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करकरे को किसने मारा ? भारत में आतंकवाद का असली चेहरा

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 12, 2024
in युद्ध विज्ञान
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करकरे को किसने मारा ? भारत में आतंकवाद का असली चेहरा
करकरे को किसने मारा ? भारत में आतंकवाद का असली चेहरा

‘आज मैं अपनी असलियत बताता हूं. एक संगठन का मेरे ऊपर बहुत भारी क़र्ज़ है. मैं, अपने बचपन से जवानी तक उसके साथ रहा…भले कुछ लोगों को बुरा लगे, मैं, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) का सदस्य रहा हूं और आज भी हूं..अभी भी मैं इस संगठन की कोई सेवा करने को तत्पर हूं. संगठन से जो भी आदेश मिलेगा, मैं पूरी लगन से करूंगा.’ कोलकता उच्च न्यायलय के जज, चित्त रंजन दाश ने, 20 मई को सेवानिवृत्ति के अवसर पर जो बोला वह हर देशवासी के कानों में गूंज रहा है. उससे, देश का वह तबक़ा हैरान है, जो नहीं जानता कि देश के शासन-तंत्र के सभी अंगों में, ब्राह्मणवादी, मनुवादी आरएसएस की घुसपैठ कितनी गहरी हो चुकी है.

इससे पहले भी अनेक जज, अपने चरित्र से, यही साबित कर चुके हैं, लेकिन स्पष्ट रूप से, डंके की चोट पर, यह कहने की हिम्मत किसी की भी नहीं हुई. मौजूदा बुर्जुआ जनवाद के बाक़ी तीन स्तंभों; प्रशासन, मीडिया और विधायिका के बारे में तो किसी को कोई संदेह है ही नहीं. न्यायपालिका को ‘पवित्र गाय’ समझा जाता रहा है लेकिन उसकी असलियत ख़ुद-ब-ख़ुद स्पष्ट होती जा रही है. साथ ही, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के घोषित व छुपे सदस्यों का, मौजूदा संविधान में, जिसके सम्मान और रक्षा की शपथ लेकर वे वहां पहुंचे हैं, कितना भरोसा है, यह भी ज़ाहिर हो चुका है.

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महाराष्ट्र के कोल्हापुर ज़िले की गंगा जमुनी तहज़ीब में जन्मे, पले-बढ़े आईपीएस अधिकारी, एस एम मुशरिफ, सेवानिवृत्त आईजी पुलिस, महाराष्ट्र द्वारा, सघन शोध के बाद लिखी लोकप्रिय पुस्तक, ‘करकरे को किसने मारा ? देश में आतंकवाद का असली चेहरा’ में ब्राह्मणवादी-कट्टरवादी हिन्दू आतंकियों की पहुंच और पैठ कितनी व्यापक, पुरानी और गहरी है, ने इस कड़वी सच्चाई को, तथ्यों और सबूतों के साथ उजागर किया है. मौजूदा हालात से चिंतित हर व्यक्ति को, इस पुस्तक को गंभीरता से पढ़ना चाहिए. इस पुस्तक की लोकप्रियता का ये आलम है कि 2009 में प्रकाशित हुई इस पुस्तक का अनुवाद 9 भाषाओं में हो चुका है और अब तक 6 संस्करण आ चुके हैं. इस पुस्तक की समीक्षा में, पुस्तक के महत्वपूर्ण और गंभीर चिंतन प्रेरित करने वाले अंशों को, ज्यों का त्यों, उद्धृत किया जा रहा है.

‘मेरा शोध कार्य बताता है कि ऊपर वर्णित मुद्दे (1893 से ज़ारी हिन्दू-मुस्लिम दंगे तथा आतंकी घटनाएं), आपस में गुंथे हुए हैं. इनमें प्रमुख खिलाड़ी हैं; ब्राह्मणवादी – ब्राह्मण समुदाय का एक बहुत छोटा हिस्सा, ब्राह्मणवादियों के प्रभुत्व वाली इंटेलीजेंस ब्यूरो (IB) तथा इन्हीं ब्राह्मणवादी तत्वों के प्रभुत्व वाला मीडिया का एक समूह. इनका मुख्य मक़सद है भारतीय समाज पर ब्राह्मणवादियों का सम्पूर्ण क़ब्ज़ा. शुरुआत में, इनका मक़सद था, सामान्य हिन्दुओं को सांप्रदायिक दंगों के लिए भड़काकर, सामाजिक तथा धार्मिक नियंत्रण हासिल करना, लेकिन उनके मुस्लिम-विरोधी अभियान को ऐसा व्यापक समर्थन मिला कि उनके अंदर राजनीतिक शक्ति हासिल करने की इच्छा भड़क उठी और उसी मक़सद से उन्होंने रामजन्मभूमि जैसे भावनात्मक मुद्दे उठाकर, सांप्रदायिक भावनाओं और तेज़ी से भड़काना शुरू कर दिया. इसी का नतीज़ा था कि बाबरी मस्जिद विध्वंश के बाद, वे राजनीतिक शक्ति हासिल करने और आज़ादी के बाद के सांप्रदायिक राजनीति के शिखर पर पहुंचने में क़ामयाब हो गए.’ (प्रस्तावना, पृष्ठ 17)

