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अंजन कुमार की कविता वैचारिक बोध से लैस, व्यवहारिक कविताएं है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 10, 2025
in गेस्ट ब्लॉग
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इन्दरा राठौर

सुअर एक पशु है. बस सिर्फ एक पशु. जीव जगत में अस्तित्व भी उसका, नाम मात्र का है. न कोई कीमियागिरी है और न कोई चालाकी. अपशिष्ट मल खाता है. अपने आसपास के जीव जगत में जब सुअर को देखता हूं, लगता वह एक निर्दोष जीव है. किन्तु गाली और मुहावरे में इसका प्रयोग जरुरतों से बढ़े और धड़ल्ले में हुआ. इस तथाकथित सभ्य और सभ्रांत समाज ने हमेशा सुअर, कुत्ते की प्रजाति को अश्लील गालियां दी है. यह अंजन है कि उसने अपनी कविता में, यह नहीं किया ! बल्कि फूल को फूल और शूल को शूल कहा.

यह तो मैं कह रहा — ; और कब ? जब समय बहुत-बहुत हिंसक, क्रूर, अराजक और जटिल हो गया है, उस यथार्थ से उत्पन्न गहरे असंतोष और गुस्से को बहुत कलात्मक ढंग से कह पाना मुश्किल हो दिखा है. कवि के लिये कविता को उसके वैचारिक आवेग में ही बनाए रखना कम मुश्किल काम नहीं रह गया है. ऐसी स्थिति में कविता स्वभावत: ही अभिधात्मकता में अभिव्यक्त होती है. वस्तुत: तब स्थितियां जो बनती है वह कविता के वास्तविक कर्म के काफी नजदीक की बात है. फिर तो आप सुअर को सुअर ही कहोगे और गाय को गाय.

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अभिधा में जब भी कोई बात रखी जाती तो यह कहना न होगा कि निर्लज्ज, नंगा और वस्त्रहीन को नंगा ही कहा जाएगा. इसी तरह बातों को सीमित कर कहा जाए तो बनियान धारी को ‘बनियान’ और चड्डीधारी को ‘चड्डी’ ! अभिधा में हिंदी कविता ने लगातार इसी तरह से जब भी कहा, खरा सच को कहा है. जो अब अंजन कुमार की कविता का जायका बन आया. यहां प्रस्तुत कविताएं हैं न‌ई सदी के कवि अंजन कुमार की, जिसने लगातार हिंदी को एक पर एक बेहतरीन कविताएं दी है. वैचारिक बोध से लैस, व्यवहारिक कविताएं दी है

हत्यारे

इतिहास के पन्नों पर वे कहीं नहीं थे
और थे भी तो एक बदनुमा दाग की तरह
एक हत्यारें के रूप में
क्योंकि हत्या से ही शुरू होता है उनका इतिहास

उनका इतिहास एक काला पन्ना है
उनकी टोपी की तरह
खोखली बहादुरी में बांह तक मुड़ी हुई
छक सफेद शर्ट की तरह
जिसमें एक कतरा खून तक नहीं
देश की आजादी के नाम
एक डंडा है
जो हांकलना चाहता है पूरी जनता को भेड़ की तरह
और एक निक्कर, जो प्रतीक है
हर प्रतिरोध के दमन का

दरअसल उनके पास ऐसा कुछ भी नहीं
जिसके लिए वे गर्व कर सके
और यही आत्महीनता उन्हें कुंठित और हिंसक बनाती है.
क्योंकि वे जानते हैं जिसका कोई इतिहास नहीं होता
उसका कोई भविष्य भी नहीं होता

इसलिए वे अतीत में अपनी जगह के लिए
इतने बैचेन, इतने आतुर हैं
कि इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने में लगे रहते हैं
इतिहास की नई-नई व्याख्याएं करते हैं
देश के महानायकों के नामों को कब्जियाते हैं
या उनकी कतार में अपना नाम जबरन जुड़वाते हैं
जब ऐसा नहीं हो पाता
तो उन्हें बदनाम कर अपना कद बढ़ाते हैं
सड़कों के, भवनों के, पुलों के, संस्थानों के व
राज्यों आदि के नाम बदलते है

