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अरुंधति रॉय पर हमला उनके सिगरेट पीते फोटो पर नहीं, रॉय के विचारों पर है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 7, 2025
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अरुंधति रॉय पर हमला उनके सिगरेट पीते फोटो पर नहीं, रॉय के विचारों पर है
अरुंधति रॉय पर हमला उनके सिगरेट पीते फोटो पर नहीं, रॉय के विचारों पर है
हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

मेरी अंग्रेजी इतनी अच्छी नहीं कि मैं पूरी सहजता और समझ के साथ अरुंधति रॉय के अंग्रेजी में लिखे उपन्यास या आलेख पढ़ जाऊं. लेकिन, मैंने गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स का हिन्दी अनुवाद पढ़ा है. कुछ समझ में आया, कुछ नहीं आया, लेकिन इस उपन्यास का इतना नाम और यश था कि उसे मंगवा कर पढ़ना जरूरी लगा.

अरुंधति रॉय के वैचारिक आलेख हिंदी अखबारों में भी अनुवाद के रूप में आते रहे हैं और मैं ने उन्हें खूब पढ़ा है और बेहद रुचि से पढ़ा है. उन्हें अच्छी तरह समझा भी है. रॉय के आलेखों के कंटेंट से दुनिया वाकिफ है. वे विभिन्न मामलों पर अपनी स्वतंत्र राय रखती हैं और उन्हें बेधड़क व्यक्त भी करती हैं.

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साम्राज्यवाद, नवउपनिवेशवाद, नवउदारवाद आदि के साथ ही देश और दुनिया के सामने समस्या बने विभिन्न मुद्दों पर भी उनकी स्पष्ट और स्वतंत्र राय है – कोई समर्थन करे या विरोध.

जब देश और दुनिया में नवउदारवाद का खैर मकदम हो रहा था, उस वक्त भी उनके आलेख इसकी विसंगतियों को सामने लाने में कतई कोई परहेज नहीं करते थे और अभिव्यक्ति की धार तो ऐसी जिसे पाने के लिए साधारण लोगों को कई कई जन्म लेने पड़ें.

नवउदारवादी संस्कृति की सिफत है कि उसके विरोध में चलने वाली कलम को ब्लेम करने के लिए वे पूरी कायनात को जुटा लेते हैं. कूढ़मगज बुद्धिजीवियों के इस दौर में ब्लेमिंग का यह सिलसिला परवान चढ़ भी जाता है. हालांकि, अरुंधति पर इस ब्लेमिंग आदि का कभी कोई प्रभाव नहीं पड़ा और वे उत्तरोत्तर विद्रोही विचारों के साथ हमारे सामने आती रहीं.

दुनिया को ऐसी स्त्रियों की बहुत जरूरत है जो स्त्रीत्व के लबादे से बाहर आकर एक संपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में लोगों के सामने आएं. अरुंधति इसकी एक प्रतिमान बन कर सामने आती रहीं. उनकी हालिया किताब के मुख्य पृष्ठ पर बीड़ी या सिगरेट पीती उनकी तस्वीर का यही फलसफा है.

जिस हिंदी समाज ने मुक्तिबोध, राजेंद्र यादव, मोहन राकेश आदि न जाने कितने लेखकों की सिगरेट पीती फोटू को उनकी बौद्धिकता और उनके बेलौस व्यक्तित्व का पैमाना मान लिया, वह अगर अरुंधति की इस तस्वीर पर कांव कांव कर रहा है तो यह हिंदी समाज की समस्या है, अरुंधति की नहीं.

बीड़ी सिगरेट बहुत खराब चीज है और स्वास्थ्य को भारी हानि पहुंचाती है…तो फिर उन लेखकों की ऐसी तस्वीरों की भी निंदा होनी चाहिए. वे नई पीढ़ी को क्या संदेश देते हैं… कि भारी बौद्धिक लोग जब चिंतन की गहन अंतर्दशा में होते हैं तो होंठों पर सिगरेट सुलगा कर विचारों के नए नए सिरों तक पहुंचते हैं.

मैं जब एमए में पढ़ता था तो हॉस्टल में आधी आधी रात को जगे मेहनती विद्यार्थियों को देखता था…पढ़ रहे हैं, पढ़ते ही जा रहे हैं, लिख रहे हैं, लिखते ही जा रहे हैं…बारह बजा, एक बजा, दो बज गए, अब तो तीन बज गए. गहन विचारों में मग्न उनमें से अनेक युवक सिगरेट सुलगाते थे और मान्यता थी कि इससे विचारों का केंद्रीकरण होता है, मन केंद्रित होता है और ज्ञान के नए चक्षु खुलते हैं.

देखादेखी मै भी गहन गंभीर पढ़ाकू दिखने के लिए सिगरेट के साथ कॉपी किताबों के सामने बैठता था. यह अलग बात है कि ढलती रातों में अक्सर मैं बेहद धीमी आवाज में टेप रिकॉर्डर पर कोई गाना या कोई गजल बजा देता और बेहद गंभीर भावों में डूब सिगरेट के कश लेने लगता था. मेरे प्रोफेसर पिता मुझे बताया करते थे कि तुम हिंदी साहित्य के छात्र हो, गजल गाने सुनना और गुलशन नंदा आदि को पढ़ना भी कोर्स की ही चीज बन जाएगी.

