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आज अन्तराष्ट्रीय सर्वहारा के दूसरे महान शिक्षक एंगेल्स का स्मृति दिवस है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 5, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
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आज अन्तराष्ट्रीय सर्वहारा के दूसरे महान शिक्षक एंगेल्स का स्मृति दिवस है
आज अन्तराष्ट्रीय सर्वहारा के दूसरे महान शिक्षक एंगेल्स का स्मृति दिवस है

फ्रेडरिक एंगेल्स (28 नवंबर, 1820 – 5 अगस्त, 1895) एक जर्मन समाजशास्त्री एवं दार्शनिक थे. एंगेल्स और उनके साथी कार्ल मार्क्स को मार्क्सवाद के सिद्धांत के प्रतिपादन का श्रेय प्राप्त है. एंगेल्स ने 1845 में इंग्लैंड के मजदूर वर्ग की स्थिति पर ‘द कंडीशन ऑफ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड’ नामक पुस्तक लिखी. उन्होंने मार्क्स के साथ मिलकर 1848 में ‘कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र’ की रचना की और बाद में अभूतपूर्व पुस्तक ‘पूंजी’ (दास कैपिटल) को लिखने के लिये मार्क्स की आर्थिक तौर पर मदद की. मार्क्स की मौत हो जाने के बाद एंगेल्स ने पूंजी के दूसरे और तीसरे खंड का संपादन भी किया. एंगेल्स ने अतिरिक्त पूंजी के नियम पर मार्क्स के लेखों को जमा करने की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई और अंत में इसे पूंजी के चौथे खंड के तौर पर प्रकाशित किया गया.

एंगेल्स का प्रारंभिक जीवन

एंगेल्स का जन्म 28 नवम्बर 1820 को प्रशिया के बार्मेन (अब जर्मनी का वुप्‍पेट्रल) नामक इलाके में हुआ था. उस समय बार्मेन एक तेजी से विकसित होता औद्योगिक नगर था. एंगेल्स के पिता फ्रेडरिक सीनियर एक धनी कपास व्यापारी थे. एंगेल्स के पिता की प्रोटेस्टेंट ईसाई धर्म में गहरी आस्था थी और एंगेल्स का लालन पालन भी बेहद धार्मिक माहौल में हुआ. एंगेल्स के नास्तिक और क्रांतिकारी विचारों की वजह से उनके और परिवार के बीच अनबन बढती ही जा रही थी. एंगेल्स की मां द्वारा एलिजाबेथ द्वारा उन्हें 1848 में लिखे एक खत से इस बात की पुष्टि हो जाती है.

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एलिजाबेथ ने उन्हें लिखा था कि वह अपनी गतिविधियों में बहुत आगे चले गये हैं और उन्हें इतना आगे नहीं बढकर परिवार के पास वापस आ जाना चाहिये. उन्‍होंने खत में लिखा था – ‘तुम हमसे इतनी दूर चले गये हो बेटे कि तुम्हें अजन‍बियों के दु:ख तकलीफ की अधिक चिंता है और मां के आसुंओं की जरा भी फिक्र नहीं. ईश्‍वर ही जानता है कि मुझ पर क्या बीत रही है. जब मैने आज अखबार में तुम्हारा गिरफ्तारी वारंट देखा तो मेरे हाथ कांपने लगे.’ एंगेल्स को यह खत उस समय लिखा गया था जब वह बेल्जियम के ब्रसेल्स में भूमिगत थे.

इससे पहले जब एंगेल्स महज 18 वर्ष के थे तो उन्हें परिवार की इच्छानुसार हाईस्कूल की पढाई बीच में ही छोड़ देनी पडी थी. इसके बाद उनके परिवार ने उनके लिये ब्रेमेन के एक कार्यालय में अवैतनिक क्लर्क की नौकरी का बंदोबस्त कर दिया. एंगेल्स के परिजनों का सोचना था कि इसके जरिये एंगेल्स व्यवहारिक बनेंगे और अपने पिता की तरह व्यापार में खूब नाम कमायेंगे. हालांकि एंगेल्स की क्रांतिकारी गतिविधियों की वजह से उनके परिवार को गहरी निराशा हुई थी.

ब्रेमेन प्रवास के दौरान एंगेल्स ने जर्मन दार्शनिक हीगेल के दर्शन का अध्ययन किया. हीगेल उन दिनों के बहुत से युवा क्रांतिकारियों के प्रेरणा स्रोत थे. एंगेल्स ने इस दौरान ही साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रियता दिखानी शुरु कर दी थी. उन्होंने 1838 के सितंबर में ‘द बेडूइन’ नामक अपनी पहली कविता लिखी.

एंगेल्स 1841 में प्रशिया की सेना में शामिल हो गये और इस तरह से बर्लिन जा पहुंचे. बर्लिन में उन्हें विश्वविद्यालयों में अध्ययन करने का मौका मिला और इस दौरान ही वह हीगेलवादी युवाओं के एक दल में शामिल हो गये. उन्होंने अपनी पहचान गुप्त रखते हुये कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की वास्तविक स्थितियों पर ‘राइनीश जेतुंग’ नामक समाचारपत्र में भी कई लेख लिखे. उस समय इस अखबार के संपादक कार्ल मार्क्स थे. मार्क्स और एंगेल्स का इससे पहले कोई परिचय नहीं था और नवंबर 1842 में हुई एक छोटी-सी मुलाकात के बाद ही दोनों को एक दूसरे को जानने का मौका मिला. एंगेल्स जीवनभर जर्मन दर्शन के कृतज्ञ रहे क्योंकि उनका मानना थी इसी परिवेश की वजह से ही उनका बौद्धिक विकास संभव हो सका.