‘बहुत प्राचीन काल से ही, इंडिया के सामाजिक जीवन पर ब्राह्मणों का वर्चस्व रहा है. जब भी उनकी पकड़ ढ़ीली हुई है, उन्होंने अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए, अनेक रणनीतियां, जैसे बौद्ध भिक्षुओं को मारना और देश से भगाना, जाति व्यवस्था पैदा करना, धर्म-ग्रंथों द्वारा विभिन्न तिकड़मों से, ब्राह्मणों के स्तर को भगवान के स्तर तक उठा देना, मनु-स्मृति की रचना करना और उसे दैविक पुस्तक की तरह प्रस्तुत करना, समाज में अंधविश्वासों और अंध-भक्ति को बढ़ाना, देश में क्षत्रियों के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रण में रखने के लिए, विदेशी आक्रमणकारियों को आमंत्रित करना, अपने निहित स्वार्थ में इतिहास को विकृत करना तथा परिस्थितियों के अनुरूप अपनी रणनीति को बदलते हुए, समाज पर अपना वर्चस्व एवं प्रभुत्व क़ायम रखा है.’ (हिन्दू-मुस्लिम दंगे, पृष्ठ 23-24)

:हालांकि, ब्राह्मणवादियों ने, समय-समय पर सांप्रदायिक समस्याएं खड़ी करने की गतिविधियां 1893 से ही शुरू कर दी थीं, लेकिन उनकी ये हरक़तें सुनियोजित तथा सुसंगठित नहीं थीं. इसी परियोजना को योजनाबद्ध तथा सुसंगठित तरह से चलाने के लिए तथा ब्राह्मणवादियों के विभिन्न गुटों में सामंजस्य तथा अनुशासन क़ायम करने के मक़सद से ही, 1925 में, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS, इसके बाद ‘संघ’) की स्थापना हुई. अपने मक़सद को हासिल करने के लिए संघ ने दो महत्वपूर्ण इदारों, मीडिया और ख़ुफ़िया विभाग को अपने नियंत्रण में लेना शुरू कर दिया क्योंकि ये दोनों विभाग, ‘जन-मत’ तैयार करने के लिए बहुत ज़रूरी थे.

‘1947 में, जब हमें आज़ादी हासिल हुई, तब तक इन दोनों इदारों पर, संघ का काफ़ी हद तक क़ब्ज़ा हो चुका था. आज़ादी हासिल होने के बाद तो, संघ ने अपना शिकंजा, इन दोनों इदारों में बहुत प्रभावशाली बनाते हुए, लोगों में सांप्रदायिक ज़हर फ़ैलाने तथा लोगों का ध्यान, उनके जीवन-मरण के मूल मुद्दों से भटकाने के लिए इस्तेमाल किया तथा सामाजिक तथा सांस्कृतिक संस्थाओं पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया.’ (वही, पृष्ठ 26).

‘इंटेलीजेन्स ब्यूरो (IB), भारत सरकार की प्रमुख ख़ुफ़िया एजेंसी रही है. यह, एक तरह से, सरकार की आंख और कान है. इसलिए शुरू से ही, ब्राह्मणवादियों ने इसमें घुसपैठ शुरू कर दी थी तथा आज़ादी मिलने के महज़ 10 साल में, इसे पूरी तरह अपने क़ब्ज़े में ले लिया….उन्होंने ये काम कैसे किया, यह जानना भी बहुत दिलचस्प है. आईबी में दो तरह के अधिकारी होते हैं, एक नियमित और दूसरे, मध्य तथा उच्च पदों पर डेपुटेसन पर आए हुए. ब्राह्मणवादियों ने शुरू से ही अपने लोगों को इसमें प्रवेश कराकर, नियमित महत्वपूर्ण पदों पर बिठा दिया.

