तरह एक मायने में साम्राज्यवाद या उपनिवेशवाद द्वारा पैदा किए जा रहे सारे के सारे तनाव, नाटकीय तरीके से उस औजार पर संकेद्रित हो गए, जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने खुद ही गढ़ा था। यह पक्का करने के खयाल से कि इस सेना में एक ही भाषा बोलने वाले सिपाही लेने चाहिए, बंगाल आर्मी के सिपाही हिंदुस्तानी भाषा बोलने वाले इलाके से ही भर्ती किए गए थे। इसे तिलंगी सेना या कुर्गी सेना भी कहा जाता था। इसे तिलंगी सेना इसलिए कहा जाता था कि इस सेना के शुरुआती सिपाही आंध्र प्रदेश से थे। इस सेना में वे चूंकि साक्षर लोगों को ही रखना चाहते थे, अत: उन्होंने भर्ती के लिएब्राह्मणों पर ही ध्यान केंद्रित किया था। यह हमें इसकी भी याद दिलाता है कि यह एक साक्षर सेना थी। इस सेना का नवाबों, शाहजादों, जमींदारों और तालुकेदारों की पुरानी दुनिया से कुछ भी लेना-देना नहीं था। यह बात बहुत ही महत्वपूर्ण है।

इसमें शक नहीं कि उन्होंने तात्कालिक रूप से तो चिकनाई वाले कारतूसों से भड़ककर ही विद्रोह किया था और इस तरह दीन या धर्म के मुद्दे पर विद्रोह किया था। लेकिन, यह कोई धार्मिक सेना नहीं थी। सिपाही बस उतने ही धार्मिक थे, जितने बाकी तमाम लोग। वे जाति के मामले में जरूर काफी सचेत थे। 1850 के बाद यह तय किया गया था कि चूंकि इस सेना में इतने सारे ब्राह्मण थे, निचली जाति के लोगों को इस सेना में भर्ती ही नहीं किया जाए। इस तरह, वे किसी हद तक जाति-सजग जरूर थे अन्यथा वे संगठन के और सैन्य नेतृत्व के आधुनिक तरीकों से अच्छी तरह से परिचित थे और उनका सामंती वर्ग के साथ कोई लेना-देना नहीं था।

बंगाल आर्मी के संबंध में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात यह थी कि इसमें हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों को साथ-साथ रखा गया था। सैय्यद अहमद खान ने तो अपनी रचना, ‘हिंदुस्तानी बंगावत के वजूहात’ में अंगरेजों की इसके लिए आलोचना भी की थी कि उन्होंने इतनी नासमझी की थी कि हिंदुओं और मुसलमानों को बटालियानों और रेजीमेंटों के तहत साथ-साथ रखा था। वह लिखते हैं : ‘जब वे लड़ने के लिए निकले, दोनों के खून आपस में मिल गए और हिंदू, मुसलमान की मदद के भरोसे था और मुसलमान, हिंदू की मदद के आसरे।’ इस तरह वे भाई बन गए। उनकी भाईचारे की भावनाएं, सगे भाइयों से गहरी थीं। वह कहते हैं, ‘यह गलत था।’ अगर मुसलमान और हिंदू, अलग-अलग रेजीमेंटों में रहे होते, तो मुसलमानों के विद्रोह करने की स्थिति में अंगरेज, हिंदुओं के खिलाफ मुसलमानों का या मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं का उपयोग कर सकते थे।

लेकिन, यह सलाह तो विद्रोह हो जाने के बाद दी जा रही थी। सच तो यह है कि चूंकि एक का खून दूसरे के खून से मिल गया था, हिंदू और मुसलमान सिपाही यह भूल ही गए थे कि वे अलग-अलग धर्मों को मानने वाले हैं। जब चिकनाई वाले कारतूसों का मुद्दा आया या फिर दूसरे अनेक मौके आए थे जब मुसलमान सिपाहियों ने कहा था कि जब तक हमारे हिंदू भाई इन कारतूसों को स्वीकार नहीं करते, हम भी उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे। आगे चलकर सिपाहियों ने अपने अफसरों का चुनाव करना शुरू कर दिया। यह हैरानी की बात है कि प्रचंड रूप से हिंदुओं की बहुलता वाले दस्तों ने मुसलमानों को अपना अफसर चुना था और प्रचंड रूप से मुसलिम बहुल दस्तों ने हिंदुओं को। यह कोई सचेत रूप से नहीं किया जा रहा था। यही बात इस सचाई को खास तौर पर शानदार बना देती है।

