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16 फरवरी भारत बंद : भारत समेत दुनियाभर में उठ रही है जनसंघर्षों की लहर

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 7, 2024
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16 फरवरी भारत बंद : भारत समेत दुनियाभर में उठ रही है जनसंघर्षों की लहर
16 फरवरी भारत बंद : भारत समेत दुनियाभर में उठ रही है जनसंघर्षों की लहर

दुनियाभर में उभर रही दक्षिणपंथी सरकारों की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ जनसंघर्षों का जनसैलाब उमड़ पड़ा है. इसी कड़ी में भारत में भी किसानों का संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) और केंद्रीय ट्रेड यूनियन (सीटीयू) के साथ मिलकर, केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार की किसान विरोधी और श्रमिक विरोधी नीतियों के खिलाफ 16 फरवरी को देशव्यापी ग्रामीण बंद और औद्योगिक हड़ताल का आह्वान किया है.

भाजपा की नेतृत्व वाली सरकार के एक दशक लंबे शासन ने हर साल दो करोड़ नौकरियां पैदा करने, गरीबों के बैंक खातों में 15 लाख रुपये जमा करने आदि की जोरदार घोषणाओं के बावजूद बड़े पैमाने पर लोगों के बुनियादी मुद्दों का समाधान नहीं किया है,और जुमलाबाजी करके जनता को धोखा दिया है. बेरोज़गारी पिछले पचास साल की तुलना में उच्चतम स्तर पर है. पिछले दस वर्षों में ‘अच्छे दिन’, ‘चमकदार भारत’ की बात वास्तविक तथ्यों के प्रकाश में एक क्रूर मजाक बनकर रह गई है.

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मेहनतकश जनता की वास्तविक मज़दूरी में 20% की गिरावट आई है और इस अवधि में अत्यावश्यक वस्तुओं की कीमतों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है. श्रमिकों को निराशाजनक वेतन पर जीने के लिए मजबूर करते हुए निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों में नियमित कार्यबल पर अस्थायी श्रम के दबाव के साथ अनुबंध या आउटसोर्सिंग पर रोजगार नियम बन गया है. श्रमिकों को स्वैच्छिक, योजना, गिग आदि कहकर मजदूर का दर्जा और वेतन से वंचित किया जाता है.

कॉर्पोरेट क्षेत्र के फायदे के लिए एक नीति के रूप में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के निजीकरण के साथ, अनुबंध / अस्थाई श्रम के रोजगार की दिशा में अभियान को और तेज किया जा रहा है. फ्लोर वेज की शुरुआत करके नए वेतन संहिता के माध्यम से भाजपा सरकार न्यूनतम वेतन को कम करने की कोशिश कर रही है, जिससे वेतन और भी निराशाजनक हो रहा है और श्रमिकों को गरीबी में धकेल दिया जा रहा है.

भाजपा सरकार ने अपना इरादा स्पष्ट कर दिया है जब वित्त मंत्री ने घोषणा की कि ‘नवरत्न’ सहित लाभ कमाने वाली सार्वजनिक उपक्रमों में से मुट्ठी भर को छोड़कर बाकी सभी का निजीकरण किया जाएगा. इस नीति का निशाना राष्ट्रीयकृत बैंक भी बने हैं. सरकारी संपत्तियों का मुद्रीकरण( बेचना) निजीकरण का एक अन्य नाम है. श्रमिक वर्ग को और अधिक लूटने और कड़ी मेहनत से जीते गए अधिकारों को खत्म करने के लिए सरकार, देश के कॉर्पोरेट क्षेत्र और विदेशी पूंजी को लाभ पहुंचाने के लिए चार श्रम कोड ( संहिता) लेकर आई है.

कर्मचारियों का पीएफ (भविष्य निधि) कॉर्पोरेट लूट के लिए खुला है और सरकार नई पेंशन योजना की जगह (सीपीएस), ओपीएस (पुरानी पेंशन योजना) को बहाल करने से इनकार करती है. अब सरकार इजरायल को, बेरोजगारी से त्रस्त भारतीय श्रमिकों को भर्ती करने की अनुमति दे रही है, ताकि उन्हें फिलिस्तीनी श्रमिकों के स्थान पर युद्ध क्षेत्र में ले जाया जा सके.

जहां पिछले पांच वर्षों में देश में बड़े पूंजीपतियों का मुनाफा 30% बढ़ गया है, वहीं वैश्विक भूख सूचकांक में भारत 125 देशों में 111वें स्थान पर है. वैश्विक मानव विकास सूचकांक में 191 देशों में ‘शाइनिंग इंडिया’ 132वें स्थान पर है. वर्तमान शासन में भारत, प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में कुख्यात हो गया है और 180 देशों में 161वीं रैंक हासिल कर पत्रकारों के लिए खतरनाक माना जाता है.

