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सतयुग आ चुका था

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
April 15, 2025
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सतयुग आ चुका था
सतयुग आ चुका था
विष्णु नागर

यह उस समय की बात है, जब सारे विरोध और अंतर्विरोध गहरे दफ्न हो चुके थे. पूंजीपति, मजदूरों को कभी-कभी गले लगा लिया करते थे, कभी-कभी उनके साथ चाय पी लिया करते थे, उन्हें बिस्किट खिला दिया करते थे. कभी-कभी कृपापूर्वक उनका हालचाल पूछ लेते थे. कभी-कभी वे किसी-किसी की हजार-दो हजार की मदद कर देते थे. किसी की पांच हजार तक की मदद कर देते थे, ऐसी भी अफवाह थी.

इस सबसे मजदूर इतने प्रभावित थे कि सबकुछ भूल चुके थे. पूंजीपतियों के गीत गाने लगे थे, उनकी हर बात मानने लगे थे. वे जितनी भी मजदूरी देते थे, चुपचाप ले लेते थे. पहले से कम देते थे तो भी खुशी-खुशी मंजूर कर लेते थे और ऊपर से धन्यवाद देना नहीं भूलते थे. उन्हें अच्छी तरह समझाया जा चुका था और उन्हें समझ में आ चुका था कि पैसों से कोई सुखी नहीं होता. मन की खुशी ही असली खुशी होती है.

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पूंजीपति स्वयं अपना उदाहरण देते हुए कहते थे कि आप लोग समझते हो कि हम सुखी हैं ? आपको मालूम है कि मुझे कितने रोग हैं, लाखों रुपए हर महीने डाक्टरों को देता हूं. आज इसी कारण से, आपके आशीर्वाद से, आप मजदूर भाइयों-बहनों के सामने यहां खड़ा हूं. इस पर खूब तालियां बजतीं. सेठ जी की जय बोली जाती.

वे आगे कहते – ‘आज हम मन से दो रोटियां तक नहीं खा पाते. शरीर धर्म की रक्षा के लिए खाना मजबूरी है तो बेमन से किसी तरह बिना घी की कभी एक, कभी दो रोटी खा लेते हैं. अब हम बदल नहीं सकते. हमारा शरीर सुविधाओं का इतना अभ्यस्त हो चुका है, इतनी बीमारियां पाल चुका है कि अब चाह कर भी कुछ हो नहीं सकता. अब समझ में आ रहा है कि मजदूरों-सा सुख हमारी किस्मत में नहीं था, न कभी होगा अब.’

इतना कहकर वे अकसर टसुए बहाने लगते. हथेलियों से अपना सिर फोड़ने लगते. ईश्वर को दोष देने लगते कि पूर्व जन्म में हमने क्या पाप किया था, जो तूने हमें मजदूर न बनाकर पूंजीपति बना दिया !

पूंजीपतियों को इतना दुखी देखकर मजदूरों का दिल पिघलकर मोम हो जाता. वे अपने को पूंजीपतियों से अधिक सुखी समझने लगते. कहते कि यह हमारे पूर्व जन्मों का संचित फल है कि हम मजदूर के घर में पैदा होकर मजदूरी कर रहे हैं. जीवन का असली सुख, ये बड़ी तोंद वाले, ये करोड़ों और अरबों के मालिक क्या जानें ?

इस वातावरण में हड़ताल और तालाबंदी का युग जा चुका था. ट्रेड यूनियनों की जरूरत खत्म हो चुकी थी. मर्द किसी भी बात पर औरत को रूई की तरह धुन डालते थे. फिर थोड़ी देर बाद कुछ सोचकर उसकी मलहम पट्टी कर देते थे, उसके गाल चूम लेते थे, उसकी खूबसूरती और वफादारी की तारीफ कर दिया करते थे. इसके बाद औरत और मर्द मिलकर मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर की तर्ज पर तू मेरी ये और मैं तेरा वो गाने‌ लगते.

आसपास के सभी मर्द और सभी औरतें भी इन्हीं उपायों से सुखी और संतुष्ट थे. नेता जोर का झटका धीरे से देते थे और जनता के साथ मटक-मटक कर नाचते थे.

पहले सत्य को असत्य से काफी जूझना पड़ता था, फिर भी सत्य पर अकसर ही असत्य की विजय हो जाती थी. किसी को इस पर आश्चर्य भी नहीं होता था बल्कि इसके विपरीत होने पर लोग चकित हो जाते थे. जरूर इसके पीछे कोई बड़ा षड़यंत्र है, ऐसा मानते थे. सरकार जासूसी शुरू कर देती थी कि असत्य पर सत्य की इस विजय का मास्टरमाइंड कौन है और कहां है ? उसकी खोज होती.