मैं सिपाहियों की भूमिका पर खास तौर पर जोर देना चाहता हूं क्योंकि कुछ बात है कि हमें ‘बंगावत’ शब्द पसंद नहीं है और इस नापसंदगी को फैलाकर बंगाल आर्मी के सिपाहियों तक पहुंचा दिया गया है। वे ही इस विद्रोह की रीढ़ थे। वे इस विद्रोह के सबसेपुख्ता घटक थे। वे ही इस विद्रोह के सबसे सशस्त्र तत्व थे। बेशक, विद्रोह में दूसरे भी शामिल थे। लेकिन विद्रोह में, सशस्त्र बलों की भूमिका ही सबसे पहले आती है। इसी ने 1857 के विद्रोह को दुनिया का सबसे बड़ा उपनिवेशविरोधी विद्रोह बनाया था। दूसरा कोई भी विद्रोह बंगाल आर्मी जैसे 1 लाख 20 हजार से ज्यादा पेशेवर सैनिकों को विद्रोह के मैदान में नहीं उतार पाया था। बंगाल आर्मी के कुल 1 लाख 35 हजार सिपाहियों में से सिर्फ 8 हजार ही थे जो अब भी ब्रिटिश सेना के वफादार बने हुए थे।

मेरे खयाल में हमारे देश के लोगों की बंगाल आर्मी के सिपाहियों की जनतांत्रिक भावनाओं या उनके जनतांत्रिक परिसर के बारे में जानने में खास तौर पर दिलचस्पी होगी। उन्होंने हर एक स्थान पर काउंसिलों का गठन किया था। सिपाहियों ने इन्हें काउंसिलों का ही नाम दिया था। उन्होंने इन्हें ‘पंचायत’ का नाम नहीं दिया था। दूसरों ने जरूर इन्हें पंचायत कहा था। लेकिन, सिपाही इन्हें काउंसिल ही कहते थे। उन्होंने प्रशासन के संचालन के लिए इन काउंसिलों में अपने साथियों को चुना था। दिल्ली में वास्तव में उन्होंने एक कोर्ट ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन का गठन किया था। इसमें विभिन्न दस्तों के उनके प्रतिनिधि शामिल थे, जिन्हें दिल्ली का शासन संभालना था और व्यवहार में, रस्मी सम्राट बहादुशाह जफर को परे खिसकाकर, सरकार के सारे के सारे फैसले लेने थे। अगर विद्रोह सफल हो गया होता तो भारत की शुरुआती संसद के रूप में हमारे सामने, सेंट्रल लेजिस्लेटिव एसेंबली की जगह पर, दिल्ली का कोर्ट ऑफ एडमिनिस्टे्रशन आया होता। इसलिए, यह बंगाल आर्मी का एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटक था। उनके बीच एक आधुनिक संगठन की अवधारणा तो थी ही, इसके अलावा उन्होंने चुनाव और चयन प्रणाली को इतना भारी महत्व भी दिया था। यह कहा जाता था कि यही उनकी मुसीबत भी बन गया क्योंकि कोई भी फैसला लिए जाने से पहले, अंतहीन बहसें हुआ करती थीं।

गौर करने वाली एक और बात यह है कि ब्रिटिश राज में सिपाहियों के आचरण की आलोचनाएं किए जाने के बावजूद, अगर हम वाकई मिसाल के तौर पर विद्रोहियों के नियंत्रण के चार महीनों के दौरान दिल्ली के हालात पर नजर डालते हैं, जिस दौर के संबंध में अखबार और दस्तावेज, राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद हैं, सिपाहियों के गलत आचरण के मामले बहुत सीमित नजर आते हैं और यह उल्लेखनीय बात है। उन्हें कोई तनख्वाह नहीं मिल रही थी, जिसके चलते शुरुआत में उन्हें असैनिक आबादी से कुछ पैसे की उगाही करनी पड़ी थी। लेकिन, जब उनकी तनख्वाह का इंतजाम हो गया, उसके बाद उन्होंने असैनिक आबादी को परेशान नहीं किया, यहां तक कि महाजनों को भी नहीं। इन परिस्थितियों को देखते हुए, विद्रोहियों के नियंत्रण के इन चार महीनों के दौरान दिल्ली में जिस तरह कानून व व्यवस्था को कायम रखा गया, वाकई उल्लेखनीय है। किसी की भी ओर से इसकी कोई शिकायत नहीं आई थी कि सिपाहियों ने उसके परिवार को लूटा हो या किसी को मार दिया हो।

जरा इसकी तुलना, ब्रिटिश कब्जे के दौरान उसी दिल्ली में जो कुछ हुआ था उससे करके देखें। एक सिरे से जनता का नरसंहार हुआ था और उसे लूटा गया था। साहूकारों और व्यापारियों का सब कुछ छिन गया। अंगरेजों के लाड़ले कहे जाने वाले अफसरों ने उनके घरों को खुदवा दिया था। इस तरह विद्रोह के पूरे दौर में बागी सिपाहियों का आचरण, उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए वास्तव में उदाहरणीय था।