सांप्रदायिकता की विभाजनकारी राजनीति की घृणित कला में महारत हासिल करने के बाद, भाजपा बहुसंख्यक समुदाय को धार्मिक उन्माद के नशे में डुबोने और चुनावी लाभ के लिए आक्रामक रूप से हिंदुत्व कार्ड खेल रही है. इन स्थितियों में, मजदूर वर्ग को तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के हालिया लंबे संघर्ष से सबक लेना चाहिए जिसने मोदी सरकार को इन कानूनों को वापस लेने के लिए मजबूर किया. ऐतिहासिक किसान आंदोलन का नेतृत्व करने वाला एसकेएम सरकार द्वारा किए गए वादों को लागू करने की मांग कर रहा है.

इसी तरह पंजाब की एक पत्रिका ‘मुक्ति संग्राम’ दुनियाभर में उभर रहे जनसंघर्षों की रिपोर्ट करते हुए बताता है कि यूनाइटेड किंगडम के मज़दूर, सरकार के एक नादरशाही फ़रमान का विरोध कर रहे हैं. हड़ताल क़ानून, जो 9 दिसंबर 2023 को लागू हुआ है, असल में हड़ताल विरोधी क़ानून है. इसके मुताबिक़ मज़दूरों को हड़ताल के दौरान आठ क्षेत्रों में सीमित समय के लिए काम करना ही पड़ेगा. ऐसा ना करने की सूरत में मालिक के पास मज़दूर पर क़ानूनी कार्यवाही करने का अधिकार होगा.

यानी हड़ताल करना केवल एक खानापूर्ति या प्रतीकात्मक कार्रवाई बनकर रह जाएगी. बेल्जियम में भी ऐसे ही एक प्रस्तावित क़ानून के विरोध में मज़दूर सड़कों पर हैं. ये जन-विरोधी क़ानून और इनके जवाब में उठा संघर्ष यूरोप की मौजूदा स्थिति बयान करता है. आख़िर अंग्रेज़ हुकुमरानों को क्या ज़रूरत पड़ गई ऐसे क़ानून बनाने की ?

असल में साल 2023 मज़दूर संघर्षों के फूटने का साल रहा है. और यह अकेले यूरोप की बात नहीं, बल्कि अमेरिका, चीन और जापान की भी यही कहानी रही है. पूंजीवादी व्यवस्था के शीशमहल के तौर पर जाने जाते इन देशों के बारे में डेढ़ दशक पहले तक कहा जाता था कि यहां का मज़दूर ख़ुशहाल मज़दूर है, जिसके पास पक्की नौकरी और अच्छी तनख़्वाह है.

कि 1960-70 का संकट और मज़दूर संघर्ष अब अतीत की बात हो गए हैं और बुनियादी ज़रूरतों की अब कोई लड़ाई नहीं है, कि ‘अमेरिकी सपना’ फि‍र से जीत गया है. कई तो यहां तक भी कहते थे कि यहां तो कोई मज़दूर है ही नहीं. माना जाता था कि मज़दूर यूनियनें दबा दी गईं हैं और दुबारा उनके संगठित होने की कोई संभावना नहीं. लेकिन इन देशों में उठे संघर्षों ने ख़ुशहाली के इस भ्रम को तार-तार कर दिया है.

पूंजीवादी लूट ही मौजूदा वर्ग संघर्ष का कारण बनी है. इस व्यवस्था में मज़दूरों की लूट ख़त्म होना असंभव है क्योंकि इसी लूट पर तो सारी व्यवस्था टिकी हुई है. और इसीलिए देर-सवेर इस लूट के ख़िलाफ़ संघर्ष उठना भी लाज़मी है. बढ़ती मंहगाई, गिरते वेतनों और रोज़गार की अनिश्चितता के कारण संयुक्त राष्ट्र अमेरिका 2022 से ही बड़े मज़दूर संघर्षों की दहलीज़ पर खड़ा था और 2023 ने यह साबित कर दिखाया.

डाक कर्मचारी, नर्सें, रेलवे मज़दूर आदि हर विभाग के मज़दूर हड़ताल, धरने-प्रदर्शन कर रहे हैं. अकेले संयुक्त राष्ट्र अमेरिका (आगे केवल अमेरिका) की बात करें, तो मज़दूरों के संघर्षों के आंकड़े जुटाने वाली एक संस्था ‘लेबर एक्शन ट्रैकर’ के मुताबिक़ 31 अक्टूबर 2023 तक 354 हड़तालें हुईं, जिनमें 4,92,000 मज़दूर शामिल हुए – यह गिनती 2021 में हड़तालों का हिस्सा बने मज़दूरों की गिनती से 8 गुना ज़्यादा थी और 2022 से 4 गुना.

