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Home कविताएं

रात के मरे हुए काले कुत्ते…

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 16, 2024
in कविताएं
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रात के मरे हुए काले कुत्ते...
रात के मरे हुए काले कुत्ते…

रात के मरे हुए
काले कुत्ते की लाश को
पूंछ से पकड़ कर मैं
ज़ोर से घुमा कर
दूर फेंक देना चाहता हूं
काउबॉय के फंदे की तरह
किसी भटके हुए लेकिन
पालतू पशु के गले से लिपट जाए
और मैं उसे पूरी ताक़त के साथ
अपनी तरफ़ खींच लूं

इस रस्साकश्शी में
अंततः हम दोनों एक दूसरे के पास आएंगे

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कौन है श्रेष्ठ ?

तलछंट पर सिमटती हुई
शाम की रोशनी में

रिज़्क की तलाश में
अपनी माँ से बिछुड़ती
अबोध बालिका के घुटे हुए आंसू हैं

और उपर
उस ऊंचे पेड़ से उल्टी लटकी हुई
भूख

घिसे हुए कपड़े घिसे हुए शीशे नहीं होते
इनसे दिखता है बदन
हड्डियों के ढांचे और घिसे हुए कपड़ों के बीच
मांस की मात्रा तय करती है
बदन की क़ीमत

बाज़ार कभी बंद नहीं होते
बंद बाज़ार बदन को रोटी नहीं देते

और मुझे दूसरे किसी बाज़ार को
बसाने की इजाज़त भी नहीं है

ऐसे में मेरे पास
काली रात के कुत्ते की लाश को
पूंछ से पकड़ कर
दूर फेंकने के सिवा
और कोई रास्ता नहीं है

उनके पास शाम और सुबह है
मेरे पास दिन और रात के सिवा
कुछ भी नहीं है

स्याह सफ़ेद के बीच के रंग की पहुंच
मेरे सर के बालों से आगे नहीं है

दिन
उम्मीदों के बलात्कार हैं

रात
सपनों का सुहाग

मेरी पीठ पर
मेरे मेरुदंड में
सुबह और शाम के कीड़े नहीं रेंगते

गुदगुदी का अहसास मर चुका है

अब सिर्फ़ अट्टहास है
या खामोश क्रंदन

मुझे उस अबोध बालिका को उसकी
मां के पास पहुंचाना है
ढेर सारा चावल के साथ

और मैं दिन का इंतज़ार नहीं कर सकता

2

कालांतर में
जब दुनिया के सारे बम
बरस चुके होंगे
सारे युद्धक विमान
नष्ट हो कर धूल चाट रहे होंगे
और अकाल मृत्यु के सारे उपादान
काल कवलित हो कर
तुम्हारी स्मृति में गुंथ जाएंगे
नथुनों से ग़ायब होते
बारूद की महक की तरह
कुछ स्त्रियां
फटे हुए बमों के खोखों में
उगा लेंगी फूल
कुछ मर्द
क्यारियां बनाकर
कतारबद्ध करेंगे उन्हें
लेकिन,
पीछे हाथ बांधे
युद्ध बंदियों की तरह नहीं
ये फूल बुलाएंगे बच्चों को
खुले हाथों से
जैसे आज पुकारता है मुझे कभी कभी
कफ़स की ऊंचे, छोटे से रोशनदान से
नीला आसमान

शिव तांडव के संगीत में
सती के शव का परीक्षण
सतत चलता रहता है जब
कोई कोई सुन लेता है उसमें
बरसते सावन की लक्षणा
इस ह्रिंस समय की ताल पर
नाचते हुए
औघड़, भावशून्य मुखौटे
आदमी की बोटी बोटी नोचकर
चढ़ा रहे हैं महाप्रसाद

व्यंजना की भाषा सीमित है
और खुले मैदान का युद्ध
छापामार लड़ाई से अलग है
वे खुले मैदान में खड़े हमारे विरुद्ध
छापामार युद्ध में व्यस्त हैं
खबरिया चैनलों और अख़बारों की
भाषा, भंगिमाओं से टपकता हुआ
आदमी का लहू
मरीज़ की धमनियों में डालकर
विद्रुप की हंसी हंसता है
तानाशाह
आत्महत्या के बीज
सघन अंधकार में प्रस्फुटित होते हैं
जानता है वह
इसलिए उसके पागलपन के पीछे
एक षड्यंत्र होता है
जिसे रूप देने के लिए
सदियों जागा है वह

कुछ दिनों की बात है
किसी का अभीष्ट पूरा नहीं होता यहां
सर्वनाश का अभीष्ट तो कभी नहीं
कुछ दिनों की बात है
लड़ो
और अगर मरना भी पड़े
तो याद रहे कि
तुम्हारी मुठ्ठियां बंद रहे
तुम सिकंदर नहीं हो
तुम ख़ाली हाथ नहीं जा रहे हो दुनिया से
तुम्हारे साथ जा रहीं हैं
तुम्हारी उन लड़ाईयों की स्मृतियां
जिन्हें तुमने औरों के लिए लड़ा
अपने साथ साथ
तुम बस एक नाविक हो
अपने सख़्त हाथों में
धारा के विपरीत खेते हुए नाव

कोई तो पार उतरेगा
कुछ तो बचा रखती है पृथ्वी
नदी के उस पार
पृथ्वी के जूड़े में
फूल टांकतीं कुछ स्त्रियां
हल चलाते कुछ पुरुष
और शोर मचाते कुछ बच्चे
जो एक दिन बनाएंगे
एक नई भाषा
लक्षणा और व्यंजना से परे
चित्रलिपी सा सरल
गुफा चित्र सा निर्मल

3

इस मौसम में
कुछ अलग करने की चाहत है

इस मौसम में
मैं खेतों में उगे कपास को नहीं नोचूंगा
और उन्हें धरती पर बरस कर फ़ना हो गए
बादलों की याद में
ज़मीन पर छोड़ दूंगा

इस मौसम में
मैं ऊंची इमारतों में बने हुए
मधुछत्तों को वहीं छोड़ दूंगा
बसंत की याद की तरह

इस मौसम में
मैं तुम्हारी पुरानी तस्वीर के सामने बैठ कर
देखूंगा तीस्ता के निर्मल प्रवाह को
प्रेम की याद की तरह

इस मौसम में
मैं उस ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर
गुम हो जाने दूंगा
उस अंधेरी सुरंग में
जिसके आख़िर में
कभी हुआ करता था
तुम्हारी आंखों का उजाला

  • सुब्रतो चटर्जी

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