जहां तक धर्म का सवाल है, मैं पहले ही कह चुका हूं कि बेशक, धर्म उनका एक नारा था। यह विचार विकसित किया गया था कि हिंदू और मुसलमान, दोनों एकेश्वरवादी हैं, जबकि ईसाई ही हैं जो त्रिमूर्ति में विश्वास करते हैं। मुसलमानों और हिंदुओं के धार्मिक मूल्य एक ही हैं। वे ईश्वर में विश्वास रखते हैं। हर जगह विद्रोहियों द्वारा दोनों समुदायों को एकजुट करने के लिए यह तर्क पेश किया जा रहा था। लेकिन, इससे आगे यह धारणा थी कि वे हिंदुस्तान के प्रति वफादार थे और अंगरेज एक भिन्न राष्ट्रीयता के लोग थे, जो हिंदुस्तानियों को बेइज्जत कर रहे थे।

मैं इस विद्रोह के एक और तत्व पर आना चाहूंगा, जिसे भुला ही दिया गया है। उस समय दिल्ली से तीन अखबार निकलते थे, दो उर्दू में और एक फारसी में। देहली का उर्दू अखबार एक बड़ा अखबार था। ये अखबार उस जमाने के शिक्षित वर्ग की भाषाओं में निकलते थे। देहली उर्दू अखबार की मुख्य लाइन इस प्रकार थी : ‘अंगरेज विदेशी हैं। वे गोरे हैं और हम काले हैं। वे ईसाई हैं और वे त्रिमूर्ति में विश्वास करते हैं। हम मुसलमान और हिंदू हैं। मुसलमान, अल्लाह में विश्वास करते हैं और हिंदू, आदिपुरुष में।’

जहां तक दोनों समुदायों को एक दूसरे से जोड़ने का सवाल है, यह सब सही था। लेकिन, देश के नाम पर देशभक्तिपूर्ण पुकारें भी थीं। देहली उर्दू अखबार अपने पाठकों को हमेशा, ‘प्यारे देशवासियो’ कहकर संबोधित करता है। उसकी पूरी वफादारी हिंदुस्तान या भारत के लिए है। उसके लिए सिपाही बादशाही फौज या शाही फौज नहीं है। वे तो ‘फौज-ए-हिंदुस्तान’ हैं या ‘हिदुस्तानी फौज’। वे मजहब से भले ही हिंदू हों या मुसलमान, यह अखबार अकसर उन्हें जेहादी या धर्मयोध्दा कहता है।

विद्रोहियों के जनतंत्रवादी कमांडर, बख्त खान इस अखबार की नजरों में उसके सबसे बड़े नायक हैं। मैं कहना चाहूंगा कि बख्त खान, धर्मशास्त्रविदों को काफी हिकारत की नजर से देखता था। मिसाल के तौर पर उसने यह आदेश जारी किया था कि अगर दिल्ली में कोई गोकुशी करता है तो उसे मौत के घाट उतार दिया जाएगा। उसने इस आशय के आदेश जारी किए थे। पिछले ही दिनों गोकुशी के खिलाफ आई.सी.एच.आर. की प्रदर्शनी में इस आदेश को प्रदर्शित किया गया था। खुद को मुजाहिदीन कहने वाले जो लोग हिंदू-मुसलिम एकता में खलल डालना चाहते थे, उनके लिए उसने कह दिया था कि उन्हें जामा मसजिद से निकाल फेंका जाना चाहिए, क्योंकि वे अपनी गंदगी से मसजिद को नापाक कर रहे थे। वास्तव में इसी शख्श की देहली उर्दू अखबार प्रशंसा करता है। यह एक महान सैन्यकमांडर या सिपाही था, जो दिल्ली का कमांडर इन चीफ बनाया गया था। वह आखिर में लखनऊ चला गया और वहां लड़ाई के मैदान में 1859 में उसकी मौत हो गई। ऐसा शख्श देहली उर्दू अखबार का हीरो था।

सच यह है कि शिक्षित आबादी धर्मशास्त्रियों के अंगूठे के नीचे किसी भी तरह से नहीं थी और उसके बीच अनेक आधुनिक विचार मौजूद थे। उर्दू अखबार इसकी वकालत कर रहा था कि शिक्षित लोगाें को हथियार बनाने वाले कारीगर का काम संभाल लेना चाहिए; उन्हें राइफलें बनानी चाहिए। यहां शारीरिक श्रम के प्रति प्रशंसा का भाव सामने आता है और दूसरी ओर संचार के किसी भी आधुनिक साधन की किसी तरह की निंदा नहीं है। वास्तव में फिरोज शाह ने तो 1857 के अगस्त के अपने एलान में भाप से चलने वाले जहाजों का और रेलवे के विकास का वादा किया था। इन सिपाहियों और खास तौर पर शिक्षित लोगों ने विद्रोहों को दिशा देने का काम किया था और उसके लिए एक विचारधात्मक रूपरेखा मुहैया कराई। लेकिन, दूसरे तबकों की भी भूमिका महत्वपूर्ण थी। यह बात दस्तकारों के मामले में तो और भी सच है, जो हर जगह विद्रोहों में शामिल हुए थे। मुजाहिदीन के नाम से पहचाने जाने वाले असैनिक वालंटियरों में, जिन्होंने वास्तव में लड़ाकों के रूप में विद्रोह में हिस्सा लिया था, उनकी संख्या काफी अच्छी थी। मुजाहिदीन की संज्ञा का प्रयोग अकसर मुसलमानों के मामले में ही किया जाता था, हालांकि कई बार हिंदू असैनिक वालंटियरों के लिए भी इस संज्ञा का प्रयोग किया गया है।

