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बिहार एक राज्य है लेकिन आर्थिक और शैक्षणिक तौर पर इसकी हैसियत एक उपनिवेश से अधिक नहीं

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 17, 2025
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बिहार एक राज्य है लेकिन आर्थिक और शैक्षणिक तौर पर इसकी हैसियत एक उपनिवेश से अधिक नहीं
बिहार एक राज्य है लेकिन आर्थिक और शैक्षणिक तौर पर इसकी हैसियत एक उपनिवेश से अधिक नहीं
हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

देश की आबादी में बिहार की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत है जबकि देश की कुल जीडीपी में बिहार की हिस्सेदारी मात्र 3 प्रतिशत है. तो रोजी रोजगार के लिए पलायन तो होगा बिहारियों का. राजनीतिक नारेबाजी अलग चीज है, आर्थिक विवशताओं की बात अलग है.

बिहार एक राज्य है लेकिन आर्थिक तौर पर इसकी हैसियत एक उपनिवेश से अधिक नहीं. यह देश के विकसित क्षेत्रों को सस्ते मजदूर उपलब्ध कराने की खदान है और औद्योगिक उत्पादन केंद्रों के सस्ते महंगे माल खपाने का एक बड़ा बाजार भी.

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यहां के राजनेताओं और ब्यूरोक्रेट्स ने पूरी निष्ठा के साथ शिक्षा को इस हद तक बर्बाद किया कि देश के औद्योगिक केंद्रों को सस्ते मजदूरों और महानगरों के बबुआनों को सस्ते घरेलू सेवकों की आपूर्ति में कभी कोई कमी नहीं होने पाए.

बिहार से बाहर जाने वाली रेलगाड़ियों की जेनरल बोगी में आप छठी सातवीं से लेकर एमए, बीए पास लोगों की बेतहाशा भीड़ रोज देख सकते हैं, जो जर्द चेहरे लिए महानगरों की अमानवीय कॉर्पोरेट संस्कृति में खुद को खपाने के लिए जा रहे होते हैं. उनके नियंताओं ने यह सुनिश्चित किया है कि उन्हें क्वालिटी शिक्षा नहीं मिले और भले ही उनके पास ऊंची डिग्री ही क्यों न हो, वे अर्द्धकुशल या अकुशल श्रमिक बनने से अधिक की कल्पना भी नहीं कर सकते.

गतिशील अर्थव्यवस्था में रोजगार के लिए आबादी का आदान प्रदान स्वाभाविक है लेकिन देश का कोई इलाका अगर इसलिए प्रसिद्ध हो कि विकसित इलाकों में गार्ड, वेटर, ड्राइवर, सेवक, फैक्ट्री मजदूर, बोझा ढोने वालों, रिक्शा, ठेला चलाने वालों से लेकर गैंगस्टर्स के गुर्गों और शूटरों तक की आपूर्ति में वही इलाका अव्वल है तो सोचने की जरूरत है कि इसकी जड़ में निर्धनता और बेरोजगारी के अलावा वहां की दरिद्र शैक्षिक व्यवस्था का कितना योगदान है !

बिहार में चुनाव होने वाले हैं तो आजकल बिहार राजनीतिक विमर्शों के केंद्र में है. एक प्रशांत किशोर के अलावा कोई बिहार की शिक्षा पर बात नहीं कर रहा. यद्यपि, प्रशांत किशोर की राजनीतिक विश्वसनीयता पर कई सवाल तैरते रहे हैं लेकिन उनके भाषणों और साक्षात्कारों में हम बिहार की मूलभूत समस्याओं को उभरते हुए तो देखते ही हैं.

राजनीतिक विश्वसनीयता को अगर परे रख कर हम प्रशांत किशोर की वैचारिकी को देखें तो हमें कुछ समझ ही नहीं आता.

उन्होंने बेलागंज उपचुनाव के दौरान कहा कि सरकारी स्कूल अच्छे नहीं हैं तो हम गरीबों के बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में दाखिला करवाएंगे. यह सिर के ऊपर से गुजर जाने वाली बात है और नीति आयोग के सीईओ रहे अमिताभ कांत के उस भाषण का ही दोहराव है जिसमें उन्होंने कहा था कि सरकारी स्कूल बंद कर गरीबों के बच्चों का दाखिला प्राइवेट स्कूलों में करवाया जाए और उनकी फीस सरकार भरे.