उनकी मानसिक दरिद्रता पर दया आती है
उनके अनुयायियों पर हंसी
जिससे पूछो कुछ तो बताते हैं कुछ
तोते जैसे रटा-रटाया सुनाते है कुछ
उन्हें चिल्लाने और काटने के सिवा कुछ नहीं आता
अज्ञान का खोखलापन कितना शोर मचाता है
उन्हें देख-सुनकर बहुत अच्छे से समझ आता है
दरअसल, उन्हें देशभक्त नागरिक नहीं, तोता चाहिए
क्योंकि उनकी परिभाषा में देशभक्त का अर्थ तोता होना है
जिसे सिर्फ राम राम चिल्लाना है

वे सिर्फ जनता को भटकाना जानते हैं
इसीलिए हर जरूरी सवालों को जाति, धर्म और सीमा से जोड़ देते हैं
उनके पास भटकाने के सिवा कोई चारा भी नहीं
क्योंकि किसी बेहतर भविष्य का सपना भी नहीं
है तो सिर्फ और सिर्फ झूठे जुमले
इसीलिए उन्हें पढ़े-लिखें समझदार लोगों से नफरत है
और पढ़े-लिखें मूर्खों, चापलूसों से मोह
चेतना विहीन, विवेकहीन, अंध भक्तों का दरबार
या यूं कहें इन्हीं मूर्खों से चलती है इनकी सरकार

इसीलिए
इन्हें मानव और मानवता से कभी कोई लेना देना रहा ही नहीं
ये तो सिर्फ एक खास ग्रंथ, एक खास वर्ग, एक खास जाति और एक खास संस्कृति के वाहक हैं
या यूं कहें कि एक महाझूठ के नायक हैं
एक कपोल कल्पित कल्पना जो बहलाती है मन को
मन की बात करके

वे शून्य में पैदा हुये
जैसे पैदा होती है बिमारियां
हमारी जारूकता के अभाव में

वे पैदा हुए
क्योंकि हम आधुनिक होकर भी आधुनिक नहीं हुए
शिक्षित होकर भी अशिक्षित
वैज्ञानिक युग में भी अवैज्ञानिक
विवेक रखकर भी विवेकहीन
वे जो बोलते रहे उसे ही सच मानते रहे
हमारी अंध आस्था के तावे पर वे अपनी रोटियां सेंकते रहे

क्या करे विकल्पहीन समय में
झूठ बोल कर बहलाने वाला
हमारे लिए महान है
इसीलिए तो यहां हर ठग
साधु, संत और भगवान है

हमारे पास दिमाग तो है
मगर अभी वह कई तरह से गुलाम है
इसीलिए
अपने वास्तविक दुश्मन से अनजान है

इधर बीते कुछ वर्षों में रंग पर जितना राजनीतिकरण किया जा सकता था; किया गया. मनुष्य के ईमान-धरम, प्रेम-सौहार्द्र, आपसी भाईचारा, समझ-बूझ व समरसता पर जितने आघात किए जा सकते थे; किया गय. भेदभाव, हिंसा, और इस बीच नफरत की आग इतने सुलगाये जा चुके हैं कि रंग अपने अर्थवत्ता से च्युत होता दिखाई देने लगा ! वह अपने स्वभाविकता से अलग घृणा रूप में पहचाना जाने लगा. पर कहना न होगा कि इस विषम परिस्थितियों में भी ‘लाल’ ‘हरा’ ‘नीला’ नारंगी सबकी नैसर्गिक पहचान को हिंदी ने अब तक अक्षुण्ण बनाए रखा.

हिंदी में रंग को लेकर काफी कविताएं लिखी गई है. रंग पर हमारे समय के जरूरी कवियों में Sharad Kokas की पहली कविता संग्रह ‘हमसे तो बेहतर रंग है’ है, तो चित्रकार कवि Kunwar Ravindra के दो-दो काव्य संग्रह ‘रंग जो छूट गया था’ व ‘बचे रहेंगे रंग’ शीर्षक से प्रकाशित है. तथापि रंग पर लगभग सभी साथी कवियों की कविताएं भी दर्ज हैं. यानी, रंग कला के सभी माध्यमों में, उनके कला शिल्पियों में, वैसा ही जीवन्त बना हुआ है जैसा कि माना गया है.