जहां तक इस विद्रोह में किसानों के शामिल होने का सवाल है, इस सिलसिले में मुझे कुछ खास कहने की जरूरत नहीं है क्योंकि अब, खास तौर पर एरिक स्टोक्स की कृति के सामने आने के बाद से, इस भूमिका को पूरी तरह से पहचाना जा चुका है। उन्होंने जमींदारों को नेतृत्व में रखकर लड़ाई लड़ी थी और बहुत बार, किसान समुदाय ने स्वतंत्र रूप से कार्रवाइयां भी थीं, जिस सब पर एरिक स्टोक्स ने विस्तार से चर्चा की है।

थार्न हिल ने, जो 1858 के आखिर में मथुरा के डिस्ट्रिक्ट मजिस्टे्रट थे, लिखा था कि ब्रिटिश शासन के बने रहने के सबसे ज्यादा खिलाफ तो किसान ही थे। उनका कहना था कि अंगरेजों का काम अब यह होगा कि जमींदारों की मदद करें और किसानों को दबाएं। इस विद्रोह में किसानों की हिस्सेदारी सबसे पहले तो कर वसूली और वास्तव में कमरतोड़ कर वसूली का नतीजा थी। दूसरे, विद्रोहों में उन देहाती इलाकों के किसानों की हिस्सेदारी खास तौर पर ज्यादा थी, जहां किसान और सिपाहियों के बीच सीधे रिश्ते थे। बेशक, बाद वाले कारक की भी भूमिका रही थी, फिर भी विद्रोह में किसानों की बड़े पैमाने पर हिस्सेदारी की वजहें तो, महालवाड़ी इलाकों में कमरतोड़ कर वसूली और ऋणों के बोझ के चलते, उनके अपनी जमीनें खो बैठने या खोने के खतरे में आ जाने आदि से संबंधित थीं। इसी ने उन्हें विद्रोह की ओर धकेला था।

अब मैं पूरे सम्मान के साथ, अपनी पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया में पंडित नेहरू नेइस विद्रोह के संबंध में जो कुछ कहा था, उसकी चर्चा करना चाहता हूं। उन्होंन 1857 के विद्रोह को एक विशाल और जबरदस्त विद्रोह का नाम दिया था। वह अपनी इस बात को दोहराते भी हैं क्योंकि 1857 के उनके विवरण के आखिर में आया यह सूत्रीकरण बहुत ही भावपूर्ण है। सचाई यह है कि अंगरेजों ने भारत पर जो जुल्म ढाए थे, जिस तरह लोगों को फांसियां दी थीं और लूटा था, उसे लेकर वह काफी भावुक हो उठते हैं। वह विस्तार से इस सबका वर्णन करते हैं। फिर भी यह कहते हैं कि अंतिम विश्लेषण में यह विद्रोह था एक सामंती विद्रोह ही। बुनियादी तौर पर सामंती विद्रोह। इस विद्रोह के संबंध में उसके प्रमुख नेताओं ने जो विचार व्यक्त किए थे, उनके दिमाग में रहे होंगे।

इसमें तो कोई शक ही नहीं है कि इस विद्रोह के अनेक प्रमुख नेता या राजा-राजकुमार थे या जमींदार। मुझे उनके नाम गिनाने की जरूरत नहीं है। मिसाल के तौर पर जगदीशपुर के जमींदार, कुंवरसिंह या अमरसिंह का उदाहरण लिया जा सकता है, जिन्होंने अपनी विद्रोही सेना के साथ रीवां, कालपी, कानपुर, लखनऊ और आजमगढ़ तक मार्च किया था। कहा जाता है कि ब्रिटिश इतिवृत्तकारों के विद्रोह के वृत्तांतों में यह स्वीकार किया जाता था कि अगर विद्रोहियों के पास इनके जैसे दर्जन भर नेता भी होते, तो दोबारा ब्रिटिश राज कायम हो ही नहीं सकता था। खुद एंगेल्स ने 1857 में अमरसिंह की कार्यनीति की प्रशंसा की थी। वे बेशक जमींदार थे। इसी तरह रानी लक्ष्मीबाई, झांसी की रानी थीं। उधर हजरतमहल थीं, जिन्होंने इतनी मजबूती से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। बेशक, ये सभी 1857 के महान नायक थे।