विचारधारा से रहित राजनीति वंचितों की मुक्ति के सवाल पर कल्पनाशून्य प्रलापों से आगे नहीं बढ़ पाती और मुफ्त बिजली, मुफ्त बस यात्रा, मुफ्त पानी, मुफ्त अनाज, कुछ कैश आदि के फौरी उपायों तक जा कर दम तोड़ देती है. बिहार के सवाल फौरी जवाबों से हल नहीं हो सकते. इससे नीतिगत स्तरों पर और कुशल क्रियान्वयन के माध्यम से ही जूझ सकते हैं.

लालू-नीतीश अपनी सीमा दर्शा चुके और अब राजनीतिक पटल से ओझल होने की राह पर हैं. बिहार की ध्वस्त शिक्षा के लिए उन्हें कोसने के पर्याप्त आधार मौजूद हैं लेकिन इस बर्बादी के सूत्र 1980 के दशक में ही मिलने लगते हैं, जब जगन्नाथ मिश्र की सरकार ने बड़े पैमाने पर स्कूलों, कॉलेजों का सरकारीकरण तो किया लेकिन उनमें शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया में भारी गड़बड़झाला भी होने दिया. उस दौर के बाकी कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने भी विश्वविद्यालयों को ढलान से धकेलने में अपनी पूरी भूमिका निभाई.

हद तो तब हो गई जब बिंदेश्वरी दुबे के मुख्यमंत्रित्व और लोकेशनाथ झा के शिक्षामंत्रित्व में बेहद गैरजिम्मेदाराना तरीके से चालीस कॉलेजों का सरकारीकरण करते हुए उनमें नियुक्त चार हजार योग्य अयोग्य शिक्षकों को मान्यता दे दी गई. तब से जो बिहार की उच्च शिक्षा जमीन पर औंधे मुंह गिरी तो फिर कभी उठ नहीं पाई.

हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक केस मुकदमों का ऐसा अंबार लगा और सुनवाइयों का दौर इतना लंबा चला कि आज 2025 में भी कई मुकदमें चल ही रहे हैं. इसी से जुड़ी किसी सुनवाई के दौरान पटना हाई कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस बी एम लाल ने कहा था, ‘यह तो चारा घोटाला से भी बड़ा घोटाला है.’

लालू जी के दौर में शिक्षा की बची खुची सांस्थानिक गरिमा भी नष्ट हो गई जबकि नीतीश जी के विजन को ब्यूरोक्रेसी पर उनकी निर्भरता ने तबीयत से पलीता लगाया.

तो, आज बिहार की शिक्षा देश के पैमाने पर रैंकिंग में किसी बियाबान तलहटी में है और उच्च शिक्षा की स्थिति में गिरावट तो शर्मनाक हदों तक जा पहुंची है. बिहार के अधिकतर विश्वविद्यालय और महाविद्यालय परिसर प्रतिभाओं की कत्लगाह बन चुके हैं जहां मेधावी छात्रों के लिए कुछ ऐसा नहीं है जो उन्हें आधुनिक शिक्षा और रोजगार के मानकों के अनुसार कदमताल करने लायक बना सके. देश विदेश के नामी संस्थानों से पढ़ कर आए एक से एक मेधावी और कुछ सार्थक करने को उत्सुक युवा असिस्टेंट प्रोफेसर्स की जमात यहां की आंतरिक जर्जरता और गलाजत देख हतप्रभ है.

बिहार का कोई भी राजनीतिक दल या कोई भी नेता इन मुद्दों पर कभी बोलता नहीं दिखता. बिहार की सबसे बड़ी समस्या क्वालिटी शिक्षा का अभाव है. यह बिहार के साधनहीन युवाओं की नसों में जहर भर देता है जो जीवन में उन्हें आगे बढ़ने की राह में अलंघ्य दीवारें खड़ी कर देता है.

अंबेडकर ने कहा था, ‘शिक्षा शेरनी का दूध है, जो पियेगा वह दहाड़ेगा…’

शिक्षा और डिग्री में अंतर है. खोखली डिग्रियों की अराजक फैक्ट्री बन चुके संस्थान बिहार की सबसे बड़ी चुनौती हैं. अंबेडकर की फोटो लगा कर राजनीति करने वाले नेता भी इस पर नहीं बोलते. उनकी कुनबाई राजनीति में ऐसे बड़े सवालों के लिए स्पेस ही नहीं है. वे नवउदारवादी शक्तियों के मोहरे बन चुके हैं और अपने मतदाता समूहों के लिए उनके पास कोई सार्थक विजन नहीं है.

