Wednesday, September 16, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

आंसुओं का वर्ग : पीड़ितों के आंसू बनाम घड़ियाली / सेलेक्टिव आंसू

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 16, 2023
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
घड़ियाली आंसू और सिलेक्टिव सहानुभूति
आंसुओं का वर्ग : पीड़ितों के आंसू बनाम घड़ियाली / सेलेक्टिव आंसू
Subrato Chatterjeeसुब्रतो चटर्जी

मनीष सिसोदिया को अपनी बीमार पत्नी से मिल कर रोते देख कर लाखों लोगों की आंखों में आंसू आ गए. कुछ दिनों पहले यही आंसू बरबरा राव और स्टेन स्वामी या अन्य एक्टिविस्ट लोगों के लिए भी निकले थे. आंसू निकलना सेहत के लिए अच्छा है. आंसू निकलने से आपके संवेदनशील होने का प्रमाण भी मिलता है.

न्याय पर अन्याय की जीत देख कर अगर आपके आंसू निकलते हैं तो इसका मतलब यह है कि चाहे अपनी मजबूरियों के बोझ तले आपकी आत्मा कितनी भी कुचली क्यों न गई हो, आपकी संवेदनाएं घास के उस बीज की तरह अभी तक जीवित हैं, जो पत्थर की कोख से भी उग आतीं हैं.

You might also like

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

पाश याद आ गए ? याद आना भी चाहिए. अब इन संवेदनाओं की ज़रा और पड़ताल करते हैं. क्या संवेदनाओं का भी कोई वर्ग चरित्र होता है ? महादेवी वर्मा ने लिखा था – ‘महलों से ले कर झोपड़ी तक / हर आंसू के रंग उजले.’ बहुत साधारणीकरण है और मैं इस तरह के सामान्यीकरण और निरर्थक बातों से कभी भी इत्तफ़ाक़ नहीं रखता हूं.

आप महलों में रहने वाले खाए अघाए लोगों की भाववादी परिकल्पनाओं के द्वारा आयातित आंसुओं की तुलना झोपड़ी में भूख और भय के साए में निरंतर घनीभूत होते जीवन की क्षीण संभावनाओं और गभीर निराशा को आंसुओं के रूप में अभिव्यक्त होने के बीच कोई तुलना कैसे कर सकते हैं ?

मृत्यु और रोग का शोक एक अलग प्रश्न है, लेकिन महलों में मृत्यु पर रुदाली बुलाने की परंपरा ने उस पर भी एक प्रश्न चिह्न तो लगा ही दिया है. ऐसे में अगर आपकी संवेदनाएं सतह पर दिखने वाली सच्चाई के पार किसी और बात पर नहीं प्रकट होतीं हैं तो आपकी संवेदनाओं का संसार सीमित ही नहीं अवसरवादी भी है.

आपको मालूम है कि भारत जैसे पाशविक व्यवस्था में कितने लाख लोगों को बिना जुर्म सिद्ध हुए सारा जीवन जेल में बीताना पड़ता है, जिन्हें हम under trial prisoners कहते हैं ?

आपको मालूम है कि इनमें से 99% गरीब, बेसहारा, अकलियत और अपने जल, जंगल और ज़मीन की लड़ाई लड़ने के लिए मजबूरी में हथियार उठाए हुए तथाकथित नक्सली हैं ? फिर भी आपके आंसू उनके लिए नहीं निकलते हैं.

मालूम है क्यों ?.इसलिए कि आपकी संवेदनाओं का भी एक वर्ग चरित्र है.

चूंकि आप मध्यम वर्ग से आते हैं इसलिए आप क्रांतिकारी होने के नाम पर ज़्यादा से ज़्यादा बस एक सुधारवादी हैं. इसलिए आप एक्टिविस्ट लोगों को अपना नायक मानते हैं. इसलिए आप ‘India Against Corruption’ जैसे बुर्जुआ सुधारवादी आंदोलनों के पीछे भागते हैं. इसलिए हमारी पीढ़ी के लोग कभी जेपी आंदोलन के साथ जुड़े थे. यही कारण है कि आप व्यवस्था बदलने की लड़ाई में कभी शामिल नहीं हैं

आपकी लड़ाई तनख़्वाह बढ़ाने से लेकर ओपीएस की पुनर्बहाली के लिए हो सकती है, यूनिवर्सल एजुकेशन के लिए कभी नहीं हो सकती है. आपको डर है कि अगर यह व्यवस्था नहीं रहेगी तो आपकी सुख समृद्धि का क्या होगा ? इसलिए आप किसी शंकर गुहा नियोगी जैसे योद्धाओं के साथ नहीं खड़े होते हैं.

अगर आपके आंसू बरवरा राव के लिए निकलते भी हैं तो वे उनकी वृद्धावस्था के लिए निकलते हैं, न कि उनके संघर्ष के लिए. ऐसे में गौरी लंकेश को भुलाना आसान है. ऐसे में रोहित वेमुला को भुलाना आसान है. ऐसे में चारु मजूमदार और उन असंख्य योद्धाओं को भुलाना आसान है, जिन्होंने सच में मुक्ति का पथ दिखाया था.

इसलिए स्वतंत्रता संग्राम के उन हस्तियों को भुलाना आसान है, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे कर भारत को न सिर्फ़ अंग्रेजों से आज़ादी दिलानी चाही वरन एक समता मूलक समाज की स्थापना के लिए लड़ते हुए मारे गए.

अंत में –

इस दीवाली में
मैं बस उन घरों की
गिनती रखूंगा
जिन के दरवाज़ों पर
कभी नहीं दी
रोशनी ने दस्तक

मैं उन घरों में
रहने वाली आत्माओं को
नहीं दूंगा कोई भी
शुभकामनाएं

इससे पहले की ये
खोखली संवेदनाएं
बोझ बन जाए मुझ पर

मैं उतार दूंगा उन्हें
तुम्हारी जगमगाती हवेलियों के
ओसारा पर

ताकि तुम कल सुबह
पटाखों के ख़ाली खोखों को
गिन गिन कर
गिन सको
कितनी शुभकामनाएं मिलीं थीं तुम्हें
बिना दांत के पोपले मुंह से
पायोरिया के दुर्गंध समेटे हुए

मेरा ठिकाना कहीं और है मेरे दोस्त !

Read Also –

मैं जश्न तब मनाऊंगा जब हर आंख से आंसू पोंछ दिया जाएगा – हिमांशु कुमार
मगरमच्छ के आंसू और बाल नरेंद्र
मोदी के मगरमच्छी आंसू की नौटंकी
ड्रेकुला मोदी और उसके घड़ियाली आंसू
Kakkoos : वो हकीक़त है जिसे देखकर आंसू नहीं गुस्सा आना चाहिये 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

रूसी क्रान्ति का विकास पथ और इसका ऐतिहासिक महत्व

Next Post

लेनिन की कविता : ‘वह एक तूफानी साल’

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

by ROHIT SHARMA
September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

by ROHIT SHARMA
August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

by ROHIT SHARMA
August 27, 2026
Next Post

लेनिन की कविता : 'वह एक तूफानी साल'

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

कश्मीर में श्यामाप्रसाद प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु और धारा 370

June 29, 2022

देवदासी-प्रथा, जो आज भी अतीत नहीं है

November 26, 2018

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

August 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

प्रशांत बोस उर्फ किशन दा के बारे में संक्षिप्त जानकारी

August 26, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.