ऐसे तालुकेदारों की संख्या काफी बड़ी है, जिन्होंने विद्रोह के लिए अपनी जानें कुर्बान की थीं और जिन्हें अपने देश के लिए लड़ने के लिए अंगरेजों ने फांसी पर चढ़ाया था। बरेली के खान बहादुर खान का जिक्र किया जा सकता है, जो एक जमींदार थे और आखिरकार उन्हें फांसी दी गई थी। अपनी बढ़ी उम्र के बावजूद, वह अंगरेजों के बहुत मुखर विरोधी थे। इसी तरह, इन विद्रोहों में मुगलों की बहुत ही शानदार भूमिका को लिया जा सकता है। और बहादुरशाह जफर, जिसने अपनी शुरुआती हिचकिचाहट की बाद में क्षतिपूर्ति कर दी थी और अंतत: अपनी शायरी को और खुद को समर्पित कर दिया था, जिसमें उसने इस विद्रोह के शहीदों को श्रध्दांजलि अर्पित की थी। विद्रोह के बारे में पंडितजी के चरित्रांकन को लेकर कोई विवाद नहीं है, यह कहना सही नहीं होगा। वास्तव में इस विद्रोह के चरित्रांकन पर भिन्न-भिन्न रायें रही हैं। मिसाल के तौर पर एक तर्क यह भी दिया जाता रहा है कि 1857 का विद्रोह, सारत: एक किसान विद्रोह था, जिसके निशाने पर जमींदार थे और विदेशी शासन। लेकिन, वास्तव में ऐसा कहना पूरी तरह से गलत होगा। पी.सी. जोशी ने पचास साल पहले इस गलती को रेखांकित किया था और मैं इस पर आगे बहस नहीं करना चाहूंगा।

असली नुक्ता यह है कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब तालुकेदार, जमींदारऔर राजा-रजवाड़े, सिपाहियों, किसानों और दस्तकारों के साथ होकर, उस समय की दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी सत्ता के खिलाफ उठ खड़े हुए, खुद उनकी अपनी धारणाएं भी बदल गईं। प्रतिरोधी संघर्ष ने उनके नजरिए को बदल कर रख दिया था।

इस सिलसिले में मैं अवध के विद्रोहियों के दो दस्तावेजों की ओर ध्यान खींचना चाहूंगा। इनमें से पहला दस्तावेज भाषा के पहलू से बहुत ही महत्वपूर्ण है। वास्तव में विद्रोहियों के सारे के सारे दस्तावेज, चाहे वे अखबार हों या फिर उनकी घोषणाएं हों, महत्वपूर्ण हैं। फिर भी यह एलान मेरा प्रिय दस्तावेज है, जो कि हमारे संविधान के उस प्रावधान को चुनौती देता है, जो यह कहता है कि हिंदी, संस्कृत की शब्दावली पर आधारित होनी चाहिए। ये एलान संस्कृत की शब्दावली में न होकर, पूरी तरह से बोलचाल की हिंदुस्तानी में हैं। उनमें उर्दू के शब्दों का तो बोलबाला है, लेकिन फारसी के शब्दों का नहीं। मिसाल के तौर पर मेरे पास एक घोषणा का द्विभाषिक पाठ है, जिसमें दाएं हाथ में उर्दू में घोषणा है और बाएं पर हिंदी में। दोनों पाठ पूरी तरह से एक जैसे नहीं हैं। उर्दू या हिंदुस्तानी के पाठ में उर्दू के शब्दों की बहुतायत है, न कि फारसी के शब्दों की। इसी तरह, हिंदी के पाठ में हिंदुस्तानी के शब्द प्रमुखता से हैं, कुछेक शब्द फारसी के भी मिल जाएंगे, लेकिन संस्कृत के शब्द व्यावहारिक मायने में गैर-हाजिर ही हैं। यही है जनता की भाषा। यह एलान छपे हुए रूप में है। इस तरह विद्रोह का एलान करने में विद्रोही, छपाई का सहारा ले रहे थे। यह पुराने सामंती रुख से काफी भिन्न मामला है। यह कोई हुक्मनामा नहीं है। यह कोई आज्ञाप्ति नहीं है।

इस सार्वजनिक अपील के लिए ‘इश्तिहारनामा’ शब्द का प्रयोग किया गया है। आखिर, यह अपील किसको संबोधित थी? यह अपील जमींदारों के लिए और आम बाशिंदों के लिए थी। इस पाठ में पुराने मूल्य भी नजर आते हैं। इसकी शिकायत की जा रही है कि जमींदारों की जमीनें अंगरेज छीन रहे हैं, जैसा इससे पहले के निजाम में नहीं होता था। ये जमींदार अपनी जमीनों की इज्जत करते थे। अंगरेज तो इन जमींदारों के साथ भी, मजूरों-हम्मालों जैसा बर्ताव कर रहे थे। अंगरेजों के लिए तो वे मोचियों की तरह हैं। इसलिए, भारतीय निजाम फिर से श्रेणी विभाजन को बहाल करेगा। लेकिन, जल्द ही विद्रोहियों की घोषणाओं से यह तत्व काफूर होना शुरू हो गया। अंत में उन्हीं विद्रोहियों ने, हजरत महल के उसी कोर्ट की तरफ से जब 1857 के अक्टूबर में मलका विक्टोरिया की घोषणा का जवाब दिया, तो ये सभी मामले भुलाए जा चुके थे। अब साधे-सीधे हिंदुस्तानियों से अपील की जा रही थी।