‘साथ ही, संघ ने अलग-अलग राज्यों से अपने पक्के और चतुर आईपीएस अधिकारी सदस्यों को, आईबी में डेपुटेसन पर जाने का आदेश दिया…(उदाहरण देते हुए), महाराष्ट्र के, वी जी वैद्य, आईबी में अंत तक रहे, ‘डायरेक्टर इंटेलीजेन्स’ के पद से रिटायर हुए, और एक दिलचस्प हकीक़त देखिए, जब वे आईबी प्रमुख थे, ठीक उसी वक़्त, उनके सगे भाई, एम जी वैद्य, महाराष्ट्र राज्य, संघ प्रमुख थे.’ (वही, पृष्ठ 28).

‘2002 के गुजरात के मुस्लिम नरसंहार की दुनियाभर में भर्त्सना हुई और संघ तथा भाजपा नंगे हो गए. ब्राह्मणवादियों ने तय किया कि पिछले 5 दशकों से ज़ारी हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़काने के औज़ार ने उन्हें, राजनीतिक शक्ति की लहलहाती फसल फसल दी है, लेकिन अब ये औज़ार थोथरा हो चुका है, और अब इसहथियार के उनके ऊपर ही पलट जाने का अंदेशा है, उनकी राजनीतिक पकड़ कमज़ोर हो सकती है.

‘बाबरी मस्जिद विध्वंश, इस ज़हरीले हथकंडे का उच्चांक था. इसीलिए उन्होंने, गेयर बदलने का फैसला लिया. हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़काने के हथकंडे की जगह, मुस्लिम आतंकवाद का हौव्वा खड़ा करना शुरू कर दिया और आईबी तथा मीडिया की मदद से, उसकी तैयारी शुरू कर दी….आईबी ने प्रचार शुरू कर दिया कि कुछ जाने-माने मुस्लिम आतंकी समूहों द्वारा प्रमुख नेताओं तथा संस्थानों पर आतंकी हमलों की ख़ुफ़िया जानकारियां प्राप्त हुई हैं.’ (गेयर बदलना, पृष्ठ 39-40)

‘इंडिया में, पिछले 60 साल में, आतंकियों ने 3 प्यारे नेताओं की हत्या की है. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को ब्राह्मणवादी आतंकी ने बेरहमी से क़त्ल किया, जिसकी वज़ह ब्राह्मणवादियों ने यह बताई थी कि वे पाकिस्तान के प्रति नरम थे, हालांकि, असलियत यह थी कि वे आज़ाद भारत को ब्राह्मणवादी मुल्क नहीं बनने देना चाहते थे. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को खालिस्तानी आतंकियों ने गोलियों से इसलिए भून डाला कि उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया था, तथा राजीव गांधी को लिट्टे के तमिल आतंकियों ने इसलिए बम से उड़ा दिया क्योंकि उन्होंने श्रीलंका में सेना भेजी थी…’ (वही, पृष्ठ 50).

‘लगभग हर आतंकी वारदात की जांच उसके सही अंजाम तक पहुंचे, आईबी, यह नहीं होने देती. यह सुनिश्चित करती है कि हर बम-विस्फोट की तहकीक़ात उसके इशारे पर ही हो. अगर स्थानीय पुलिस सही दिशा में जांच कर रही होती है, तो यह तुरंत उसमें घुस जाती है, और अपनी मनगढ़ंत थ्योरी प्रस्तुत करती है, जिसमें सारे सबूत बने-बनाए, रेडीमेड होते हैं…यह इसलिए होता है कि उस आतंकी घटना में या तो ब्राह्मणवादियों की संलिप्तता होती है, या यह सारा खेल आईबी द्वारा ही रचा गया होता है….इन सभी बम-विस्फोटों में यही हुआ है जिनकी डिटेल विभिन्न अख़बारों की रिपोर्टों से हासिल की गई है.’ (बम-विस्फोटों की जांच, पृष्ठ 64)

‘मुंबई ट्रेन बम ब्लास्ट 11 जुलाई 2006; मालेगांव बम-विस्फोट 8 सितम्बर 2006; अहमदाबाद बम-विस्फोट तथा सूरत में बम पाया जाना, 26 जुलाई 2008; दिल्ली बम-विस्फोट 13 सितम्बर 2008; समझौता एक्सप्रेस बम-विस्फोट 19 फरवरी, 2007; हैदराबाद मक्का मस्जिद बम-विस्फोट 18 मई, 2007; अजमेर शरीफ़ बम-विस्फोट 11 अक्टूबर 2007; उत्तर प्रदेश की अदालतों में बम-विस्फोट श्रंखला 23 नवंबर 2007; जयपुर बम-विस्फोट 13 मई, 2008. (वही, विभिन्न पृष्ठ)