एंगेल्स के परिजनों ने उन्हें 1842 में 22 वर्ष की उम्र में इंग्लैंड के मैंचेस्टर भेज दिया. यहां उन्हें एर्मन और एंगेल्स की विक्टोरिया मिल में काम करने के लिये भेजा गया था, जो कपडे सीने के धागे बनाती थी. एंगेल्स के पिता का ख्याल था कि मैंचेस्टर में काम के दौरान वह अपने जीवन पर पुर्नविचार करेंगे हालांकि इंग्लैंड जाते वक्त एंगेल्स राइनीश जेतुंग के दफ्तर होते गये थे, जहां उनकी मार्क्स से पहली बार मुलाकात हुई थी. इस मुलाकात के दौरान मार्क्स ने एंगेल्स को अधिक गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि मार्क्स का मानना थी कि एंगेल्स अभी भी हीगेलवादियों से प्रभावित हैं, जबकि मार्क्स उस समय तक हीगेलवादियों से अलग हो चुके थे.

एंगेल्स का राजनीतिक जीवन

मैंचेस्टर प्रवास के दौरान एंगेल्स की मुलाकात क्रांतिकारी विचारों वाली एक श्रमिक महिला मैरी बर्न्स से हुई और उनका साथ 1862 में बर्न्स का निधन हो जाने तक बना रहा. इन दोनों ने कभी भी विवाह के पारंपरिक बंधन में अपने रिश्ते को नहीं बांधा क्योंकि दोनो ही विवाह कहलाने वाली सामाजिक संस्था के खिलाफ थे. एंगेल्स एक ही जीवनसाथी के साथ जिंदगी बिताने के प्रबल पक्षधर थे लेकिन उनका मानना था कि विवाह चूंकि राज्य और चर्च द्वारा थोपी गयी एक व्यवस्था है इसलिये वह वर्गीय शोषण की ही एक किस्म है.

बर्न्स ने एंगेल्स को मैंचेस्टर और सैल्फोर्ड के बेहद बदहाल इलाकों का दौरा भी कराया. मैंचेस्टर प्रवास के दौरान एंगेल्स ने अपनी पहली आर्थिक रचना ‘आउटलाइन ऑफ अ क्रिटीक ऑफ पॉलिटिकल इकोनोमी’ लिखी. एंगेल्स ने इस लेख को अक्टूबर से नवंबर 1843 के बीच लिखा था, जिसे बाद में उन्होंने पेरिस में रह रहे मार्क्स को भेज दिया. मार्क्स ने इन्हें डाउचे फ्रांसोइस्चे जारबखेर में प्रकाशित किया. एंगेल्स ने ‘कंडीशन ऑफ इंग्लैंड’ नामक तीन हिस्सों वाली एक श्रृंखला भी जनवरी से मार्च 1844 के बीच लिखी.

मैंचेस्टर की झुग्गी बस्तियों की खराब हालात को एंगेल्स ने अपने लेखों की विषय वस्तु बनाया. उन्होंने बेहद खराब माहौल में बाल मजूरी करते बच्चों पर लेख लिखे और मार्क्स को लेखों की एक नई श्रृंखला भेज दी. इन लेखों को पहले राइनीश जेतुंग और फिर डाउचे फ्रांसोइस्चे जारबखेर में प्रकाशिक किया गया. इन लेखों को बाद में एक पुस्तक का आकार दे दिया गया जो 1845 में ‘द कंडीशन ऑफ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड’ नाम से प्रकाशित हुई. इस पुस्तक का अंगेजी संस्करण 1887 में प्रकाशिक हुआ. एंगेल्स ने इस पुस्तक में पूंजीवाद के जर्जर भविष्य और औद्योगिक क्रांति पर तो अपने विचार प्रकट किये ही, इसके अलावा इंग्लैंड की मेहनतकश जनता की वास्तविक स्थिति का हाल ए बयान पेश किया.

ब्रिटेन में कुछ वर्ष बिताने के बाद एंगेल्स ने 1844 में जर्मनी लौटने का निश्चय किया.वापसी के सफर में वह मार्क्स से मिलने के लिये पेरिस गये. प्रशिया सरकार द्वारा राइनिश जेतुंग को मार्च 1843 में प्रतिबंधित किये जाने के बाद मार्क्स पेरिस पलायन कर गये थे और अक्टूबर 1843 से वहां रह रहे थे. पेरिस में रहते हुये मार्क्स डाउचे फ्रांसिसोइचे जारबाखेर प्रकाशित कर रहे थे.

मार्क्स और एंगेल्स के बीच 28 अगस्त 1844 को प्‍लेस डू पेलाइस पर स्थित कैफे डे ला रेजेंस में मुलाकात हुई और दोनों गहरे दोस्त बन गये. मार्क्स और एंगेल्स की यह दोस्ती ता-उम्र कायम रही. एंगेल्स ने पेरिस प्रवास के दौरान पवित्र परिवार होली फैमिली लिखने में मार्क्स की मदद की. इस पुस्तक का प्रकाशन फरवरी 1845 में किया गया और यह युवा हीगेलवादियों और बौअर बंधुओं पर प्रहार करती थी. एंगेल्स 06 सितंबर 1844 को जर्मनी के बार्मेन स्थित अपने घर लौट गये. इस दौरान उन्होंने अपनी पुस्तक ‘द कंडीशन ऑफ द इंगलिश वर्किंग क्लास’ के अंग्रेजी संस्करण पर काम किया जो कि मई 1845 में प्रकाशित हुआ.

