
आदिवासी मेहनतकश जनता पर दमन के खिलाफ भारत के 14 संगठनों के संयुक्त मोर्चा ‘मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान’ (MASA) की ओर से एक वक्तव्य जारी किया गया है. मासा के घटक संगठन, यूनियन व फ़ेडरेशनों में शामिल है – ऑल इंडिया वर्कर्स काउंसिल, बिहार निर्माण व असंगठित श्रमिक यूनियन, सेंटर फॉर स्ट्रगलिंग ट्रेड यूनियंस, ग्रामीण मजदूर यूनियन, बिहार, इंडियन फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियंस (सर्वहारा), इंकलाबी मजदूर केन्द्र, इंकलाबी मजदूर केन्द्र, पंजाब, जन संघर्ष मंच हरियाणा, कर्नाटक श्रमिक शक्ति, लाल झंडा मजदूर यूनियन (समन्वय समिति), मजदूर सहायता समिति, न्यू डेमोक्रेटिक लेबर फ्रंट (स्टेट कोऑर्डिनेशन कमिटी), सोशलिस्ट वर्कर्स सेंटर, तमिलनाडु, ट्रेड यूनियन सेंटर ऑफ इंडिया.
’मासा’ की ओर से यह वक्तव्य एक ऐसे समय में जारी किया गया है जब भारत की ब्राह्मणवादी हिन्दू फ़ासिस्ट मोदी सरकार ने देश के मेहनतकश स्वाभिमानी जनता का एकमात्र सच्चा प्रतिनिधि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी माओवादी के गुरिल्लाओं को ख़त्म करने के लिए हमला बोल दिया है और आये दिन उनकी हत्या कर रहा है. अभी महज़ एक साल के अंदर ही क़रीब साढ़े पांच सौ माओवादी नेता से लेकर आम नागरिकों तक की हत्या कर चुकी है.
इतना ही नहीं भारत के टैक्स पेयर्स के द्वारा जमा सरकारी ख़ज़ानों का खुल्लम खुल्ला दुरुपयोग कर माओवादियों के कमजोर तत्वों को लालच देकर एक ओर उसे विभीषण बना रही है तो वहीं दूसरी ओर आदिवासियों के जल, जंगल, ज़मीन को लूटने के लिए देशी-विदेशी कॉरपोरेट कंपनियों के साथ सौदा कर रही है. आज भी यह सरकार छत्तीसगढ़ के इन्द्रावती टाईगर्स रिज़र्व में हज़ारों की तादाद में भाड़े के गुंडों को भेजकर माओवादियों पर हमला बोला है और फ़र्ज़ी मुठभेड़ में एक कथित माओवादी की हत्या कर दिया है. इसके साथ ही और भी हत्या करने के लिए हत्यारों का यह गिरोह जंगलों में घूम रहा है.
यही कारण है कि 4 जुलाई को ‘मासा’ की ओर से जारी यह संयुक्त वक्तव्य का महत्व हज़ार गुना बढ़ जाता है. मासा अपने वक्तव्य में कहता है कि सरकार के द्वारा दशकों से जारी भारत विजय के अश्वमेध यज्ञ में अश्व की नहीं, मनुष्यों की बलि दी जाती रही है. यह यज्ञ न्याय नहीं, हिंसा की वेदी पर विनाश-तांडव है. ऑपरेशन कगार के तहत सुरक्षा बलों द्वारा तथाकथित मुठभेड़ में भाकपा (माओवादी) के महासचिव बासवराजू सहित 27 माओवादी नेताओं की हत्या इसी अश्वमेध यज्ञ की अगली कड़ी है.
गौरतलब है कि माओवादी नेताओं के शव उनके परिजनों को नहीं सौंपे गए। इसे केंद्र सरकार और मीडिया द्वारा बड़ी बेशर्मी से ‘विजय’के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. गृह मंत्री इसे ‘नक्सलवाद के खिलाफ भारत की लंबी लड़ाई में ऐतिहासिक उपलब्धि’ करार देकर खुशी मनाता पकड़ा गया है. उसने दावा किया है कि 2026 तक नक्सलवाद को खत्म कर दिया जाएगा. पूरी व्यवस्था के हाथ रक्तरंजित हैं.
इस कार्रवाई को लेकर मानवाधिकार और प्रगतिशील संगठनों ने इसे ‘सामूहिक हत्या’ करार दिया और आरोप लगाया कि यह एकतरफा कार्रवाई है, जिसमें संवैधानिक प्रक्रिया का खुलकर उल्लंघन किया गया है. यदि सुरक्षा बलों के पास बासवराजू की गिरफ्तारी के लिए पर्याप्त जानकारी थी, तो उसे विधिक तरीके से गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? भारतीय संविधान ‘न्याय की प्रक्रिया’ और ‘व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा’ के बारे में बताती है.
‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’ के बारे में अनुच्छेद 21 यह सुनिश्चित करता है कि ‘किसी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना उसके जीवन या स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता.’ राज्य सरकार ने इस घटना की जांच के लिए अभी तक किसी न्यायिक आयोग की घोषणा नहीं की है. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 196 के अनुसार, हिरासत या मुठभेड़ में मृत्यु की न्यायिक जांच अनिवार्य है. इस मामले में इस कानून का उल्लंघन किया गया है.
