Monday, September 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home लघुकथा

कमलेश

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 2, 2024
in लघुकथा
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

You might also like

कथाकार व उपन्यासकार कैलाश वनवासी का समकालीन कथा साहित्य में एक जरूरी हस्तक्षेप

UPSC में 301वां रैंक को लेकर जब आकांक्षा सिंह के सपने में आया ब्रह्मेश्वर सिंह

एन्काउंटर

कमलेश
कमलेश

राम लाल पेशे से कुम्हार था. दिन भर मेहनत करके बमुश्किल अपने बीवी बच्चों को खाना नसीब करवा पाता था. दिये, गुल्लक, छोटी मोटी मूर्तियां, मिट्टी के खिलोने तो जैसे उसके हाथ लगते ही जीवित हो उठते थे. राम लाल की कला का दीवाना लगभग आसपास का सारा इलाका था. लेकिन चीन की झालर और मूर्तियों ने उसके व्यापार का बेड़ा गर्क कर रखा था. राम लाल की पत्नी कलावती दुकान संभालती थी और राम लाल अपनी चकिया में व्यस्त रहता था. दीपावली के लिए उसने बहुत मेहनत की थी. काफ़ी सारा माल तैयार किया था. आखिर इसी त्यौहार की बिक्री से तो उसे अच्छे दिनों की उम्मीद थी.

राम लाल का एक बेटा था कमलेश. 17 साल का जवान बेटा अभी पढ़ रहा था. बेटी अनीता तो बहुत छोटी थी. मात्र 10 साल की लेकिन अपने स्कूल में टॉप किया था. राम लाल अपने बच्चों पर गर्व करता था. बेटा कमलेश रोज शाम को अपने मास्टर गिरधारी से ट्यूशन पढ़ने जाता था. मास्टर साहब कमलेश की मेहनत और लगन की तारीफ करते थे. मास्टर साहब बहुत साधारण तरीके से रहते थे. एक भूरी पैंट और सफ़ेद कमीज़, सिर पर काली टोपी. कोई आडम्बर नहीं, कोई नखरे नहीं. इधर कुछ दिनों से कमलेश उनके घर ज्यादा देर तक रुकता और धर्म और इतिहास की बातें सीखता था.

गिरधारी मास्टर ने उसे बताया की आज़ादी की लड़ाई में ‘वीर’ सावरकर बहुत आगे रहे. आज़ादी गोलवरकर, सावरकर, गोडसे बंधु और श्यामा प्रसाद मुख़र्जी की वजह से मिली थी. नेहरू, गांधी, बोस, पटेल सब अंग्रेजों के मुखबिर थे. मास्टर ने कमलेश को एक फ़ोन भी दिया और उसमें व्हाट्सएप्प पर डेली तरह तरह के ज्ञान की बातें उसे पढ़ाते थे. नेहरू पटेल की आखिरी यात्रा में नहीं गए, नेहरू के कपड़े पेरिस में धुलते थे, गांधी ने चंद्रशेखर आज़ाद की मुखबिरी कर उन्हें मरवा दिया, मुस्लिम रेजिमेंट ने आज़ादी की लड़ाई में शामिल होने से इंकार कर दिया था इत्यादि इत्यादि.

कमलेश के दिमाग़ में यह बात बैठ चुकी थी कि हिन्दू धर्म को सिखों यानी ख़ालिस्तानीयों और मुसलमान यानी पाकिस्तानियों से खतरा था. गिरधारी मास्टर ने उसे लाठी के अनेक इस्तेमाल बताए थे. लाठी एक असलहा भी है, यह भी उस बालक ने सीख लिया था. मास्टर ने यह भी कहा था कि कमलेश ऐसे जवान लड़कों के कंधों पर ही हिन्दू धर्म टिका हुआ था. यह भी कि दिवाली से 4 दिन पहले गांव में हिन्दुओं का एक धार्मिक जुलूस निकलेगा और अगर कमलेश उसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेगा तो उसे सरकार इनाम में 1 लाख रूपये भी देगी.