फ्रांस सरकार ने 03 फ़रवरी 1845 को मार्क्स को देश निकाला दे दिया था, जिसके बाद वह अपनी पत्नी और पुत्री सहित बेल्जियम के ब्रसेल्स में जाकर बस गये. एंगेल्स जर्मन आईडोलाजी नामक पुस्तक को लिखने में मार्क्स की मदद करने के इरादे से अप्रैल 1845 में ब्रसेल्स चले गये. इससे पहले पुस्तक प्रकाशन के लिये धन इकट्ठा करने के लिये एंगेल्स ने राइनलैंड के वामपंथियों से संपर्क कायम किया था. मार्क्स और एंगेल्स 1845 से 1848 तक ब्रसेल्स में रहे. इस दौरान उन्होंने यहां के मजदूरों को सं‍गठित करने का काम किया.

ब्रसेल्स आने के कुछ समय बाद ही दोनों भूमिगत संगठन जर्मन कम्युनिस्ट लीग के सदस्य बन गये थे. कम्युनिस्ट लीग क्रांतिकारियों का एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन थी, जिसकी शाखाएं कई यूरोपीय शहरों में फैली थी. मार्क्स और एंगेल्स के कई दोस्त भी इस संगठन में शामिल हो गये. कम्युनिस्ट लीग ने मार्क्स और एंगेल्स को कम्युनिस्ट पार्टी के आदर्शों पर एक पैम्‍फलेट लिखने का काम सौंपा, जिसे आगे जाकर कम्युनिस्ट घोषणापत्र (मैनीफेस्टो ऑफ द कम्युनिस्ट पार्टी) के नाम से जाना गया. इसका प्रकाशन 21 फ़रवरी 1848 को किया गया और इसकी जो चंद पंक्तियां इतिहास में हमेशा के लिये अमर हो गयीं वे थी, एक कम्युनिस्ट क्रांति सत्तारूढ वर्गों की बुनियाद को हिलाकर रख देगी. सर्वहारा वर्ग के पास जंजीरों को खोने के अलावा कुछ भी नहीं है. उनके सामने जीतने के लिये पूरी दुनिया पडी है. दुनिया भर के मेहनकतकशों एक हो.

फ्रांस में 1848 में क्रांति हो गयी, जिसने जल्द ही दूसरे पश्चिम यूरोपीय मुल्कों को अपनी चपेट में ले लिया, इसकी वजह से एंगेल्स और मार्क्स को अपने देश प्रशिया लौटने पर मजबूर होना पडा. वे दोनों कालोन नामक एक शहर में बस गये. कालोन में रहते हुये दोनों मित्रों ने मिलकर न्‍यूए राइनीश जेतुंग नामक अखबार शुरु किया. प्रशिया में जून 1849 में हुये तख्तापलट के बाद इस अखबार को शासन के दमन का सामना करना पडा. इस तख्तापलट के बाद मार्क्स से उनकी प्रशिया की नागरिकता छीन ली गयी और उन्हें देशनिकाला दे दिया गया.

इसके बाद मार्क्स पेरिस गये और वहां से लंदन. एंगेल्स प्रशिया में ही टिके रहे और उन्होंने कम्युनिस्ट सैन्य अधिकारी आगस्ट विलीच की टुकडियों में एक एड डे कैंप की भूमिका अदा की. इन टुकडियों ने दक्षिण जर्मनी में हथियारबंद संघर्ष को अंजाम दिया था. जब इस आंदोलन को कुचल दिया गया तो एंगेल्स बचे खुचे क्रांतिकारियों के साथ सीमा पार करके स्विटजरलैंड चले गये. एंगेल्स ने एक रिफ्यूजी के रूप में स्विटजरलैंड में प्रवेश किया और सुरक्षित इंग्लैंड पलायन कर गये. इस बीच मार्क्स को लगातार एंगेल्स की फिक्र सताती रही थी.

एंगेल्स ने इंग्लैंड आने के बाद मार्क्स की दास कैपिटल लिखने में आर्थिक मदद करने के इरादे से अपने पिता के स्वामित्व वाली उसी पुरानी कंपनी में काम करने का निश्चय किया. एंगेल्स को यह काम पसंद नहीं था पर एक महान उद्धेश्य को सफल बनाने के इरादे से वह इस कारखाने में काम करते रहे. ब्रिटिश खुफिया पुलिस एंगेल्स पर लगातार नजर रखे हुये थी और वह मैरी बर्न्स के साथ यहां अलग अलग नामों के साथ छिपकर रह रहे थे.

एंगेल्स ने मिल में काम करने के दौरान ही समय निकालकर ‘द पीसेंट वार इन जर्मनी’ नामक पुस्तक लिखी. इस दौरान वह समाचारपत्रों में भी निरंतर आलेख लिखते रहे थे. एंगेल्स ने इस दौरान आफिस क्लर्क के रूप में काम करना भी शुरु कर दिया था और 1864 में इस मिल में भागीदार भी बन बैठे. हालांकि पांच वर्षों के बाद अध्ययन में अधिक समय देने के इरादे से उन्होंने इस कारोबार को अ‍लविदा कह दिया.

मार्क्स और एंगेल्स के बीच इस दौरान हुये पत्राचार में दोनों मित्रों ने रूस में संभावित रूप से होने वाली बुर्जुवा क्रांति पर भी विस्तार से चर्चा की. एंगेल्स 1870 में इंग्लैंड आ गये और अपने अंतिम दिनों तक यहीं रहे. वह प्रिमरोस हिल पर स्थित 122 रीजेंट पार्क रोड पर रहा करते थे. मार्क्स का 1883 में निधन हो गया.

मार्क्स के निधन के बाद एंगेल्स ने दास कैपिटल के अधूरे रहे गये खंडों को पूरा करने का काम किया. एंगेल्स ने इस दौरान ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ जैसी विलक्षण पुस्तक को लिखने का भी काम किया. इस पुस्तक में उन्होंने बताने की कोशिश की कि पारावारिक ढांचों में इतिहास में कई बार बदलाव आये हैं. एंगेल्स ने बताया कि एक पत्नी प्रथा का उदय दरअसल पुरुष की अपने बच्चों के हाथों में ही संपत्ति सौंपने की इच्छा से महिला को गुलाम बनाने की आवश्यकता के साथ हुआ.