यह भी उल्लेखनीय है कि माओवादी संगठनों और विभिन्न जनतांत्रिक मंचों की ओर से सरकार के साथ वार्ता की संभावनाएं तलाशी जा रही थी. कुछ समाचार सूत्रों के अनुसार, माओवादी नेतृत्व इस उम्मीद में था कि कोई संवाद स्थापित होगा. कुछ अपुष्ट खबरों के हिसाब से दोनों पक्षों के बीच शान्तिवार्ता चल रही थी. लेकिन सरकार ने शांति की संभावना को नष्ट कर दिया और बातचीत के बदले एकतरफा सैन्य ऑपरेशन को तरजीह दी.
इस पूरी स्थिति में यह स्पष्ट है कि यह ‘एनकाउंटर’ नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक हत्या है. न्याय का सिद्धांत कहता है कि कोई कितना भी बड़ा अपराधी क्यों न हो, उसे निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है. यहां न तो आरोपों की पुष्टि हुई, न कोई गिरफ्तारी, न मुकदमा – सीधे मौत. यह ‘राज्य द्वारा हत्या’ की श्रेणी में आता है.
यह कार्रवाई केवल एक संगठन पर हमला नहीं है, बल्कि यह देश की शोषित-पीड़ित जनता, विशेषकर बस्तर क्षेत्र और समूचे देश की आदिवासी आबादी पर एक निर्णायक और योजनाबद्ध हमला है. वर्तमान सरकार की नीतियां महज आदिवासी अधिकारों की उपेक्षा नहीं हैं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. यह साम्राज्यवाद की विश्वव्यापी लूट का हिस्सा है.
‘विकास’ के नाम पर चल रही यह नीति वास्तव में विनाश का पर्याय बन चुकी है – एक ऐसा विनाश जो न केवल आदिवासियों को तबाह करता है, बल्कि पूरे मेहनतकश वर्ग के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगाता है. यह सरकार, अपनी पूंजीपरस्त नीतियों के तहत, समाज के सबसे वंचित वर्गों-तबकों को कुचलते हुए उस रास्ते पर चल रही है जहां अंत में केवल मुनाफा जीतेगा, मेहनतकश जनता हार जाएगी.
इस अश्वमेध यज्ञ का लक्ष्य है – नव उदारवादी व्यवस्था के अधीन देशी-विदेशी पूंजी की लूट को सुगम बनाना. इसके लिए देश के जंगल, पहाड़ और नदियों को रौंदा जा रहा है जो सदियों से आदिवासी समुदाय की जीवनरेखा रहे हैं. हजारों एकड़ वनों को ‘रक्षा’, ‘औद्योगिक गलियारे’ या ‘माइनिंग लीज़’ के नाम पर उजाड़ा जा रहा है. आदिवासी ग्रामसभाओं की अनुमति की अनदेखी कर, संविधान की पांचवी अनुसूची की धज्जियां उड़ाकर जमीनों पर जबरन कब्जा किया जा रहा है.
हद तो तब हो गई, जब इस संगठित लूट के खिलाफ जो भी आवाज़ उठाता है, उसे माओवादी कहकर गोली से चुप करा दिया जाता है. अब विरोध एक जुर्म है, और इंसाफ की मांग देशद्रोह! प्रश्न यह है – यह खेन से सनी चुप्पी और झूठा नैरेटिव कब तक थोपा जायेगा ?
यह सब केवल इसलिए किया जा रहा है जिससे अदानी और अंबानी जैसे मुट्ठीभर पूंजीपति घराने संसाधनों पर अपना कब्जा और बढ़ा सकें. यह अब किसी रहस्य की बात नहीं रही कि केंद्र सरकार बस्तर और अन्य खनिज-समृद्ध आदिवासी इलाकों को खाली कराने के मिशन पर है, जिससे वह इलाके को खनन पूंजीपतियों के हवाले कर सके. माओवादी कार्यकर्ताओं की यह हत्या उसी दिशा में एक ‘निर्णायक कार्रवाई’ है – जैसा सरकार खुद मान रही है.
आदिवासी समुदाय की बेदखली और लूट हेतु सरकार के इस युद्ध के खिलाफ उनका संघर्ष माओवादी विद्रोह से पहले से चलता आ रहा है. साथ ही, यह हमला केवल आदिवासी समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जद में देशभर की मेहनतकश जनता है – चार श्रम संहिता के जरिये मजदूर वर्ग पर हमला, कृषि कानूनों के जरिये किसानों पर हमला, जनवादी अधिकारों का दमन आदि हर जगह सरकार हमलावर है. वह जनांदोलनों को खत्म करने पर आमादा है.
इसलिए इस शोषण, अन्याय और दमन की रक्तरंजित लकीर के विरुद्ध आवाज उठाना अब केवल जरूरी नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अनिवार्यता बन चुका है. हम मेहनतकश जनता का आह्वान करते हैं कि वह अपनी संगठित चेतना और संघर्ष की मशाल से शासक वर्ग के लूट-खसोट और दमन का डटकर मुकाबला करे.
‘मासा’ अपनी आवाज बुलंद करते हुए मांग करता है कि देश की मेहनतकश स्वाभिमानी जनता कॉर्पोरेट लूट के खिलाफ, आदिवासी मेहनतकश जनता के शोषण-दमन के खिलाफ, ऑपरेशन कगार (ऑपरेशन ब्लैक फारेस्ट) के खिलाफ, एक्स्ट्रा जुडिशियल किलिंग के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाये और सत्ता के इस खूनी खेल को बंद कराये.
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