तो, भावुक मनोदशा में या चिंतन की गहन दशा में होंठों पर सिगरेट एक लोकप्रिय फैशन की तरह स्थापित था. बड़े लेखकों, विचारकों के सिगरेट पीते फोटोज इस फैशन के प्रचलन को खूब बढ़ावा देते थे. आज भी उनके ऐसे ही फोटो खूब खूब दिखते हैं और कोई प्रतिक्रिया नहीं आती. लेकिन, अरुंधति रॉय की इस फोटो पर खूब खूब प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. यह लेखकों विचारकों को देखने का अपना जेंडर बॉयस है.

इधर, कुछ बड़े नामों को अरुंधति रॉय के नाम पर स्यापा करते देखा. तो, अन्य बहुत सारे लोग भी इस रुदन और लानत मलामत में शामिल हो गए. यह स्यापा, यह लानत मलामत सिर्फ सिगरेट पीते फोटो पर नहीं, रॉय के विचारों पर था.

एक ने लिखा, ‘अरुंधति रॉय बौद्धिक आतंकवादी है’…दूसरे चर्चित बुद्धिजीवी ने जवाब दिया…’शत प्रतिशत सही’…

पहले ने आगे लिखा, ‘इस महिला से सावधान रहने की जरूरत है’…अगले ने जवाब दिया…’बिल्कुल’…

अरुंधति रॉय से किन्हें सावधान रहने की जरूरत है ? क्यों सावधान रहने की जरूरत है ?

इस सवाल का जवाब रॉय के आलेखों में मिलता है. उनके कंटेंट देखें तो पता चलता है कि बौद्धिकों का कौन सा तबका उनसे सावधान रहने की ताकीद कर रहा है और क्यों कर रहा है. रॉय नवउपनिवेशवादी, साम्राज्यवादी शोषण के नए प्रतिमानों पर खुल कर बात करती हैं और अभिव्यक्ति की दौरान थोड़ा भी सॉफ्टनेस नहीं दिखाती.

दरअसल, यह चीजों को देखने का अपना नजरिया है. आप क्या लिखते हैं यह इस पर निर्भर करता है कि आप चिंतन और विचारों के किस सिरे पर खड़े हैं, आपकी चिंताओं के केंद्र में कौन है.

उत्पीड़ितों की कसौटियों पर राष्ट राज्य की नीतियों को परखने पर कई ऐसी बातें सामने आती हैं जिन्हें लोकप्रिय धारणाओं में राष्ट्र विरोधी ठहरा देने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है. अरुंधति इसकी मिसाल हैं.

कोई भी जरा आधुनिक भारत में आदिवासियों के साथ हुए नीतिगत व्यवहार का अध्ययन कर ले. विस्तृत अध्ययन करे. उसे पता चल जाएगा कि अंग्रेजों के कंपनी राज से लेकर आज के भारत में जिस कंपनी राज का प्रभुत्व बढ़ा है, उसमें आदिवासियों के साथ कितनी क्रूरताएं हुई हैं, कितने छल हुए हैं और हो ही रहे हैं. उन पर बातें करने वाला आसानी से अर्बन नक्सल ठहरा दिया जाता है और बौद्धिकों का एक तबका इन कथित अर्बन नक्सलियों को ब्लेम करने के अभियान में लग जाता है. सिस्टम तो ऐसे लोगों के पीछे पड़ी ही रहती है.

उत्पीड़ितों का अपना अर्थशास्त्र है, अपना समाज शास्त्र और अपना राजनीति शास्त्र है और जब वे इस पर बात करने को मुखर और सक्षम होंगे तो सिस्टम के द्वारा निर्मित या आरोपित लोकप्रिय धारणाओं का शीराजा बिखर जाएगा.

उत्पीड़ितों का अर्थशास्त्र आज की जीडीपी आधारित विकास प्रक्रिया के विरोध में खड़ा है और अरुंधति रॉय जैसी लेखिकाएं विचारों के इसी विद्रोही बिंदु पर अवस्थित हैं. जिस दिन यह अर्थशास्त्र सिस्टम द्वारा लोकप्रिय बनाई गई आर्थिकी से जूझने में सक्षम होगा, यह देश बदल जाएगा, दुनिया बदल जाएगी.

देश नहीं बदले, दुनिया नहीं बदले…इसके लिए विद्रोही और स्वतंत्र विचार रखने वालों को कठघरे में खड़ा करो, उन्हें जेलों में सड़ा दो, उन्हें निंदित करो. सिस्टम ऐसा करता है तो यह समझ में आने वाली बात है लेकिन जो बौद्धिक जमात इस सिस्टम के फलसफे को अप्रत्यक्ष समर्थन देती ‘अरुंधति जैसी महिलाओं से सावधान रहने की ज़रूरत’ बताती है उनसे उत्पीड़ित जमात को सावधान रहने की जरूरत है.

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