अमेरिका की लगभग सारी ऑटो कंपनियों के मज़दूर इस साल 14 सितंबर से तनख़्वाहों में बढ़ोतरी के लिए लगातार हड़तालें कर रहे हैं. ये हड़तालें अमेरिका के 88 सालों के इतिहास की सबसे बड़ी हड़तालें हैं, जिन्होंने ऑटो कंपनियों के मालिकों की नाक में दम कर रखा है. ‘यूनाइटेड ऑटो वर्क्स’ इस समय अमेरिका की सबसे बड़ी यूनियन है, जो ‘बिग थ्री’ कहीं जाने वाली तीन बड़ी कंपनियों – जनरल मोटर्स, फ़ोर्ड, स्टेलांटिस के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रही है.

अन्य क्षेत्रों की बात करें, तो 75000 नर्सों ने हड़ताल के दम पर तनख़्वाह में 21% की बढ़ोतरी करवाई. हॉलीवुड के 11,500 हज़ार लेखक और 65,000 अदाकार लगातार जुलाई से बड़ी कंपनियों जैसे नेटफ़्लि‍क्स, वाल्ट डिज़्नी आदि के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं. पिछले साल दिसंबर में 80,000 रेलवे कर्मचारियों की हड़ताल की घोषणा की गई थी, जिसके दबाव में बाइडेन ने हड़ताल से पहले ही सदन बुलाकर उनकी मांगें मान ली.

अक्टूबर 2021 में जॉन-डीअर कंपनी के 10,000 मज़दूर हड़ताल पर गए. कैलोगस के मज़दूरों की हड़ताल अक्टूबर 2021 से मार्च 2022 तक चली. अमेरिका के स्टारबक्स के 200 स्टोरों के मज़दूर दिसंबर 2021 से लगातार वेतनों में बढ़ोतरी और बेहतर काम के हालातों के लिए हड़तालें कर रहे हैं.

अगस्त में अमेरिकी यूनाइटेड डाक विभाग के 1 लाख कामगारों ने हड़ताल का ऐलान किया था, जिसके दबाव में सरकार को उनकी मांगें माननी पड़ी. पिछले समय में लॉकडाउन के बुरे प्रभाव, पूंजीपतियों के बढ़ते मुनाफ़े बनाम काम के हालात के गिरते स्तर, बढ़ती क़ीमतों और दशकों से वेतन में बढ़ोतरी ना होने से सताए अमेरिकी मज़दूरों ने ना केवल हड़तालें की हैं, बल्कि संगठित होकर आंशिक जीतें भी हासिल की हैं.

यूनाइटेड किंगडम की धरती भी संघर्षों के पक्ष से बहुत उपजाऊ रही. यहां आई मंदी का सबसे अधिक बोझ झेल रहे यहां के मेहनतकश लाखों की गिनती में सड़कों पर उतर आए. दिसंबर 2022 से जनवरी 2023 तक यू.के. के राष्ट्रीय स्वास्थ्य विभाग की एक लाख नर्सों ने बड़ी हड़ताल की. 2023 में 50,000 रेलवे कामगारों, डाक विभाग के 1,15,000 कामगारों ने सरकारों से हक़ हासिल करने के लिए हड़तालें की.

अगर बाक़ी यूरोप की बात करें तो पेंशन स्कीम को वापस करवाने के लिए फ़्रांस की सड़कें जाम करने वाले लाखों मज़दूरों को कैसे भुलाया जा सकता है. 2022 तक यूरोपीय संघ के देशों के 9.53 करोड़ लोग अति ग़रीबी के मुहाने पर खड़े थे. ऐसे समय में इटली, स्पेन, रोमानिया, बेल्जियम, जर्मनी, पुर्तगाल, सर्बिया और स्कॉटलैंड में लाखों लोग मंहगाई, बेरोज़गारी, छंटनियों और बेहतर काम के हालातों के लिए हड़तालों, धरने-प्रदर्शनों का हिस्सा बने.

उपरोक्त विवरण पूंजीवाद के इन ‘आदर्श महलों’ के भ्रम को तोड़ रहे हैं. ख़ासकर इस भ्रम को कि इन देशों में मज़दूर ख़त्म हो गए हैं. इस झूठे दावे की हवा निकालता सच हमारे सामने है. अमेरिका, यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं को हिलाकर रख देने वाली हड़तालें कर रहे ये लोग, क्या मज़दूर नहीं हैं ?