अगर मुझे ठीक-ठीक याद है तो अवध के विद्रोहियों की 1857 की जुलाई की घोषणा में हमें ‘हिंदुस्तान’ शब्द दिखाई नहीं देता है। लेकिन, मलका विक्टोरिया की घोषणा के जवाब में हमें ‘हिंदुस्तान’ शब्द मिल जाता है। ठीक-ठीक जिस जुमले का इस्तेमाल किया गया है वह है’हिंदुस्तानी फौज और अवाम’। उन्हें संबोधित कर कहा जा रहा है किमलका विक्टोरिया पर विश्वास न करें। मलका विक्टोरिया का एलान धोखे और फरेब से भरा हुआ है। अगर वे वाकई न्याय करना चाहती हैं तो मैसूर क्यों नहीं लौटा देतीं जो उन्होंने टीपू सुलतान से छीना था? वे पंजाब क्यों नहीं लौटा देतीं जो उन्होंने दिलीपसिंह से छीना था? और वे बंगाल क्यों नहीं लौटा देतीं जो उन्होंने धोखे से छीना था? और अवध भी क्यों नहीं लौटा देतीं अगर मलका विक्टोरिया की दिलचस्पी न्याय करने में है तो उन्होंने यहां भी जो संपदा हथियाई है, उसे लौटा क्यों नहीं देतीं?

इस जबाव में जो दूसरी दलील दी जा रही थी वह यही थी कि अंगरेज तुम्हें कभी माफ नहीं करेंगे। तुम्हें तब तक लड़ते रहना होगा, जब तक कि अंगरेजों को निकाल बाहर नहीं किया जाता है। लड़ाई से पीछे नहीं हटना चाहिए। यह कमाल की बात है कि उस समय जबकि विद्रोह का सब कुछ खतम हो चुका था, उन्होंने यह जवाब छपवाया था और उसमें पूरे भारत की तसवीर को सामने रखते हुए, यह सब कहा था। इस तरह हम, सामंती वर्ग के नजरिए में एक बदलाव आता देखते हैं।

यहां मैं जो नुक्ते लेना चाहूंगा, वे सब आपस में जुड़े हुए हैं। पहला है, झांसी की रानी के रुख में आया बदलाव। इससे हमें पता चलता है कि किस तरह पारिवारिक शिकायतें, आज की भाषा में कहें तो राष्ट्रीय लक्ष्यों में या बृहत्तर लक्ष्यों में बदल जाती हैं। अगर झांसी को ब्रिटिश राज में नहीं मिलाया गया होता और उनके दत्तक पुत्र के दावे को खारिज न कर दिया गया होता, तो झांसी की रानी का ब्रिटिश हुकूमत से कोई विरोध नहीं होता। इसीलिए वह विद्रोहियों के साथ आने में हिचकिचा रही थीं। लेकिन, एक बार जब वह विद्रोह के साथ जुड़ गईं, वह ऐसी गतिविधियों तक पहुंच गईं जिनकी पहले कभी उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी, जैसे पठान रक्षक और मुसलिम तोपची रखना, सिपाहियों का नेतृत्व करना, बंदूक बनाने के लिए फाउंड्री स्थापित करना आदि। जब वह तूफानी लड़ाई के बाद झांसी से दूर निकल रही थीं, दकन के एक पंडित से उनकी भेंट हो गई।

उस ब्राह्मण विष्णु भट्ट ने यह दर्ज किया है कि वह पठानी पोशाक में थीं और पठान रक्षक ही उनके साथ थे। वह कुएं से पानी पीना चाहती थीं। जैसे ही रानी को उसके दकन का ब्राह्मण होने का पता चला, उन्होंने ब्राह्मण से बातचीत शुरू कर दी। विष्णु भट्ट जब विद्रोह के बीच फंसा, वह बनारस से आ रहा था। उसने जो लिखा है, एक तटस्थ प्रेक्षक का बयान है। झांसी की रानी ने उससे कहा था : ‘मैं तो एक गरीब विधवा हूं। मुझे विधवा धर्म अपनाना चाहिए था, जैसा कि रिवाज है। लेकिन नियति को यही मंजूर था कि मैं आज हिंदू धर्म के सम्मान के लिए लड़ रही हूं।’

बेशक, वह जिस हिंदू धर्म के लिए लड़ने की बात कर रही थीं, उस परंपरा-निर्धारित धर्म के लिए लड़ना नहीं हो सकता है, जिसका तकाजा यही था कि वह बाकी हर चीज से कटी हुई एक विधवा का जीवन व्यतीत करतीं। वह तो उस हिंदू धर्म की बात कर रही थीं, जिसका यह निर्देश था कि विदेशियों के राज को उखाड़ फेंको। सिपाहियों की ही तरह, झांसी की रानी की भी धर्म ने निर्देश के मामले में यही धारणा थी। रजतकांत राय ने अपने ‘अनुभूत’ समुदाय के विश्लेषण में धर्म और देशभक्ति के इस खास अंतर्संबंध का बहुत सुंदर तरीके से विश्लेषण किया है और यह दिखाया है कि किस तरह यहां आकर धर्म की अवधारणा, किसी खास धर्म के प्रति वफादारी मात्र के विचार से आगे बढ़कर, खास तौर पर देशभक्तिपूर्ण, असांप्रदायिक रूप ले लेता है।