अतः रंग के संदर्भ में अंजन की सुनी सारी जानकारी इत्तेफाक रखने वाले हैं. कला और मनुष्य जीवन में रंग की संश्लिष्टता यदि बने हुए हैं और इतने गहरे में पैठ बनाई हुई कि यथार्थ, रंग के खूबसूरत बिम्ब जितना ही उड़ान भर सकता है, जितना सच के करीब जा सकता है वह अन्य बिम्ब के लिए अनछुए हैं. निस्संदेह अंजन के इस कथन पर मेरी पूरी सहमति है कि रंग की अपनी भाषा और माधुर्य है, उसका अपना अविस्मृत स्वाद है. जो अंजन की इस कविता के काव्य पंक्तियों में एक नयेपन की बानगी लिए आए हैं.

मैं एक दिन
रंगों के स्वाद के बारे में जानने निकला
आपको आश्चर्य होगा जानकर
कि किसी चित्रकार ने नहीं
बल्कि उस आदमी ने बताया मुझे
ठीक-ठीक हरे रंग का स्वाद
जिसने हरी मिर्च के साथ
सूखी रोटी खाने की कला सीख रखी थी
और जिसकी देह से चिपका हुआ था
सूखकर सफेद रंग का स्वाद

यहां मुझे कवि आलोचक विजेन्द्र के विपरीत तत्वों की एकरूपता संबंधी तथ्य याद हो आए कि एक कलाप्रेमी, स्वप्नदर्शी चित्रकार की तूलिका में रंग का स्वाद धूमिल के शब्दों में कहें तो ‘लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो, उस घोड़े से पूछो जिसके मुंह में लगाम है.’ तो यह रंग की तरह है.

रंग

मैंने सुना है
रंगों की अपनी भाषा होती है
और भाषा का अपना एक स्वाद
इसका अर्थ यह हुआ
कि रंगों का भी अपना स्वाद होता है
अगर होता है
तो कैसा होता होगा रंगों का स्वाद ?

मैं एक दिन
रंगों के स्वाद के बारे में जानने निकला
आपको आश्चर्य होगा जानकर
कि किसी चित्रकार ने नहीं
बल्कि उस आदमी ने बताया मुझे
ठीक-ठीक हरे रंग का स्वाद
जिसने हरी मिर्च के साथ
सूखी रोटी खाने की कला सीख रखी थी
और जिसकी देह से चिपका हुआ था
सूखकर सफेद रंग का स्वाद

पीला रंग
मुझे खींच ले गया
सरसों के खेत की ओर
पर पीले रंग का स्वाद
मुझे पता चला
खेत में काम कर रही उस स्त्री से
जिसका चेहरा
अपनी बेटियों के हाथ पीले होने की प्रतिक्षा में
पीला पड़ चुका था

मैं आगे बड़ा
और खेत की मेड़ पर बैठे
आकाश की ओर देख रहे
एक किसान से पूछा
नीले रंग का स्वाद
उसने अपनी पीठ दिखाते हुए कहा-
जो अपनी मिट्टी के रंग का स्वाद जानते हैं
नीले रंग का स्वाद
उनकी पीठ पर दर्ज होता है

शाम ढल रही थी
आकाश लाल हो चुका था
मैं उठा और चल पड़ा यह सोचकर
कि रात होने से पहले
मुझे जान लेना चाहिए
ठीक-ठीक लाल रंग का स्वाद

अंजन कुमार की कविताओं में एक बड़ा पक्ष विडंबना बोध है. एक कवि जब अपने समय, सन्दर्भ और उसके यथार्थ से टकराता है तब स्वभाविक रूप से उससे उपजे विडंबना ही उसका पहला दृश्य चित्र होता है. यह दृश्य चित्र भी सिनेमाई रूप में अकल्पनीय व गतिशील लिए होता है. जिसे कवि सरल भाषा और शिल्प में पकड़ भी ले, परन्तु उसके परिवर्तनशील चरित्र की गति, उसे टुकड़ों-टुकड़ों में विभक्त कर गड्मड् बना देता है. तब कवि उस कंटेंट को रखने में बिम्ब का विधान करता है.