एशिया की महाशक्तियां भी इस साल इस आग से बची नहीं रह पाईं. चीनी लेबर ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक़ 2022 और 2023 के दौरान, 1500 से अधिक मज़दूर संघर्ष हुए. एवरग्रांदे कंपनी से शुरू हुए रियल एस्टेट के संकट के कारण केवल इसी क्षेत्र से संबंधित ही 1,777 विरोध प्रदर्शन केवल जून 2022 और अक्टूबर 2023 के दरमियान हुए, जिनकी शुरुआत निर्माण मज़दूरों ने अपनी रुकी हुई तनख़्वाहें देने की मांग रखकर की.

हर महीने 50 से 70 संघर्ष हुए और हो रहे हैं, अगस्त 2023 में सबसे अधिक हुए, जिनमें से 100 संघर्ष मज़दूरों के नेतृत्व में हुए. ये हड़तालें और प्रदर्शन चीन के 297 शहरों तक फैले हैं. चीनी सत्ता की रोकों के कारण केवल इतने ही आंकड़े बाहर आ सके हैं. लेकिन इससे भी साफ़ है कि चीन में दमनकारी हुकूमत होने के बावजूद वह संघर्षों को रोक नहीं सकी.

पूंजीवादी ‘बुद्धिजीवी’ एशिया की बात करते हुए अक्सर जापान के गुणगान करते हैं, लेकिन जापान की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है. पिछले दो सालों में इस देश में 4,000 से अधिक छोटी-बड़ी हड़तालें हुई हैं, जिनमें निर्माण क्षेत्र, स्वास्थ्य सुविधाओं का क्षेत्र, नर्सिंग और काफ़ी अन्य क्षेत्र शामिल हैं.

अमेरिका और यूरोप के देशों में मज़दूरों ने केवल आर्थिक मसलों पर ही आवाज़ बुलंद नहीं की, बल्कि अपनी सरकारों को राजनीतिक मसलों पर भी घेरा है. फ़्रांस और अमेरिका में पुलिसिया दमन के ख़िलाफ़ फूटा जनाक्रोश इसका सबूत है. इसका सबूत इन देशों की सड़कों पर रूस-यूक्रेन जंग और इज़रायल के फ़ि‍लिस्तीन पर किए जा रहे दमन के ख़िलाफ़ उतरे लाखों लोग हैं. भले ही जनवादी अधिकारों के लिए उठतीं इन आवाज़ों में अभी साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन का भ्रूण ही है, लेकिन क्रांतिकारी आंदोलन के लिए यह स्वागतयोग कदम है.

पूंजीवादी अर्थशास्त्री मज़दूरों की क्रांतिकारी पहलक़दमी की जड़ ‘कोरोना महामारी के कारण आई मंदी’ को बता रहे हैं. लेकिन असल में इन संघर्षों के लिए तो लॉकडाउन से पहले ही ज़मीन तैयार हो चुकी थी. मिसाल के तौर पर 2018 में अमेरिका में 4,85,000 मज़दूरों ने हड़तालों में हिस्सा लिया, जो कि 1986 के बाद सबसे बड़ा आंकड़ा था. ‘कोरोना महामारी’ का बहाना इन बुद्धिजीवियों द्वारा असल समस्या को ढंकने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.

असल में यह पूंजीवादी व्यवस्था मुनाफ़े पर टिकी हुई व्यवस्था है, जो अपने अंदर ही अपनी तबाही के बीज लेकर चलती है. जब पूंजीपतियों के मुनाफ़े गिरते हैं, तो वह इससे बचने के लिए मज़दूरों की लूट को तेज़ करते हैं, जिसमें काम के घंटे बढ़ाना, काम का बोझ बढ़ाना या वेतन घटाना शामिल है. मुनाफ़े की यही हवस बेरोज़गारी, मंहगाई और काम की बुरी हालतों जैसी बुराइयों को जन्म देती है.

मज़दूरों की क्रांतिकारी पहलक़दमी इन बुराइयों के विरोध में संघर्ष खड़े करती है लेकिन इस शोषक व्यवस्था की हदों के अंदर पूंजीवाद के अटल संकट से पार नहीं पाया जा सकता. इसलिए मौजूदा जन पहलक़दमी ही, पूंजीवादी लूट से रहि‍त समाज यानी समाजवादी समाज के ज़रिए मज़दूरों और अन्य शोषित तबक़ों की मुक्ति करवा सकती है. इसलिए आज इन शानदार जन पहलक़दमियों को मज़दूर वर्ग के नेतृत्व में एक सूत्र में पिरोने की, इन्हें पूंजीवाद विरोधी और समाजवादी दिशा की ओर बढ़ाने की बड़ी चुनौती हमारे सामने है.

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