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बंदूकों की गूंज के बीच दण्डकारण्य की जंगलों से प्रकाशित ‘प्रभात’ के लिए अविस्मरणीय योगदान देने वाली कॉ. आलूरी ललिता

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 15, 2024
in गेस्ट ब्लॉग
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बंदूकों की गूंज के बीच दण्डकारण्य की जंगलों से प्रकाशित 'प्रभात’ के लिए अविस्मरणीय योगदान देने वाली कॉ. आलूरी ललिता
बंदूकों की गूंज के बीच दण्डकारण्य की जंगलों से प्रकाशित ‘प्रभात’ के लिए अविस्मरणीय योगदान देने वाली कॉ. आलूरी ललिता

नक्सलबाड़ी आंदोलन ने तमाम मानवीय मूल्यों पर चौतरफा शानदार प्रभाव डाला है. इसने चीजों को देखने की नवीन दृष्टि दी. इस नवीन दृष्टि ने न केवल किसान-मजदूरों के जीवन पर प्रभाव डाला, वरन् सिनेमा और साहित्य के क्षेत्र में भी जबरदस्त उथल-पुथल मचा दिया. बड़ी तादाद में क्रांतिकारी साहित्य रचे गए. पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित हुई. नक्सलबाड़ी आंदोलन को क्रूरतापूर्वक कुचलने के बाद देश भर में नक्सलबाड़ी की चिंगारी फैल गई, जिसमें इन साहित्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

नक्सलबाड़ी आंदोलन, जो पहले देश के एक छोटे से हिस्से में था, अब वह देशभर में अनेक टुकड़ों में बंटकर दावानल की तरह बढ़ गया, जो बाद में माओवादी आंदोलन के रुप में अपनी पहचान बनाई. इसी के साथ बढ़ा क्रांतिकारी साहित्य का लेखन. माओवादी आंदोलनकारियों ने क्रांतिकारी लेखन को हर संभव तरीके से मदद किया. इसी क्रम में पूर्ववर्ती माओवादी संगठन ने सैकड़ों पत्र-पत्रिका और दस्तावेजों का प्रकाशन किया, जिसमें से एक महत्वपूर्ण त्रैमासिक दण्डकारण्य से प्रकाशित ‘प्रभात’ भी है.

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इस पत्रिका की सबसे खास बात यह है कि यह पत्रिका भारत सरकार की नृशंस हत्यारी पुलिस और सीपीआई माओवादी के गुरिल्लों के बीच जारी मुठभेड़ों के बीच से एक साथ पांच भाषाओं – हिन्दी, अंग्रेजी, तमिल, तेलगू और बंगला – में प्रकाशित होती है, जिसमें प्रकाशित हर आलेख अन्य भाषाओं में अनुदित की जाती है. तकरीबन 100 पृष्ठों में प्रकाशित यह रंगीन त्रैमासिक पांचों भाषाओं में छपकर वितरण के लिए तैयार हो जाती है.

आज जब बड़े-बड़े घरानों द्वारा महानगरों से प्रकाशित पत्रिकाएं जो असीम संसाधनों के बाद भी पाठक न मिलने या अन्य कारणों से आये दिन बंद होती रहती है, ऐसे में ‘प्रभात’ का पिछले कई दशकों से निर्बाध प्रकाशन और उसका वितरण दांतों तले अंगुली दबाने जैसा है. वह भी तब जब इस पत्रिका पर सरकार द्वारा आये दिन हमले किया जा रहा है. यह पत्रिका एक और कारणों से खास तब बन जाता है जब हमें यह मालूम होता है कि यह पत्रिका किसी महानगरों से नहीं बल्कि दण्डकारण्य की बीहड़ जंगलों से प्रकाशित होती है.

इस पत्रिका के संस्थापक सम्पादक कॉ. आलूरी ललिता की मौत 21 नवंबर, 2021 को दिल का दौरा पड़ने की वजह से हो गया, जिसको श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए ‘प्रभात’ ने अपने अंक (अक्टूबर-दिसम्बर, 2021) में यह लेख छापा था, जिसे हम अपने पाठकों के लिए यहां प्रस्तुत कर रहे हैं. ‘प्रभात’ लिखता है कि तेलुगू राज्यों के क्रांतिकारी शिविर व प्रगतिशील साहित्य दुनिया के लिए आलूरी भुजंगराव की जीवनसंगिनी के रूप में वे चिरपरिचित थीं. हालांकि दंडकारण्य आंदोलन, विशेष कर ‘प्रभात’ से उनका खास रिश्ता था.

