
सुब्रतो चटर्जी
दुनिया के इतिहास में शायद यह पहला मौका है कि एक क्रिमिनल प्रधानमंत्री और एक क्रिमिनल धंधेबाज़ को बचाने के लिए एक पूरे देश की बलि दी जा रही है और जनता बेशर्मी से चुप है. आप जो भी कहें, न तो यह राष्ट्रवाद के ज़हर के चलते हो रहा है और ना ही धार्मिक ज़हर के चलते. दरअसल इसके लिए भारत की स्वैच्छिक ग़ुलाम जनता, मुर्दा विपक्ष और राजनीतिक रूप से लुंपेन मध्यम वर्ग ज़िम्मेदार हैं.
उच्च सरकारी पदों पर आसीन और न्यायपालिका पर क़ाबिज़ लोग भी इसी श्रेणी में आते हैं. ये इतने ज़्यादा भ्रष्ट, अनैतिक और मरी हुई आत्मा के शारीरिक वाहक हैं कि ये किसी भी हाल में क्रिमिनल लोगों की सरकार के ग़ैरक़ानूनी फैसलों की खिलाफ़ न कुछ बोल सकते हैं और ना ही कुछ कर सकते हैं. संविधान प्रदत्त अपनी शक्तियों का सदुपयोग करना भी इनके बस का नहीं है.
ऐसी स्थिति में जब लुंपेन ट्ंप भारत को डेड इकोनॉमी घोषित करता है तो हम चुपचाप ट्रेड डील पर अदानी को बचाने के लिए दस्तख़त कर देते हैं, देश जाए भांड़ में. आपने इन हालातों में कभी किसी विपक्षी पार्टी को संसद में इन सवालों पर बोलते हुए सुना है ? जनांदोलन को शुरू करना और नेतृत्व देना तो दूर की बात है.
नये टैरिफ़ नीति के बाद भारत में करोड़ों नये बेरोजगार बढ़ेंगे और हज़ारों उद्योग धंधे तबाह हो जाएंगे, लेकिन भिखारियों को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है. जेहि विधी राखे राम जपते हुए गोबर पट्टी को तो बिल्कुल नहीं.
कुछ लोग मानते हैं कि ट्रंप मोदी को हटाने की हद तक उसे बेइज्जत करता रहेगा. मैं बिल्कुल ऐसा नहीं मानता हूं. मोदी के जाने के बाद ट्रंप को इस 140 करोड़ लोगों के वतन में उसके जैसा दूसरा अपराधी, हीन भावना ग्रस्त, अनपढ़ कॉरपोरेट गुलाम ढूंढे नहीं मिलेगा, जिसे वह जब चाहे तब जुतिया कर जो चाहे वो करवा ले.
मोदी को ज्यादा ख़तरा आंतरिक पूंजीवादी ताक़तों से है. यह कहना बहुत आसान है कि अमरीका अगर माल लेना छोड़ दे तो भारतीय उद्योग जगत दूसरे देशों में अपने माल की खपत कर लेंगे, लेकिन व्यापार जगत में ऐसी परिस्थितियों को रातोंरात नहीं बनाया जा सकता है.
उदाहरण के तौर पर हम देश के कपड़ा उद्योग को ले सकते हैं. रेडिमेड कपड़ों का सबसे बड़ा आयातक अमेरिका है और दूसरे नंबर पर यूरोपीय संघ है. अमेरिका जहां करीब पैंसठ प्रतिशत तक आयात करता है वहीं यूरोपीय संघ और बाक़ी दुनिया पैंतीस प्रतिशत तक आयात करती है.
ऐसे में अगर उद्योग जगत चाहे भी तो अपना माल बाकी दुनिया में नहीं खपा सकता है. ब्रिटेन वैसे भी गर्म कपड़ों का आयात करता है जो कि भारत में नहीं बनते हैं इसलिए ब्रिटेन के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते से भारत के इस सेक्टर को कोई लाभ नहीं होगा.
इसी तरह से ऑटोमोबाइल, हीरा पन्ना व्यापार और दवा उद्योग को भी धक्का लगेगा. इस बिन्दु पर देसी पूंजी और विदेशी पूंजी के अंतर्विरोध को बल मिलेगा और देसी पूंजीपति अंतरराष्ट्रीय पूंजी के दलाल ताक़तों को हटाने का प्रयास करेंगे. मोदी का अंत ट्रंप या कोई विदेशी ताक़त नहीं करेगी, उसका अंत देसी पूंजी की ताक़तें ही करेंगी, यह नोट कर रख लीजिए.
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सुब्रतो चटर्जी