एंगेल्स का 1895 में लंदन में गले के कैंसर से निधन हो गया. वर्किंग शवदाहगृह में अंतिम संस्कार किये जाने के बाद उनकी अस्थियों बीची हेड पर समुद्र में अर्पित कर दिया गया.

एकनिष्ठ परिवार का ऐतिहासिक महाख्यान

आज परिवार की संरचना सबसे ज्यादा संकटग्रस्त है. कोई परिवार नहीं है जहां संकट न हो. सवाल यह है क्या परिवार स्थिर संरचना है ? अपरिवर्तनीय संरचना है अथवा परिवार की संरचना में बदलाव आते रहे हैं ? परिवार बनाने और परिवार बचाने के नाम पर निरंतर हिंसाचार हो रहा है और औरतों पर हमले बढ़े हैं. विभिन्न बहानों से औरतों के अधिकारों में कटौती की पुंसवादियों ने मुहिम छेड़ दी है. ऐसे में एक बार परिवार और उससे जुड़े बुनियादी सवालों पर विचार कर लेना समीचीन होगा.

फ्रेडरिक एंगेल्स ने ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ नामक किताब में लिखा है – ‘मौर्गन कहते हैं : ‘परिवार एक सक्रिय स्रोत है. वह कभी भी जड़ और स्थिर नहीं होता, बल्कि निम्न रूप से सदा उच्चतर रूप की ओर अग्रसर होता है. यह उसी प्रकार है जिस तरह पूरा समाज निम्न से उच्च्तर अवस्था की ओर बढ़ता है. इसके विपरीत, रक्त-संबध्दता की व्यवस्थाएं निष्क्रिय हैं. परिवार ने जो प्रगति की है, उसे ये व्यवस्थाएं बहुत बाद में जाकर व्यक्त करती हैं. ये मौलिक रूप से तभी बदलती हैं, जब परिवार में मौलिक परिवर्तन हो चुका होता है.’

मार्क्स इस पर कहते हैं : ‘और यही बात राजनीतिक, कानूनी, धार्मिक तथा दार्शनिक प्रणालियों पर भी लागू होती है.’ परिवार तो जीवित अवस्था में रहता है, लेकिन रक्त-संबद्धता की व्यवस्था जड़ीभूत हो जाती है. रक्त-संबद्धता की व्यवस्था जबकि रूढ़िबद्ध रूप में विद्यमान रहती है, परिवार विकसित होकर उसके चौखटे से बाहर निकल आता है.’ यह बात आज भी सच है कि परिवार आगे निकल गया है, इसके बावजूर रक्त संबंधों पर आधारित गोत्र व्यवस्था अभी भी जड़ रूप में मौजूद है और उसके खाप पंचायत जैसे हिमायती भी हैं. वे परिवार को देख नहीं रहे हैं, वे गोत्र को देख रहे हैं.

खाप पंचायत वाले जिस तरह परिवार और गोत्र की व्यवस्था के बारे में शुद्धतावादी नजरिए से बातें कर रहे हैं उसे देखकर आश्चर्य होता है कि अपने गोत्र के अतीत को भी वैज्ञानिक ढ़ंग से देखना नहीं चाहते. वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि मानव सभ्यता में, मानव संबंधों में, गोत्र के संबंधों में आदिकाल में कोई अनियंत्रित यौन संबंध नहीं थे. सामाजिक विकास के क्रम में एकनिष्ठ यौन संबंध बहुत बाद की अवस्था में पैदा हुए हैं. खाप पंचायत वाले यौन सभ्यता के इतिहास और उसकी सम्मिश्रण की प्रक्रिया को ठुकरा रहे हैं. ऐसी स्थिति में एक बार एंगेल्स को याद करना बेहतर होगा.

एंगेल्स के अनुसार ‘कुछ दिनों से यह कहना एक नैतिक शुद्धतावादी फैशन सा हो गया है कि मानवजाति के यौन-जीवन के इतिहास में इस प्रारंभिक अवस्था का अस्तित्व ही न था. उद्देश्य यह है कि मानवजाति इस ‘कलंक’ से बच जाए. कहा जाता है कि ऐसी अवस्था का कहीं कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं मिलता. इसके अलावा, खास तौर पर बाकी पशुलोक की दुहाई दी जाती है. इसी प्रेरणावश लेतूर्नो ने (‘विवाह और परिवार का विकास’, 1888) ऐसे बहुत से तथ्यों को जमा किया जिनसे सिद्ध होता था कि पशुलोक में भी नीचे की अवस्था में ही पूर्ण रूप से अनियंत्रित यौन-संबंध पाए जाते हैं. लेकिन इन तमाम तथ्यों से मैं केवल एक ही परिणाम निकाल सकता हूं, वह यह कि जहां तक मनुष्य का और उसकी आदिम जीवनावस्था का संबंध है, इन तथ्यों से कुछ भी सिद्ध नहीं होता.