अंजन के यहां भी समय, संदर्भ और यथार्थ की जटिलता में जो फांक है, वह दृष्टि और चेतना के स्तर में ब्यौरों की सम्पूर्णता में मुनासिब कम है इसीलिए ही यहां बिम्ब की प्रधानता है. बिम्ब की सबसे खूबसूरत बात यह है कि वह बहुकोणीय, बहुआयामी बातों, चीजों, मुहावरों के प्रकटीकरण का अचूक अस्त्र सा है. इस बीच अंजन की कविताओं में आए बिम्ब से यह साबित होता है कि वे इस अस्त्र के प्रयोग में कर्मवीर हो चलें हैं. यानी साधक की गुणवत्ता साध्य के भेदन में है तो यह कमाल अंजन ने बखूबी किया है. कहना आतिशय नहीं होगा.

उनकी नजर में

गोल चांद और अपने बीच
पसरे हुए अंधेरे को
देखते हुए लगा
एक गहरा कुआं है
जिसकी सतह पर
घास की जगह
काई जम गई है

समय किसी सांप की तरह
रेंग रहा है फन फैलाए
हवा में फैला जहर
धीरे-धीरे
सुन्न कर रहा है दिमाग को

अफवाहों के आकाश पर
आंतक के डैने फैलाये
उड़ रहे हैं चमगादड़
और उन्माद में चूहे
और गहरा कर रहे हैं
कुएं को

धाार्मिक और राजनीतिक
ईंट-पत्थरों के नीचे
कुचल दिए गए वे तमाम चेहरे
जिनसे सड़े हुए प्रजातंत्र की दुर्गंध आ रही है
देखकर मूर्खताओं का मुंह
हंस रहे हैं
एक भयानक हंसी
गूंज रही है जिसमें
भयावह भविष्य की चीख

हाथ जेब में
चिल्हर पैसों के बीच
ढूंढ रहा है साहस
जबकि सफेद आस्तीनों मे
छुपे हुए हाथों के लिए
हाथ का मतलब
झंडा, बैनर, पोस्टर, और वोट है
मुट्ठी कदाचित नहीं

उनकी नजर में
आदमी सिर्फ यहां
नर्म गोस्त का टुकड़ा भर है
खूंखार सियासी जबड़ो के बीच

अच्छी रचना अपने उद्देश्य में सतत गतिशील बनी रहती है. उसकी औजार हमेशा अपने धार में तेज बनी रहती है. कंटेंट के स्तर पर नैचुरल होते हुए, कृत्रिमता का प्रखर विरोधी होता है तथा विचारधारा के स्तर पर आवश्यक कला संवेगो के समानांतर रख चीजों को परिष्कृत रुप में पाठक के पास लाती है. अंजन कुमार की कविताएं इसी साफगोई के कारण महत्वपूर्ण है.

एक कलाकार के भीतर संदेह का जनमना अपने आसपास के दृश्य चित्रों से आरंभ होता है, बाजार में बढ़ते प्रभावों को कवि संभावनाओं और सच के बहुत करीब देख रहा है कि कह रहा है; यह वह नहीं है बल्कि

एक नयी भाषा में
रची जा रही है दुनियां
जिसमें न हमारी आत्मा होगी
न हमारी संस्कृति
और न ही हमारे जमीन की गंध

हत्यारी संभावनाओं ने दस्तक दी है, उसकी रूख, उसके चाल चलन से हमारे गत्यात्मक था के अभाव में जब