प्रशांत किशोर इस भीड़ में कुछ नया और सार्थक बोल जरूर रहे हैं लेकिन उनकी बातों का कोई वैचारिक आधार नहीं, न कोई स्पष्ट रोड मैप वे दे रहे हैं. मसलन, हम पटना की दीवारों पर जनसुराज के नारे लिखे देखते हैं, ‘पलायन रोका जाएगा और बिहार के बेरोजगारों को यहीं पर दस बारह हजार की नौकरी दी जाएगी.’

कौन सी नौकरी ? किस फैक्ट्री या संस्थान में नौकरी ? किस योग्यता पर ? कितने दिनों तक ? दस हजार की नौकरी का क्या मतलब ? बिहार की शिक्षा और रोजगार से जुड़े परिदृश्य में गहरे अंधेरे व्याप्त हैं और इन अंधेरों का मुकाबला शीशेबाजी से नहीं किया जा सकता.

सबसे बड़े विपक्षी दल राजद को हमने कभी शिक्षा से जुड़े बड़े सवालों पर कोई मंथन करते नहीं देखा, न ही उनके कोई बयान सुनने को मिलते हैं. उनकी नजरों के सामने बिहार की उच्च शिक्षा रसातल में जाती गई, इस पर ठेकदारों और माफिया का वर्चस्व बढ़ता गया लेकिन राजद के किसी बड़े नेता का कोई बयान नहीं सुनाई दिया.

वे पिछड़ों के उत्थान की बातें करते हैं लेकिन पिछड़े वर्ग के गरीब युवाओं की नसों में जहर का इंजेक्शन देते जर्जर संस्थानों और पतित बुद्धिजीवियों की जमात पर उनका कोई वक्तव्य तक नहीं आता, सशक्त हस्तक्षेप या आंदोलन आदि की तो बातें ही बेमानी हैं.

पलायन बिहार का सत्य है और यहां की जो भौगोलिक, औद्योगिक और आर्थिक सच्चाई है, अगले कई दशकों तक रोजगार के लिए यह पलायन यहां के लोगों की नियति बनी रहेगी. जरूरत है इस पलायन को सार्थक रूप देने की जो क्वालिटी शिक्षा से ही प्राप्त हो सकती है. क्वालिटी शिक्षा ही क्वालिटी रोजगार की ओर ले जा सकती है.

रोजगार तो अलग बात है, यहां के बच्चे तो बाप के लोन या पैतृक जमीनें बेच कर बाहर पढ़ने जाने को मजबूर हैं. नहीं, वे सिर्फ प्रबंधन या इंजीनियरिंग, मेडिकल के लिए ही नहीं भाग रहे, स्थिति इतनी चिंताजनक स्तरों को पार कर चुकी है कि हिन्दी, अंग्रेजी, इतिहास आदि में भी बीए करने के लिए बच्चे बाहर जाने को हाथ पैर मार रहे हैं.

हम अक्सर नए चांसलर्स या वाइस चांसलर्स की एक पंक्ति अखबारों में जरूर देखते रहने के आदी हैं, ‘विश्वविद्यालयों को सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाया जाएगा…’ लोग ऐसे वक्तव्यों से जुड़ी खबरें देखते हैं लेकिन उनकी कोई आस्था नहीं जगती.

बिहार त्रासदियों का द्वीप बन चुका है और यहां की राजनीति जलते हुए सवालों से जूझने के मामले में बांझ साबित हो चुकी है. चुनाव सामने है तो बिहार में कई परियोजनाएं आई होंगी, आएंगी भी, लेकिन, होली दीवाली में बसों, ट्रेनों में जानवरों की तरह ठुंस कर दूसरे प्रदेशों से आने जाने वाले अभिशप्त लोगों की भीड़ यथावत रहने वाली है. यहां की सार्वजनिक शिक्षा इस तथ्य को सुनिश्चित करती है कि अच्छा भल मेधावी वंचित तबके का युवा सिवाय मजदूरी करने के और किसी लायक नहीं बन सके.

‘कॉर्पोरेट इंडिया’ को ‘वंचित भारत’ से यही उम्मीद भी है कि चेतना से हीन, क्वालिटी शिक्षा से महरूम मेहनतकश नौजवानों की भीड़ रेल बस पर लद लद कर आती जाए और अपनी जवानी उनके मुनाफे के लिए होम कर असमय बूढ़े और बीमार होकर गांव लौट कर वृद्धावस्था पेंशन और मुफ्त अनाज की कतार में शामिल होती जाए.

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