वे भेड़िये हैं
भोले भाले भालू नहीं हैं
कि मेरे शांत, स्पंदनहीन, सर्द
शरीर को देख कर आगे बढ़ जाएं
वे मुर्दों को भी खाते हैं
मैं तो फिर भी ज़िंदा हूं
इसलिए, वे मेरी सर्द त्वचा में
अपने दांतों को गड़ा कर
ढूंढ लेंगे उसके नीचे बहते हुए
मेरे गर्म लहू को
और मेरा निष्क्रिय
निरपेक्ष होना
कोई काम नहीं आएगा
- सुब्रतो चटर्जी
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