‘यदि कशेरुकी पशु लंबे समय तक युग्म-जीवन व्यतीत करते हैं तो इसके पर्याप्त शरीरक्रियात्मक कारण हो सकते हैं. उदाहरण के लिए, पक्षियों में मादा को अंडे सेने के दिनों में मदद की जरूरत होती है. वैसे भी पक्षियों में दृढ़ एकनिष्ठ परिवार के उदाहरणों से मनुष्य के बारे में कुछ भी सिद्ध नहीं होता क्योंकि मनुष्य पक्षियों के वंशज नहीं हैं. यदि एकनिष्ठ यौन-संबंध को ही नैतिकता की पराकाष्ठा समझा जाए तो हमें टेपवर्म को सर्वश्रेष्ठ समझना चाहिए. इसके शरीर में 50 से 200 तक देहखंडों में से प्रत्येक में नर और मादा दोनों प्रकार का पूरा लैंगिक उपकरण होता है. इसका पूरा जीवन इन खंडों में से प्रत्येक में, स्वयं अपने साथ सहवास करने में बीतता है. लेकिन यदि हम केवल स्तनधारी पशुओं पर विचार करें, तो हमें उनमें हर प्रकार का यौन-जीवन मिलता है अनियंत्रित यौन-संबंध, यूथ-संबंध के चिह्न, एक नरपशु का अनेक मादापशुओं से यौन-संबंध और एकनिष्ठ यौन-संबंध. केवल एक रूप, एक मादापशु का अनेक नरपशुओं से यौन-संबंध उनमें नहीं मिलता, इस रूप तक केवल मनुष्य ही पहुंच सके.

‘हमारे निकटतम संबंधी, चौपाया प्राणियों में भी, नर और मादा के संबंधों में हद दर्जे की विभिन्नता पाई जाती है. और यदि हम अपने दायरे को और भी सीमित करना चाहें और केवल चार तरह के पुरुषाभ वानरों पर विचार करें, तो लेतूर्नो से हमें ज्ञात हो सकता है कि वे कभी एकनिष्ठ यौन-जीवन व्यतीत करते हैं तो कभी बहुनिष्ठ. सोस्सुर, जिन्हें जिरो-त्यूलों ने उद्धृत किया है, कहते हैं कि वे एकनिष्ठ ही होते हैं. हाल में प्रकाशित ‘मानव विवाह का इतिहास’ (लंदन, 1891) में वेस्टरमार्क के इस दावे को भी कि पुरुषाभ वानरों में एकनिष्ठ यौन-जीवन की प्रवृत्ति पाई जाती है, कोई बहुत बड़ा सबूत नहीं माना जा सकता.

‘संक्षेप में, ये सारे तथ्य इस प्रकार के हैं कि ईमानदार लेतूर्नो को स्वीकार करना पड़ता है कि ‘स्तनधारी पशुओं में बौद्धिक विकास के स्तर तथा यौन-संबंध के रूप में कोई निश्चित संबंध नहीं पाया जाता.’ और एस्पिनास (‘पशु समाज’, 1877) तो साफ-साफ कहते हैं कि ‘पशुओं में दिखाई पड़ने वाला सर्वोच्च सामाजिक रूप यूथ होता है. लगता है कि यूथ परिवारों को मिलाकर बना है लेकिन शुरू से ही परिवार और यूथ के बीच एक विरोध बना रहता है, वे एक दूसरे के उल्टे अनुपात में विकसित होते हैं.’ बुनियादी बात है यूथ और परिवार के बीच का अन्तर्विरोध, जो आज भी बना हुआ है. समस्या यह है कि इसे किस तरह हल किया जाए.’

अब आप एंगेल्स के विचार पढें – ‘परिवार का यह रूप बर्बर युग की मध्यम तथा उन्नत अवस्थाओं के बीच के युग में युग्म-परिवार से उत्पन्न होता है. उसकी अंतिम विजय सभ्यता के युग के आरंभ होने का सूचक थी. एकनिष्ठ विवाह वाला परिवार पुरुष की प्रधानता पर आधारित होता है. उसका स्पष्ट उद्देश्य ऐसे बच्चे पैदा करना होता है जिनके पितृत्व के बारे में कोई विवाद न हो. यह इसलिए जरूरी होता है कि समय आने पर ये बच्चे अपने पिता के सीधे उत्तराधिकारियों के रूप में उसकी दौलत विरासत में पा सकें. युग्म-परिवार से एकविवाह परिवार इस माने में भिन्न होता है कि इसमें विवाह का संबंध कहीं ज्यादा दृढ़ होता है और दोनों में से कोई भी पक्ष उसे जब चाहे तब नहीं तोड़ सकता.

‘अब तो नियम यह बन जाता है कि केवल पुरुष को ही विवाह के संबंध को तोड़ देने और अपनी पत्नी को त्याग देने का अधिकार होता है. अपनी पत्नी के प्रति वफादार न रहने का उसका अधिकार अब भी कायम रहता है, कम से कम रीति-रिवाज इस अधिकार को मान्यता प्रदान करते हैं (नेपोलियन की विधि संहिता में तो साफ तौर पर पति को यह अधिकार दिया गया है, बशर्ते कि वह अपनी रखैल को अपने घर के अंदर न लाए) और समाज के विकास के साथ-साथ पुरुष इस अधिकार का अधिकाधिक प्रयोग करता है. लेकिन यदि पत्नी प्राचीन यौन-संबंधों की प्रथा की याद करके उन्हें फिर से लागू करना चाहे तो उसे पहले से भी अधिक सख्त सजा दी जाती है.

‘परिवार के इस नए रूप को, ऐसी हालत में, जब उसमें जरा भी नरमी नहीं रह गई है, हम यूनानियों के बीच देखते हैं. जैसा कि मार्क्स ने कहा था, यूनानियों की पुराणकथाओं में देवियों का जो स्थान है, वह उस पूर्व काल का प्रतिनिधित्व करता है जब स्त्रियों की स्थिति अधिक सम्मानप्रद और स्वतंत्र थी. लेकिन वीरगाथा काल में ही हम यूनानी स्त्रियों को, पुरुष की प्रधानता और दासियों की होड़ के कारण, निरादृत पाते हैं. ‘ओडीसी’ में आप पढ़ेंगे कि टेलेमाकस किस प्रकार अपनी मां को डांटकर चुप कर देता है. होमर की रचनाओं में यह वर्णन मिलता है कि जब कभी युवतियां युद्ध में पकड़ी जाती हैं, तो वे विजेताओं की कामलिप्सा का शिकार बनती हैं.