बदल जायेंगी जहां
जीवन की सारी परिभाषाएं
बदल जायेगें स्वप्नों के अर्थ

जब

स्वाद
जीभ तक सिमटकर रह जायेंगे
और भूख निकल आयेगी
पेट से बाहर

तब

आदर्श
जूते की तरह
पहने जायेंगे
बदले जायेंगे मूल्य
कपड़ों की तरह

इसलिए कवि कह रहा है कि

जहां विकास और विनाश में
कोई फर्क नहीं होगा

रात
जहां दिन से अधिक
चमकदार होगी

और
जीवन जहां नाचेगा
प्रेत की तरह
मृत्यु के संगीत पर

मुत्यु के संगीत पर

एक नयी भाषा में
रची जा रही है दुनियां
जिसमें न हमारी आत्मा होगी
न हमारी संस्कृति
और न ही हमारे जमीन की गंध

बदल जायेंगी जहां
जीवन की सारी परिभाषाएं
बदल जायेगें स्वप्नों के अर्थ

स्वाद
जीभ तक सिमटकर रह जायेंगे
और भूख निकल आयेगी
पेट से बाहर

आदर्श
जूते की तरह
पहने जायेंगे
बदले जायेंगे मूल्य
कपड़ों की तरह

जहां विकास और विनाश में
कोई फर्क नहीं होगा

रात
जहां दिन से अधिक
चमकदार होगी

और
जीवन जहां नाचेगा
प्रेत की तरह
मृत्यु के संगीत पर

स्मृति हमारा आज या वर्तमान नहीं है. नहीं है भविष्य भी. परन्तु जीवन को भर देता है वह उन खूबसूरत अहसासों से जिसे खूब जिया और पाया हमने. जीवन में सिर्फ सुख ही सुख नहीं होते, दुख भी है जीवन के; और मुकाबले बड़े भी. परन्तु कौन चाहता है, कि किसे उस तरह याद रहते हैं दुख, जैसा कि याद आता है सुख. दुख -और सुख का अवसान में सुख का अवसान रह-रह याद आते हैं और उसके खूबसूरत अहसासों से पुलकने लगता है मन.

न‌ई सदी की हिंदी कविता में विचार बोध, प्रेम, रूप, रस, सौंदर्य के साथ आए अंजन कुमार की यह एक स्मृति जीवी संवेदनात्मक कविता है. जिसमें अंजन गोते लगा रहे हैं. अंजन इस कविता में स्वयं के द्वारा नकार दिए एक स्वेटर को अपना काव्य विषय बनाए हैं. जिस स्वेटर को वे बरसों पहले निकाल फेंके थे स्वयं के बड़े हो मान लेने पर, परन्तु उससे पाए नर्म और गर्म अहसासों के कारण, अक्सर वे उसे ढुंढते रहे थे मन ही मन. वही स्वेटर, वही मटमैला, सफेद स्वेटर आज फिर दिखाई दे गया जब निकाल रही थी मां पुराने कपड़े.

अंजन इस कविता में न सिर्फ उस स्वेटर से पाए नरमी और गरमी से अभिभूत रहे बल्कि उल्लेखनीय उनके लिए यह भी है कि उसे मां ने बुनी थी, मां ने बनायी थी. किसलिए, क्यों बनायी, क्यों बुनी थी मां स्वेटर? अंजन की स्मृति का दुख, तकलीफ, पीड़ा यहां उजागर होता तो होता है. साथ ही उसके खूबसूरत अहसास यानी सुख जो इस कविता के भीतर अंडर करंट में प्रवाहमान है. अंजन इस कविता में सुख दुख के ईतर एक और भी बड़े अहसास से भरे दिखाई दे रहे हैं वह यह भी नहीं है

मन कर रहा था
आज इसे फिर से पहनकर
लौट जाऊं
अपने बचपन में
जी लूं इसकी नर्म गर्माहट पूरी
जो रह गई थी अधूरी

बल्कि वास्तविक तो यह है

ऐसे ही गुजर रह जाते हैं
कई बचपन
इस एहसास के बिना ही

अंजन की इस कविता में असल में उन लोगों के प्रति करूणा भर आई है, उन लोगों के प्रति विपुल संवेदना उतर आई है, जिनके पास इस तरह के अहसास से भरने का विकल्प जीवन के कठिन संघर्ष में घिसट जाने के कारण शेष नहीं है, नहीं बचा उनके पास ऐसी कोई भी यादें. अंजन इस कविता में बचपन को बचाए जाने की चिता से सराबोर हैं उस पर उनका जोर है.