इनाम की राशि सुन कमलेश की आंखों में हसीन सपने तैर गए. बस उसने जुलूस में हिस्सा लेने की ठान ली. फिर वह दिन भी आया. कमलेश अच्छे कपड़े व जूते पहन जुलुस के साथ चल दिया. धीरे-धीरे जुलूस अपने निर्धारित मार्ग से हटकर एक मस्जिद की तरफ जाने लगा. मस्जिद के सामने पहुंचते ही कमलेश के कान में मास्टर की आवाज़ आई. मास्टर ने उसे एक लाख का इनाम याद दिलाया और इशारे से भगवा झंडा लेकर मस्जिद पर चढ़ जाने को बोला. कमलेश का खून उत्तेजक नारों और डीजे के अश्लील गानों से गर्म था ही. उसने आव देखा न ताव, और मस्जिद पर चढ़ गया. मस्जिद के मीनार पर लगा झंडा नीचे गिराकर भगवा झंडा लहरा दिया.

कमलेश की आंखों के सामने तो एक लाख रूपये थे. उसे दौलत का नशा सवार था. सही गलत का फर्क धुंधला हो गया था. लेकिन जो कमलेश ने नहीं देखा वह यह कि मास्टर अब उस भीड़ से गायब हो चुका था. पुलिस ने इलाके को घेर लिया था और एसपी साहब ने फायरिंग के आर्डर दे दिए थे. कमलेश झंडा ठीक से लगा भी नहीं पाया था कि एक पुलिसिया गोली उसके सीने को छेदते निकल गई. मस्जिद की मीनार से कमलेश सीधा जमीन पर औधे मुंह गिरा और उसके मुंह से एक चीख निकल गई. उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया.

राम लाल, उसकी पत्नी कलावती और बेटी अनीता का रो रोकर बुरा हाल था. ताज्जुब यह कि भीड़ गायब थी. उसके घर पर बेटे का शव, उसके कुछ रिश्तेदार और खुद उसका परिवार ही नज़र आ रहा था. कमलेश को ‘इनाम’ मिल चुका था. राम लाल और उसके परिवार का भविष्य अंधकारमय हो चुका था. आखिर जवान बेटा खोया था.

गिरधारी मास्टर गांव से जरूर गायब हो गया था लेकिन सही सलामत था, सुरक्षित था. वह फ़ोन पर किसी को बता रहा था कि इस गांव का किला फतह हो गया था. उसके आका ने शाबाशी दी और बगल वाले जिले के एक अन्य गांव का पता देते हुये कहा – अब इस गांव का किला फतह करो.

गिरधारी उस दूसरे गांव में एक और कमलेश ढूंढने चल पड़ा…

  • राजीव श्रीवास्तव

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
Previous Post

भारत में यथास्थितिवादी, दक्षिणपंथी और प्रतिक्रियावादी राजनीति का बीजारोपण

Next Post

निपूतों के गैंग को आपके बच्चे चाहिए…

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

लघुकथा

कथाकार व उपन्यासकार कैलाश वनवासी का समकालीन कथा साहित्य में एक जरूरी हस्तक्षेप

by ROHIT SHARMA
March 17, 2026
लघुकथा

UPSC में 301वां रैंक को लेकर जब आकांक्षा सिंह के सपने में आया ब्रह्मेश्वर सिंह

by ROHIT SHARMA
March 11, 2026
लघुकथा

एन्काउंटर

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
लघुकथा

धिक्कार

by ROHIT SHARMA
February 14, 2026
लघुकथा

मैं रहूं न रहूं, पर लड़ाई ज़िंदा रहेगी : एक अपरिचय से परिचय तक की दहला देने वाली मुलाक़ात

by ROHIT SHARMA
February 7, 2026
Next Post

निपूतों के गैंग को आपके बच्चे चाहिए...

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

उदारीकरण की नीतियों के कारण श्रीलंका बदहाल

April 4, 2022

षड्यन्त्र क्यों होते हैं और कैसे रूक सकते हैं ?

November 12, 2024

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

August 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

प्रशांत बोस उर्फ किशन दा के बारे में संक्षिप्त जानकारी

August 26, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.