‘विजयी सेना के नायक अपने पदों के क्रमानुसार सबसे सुंदर युवतियों को अपने लिए छांट लेते हैं. यह सुविदित है कि ‘इलियाड’ महाकाव्य की पूरी कथावस्तु का केंद्रीय तत्व ऐसी ही एक दासी के बारे में एकिलीज और एगामेम्नोन का झगड़ा है. होमर की रचनाओं में प्रत्येक महत्वपूर्ण नायक के संबंध में एक ऐसी वंदिनी युवती का जिक्र आता है जो उसकी हमबिस्तर है और हमसफर भी. इन युवतियों को उनके मालिक अपने घर ले जाते हैं, जहां उनकी विवाहित पत्नियां होती हैं, जैसे कि ईस्खिलस का एग्गामेन्नोन कसांड्रा को अपने घर ले गया था. इन दासियों से जो पुत्र पैदा होते हैं, उनको पिता की जायदाद में से एक छोटा सा हिस्सा मिल जाता है और वे स्वतंत्र नागरिक समझे जाते हैं. तेलामोन का एक ऐसा ही जारज पुत्र त्यूक्रोस है, जिसे अपने पिता का नाम ग्रहण करने की इजाजत है. विवाहित पत्नी से उम्मीद की जाती थी कि वह इन सारी बातों को चुपचाप सहन करेगी और खुद कठोर पातिव्रत्य धर्म का पालन करेगी तथा पतिपरायण रहेगी.

‘यह सच है कि वीरगाथा काल में यूनानी पत्नी का सभ्यता के युग की पत्नी से अधिक आदर होता था, लेकिन पति के लिए उसका केवल यही महत्व था कि वह उसके वैध उत्तराधिकारियों की मां है, उसके घर की प्रमुख प्रबंधकर्त्री है और उसकी उन दासियों की दारोगा है, जिनको वह जब चाहे अपनी रखैल बना सकता है और बनाता भी है. एकनिष्ठ विवाह के साथ-साथ चूंकि समाज में दासता भी प्रचलित थी और सुंदर दासियां पूर्णत: पुरुष की संपत्ति होती थीं, इसलिए एकनिष्ठ विवाह पर शुरू से ही यह छाप लग गई कि वह केवल नारी के लिए एकनिष्ठता है, पुरुष के लिए नहीं. और आज तक उसका यही स्वरूप चला आया है.

‘जहां तक वीरगाथा काल के बाद के यूनानियों का सवाल है, हमें डोरियनों और आयोनियनों में भेद करना चाहिए. कई बातों में डोरियन लोगों में, जिनकी ठेठ मिसाल स्पार्टा है, होमर द्वारा वर्णित वैवाहिक संबंधों से भी अधिक प्राचीन संबंध मिलते हैं. स्पार्टा में हम एक ढंग का युग्म-विवाह पाते हैं, जिसे वहां के राज्य ने प्रचलित विचारों के अनुसार थोड़ा परिवर्तित कर दिया था. युग्म-विवाह का वह एक ऐसा रूप है, जिसमें यूथ-विवाह के भी अनेक अवशेष मिलते हैं. जिस विवाह से संतान नहीं होती थी उसे भंग कर दिया जाता था. राजा अनेक्सांद्रिदस ने (560 ई.पू. के लगभग) एक दूसरा विवाह किया, क्योंकि उसकी पहली पत्नी से संतान नहीं हुई थी और इस प्रकार दो गृहस्थियां कायम रखीं.

‘इसी काल के एक और राजा एरिस्टोनस ने अपनी पहली दो बांझ पत्नियों के अलावा एक तीसरी स्त्री से विवाह किया था लेकिन उसने पहली दो पत्नियों में से एक को अपने यहां से चले जाने दिया था. दूसरी ओर, कई भाई मिलकर एक सामूहिक पत्नी भी रख सकते थे. यदि किसी को अपने मित्र की पत्नी पसंद आ जाती थी, तो वह भी हिस्सेदार हो सकता था. बिस्मार्क के शब्दों में, और किसी कामुक ‘सांड़’ के आ जाने पर, यदि वह सहनागरिक नहीं हो तो भी, अपनी पत्नी को उसके उपभोग के लिए प्रस्तुत करना उचित समझा जाता था.

‘शोमान के अनुसार, प्लुटार्क की वह कथा और भी अधिक यौन-स्वच्छंदता की ओर इंगित करती है, जिसमें स्पार्टा की एक स्त्री अपने एक प्रेमी को, जो उसके पीछे पड़ा हुआ था, अपने पति से बात करने को भेज देती है. इस प्रकार, वास्तविक व्यभिचार, यानी पति की पीठ पीछे पत्नी का किसी और पुरुष के साथ यौन-संबंध उन दिनों सुनने में नहीं आता था. दूसरी ओर, स्पार्टा में कम से कम उसके उत्कर्ष काल में घरेलू दासप्रथा नहीं थी. स्पार्टियेटों में हीलोटों की स्त्रियों के साथ संभोग करने का कम प्रलोभन होता था, क्योंकि हीलोट लोग अलग बस्तियों में रहते थे. यदि इन सब परिस्थितियों में स्पार्टा की नारियां यूनान की और सब नारियों से अधिक सम्मान और आदर की पात्र समझी जाती थीं तो यह स्वाभाविक था. प्राचीन युग के लेखक यूनानी स्त्रियों में केवल स्पार्टा की नारियों और एथेंस की विशिष्ट हैटेराओं को ही इस काबिल समझते थे कि उनका जिक्र आदर के साथ करें, उनकी उक्तियों को अपनी रचनाओं में स्थान दें.