यही बात वहाबियों के संबंध में भी लागू होती है। मेरे मित्र इक्तिदार आलम खान ने वहाबियों के इस मामले पर गहराई से चर्चा की है और मैं इस संबंध में ज्यादा कुछ नहीं जोड़ पाऊंगा। फिर भी मैं यह जरूर कहूंगा कि आगे चलकर इस विद्रोह में वहाबियों की भूमिका के संबंध में जो भी दावे किए गए, बहुत ही अतिरंजित थे। वास्तव में उनकी भूमिका किसी भी तरह से उल्लेखनीय नहीं थी। इससे भिन्न, ऐसे मुसलिम वालंटियरों की भूमिका जरूर उल्लेखनीय थी, जो इस विद्रोह में शामिल हुए हिंदू असैनिकों की ही तरह यह मानते थे कि उनके धर्म का यही निर्देश है कि उन्हें विदेशियों के शासन के खिलाफ लड़ना चाहिए। लेकिन, ऐसे लोगों में ज्यादातर ने न तो अब्दुल बहाव का नाम सुना था और न सैयद अहमद बरेलवी का। दूसरी ओर उन्होंने बख्त खान का नाम जरूर सुना था और उन्हें देखा था। यह दूसरी बात है कि विलियम डेलरिंपल ने बड़ी आसानी से बख्त खान को वहाबियों के खाने में डाल दिया है, जबकि वास्तव में वह हर प्रकार के बहावी विचार के सख्त खिलाफ थे।

मैं अंत में यह कहना चाहूंगा कि पहले अकसर यह सुनने को मिलता था कि अंगरेजों ने जो कुछ किया था, उसकी पर्दापोशी नहीं की जानी चाहिए। हो सकता है कि कूटनीतिक पहलू से हम इस पहलू की चर्चा नहीं करना चाहें। लेकिन, विद्रोह फूटने के बाद जो कुछ हुआ था, उसे इतिहास के पन्नों से मिटाया तो नहीं जा सकता है। कानुपर के बीवीघर नरसंहार से काफी पहले ही, नील ने यह लिखा था कि, ‘कहा जाता है कि एक अंगरेज का गला विक्षोभ से लगभग रुंध ही जाता है कि श्रीमती चैंबर या सुश्री जेनिंग्स की हत्या कर दी गई। लेकिन देसी इतिहासों में या देसी लोगों के इतिहास में ऐसी लोकख्यातियों और लोक-कथाओं की कमी नहीं है,जिनमें हमारे लोगों के खिलाफ यह दर्ज होगा कि अपेक्षाकृत कम परिचित नाम वाली माताओं, बीवियों और बच्चों को, ब्रिटिश प्रतिशोध की विभीषिका का दयनीय शिकार बनना पड़ा था और इन कथाओं का भी दूसरी सभी कथाओं की तरह ही गहरा भावनात्मक असर होगा।’

डेलरिंपल ने दिल्ली के नरसंहार का विशद वर्णन किया है। यह दूसरी बात है कि यह विवरण पहले से मौजूद संस्मरणों की विशाल संख्या और ब्रिटिश रिपोर्टों के माध्यम से, पहले से आम जानकारी में रहा है। पूरे के पूरे शहर को उजाड़ा गया और वहां नरहसंहार किया गया। हां, एक बात जरूर है कि आधिकारिक रूप से औरतों की हत्याएं नहीं की गई थीं। लेकिन, अगर सभी मर्दों को मार दिया जाए तो औरतें कहां से खाएंगी, कहां जाएंगी? सैयद अहमद खान ने जो उस समय एक ब्रिटिश एजेंट थे, बिना किसी सहानुभूति के जिस तरह से विवरण दिया था, वह इस प्रकार है :

‘नगीना के शहरियों ने सोचा था कि लूट होगी और उनमें से कुछ ने अपने परिवारों को वहां से हटाया भी था, लेकिन उन सबको तो कत्ल ही कर दिया गया। यह कत्लेआम दिन भर चला। वहां सिर्फ एक शख्स को बख्श दिया गया था क्योंकि उसने अंगरेजों के खिलाफ फतवे पर दस्तखत करने से इनकार किया था। वर्ना सभी निर्दोष लोगों को कत्ल कर दिया गया।’ सैयद अहमद ने यह वर्णन हमदर्दी का एक शब्द तक खर्च किए बिना किया है। जब उनका इस तरह का रुख था, तो अंगरेजों का रुख कैसा होगा इसका हम अंदाजा लगा सकते हैं।