‘नांदेड बम-विस्फोट 5 अप्रैल 2006– यह मामला ख़ुद ही खुल गया, क्योंकि विस्फोट, बम बनाते वक़्त ही हो गया, जिसमें ब्राह्मणवादी रंगे हाथों पकडे गए…यह विस्फोट, पीडब्लूडी के सेवानिवृत्त इंजिनियर लक्षमण गुन्दैय्या राज्कोंदवार के घर पर हुआ, जिसमें उनके पुत्र नरेश राजकोंदवार और हिमांशु पांसे मारे गए तथा मारुती केशव वाघ, योगेश देशपांडे उर्फ़ विदुलकर, गुरुराज तुप्तेवार और राहुल पांडे गंभीर रूप से ज़ख़्मी हुए. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने घटना स्थल का दौरा किया, लेकिन एफआईआर, स्थानीय थाने में, एक एएसआई द्वारा लिखी गई, जिसमें बताया गया कि नरेश राजकोंदवार अपने घर में पटाखे बनाने का व्यवसाय कर रहा था.’ (नांदेड बम-विस्फोट पृष्ठ 159)

‘हिमांशु पांसे के घर की तलाशी ली गई तो उसमें बनावटी दाढ़ियां, मूछें तथा शेरवानी (मुस्लिमों द्वारा पहना जाने वाला लंबा कोट) भी बरामद हुए. ज़ाहिर है, यह सब पदार्थ, झूठी मुस्लिम पहचान स्थापित करने के लिए जमा किया गया था.’ (वही पृष्ठ 165)

‘नागपुर ट्रेनिंग कैंप, जहां बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग दी गई, वहां दो सेवानिवृत्त सेना अधिकारी भी मौजूद थे, उनकी पहचान की कोई कोशिश नहीं की गई. (बाद में, मालेगांव बम-विस्फोट की जांच करते वक़्त, एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे ने उन्हें गिरफ्तार किया. अगर उन्हें, उसी वक़्त गिरफ्तार कर लिया गया होता तो आगे बम-विस्फोट ना हुए होते. आईबी का एक भूतपूर्व वरिष्ठ अधिकारी भी उस ट्रेनिंग कैंप में मौजूद था, जिसकी पहचान नहीं की गई. इतना ही नहीं, उसकी पहचान छुपाने के लिए, एक व्यक्ति को ‘मिथुन चक्रवर्ती’ के नाम से प्रचारित किया गया. ज़ाहिर है, एटीएस भी उसे आईबी की अनुमति के बगैर गिरफ्तार नहीं कर सकती थी और आईबी उआकी अनुमति कभी भी नहीं देने वाली.’ (नांदेड बम-विस्फोट, पृष्ठ 168)

‘हालांकि, एक अधिकारी ज़रूर ऐसा रहा, जिसे धमकाया नहीं जा सका और जो किसी तिकड़मबजी से विचलित नहीं हुआ. वह थे, एटीएस प्रमुख, हेमंत करकरे, जिन्होंने, मालेगांव बम-विस्फोट की जांच कर रहे, के पी रघुवंशी से, जनवरी 2008 में चार्ज लिया था. हेमंत करकरे ने, 2006 में हुए नांदेड बम-विस्फोट की जांच में मौजूद छेदों को भांपकर यह नोट कर लिया था कि सीबीआई ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया और जानबुझकर उन्होंने नांदेड ब्लास्ट में ज़ख़्मी आरोपियों के हलफिया बयानों तथा एक आरोपी के घर पर पाई गईं दाढ़ी, मुछों, शेरवानी आदि को नज़रंदाज़ किया और नरेश राजकंदवार तथा हिमांशु पांसे के मोबाइल फ़ोन से किसे कॉल की गईं, इसकी कोई जांच नहीं की.

‘उन्होंने 25 नवम्बर 2008 को, अपनी एक टीम, यह कहकर, दिल्ली सीबीआई हेड क्वार्टर भेजी कि इस मामले के सभी दस्तावेज़ों को पूरा खोद डालो. उनका यह भी दृढ निश्चय था कि वे ‘मिथुन चक्रवर्ती’ तथा उस भूतपूर्व आईबी अधिकारी को भी ढूंढ निकालेंगे जिसने ट्रेनिंग कैंप में ट्रेनिंग दी. लेकिन, वे ऐसा कर पाते, दुर्भाग्य से, उससे पहले ही, 26/11 (मतलब अगले ही दिन) आतंकी हमले में मारे गए. (नांदेड बम-ब्लास्ट, पृष्ठ 173).

  • सत्यवीर सिंह

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