‘आयोनियन लोगों में हालत बिलकुल भिन्न थी जिनका लाक्षणिक उदाहरण एथेंस था. वहां लड़कियों को केवल कातना-बुनना और सीना-पिरोना सिखाया जाता था. बहुत हुआ तो वे थोड़ा पढ़ना-लिखना भी सीख लेती थी. उन्हें करीब-करीब परदे में रखा जाता था और वे केवल दूसरी स्त्रियों से ही मिल-जुल सकती थी. जनानखाना घर का एक खास और अलग हिस्सा होता था. यह आम तौर पर ऊपर की मंजिल पर या मकान के पिछले हिस्से में होता था. यहां पुरुषों की, खास तौर पर अजनबियों की आसानी से पहुंच नहीं हो सकती थी. जब मेहमान आते, औरतें वहां चली जाती थीं. स्त्रियां अकेले और बिना एक दासी को साथ लिए बाहर नहीं जाती थीं. घर में उन पर पहरा सा रहता था.

‘एरिस्टोफेनस कहता है कि व्यभिचारियों को पास न फटकने देने के लिए मोलोस्सियन कुत्ते घर में रखे जाते थे और, कम से कम एशिया के शहरों में, औरतों पर पहरा देने के लिए हिजड़े रखे जाते थे. हेरोडोटस के काल से ही कियोस द्वीप में बेचने के लिए हिजड़े बनाए जाते थे. वाक्समुथ का कहना है कि वे केवल बर्बर लोगों के लिए ही नहीं बनाए जाते थे. यूरिपिडीज में पत्नी को ओइकुरेमा यानी गृह-प्रबंध के लिए एक वस्तु (यह शब्द नपुंसक लिंग का है) की संज्ञा दी गई है क्योंकि बच्चे पैदा करने के सिवा एक एथेंसवासी की दृष्टि में पत्नी का महत्व प्रमुख नौकरानी से अधिक कुछ नहीं था. पति अखाड़े में जाकर कसरत करता था, सार्वजनिक जीवन में भाग लेता था, पर इस सबसे पत्नी को अलग रखा जाता था.

‘इसके अलावा उसके पास दासियां भी होती थीं और एथेंस के उत्कर्ष काल में तो वहां बड़े व्यापक रूप में वेश्यावृत्ति भी होती थी. कम से कम यह तो कहा ही जा सकता है कि इसे राज्य की तरफ से बढ़ावा मिलता था. इस वेश्यावृत्ति के आधार पर ही यूनान का वह एकमात्र प्रसिद्ध नारी वर्ग विकसित हुआ था. यह अपने बुद्धि बल और कलाप्रेम के कारण प्राचीन काल की नारियों के साधारण स्तर से उतना ही ऊपर उठ गया था, जितना ऊपर स्पार्टा की नारियां अपने चरित्र के कारण उठ गई थीं. एथेंस की पारिवारिक व्यवस्था पर इससे भयंकर इलजाम और क्या लगाया जा सकता है कि सही मानों में नारी बनने के लिए पहले हैटेरा बनना पड़ता था.’

विश्व सर्वहारा के महान शिक्षक, नेता और वैज्ञानिक समाजवाद के प्रवर्तकों में एक फ्रेडरिक एंगेल्स का व्यक्तित्व

इतिहास और दर्शन शास्त्र के ज्ञान के अतिरिक्त उन्होंने प्राकृतिक विज्ञानों, सैन्य विज्ञान और तुलनात्मक भाषाशास्त्र का खोजपूर्ण अध्ययन किया था. मार्क्स की तरह ही वे एक अच्छे भाषाविद् थे. वह दस भाषाएं जानते थे और सत्तर वर्ष की आयु में उन्होंने नार्वे की भाषा सीखी ताकि इब्सन की कृतियों का मूल पाठ पढ़ सकें. उनके व्यक्तित्व और रूप-रंग का वर्णन, लेसनर ने – जो उन्हें अच्छी तरह जानते थे – इस प्रकार किया है –

‘एंगेल्स लंबे और छरहरे बदन के थे. उनकी चाल तेज़ और फुर्तीली थी. उनके वक्तव्य संक्षिप्त और सटीक हुआ करते थे और उनका आचरण सीधा और सैनिक प्रभाव लिए हुए था. वह अत्यंत वाक्-पटु और हंसमुख प्रकृति के थे. जो भी उनके संपर्क में आया उसने तुरंत महसूस किया कि वह एक असाधारण प्रतिभा वाले व्यक्ति के साथ बात कर रहा है.’

जीवन-पर्यन्त मार्क्स के साथ उनके सम्बन्ध अत्यंत स्नेहपूर्ण और अंतरंग रहे. अपनी चालीस वर्षों की मित्रता के दौरान तथा उन सफलताओं और निराशाओं के दौरान, जिनसे वे अनेक बार गुजरे अनबन की छाया तक उनके बीच नहीं आई. एक मौके को छोड़कर, जो ग़लतफ़हमी का परिणाम था, उनकी मित्रता कभी ढ़ीली नहीं पड़ी.

1845 में जब मार्क्स को पेरिस से निष्कासित कर दिया जाता है तो एंगेल्स मार्क्स को लिखते हैं – ‘मैं नहीं जानता कि यह (चंदा में जमा की गई रकम) तुम्हारे ब्रसेल्स में टिकने के लिए पर्याप्त होगी या नहीं. यह कहने की ज़रूरत नहीं कि अपनी पहली अंग्रेजी कृति (इंग्लैण्ड में श्रमिक वर्गों की दशा) से मुझे आंशिक रूप में कुछ मानदेय मिलने की आशा है, वह राशि अत्यंत प्रसन्नता के साथ तुम्हारे अधिकार में दे दी जाएगी. कमीने लोग कम से कम अपनी दुष्टता द्वारा तुम पर आर्थिक तंगहाली लादने का आनंद तो नहीं उठा पाएंगे.’