विष्णु भट्ट ने कोष्टिपुर की लूट का वर्णन किया है। हम जानते हैं कि दिल्ली में सिर्फ मुसलमानों का कत्लेआम हुआ था। लेकिन, भट्ट के अनुसार कोष्टिपुर में और झांसी में, रानी के ब्राह्मण होने की वजह से, सभी ब्राह्मणों को कत्ल कर दिया गया। वह यह भी बताता है कि कोष्टिपुर में तो औरत, मर्द, बच्चे, सभी का नरसंहार किया गया था।

साफ है कि प्रतिशोध भी इतिहास का हिस्सा है। जिस तरह यह बदला लिया गया, वह भी इतिहास का हिस्सा है। इसे मिटाया नहीं जा सकता है। इसे मिटाया नहीं जाना चाहिए। अगर विद्रोहियों ने सैकड़ों में अंगरेजों की जानें ली थीं, तो अंगरेजों ने दसियों हजार में उनकी हत्याएं की थीं। एक-एक अंगरेज की हत्या की सजा, दोषियों और निर्दोषों को समान रूप से दी जाती थी। दूसरी ओर, किसी भी भारतीय की हत्या के लिए किसी यूरोपीय को कोई सजा नहीं दी गई। तब हम बदले की इन कार्रवाइयों को बराबर कैसे मान सकते हैं? इसलिए, जब हम भारत में ब्रिटिश शासन की अच्छाइयों की बात करते हैं, जैसे इंडियन सिविल सर्विस की स्थापना आदि, तो हमें इस विद्रोह में अपने प्राणों की आहुति देने वाले विद्रोहियों को तो याद करना ही चाहिए, उन साधारण नागरिकों को, आम औरतों, मर्दों और बच्चों को भी याद कर लेना चाहिए, जिन्हें 1857-58 के दौरान मौत के घाट उतारा गया था और यातनाएं देने के भांति-भांति के तरीके आजमाते हुए मौत के घाट उतारा गया था।

जहां तक अन्य विद्रोहों की और खासकर दक्षिण भारत की भूमिका का सवाल है, एक दिलचस्प प्रसंग का जिक्र करना चाहूंगा। अब से कुछ अर्सा पहले टेलीविजन पर हैदर अली और टीपू सुलतान पर एक कार्यक्रम सीरियल के रूप में दिखाया जा रहा था। लेकिन, अदालत का आदेश आ गया कि उसमें यह एलान जोड़ा जाना चाहिए कि यह इतिहास नहीं है बल्कि मिथक है या ऐसा ही कुछ और। मैंने भारतीय टेलीविजन पर किसी अन्य सीरियल में इस तरह की घोषणा जोड़े जाने का आग्रह नहीं देखा है। बहरहाल, अदालत ने यह सुनिश्चित कर दिया कि हैदरअली और टीपू सुलतान को मिथकीय चरित्रों की तरह ही लिया जाए। यह बात सही है कि बहुत बार इससे पहले के विद्रोह हमारे ध्यान से निकल जाते हैं और ऐसा लगने लगता है जैसे सब कुछ 1857 के विद्रोह से ही शुरू हुआ हो।बहरहाल, जहां तक इससे पहले के किसी तुलनीय विद्रोह का सवाल है, यह समझना जरूरी है कि देश के पूरी तरह से एकीकृत होने से पहले, अलग-अलग कड़ियों को आपस में जोड़ना मुश्किल होता होगा। विद्रोह करना वैसे भी एक नाटकीय निर्णय होता है और हम तो यही देखकर अजरज में पड़ जाते हैं कि 1857 में उत्तरी भारत में यह फैसला कैसे लिया गया होगा, जबकि लोग यह अच्छी तरह समझते थे कि यह जान की बाजी लगाने का मामला है.

फिर भी पंजाब के दो युध्दों से एक हद तक इसकी तुलना की जा सकती है। भारतीय प्रतिरोध के किसी भी इतिहास में पंजाब के दोनों युध्दों को हमेशा याद रखा जाना चाहिए। ब्रिटिश राज के विस्तार का, पंजाब के दो युध्दों जैसा जबरदस्त प्रतिरोध पहले नहीं हुआ था। अंगरेजों को इतनी कठिन लड़ाइयां पहले नहीं लड़नी पड़ी थीं। इन लड़ाइयों में बंगाल आर्मी के ही हजारों सिपाही मारे गए थे। बहरहाल, 1857 में पंजाब में हुए अधिकांश विद्रोह, वहां तैनात बंगाल आर्मी के सिपाहियों के ही विद्रोह थे। ऐतिहासिक घटनाओं में ऐसी भिन्नताओं का सामने आना स्वाभाविक है। एक मायने में हम यह कह सकते हैं कि 1857 के विद्रोह को और फैलने का मौका ही नहीं मिला था क्योंकि साल के भीतर-भीतर, वास्तव में तो छह महीने में ही, उसे कुचला जा चुका था. कौन जानता है कि अगर यह सफल हो जाता तो क्या होता!

  • इरफान हबीब, प्रसिद्ध इतिहासकार हैं, यह लेख सांसदों के लिए भाषण माला के क्रम में 9 मई 2007 को आयोजित व्याख्यान पर आधारित है.

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