स्वेटर

पुराने कपड़ों को फेंकती नहीं थी मां
रख देती थी संभालकर एक पेटी में
जिन्हें एक दिन
वह दे देती थी किसी जरूरतमंद को
या फिर ले लेती थी नये बर्तन
उन कपड़ों के बदले

आज जब मां
निकाल रही थी पुराने कपड़े
तो न जाने कहां से निकल आया
मेरे बचपन का स्वेटर
मटमैले और सफेद रंग का
जो दबा हुआ था कई रंगों के नीचे
पर जिसका रंग उड़ा नहीं था जरा भी
वह आज भी उतना ही नर्म और गर्म था
जितना की उस वक्त
जब मां ने बुना था इसे
अपने हाथों से
और जिसे पहनकर
मैंने काटे थे अपने जाड़े के दिन

न जाने कैसी धुन थी
न जाने कैसा गुस्सा
कि उतारकर एक दिन इसे
मैंने ही फेंक दिया था कहीं
बड़े हो जाने की जिद में

उसके बाद
वह फिर कभी नहीं मिला
बहुत कोशिश की उसे ढूंढने की
उसके खो जाने पर
बहुत दुखी थी मां

उसकी स्मृतियां ही रह गई थी मेरे पास
जो पड़ती जा रही थी धुंधली
जिसके रंग कभी-कभी
दिख जाया करते थे
मुझे मां की बातों में

इतने दिनों बाद
आज मिलने पर उसके
इतना खुश था
कि यकीन नहीं हो रहा था
यह मेरा बचपन है
उसे हाथों में उठाकर
मैं पूछ बैठा मां से
मां ! क्या सचमुच
मैं इतना छोटा था?
इतना सुंदर था मेरा बचपन
जिसे बुना था तुमने
अपने हाथों से
वह कुछ नहीं बोली
बस हल्के-से मुस्कुरा दिया देखकर

मन कर रहा था
आज इसे फिर से पहनकर
लौट जाऊं
अपने बचपन में
जी लूं इसकी नर्म गर्माहट पूरी
जो रह गई थी अधूरी

मगर ऐसा कहां होता है

ऐसे ही गुजर रह जाते हैं
कई बचपन
इस एहसास के बिना ही

बहकी हुई बातों के इतर विश्वास से भरा आदमी कुछ कह रहा है तो जाहिर है उसके पास साहस और ईमान है. यह साहस और ईमान है जो, वह प्रेम के हैं; कि कवि समृद्ध, सामर्थ्यवान ऊर्जा से भर कह रहा

मेरे पांव इतने गहरे धंसे हैं जमीन में
कि छू सकता हूं आकाश
देख सकता हूं उसके पार भी

अंजन कुमार न‌ई सदी की हिंदी कविता में पदार्पण करने वाले, वे कवि हैं जिनका लिखा, भरोसे का है. डर को, निडर कर साहसी बनाने के हैं. उनकी कविता कुछ बड़े बिम्बों के मार्फत यह बता पाने में धैर्यवान सामर्थ्य व चेतना से लैस कविताएं हैं कि कहना हो रहा है

कोई भी चिड़िया
अब बना सकती है अपना घोंसला
निडर होकर मेरे कंधों पर

या कि; कर सकता है

“कोई भी थका-हारा
देर तक सुस्ता सकता है मेरी छांव में
बच्चे डाल सकते हैं मुझमें झूला
बूढ़े टिका सकते हैं अपनी पीठ

दावेदार कविता, एक परिणिति में ठहरती नहीं है, उससे आगे जाती है यानि

मैं सूखने के बाद भी
हरा रह सकता हूं
दे सकता हूं ऊर्जा
संचित होकर पृथ्वी के गर्भ में

यह तभी संभव है जब, आप, हम
पाने से अधिक देना सीख लिए हों और मरने से अधिक जिंदा रहने के गुर समझ ग‌ये हो! माने कि आप वाकई में