मार्क्स के साथ उनकी मित्रता बेमिसाल थी. वह सदा मार्क्स की हर तरह से सहायता करने को तैयार रहते थे. 1981 में मार्क्स की पत्नी जेनी और उनकी पुत्री बीमार पड़ीं. मार्क्स अपनी पत्नी के साथ जब पेरिस गए (उनकी पत्नी की अपनी पुत्रियों से यह आखिरी मुलाक़ात थी) तो एंगेल्स ने उन्हें लिखा कि वह बताएं कि ‘उन्हें किस चीज़ की आवश्यकता है. जितनी भी रकम की ज़रूरत हो, बताने में वह तनिक भी न हिचकें.’

29 जुलाई, 1881 को एंगेल्स ने लिखा – ‘तुम्हारी पत्नी को किसी भी चीज़ से बंचित नहीं रखा जाना चाहिए. वह जो कुछ भी चाहतीं हैं और जो कुछ तुम समझो कि उन्हें आनंद दे सकता है, उन्हें ज़रूर मिलना चाहिए.’

एंगेल्स सदा बहुत विनम्र रहते थे. वे अपने सत्तरवें जन्मदिवस पर बधाइयों के सम्बन्ध में लिखते हैं – ‘काश ! यह सबकुछ खत्म हो जाता. मैं जन्मदिन मनाने की मनोदशा में तनिक भी नहीं हूं … और तमाम बातों के बावजूद, मैं तो केवल मार्क्स की प्रसिद्धि का लाभ उठा रहा हूं.’

एंगेल्स के व्यक्तित्व के बारे में चार्टिस्ट नेताओं में से एक और चार्टिस्ट पत्र ‘नॉर्दर्न स्टार’ के संपादक जूलियन हार्ने लेसनर के शब्द इस प्रकार हैं –  ‘मैं उनसे परिचित रहा हूं. वह मेरे मित्र थे और कई वर्षों तक यदाकदा मुझे पत्र लिखते रहे. 1843 में वह ब्रैडफोर्ड से लीड्स आए और नॉर्दर्न स्टार कार्यालय में मेरे सम्बन्ध में पूछताछ की. मैंने प्रायः बालसुलभ चेहरेवाले एक लंबे और भव्य युवक को अपने सामने खड़ा पाया.

‘जर्मनी में शिक्षा के बावजूद उस समय उनकी अंग्रेजी प्रायः त्रुटिहीन थी. एंगेल्स ने मुझे बताया कि नॉर्दर्न स्टार के वह नियमित पाठक हैं और अत्यंत दिलचस्पी के साथ चार्टिस्ट आंदोलन को देख रहे हैं. इस तरह 32 वर्ष पहले हमारी मित्रता शुरू हुई. अपने सारे काम और कठिनाइयों के बावजूद, एंगेल्स ने अपने मित्रों को याद रखने, उनको सलाह – और आवश्यकता पड़ने पर सहायता – देने के लिए सदा समय निकाला.

‘उनके अथाह ज्ञान और प्रभाव ने उन्हें कभी घमंडी नहीं बनने दिया. इसके विपरीत 55 वर्ष के बाद भी वह उतने ही विनम्र और दूसरे के काम के श्रेय को स्वीकार करने में उतने ही तत्पर थे, जितने 22 वर्ष की उम्र में. वह बेहद मेहमाननवाज़ और चुटकी लेने वाले थे. उनका मज़ाक संक्रामक रोग की तरह किसी को अछूता नहीं छोड़ता था. वे आतिथ्य सत्कार की आत्मा थे. अपने अतिथियों को प्रसन्न रखने के लिए – जिसमे उस समय अधिकतर ओवेनवादी, चार्टिस्ट, श्रमिक संघ वाले और सोसलिस्ट थे – वह सदा तत्पर रहते थे.’

1893 में उन्होंने जर्मनी , स्विट्ज़रलैंड और ऑस्ट्रिया की यात्रा की. ऐसे आंदोलन के जो प्रतिदिन शक्तिशाली होता जा रहा था, संस्थापक, नेता और पथ-प्रदर्शक होने के नाते उनका हार्दिक और ज़ोरदार स्वागत होना स्वाभाविक था. इसके बारे में 7 अक्टूबर 1893 को एक पत्र में उन्होंने जो कुछ लिखा उसकी विनम्रता द्रष्टव्य है. वह लिखते हैं – ‘सचमुच यह लोगों की सहृदयता का सुफल था, परंतु यह मेरे अनुरूप नहीं है. मैं प्रसन्न हूं कि यह समाप्त हो गया है. अगली बार मैं लिखित वादा करा लूंगा कि मुझे जनता के सामने परेड कराने की आवश्यकता नहीं. …मैं जहां कहीं भी गया, अपने स्वागत की तैयारी के पैमाने को देखकर चकित रह गया और अब तक चकित हूं. इस तरह का इंतज़ाम तो संसद सदस्यों के लिए छोड़ देना चाहिए – किन्तु मेरे लिए यह उपयुक्त नहीं.’

तो कुछ ऐसे थे हमारे विश्व सर्वहारा के महान शिक्षक और प्रिय नेता – फ्रेडरिक एंगेल्स !

(सारे अंश जेल्डा के. कोट्स की पुस्तक ‘फ्रेडरिक एंगेल्स : जीवन और कृतित्व’ से)

  • विकिपीडिया, जगदीश्वर चतुर्वेदी और आदित्य कमल

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