‘प्रभात’ की शुरुआत से लेकर उसके लगभग एक दशक के सफ़र में अपने जीवनसाथी के साथ कंधों से कंधा मिला कर कामरेड ललिता ने अनमोल योगदान दिया. उतना ही नहीं उनकी छोटी बेटी दंडकारण्य आंदोलन में कार्यरत हैं. ‘प्रभात’ पत्रिका व दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी उनके योगदान का स्मरण करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करती हैं. उनके परिजनों व मित्रों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करती हैं.

क्रांतिकारी आंदोलन ने कितने ही साधारण लोगों को असाधारण व अद्भुत बना दिया, कामरेड ललिता की जिंदगी में भी क्रांतिकारी आंदोलन ने ऐसा ही चमत्कार किया, जिससे एक साधारण गृहिणी विलक्षण क्रांतिकारी बन गई. उनका पूरा नाम ललिता परमेश्वरी था. मई 1945 में उन्होंने आंध्र प्रदेश राज्य, गुंटूर जिला, बापट्ला तहसील के सिरिपुर गांव में जन्म लिया.

सिरिपुर उनके नाना-नानी का गांव था जबकि कर्लापालेम उनके दादा-दादी का गांव था. वे रमादेवी और प्रसादराव दंपति की तीसरी संतान थीं. उन्होंने छठवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी. किशोरी अवस्था से ही वे साहित्य की शौकीन थीं. नवंबर 1960 में हिंदी शिक्षक कामरेड आलूरी भुजंगराव के साथ उनकी शादी हुई. तब तक ही कामरेड भुजंगराव संयुक्त कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता और प्रगतिशील साहित्यकार थे. दोनों दंपति की पांच संतान -चार बेटियां और एक बेटा है.

1980 दशक की शुरूआत में तत्कालीन भाकपा (माले) पीपुल्सवार के साथ उस परिवार का लगाव हो गया. धीरे-धीरे उनका घर क्रांतिकारी केंद्र बन गया. कामरेड ललिता अपने घर में आने जाने वाले क्रांतिकारियाें की ‘अम्मा’ बन गयीं. कामरेड ललिता का भी क्रांतिकारी क्रियाकलापों में शामिल होना शुरू हो गया. उनके नेतृत्वकारी लक्षण ने महिला संगठन में उन्हें सक्रिय कार्यकर्ता बना दिया.

मजदूर बस्ती में जाकर वहां की महिलाओं को वे पढ़ाती थी. अस्वस्थ्य महिलाओं को डॉक्टर के पास ले जाती थीं. महिला संगठन की कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर आस-पास के गांवों में जाकर प्रचार-आंदोलन कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लेती थी. उनके साथ मिल कर नाटकों में शामिल होती थीं. एलूर जूट मिल मजदूराें की हड़ताल में भी उन्होंने भाग लिया.

उस वक्त आंध्र प्रदेश में जोरों पर जारी पीपुल्सवार आंदोलन के प्रभाव से उनकी चार बेटियां उस आंदोलन में शामिल हुईं और उनमें से दो बेटियां पूर्णकालीन कार्यकर्ता बन गईं. पहले से ही जनवादी माहौल में बच्चों की परवरिश करने वाली कामरेड ललिता ने अपनी बेटियों के निर्णय का तहेदिल से समर्थन किया. उतना ही नहीं बाद में कामरेड्स भुजंगराव और ललिता ने एक बड़ा व साहसिक फ़ैसला लिया. बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के बाद अब उन दोनों ने अपनी पूरी जिंदगी क्रांति के लिए समर्पित करने का फ़ैसला लिया.

यह फ़ैसला लेने में कामरेड ललिता की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी. वे दोनों अपने बेेटे को छोड़ कर 1985 के बाद भूमिगत हो गए. तब तक कामरेड भुजंगराव की उम्र 55 पार चुकी थी और ‘अम्मा’ की 40. उस उम्र में ऐेसा फ़ैसला लेना कोई मामूली बात नहीं थी. लेकिन क्रांति के प्रति उनकी समर्पित भावना ने उन्हें ऐसी हिम्मत दी. बाद में उनकी जिंदगी दंडकारण्य आंदोलन से जुड़ गयी. तब तक दंडकारण्य आंदोलन विकसित हुआ था.

दंडकारण्य जोन के मुखपत्र के रूप में ‘प्रभात’ का प्रकाशन शुरू करने का पार्टी ने निर्णय लिया था. हिंदी भाषा में अच्छी कुशलता हासिल कामरेड भुजंगराव ‘प्रभात’ के संस्थापक संपादक मंडल के सदस्य बन गये थे. उन्होंने ‘प्रभात’ के संपादक व अनुवादक के रूप में लगभग 7 वर्ष तक अपनी अनमोल सेवाएं दीं. सिर्फ ‘प्रभात’ के लिए ही नहीं उन्होंने कई रचनाएं भी की थी और कई तेलुगू पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद किया. दंडकारण्य से प्रकाशित कई पुस्तकों का भी उन्होंने हिंदी में अनुवाद किया.