प्रेम करना सीख लिये हों
वह भी

तुम्हारे साथ रहकर

तभी आप दावेदार हो सकते हैं

तुम्हारे साथ रहकर

मेरे पांव इतने गहरे धंसे हैं जमीन में
कि छू सकता हूं आकाश
देख सकता हूं उसके पार भी

कोई भी चिड़िया
अब बना सकती है अपना घोंसला
निडर होकर मेरे कंधों पर

कोई भी थका-हारा
देर तक सुस्ता सकता है मेरी छांव में
बच्चे डाल सकते हैं मुझमें झूला
बूढ़े टिका सकते हैं अपनी पीठ

मैं सूखने के बाद भी
हरा रह सकता हूं
दे सकता हूं ऊर्जा
संचित होकर पृथ्वी के गर्भ में

मैंने पाने से अधिक
अब देना सीख लिया है
मरने से अधिक जिंदा रहना

हां!
मैंने प्रेम करना सीख लिया है
तुम्हारे साथ रहकर

अंजन के यहां अकूत काव्यात्मक वैविध्यता है. वे अपनी इस कविता में वो सब ला पाए हैं जिसे कि वैचारिक कविताओं ने लगभग नजर अंदाज किया. आम तौर शंख कर्मकाण्ड और अनुष्ठान विषयक सजावटी वस्तु का रूप धारण कर चुका है और वह भी अपनी असीम शक्ति व साहस से परे प्रतीत होने लगा है जबकि सम्प्रदायिक शत्रुओं के खिलाफ युद्ध की आशंकाएं रोज नए नए रूपों में अभिव्यक्त होने लगे हैं. ऐसे में उसका वास्तविक और वांछनीय रूप में प्रयोग नितांत जरूरी है.

अंजन वस्तुत: तात्कालीन साम्प्रदायिक, सामंती शक्तियों के खिलाफ जन विद्रोह और मुखालफत के पक्षधर कवि हैं जो आदिम अस्त्रों के धार और तेज के पुनः पुनः वांछनीय प्रयोगों के पक्षकार हैं. यह उनकी इस कविता के चंद पंक्तियों में शिद्दत से वे उजागर कर पाए हैं इसमें कोई संदेह नहीं.

इसकी आवाज
जगा सकती है
सोये हुए समुद्र को
उठा सकती है
दबे हुए तूफान को
गिरा सकती है
उन पहाड़ों को भी
रोके रखा है जिसने
हमारे हिस्से की रोशनी को
यह बिगुल भी हो सकता है
जन विद्रोह का

इससे पहले
कि हमारे आदिम हथियार
बदल दिए जाएं
सजावटी समानों में
या फिर
प्रयोग किए जाएं
किसी धार्मिक युद्ध में

इसे उठाओं
फूंक दो पूरी ताकत से हवा
कि वह बज उठे
और लगे गूंजने
दसों दिशाओं में

शंख

अन्य सजावटी समानों की तरह
रखा हुआ है वह भी
घर को सजाने के लिए
जैसे सजे रखे होते हैं
बरछे, भाले, ढाल, तलवार, तीर-धनुष

देखकर उसे ऐसा लगता
छोड़ दो अभी पानी में
तो जी उठेगा

कान के पास रखकर
बंद करके आंखें
सुनो
इसका आदिम संगीत
घूमने लगेगा
पूरा समुद्र आंखों के सामने
उतरने लगोगे
इसकी गहराई में
मानो पूरा का पूरा समुद्र कैद हो
इसके भीतर
अपनी असीम शक्तियों के साथ

आदि से
युद्ध का उदघोषक रहा यही
इसी से शुरू हुए कई युद्ध
इसी से खत्म
इसी से शुरू होते हैं
कई धार्मिक कर्मकांड भी

इसकी आवाज
जगा सकती है
सोये हुए समुद्र को
उठा सकती है
दबे हुए तूफान को
गिरा सकती है
उन पहाड़ों को भी
रोके रखा है जिसने
हमारे हिस्से की रोशनी को
यह बिगुल भी हो सकता है
जन विद्रोह का