अगर वह जज भी होता तो उसे किसी न किसी बहाने, किसी आरोप में पकड़ लिया जाता और मार दिया जाता या जेल में सड़ा दिया जाता. मार दिया जाना तब हवा और पानी की तरह स्वाभाविक हो चुका था, जैसा कि आजकल है.

वक्त बदला. रणनीति आगे बढ़ी. सत्य और असत्य में घनघोर मैत्री का अभूतपूर्व युग आरंभ हो गया. यह दोस्ती दुनिया के सामने अनोखा उदाहरण बन गई. इसे हमारी संस्कृति की विजय के रूप में निरूपित किया गया. अब जहां भी असत्य संकट में फंसता, सत्य उसकी मदद के लिए दौड़ पड़ता और इसके विपरीत भी होता. दोनों सगे भाई जैसे लगते. एक के बगैर दूसरे का गुजारा नहीं था. दोनों की शक्ल-सूरत तक एक सी हो गई थी. चाल-ढाल, कपड़े तक एक से हो गए थे.

असत्य को अकसर सत्य और सत्य को असत्य समझ लिया जाता. अगर एक के पास समय नहीं होता तो दूसरा उसकी ड्यूटी बजाने चला जाता. मामला जटिल होता तो दोनों जाते और जैसे भी संभव होता, मसला हल करके आते, चाहे इसके लिए जो भी करना पड़े.

जातिप्रथा और सांप्रदायिकता का विरोध बंद हो चुका था. व्यापक सहमति थी कि दोनों का होना देश के व्यापक और दीर्घगामी हितों के लिए आवश्यक है वरना यह देश कभी प्रगति नहीं कर पाएगा, विश्व की तीसरी बड़ी आर्थिक ताकत नहीं बन पाएगा. विश्व की तीसरी बड़ी ताकत बनना इतना आवश्यक हो चुका था कि जातिप्रथा और सांप्रदायिकता को सज्जनों ने गले लगा लिया था.

मतलब विरोध और अंतर्विरोध सभी रूपों में समाप्त हो चुके थे. किसी विचारधारा का किसी विचारधारा से कोई वास्तविक विरोध नहीं था. सर्वत्र सर्वसम्मति का सुखद वातावरण था. किसी पार्टी का, किसी पार्टी से असली विरोध नहीं था. चोर का पुलिस से और पुलिस का चोर से तो पहले भी विरोध नहीं था. अब तो जिसके घर में सेंध लगाई जाती, उसका भी चोरों और पुलिस से विरोध समाप्त हो चुका था. ले जाओ, जो ले जाना हो मगर जान बख्श दो, इस पर सहमति थी.

तब चोर, पुलिस के संरक्षण में मकान मालिक की सहमति से सब काम कर लेते, जिसे नैतिक रूप से चोरी कहना भी ग़लत है. राष्ट्रवाद को अब केवल भगवा रंग की जरूरत नहीं थी, वह हर रंग और हर ढंग में उपलब्ध था. फैशन मल्टीकलर राष्ट्रवाद का था. दुकानों में हरेक की पसंद का राष्ट्रवाद सुलभ था. गरीब भी अगर मल्टीकलर राष्ट्रवाद पसंद करते तो उन्हें सरकार‌ इसके लिए सब्सिडी देती थी.

फिर एक दिन प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि कलयुग जा चुका है, सतयुग आ चुका है‌. फिर साधु-संतों ने भी यही कहा. मौलवियों से पूछा गया तो उन्होंने असहमति प्रकट नहीं की. फिर जो जहां भी था, सबने कहा कि कलयुग जा चुका है, सतयुग आ चुका है. टीवी ने, अखबार ने, फिल्मों ने, सोशल मीडिया ने कहा कि सतयुग आ चुका है.

गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले पोस्टर चिपक गये, बैनर लग गए- सतयुग आ चुका है. सरकारी गजट में छप चुका कि सतयुग आ चुका है. जगह-जगह सतयुग महोत्सव, सतयुग महामहोत्सव और सतयुग महामहामहोत्सव आयोजित होने लगे.

बस एक ही अविश्वसनीय घटना हुई कि एक बच्चे ने इस सबसे ऊब कर टीवी फोड़ दिया, मोबाइल तोड़ दिया, इंटरनेट का तार तोड़ दिया, पोस्टर फाड़ दिए. उसके बाद उस घर से वह बच्चा गुम हो गया, सतयुग भी गुम हो गया और एक दिन वह घर और उसके प्राणी भी गुम हो गए.

इस मामूली घटना के अलावा कहीं एक पत्ता तक नहीं खड़का, कोई कुत्ता तक नहीं भौंका. किसी को कोई ग़म नहीं हुआ क्योंकि सच तो यह था कि कलयुग जा चुका था, सतयुग आ चुका था.

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