इस तरह ‘प्रभात’ व दंडकारण्य आंदोलन के लिए कामरेड भुजंगराव ने जो योगदान दिया, उसमें कामरेड ललिता का महत्वपूर्ण हिस्सा था. कामरेड भुजंगराव गंभीर अस्वस्थता के पीड़ित थे. कामरेड ललिता के सहयोग के बिना ये सब वे शायद ही कर पाते. कुछ वक्त बीतने के बाद कामरेड भुजंगराव की आंखों की रोशनी भी चली गई. ऐसी हालत में कामरेड भुजंगराव बताने पर कामरेड ललिता लिखती थीं.

प्रभात के लिए डेन का संचालन करने, उसके छापने और पत्रिका के बड़े-बड़े गट्ठरों को पुलिस की आंखों में धाूल झोंक कर शहरों से जंगली क्षेत्र को पहुंचाने में अम्मा की भूमिका सराहनीय थी. अपनी जान को जोखिम में डाल कर उन्होंने ये सब किए. उस तरह कामरेड ललिता की सेवाएं ‘प्रभात’ के अक्षरों में निहित हैं.

‘प्रभात’ के अलावा उनका मकान पार्टी के महत्वपूर्ण नेतृत्व का सुरक्षा केंद्र बन गया. अपने मकान में आने जाने वाले कामरेडों का अम्मा ख्याल रखती और प्यार देती थीं. कामरेड भुजंगराव ने राज्य कमेटी स्तर की हैसियत से काम किया था. कामरेड ललिता को भी जिला स्तर की सदस्या के रूप में पार्टी ने चिह्नित किया. लेकिन उन्होंने कहा था ‘मुझे कोई स्तर नहीं चाहिए, पार्टी सदस्या की पहचान ही मेरे लिए सर्वाेन्नत, सगर्व व संतोष की बात है.’

9वें दशक की शुरूआत में दुश्मन का दमन तेज होकर ‘प्रभात’ का बाहर से संचालन असंभव हो गया. इससे पार्टी ने ‘प्रभात’ का प्रकाशन अंदरूनी इलाके से करने का निर्णय लिया. उस वक्त कामरेड्स भुजंगराव और ललिता की गंभीर अस्वस्थता को ध्यान में रख कर पार्टी ने उन्हें भूमिगत जीवन से बाहर, खुले जिंदगी में जाने का सुझाव दिया. इस तरह अनिवार्य स्थिति में 7-8 वर्षों के बाद भूमिगत जीवन को छोड़ कर वे वापस खुले जीवन में चले गए थे.

उसके बाद में भी वे दोनों कामरेड क्रांतिकारी शिविर का हिस्सा बन कर रहे थे. कामरेड भुजंगराव पहले से ही विरसम (क्रांतिकारी लेखक संघ) के सदस्य थे. 2000 में ‘अम्मा’ ने भी विरसम की सदस्यता हासिल की. भुजंगराव के लेखन में कितने ही सहयोग देने वाली कामरेड ललिता भी कुछ रचनाएं की. ‘पानी आले’, ‘चावु खर्चु (मृत्यु का खर्च)’ आदि कहानियां और कुछ कविताएं लिखी थीं.

क्रांतिकारी जन संगठनों के सभा-समारोहों में लगातार शामिल होते हुए वे युवा कार्यकर्ताओं को प्यार व प्रेरणा देती थीं. दुश्मन के तीव्र दमन में उनकी बेटी गंभीर रूप से घायल हुई थीं. उनके दो दामादों की पुलिस ने मुठभेड़ व झूठी मुठभेड़ में हत्या की थी. उनके चिरपरिचित कितने ही प्यारे कामरेडों की शहादत हुई.

2013 में उनके जीवन साथी कामरेड भुजंगराव का निधान हो गया. ऐसी कई दुखद घड़ियों का उन्होंने हिम्मत से सामना किया. आंदोलन के कई उतार-चढ़ावों में उन्होंने भाग लिया. क्रांति के प्रति अटूट विश्वास के साथ उन्होंने अपनी जिंदगी जी. उस विश्वास के साथ ही 2017 में उन्होंने अपनी बेटी व पार्टी को भेजे संदेश में कहा कि हमारी पार्टी के नेतृत्व में भारत की क्रांति जरूर सफ़ल होगी. इस आशा ही नहीं भरपूर विश्वास के साथ उन्होंने अंतिम सांस ली. जिस सपने को साकार करने के लिए कामरेड ललिता ने अपने आखिरी पल तक इंतजार किया, उस सपने के साकार के लिए और दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ने की शपथ लेंगे.

  • महेश सिंह

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