इससे पहले
कि हमारे आदिम हथियार
बदल दिए जाएं
सजावटी समानों में
या फिर
प्रयोग किए जाएं
किसी धार्मिक युद्ध में

इसे उठाओं
फूंक दो पूरी ताकत से हवा
कि वह बज उठे
और लगे गूंजने
दसों दिशाओं में

यह एक स्थिति है. आज की ताजा सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक विछोह से उत्पन्न हुई स्थिति है कि कवि में निराशा के बनिस्बत चेतावनी और आगाह है. कि जो नशा है

ये रंगीन शामें और चमकीली रातें

की वह

फीकी पड़ने लगेंगी
सुबहे खमीर में बदल जायेंगी
और दिन
अपनी हवस के बाद
घृणा से भरा खालीपन जैसा छोड़ जायेगा

वह

एक दिन
तुम रोज की तरह देखोगे आईना
तुम्हें सब दिखाई देगा
सिवाय अपने चेहरे के
यह महसूस किये बगैर
तुम निकल जाओगे घर से
हर शाम की तरह
दूसरे चेहरों के बीच
ढूंढते हुए खुद को

और तब

पाओगे एक दिन
कि हर आंख
एक सूख चुकी नदी है
जिसमें चमकते पत्थरों के सिवा कुछ भी नहीं
तुम्हारा गला सूखने लगेगा यह देखकर

यहां तक कि

तुम जब तक पानी के लिए उठोगे
एक चेहरा
तुम्हारी प्यास बुझाने
हाथों में गिलास लिए खड़ा मिलेगा
अपनी आँखों में तड़पती हुई मछलियों के साथ

यह स्थिति, यह बदलाव है कि आप समय रहते सजग नहीं हुए निर्बाध बहते रहे, चतुराई में उसे जाने समझे; तब

और
तुम पाओगे
कि तुम्हारी देह
मरी हुई मछलियों की गंध से भरा
एक मरुस्थल है.

यह एक सड़ांध है. हिन्दी कविता समय समय पर इस सड़ांध को कभी फरीद खां Rupam Mishra Archana Lark Akhilesh Srivastava Gunjan Srivastava Kapil Bhardwaj Ram Prasad Yadav Suresh Kumar Satish Chhimpa Kumar Pranjal Rai parag pawn Niranjan Kumar Shruty Kushwaha पूनम वासम Kamal Jeet Choudhary Anchit kavita kadambari brijesh anupam singh Sudarshan Sharma के यहां भिन्न-भिन्न काव्य रूपकों में अभिव्यक्त हो आई.

एक दिन

एक दिन
ये रंगीन शामें और चमकीली रातें फीकी पड़ने लगेंगी
सुबहे खमीर में बदल जायेंगी
और दिन
अपनी हवस के बाद
घृणा से भरा खालीपन जैसा छोड़ जायेगा

एक दिन
तुम रोज की तरह देखोगे आईना
तुम्हें सब दिखाई देगा
सिवाय अपने चेहरे के
यह महसूस किये बगैर
तुम निकल जाओगे घर से
हर शाम की तरह
दूसरे चेहरों के बीच
ढूंढते हुए खुद को

और पाओगे एक दिन
कि हर आंख
एक सूख चुकी नदी है
जिसमें चमकते पत्थरों के सिवा कुछ भी नहीं
तुम्हारा गला सूखने लगेगा यह देखकर

तुम जब तक पानी के लिए उठोगे
एक चेहरा
तुम्हारी प्यास बुझाने
हाथों में गिलास लिए खड़ा मिलेगा
अपनी आंखों में तड़पती हुई मछलियों के साथ

और
तुम पाओगे
कि तुम्हारी देह
मरी हुई मछलियों की गंध से भरा
एक मरुस्थल है

कैलाश बनवासी Rajkumar Soni Ashok Shandilaya Basant Tripathi Basant Sao Rajat Krishna Rajaram Bhadu Vijay Kumar #siyaram Sharma Piyush Kumar Yugal Gajendra Vasu Gandharv Anil Analhatu Anil Kanhaua Anil Kumar Srivastava Anita Singh Bharat Prasad Jaiprakash Kannoje

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