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‘माओवादियों’ का सरेंडर : किसकी जीत, किसकी हार ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 25, 2025
in गेस्ट ब्लॉग
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'माओवादियों' का सरेंडर : किसकी जीत, किसकी हार ?
‘माओवादियों’ का सरेंडर : किसकी जीत, किसकी हार ?
हिमांशु कुमार, सामाजिक कार्यकर्त्ताहिमांशु कुमार

आज अक्तूबर की गुलाबी सर्दी में बस्तर के ढाई सौ नक्सली लड़ाके अपने हथियार नेताओं और पुलिस अधिकारियों को सौंप देंगे. दो दिन पहले एक बड़े नेता वेणुगोपाल ने अपनी बंदूक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के हाथों में सौंप दी. बदले में मुख्यमंत्री फड़नवीस ने संविधान की प्रति नक्सली नेता को सौंपी. मुझे लगा कि इस संविधान की ज़्यादा ज़रूरत खुद मुख्यमंत्री फड़नवीस को नक्सली नेता से ज़्यादा है.

क्योंकि कुछ महीने पहले ही यह मुख्यमंत्री फड़नवीस फ़र्ज़ी चुनाव से जीत कर मुख्यमंत्री बने हैं. जब इनके प्रदेश महाराष्ट्र के एक गांव मालशिरस के लोगों ने इनकी भ्रष्ट ईवीएम मशीन के नतीजे को ना मानते हुए खुद मतपत्रों से चुनाव कराने की घोषणा की तो इस मुख्यमंत्री ने वहां पुलिस लगा दी, कर्फ्यू लगा दिया, गांव वालों के ऊपर मामले बना दिए.

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बहुत साल पहले बस्तर में एक नक्सली नेता से मेरी चर्चा के दौरान उन्होंने जनता के मुद्दों की लड़ाई में हिंसा-अहिंसा के प्रश्न पर कहा कि आप लोग अहिंसक तरीके से लड़ रहे हैं, आपने क्या हासिल किया ? मेधा पाटकर ने क्या हासिल किया ? नर्मदा डैम बन ही गया, लोग विस्थापित हो ही गये. मैंने भी चिढ़ कर हताशा में जवाब दिया कि आपने बंदूक से लड़ कर क्या हासिल किया ? बहरहाल हम पूरी रात साथ रहे, साथ खाना खाया और सुबह प्रेम से विदा हुए.

मुझे लगता है उस दिन की बहस में हम दोनों ने अपनी हताशा ही व्यक्त की थी और इसीलिए एक दूसरे को विफल साबित करने की कोशिश की थी. जबकि असलियत यह है कि सामाजिक बदलाव की लड़ाइयां बड़े लक्ष्य और आदर्श की तलाश में शुरू की जाती हैं. उसमें कई पीढ़ियों की कुर्बानी की एक लम्बी प्रक्रिया के बाद हम किसी जगह पहुंचते हैं. अक्सर हम सोचे गए सटीक लक्ष्य को उसी रूप में प्राप्त नहीं कर पाते हैं लेकिन हमारे संघर्ष की इस प्रक्रिया से समाज में अनेकों सकारात्मक बदलाव होते हैं.

उदाहरण के लिए नर्मदा बचाओ आन्दोलन भले ही बांध का बनना नहीं रुकवा पाया लेकिन उसने सारी दुनिया में बड़े बांधों पर सोचने की एक प्रक्रिया शुरू की. उसके कारण दुनिया में नदियों को आज़ादी से बहने के सफल आन्दोलन हुए और अनेकों बड़े बांध तोड़कर जलीय जीवों को बचाया गया. इसी तरह नक्सली आन्दोलन के कारण महिला दमन, दलितों आदिवासियों के ज़मींदारों द्वारा दमन में कमी आई, भूमि सुधार आन्दोलन के लिए सरकारें मजबूर और प्रेरित हुई, तेंदूपत्ता के रेट और मजदूरी बढ़ी.

नक्सली कौन हैं और उन्होंने हथियार क्यों उठाये, यह जानना भी नई पीढ़ी के लिए ज़रूरी है. क्या नक्सली देशद्रोही हैं जैसा की सरकार हमें बताती है ? नहीं, नक्सली देशद्रोही तो बिलकुल भी नहीं हैं. हममें से कुछ लोग समाज में फैले अन्याय के खिलाफ लड़ते हैं लेकिन कुछ लोग उस अन्याय से इतने विचलित और बेचैन हो जाते हैं कि वो उस अन्याय को समाप्त करने के लिए अन्यायी के अत्याचार का सामना उसीके हथियार छीन कर करने लगते हैं. इसलिए आप कह सकते हैं कि नक्सली हमसे ज़्यादा देशप्रेमी हैं क्योंकि वो इस देश के लोगों के लिए अपनी जान भी देने के लिए तैयार हो जाते हैं.

भारत की हालत को देखें तो यहां कि हालत यह है कि देश में अस्सी प्रतिशत दलित भूमिहीन हैं इसलिए वे गरीब हैं. इसे सोशल इकोनोमिक्स कहते हैं. यानी अपनी जाति के कारण गरीब हैं. अपनी इस गरीबी के कारण दलित दमन और शोषण का निशाना बनते हैं. आज भी भारत में 12 दलित महिलाएं प्रतिदिन बलात्कार का शिकार बनाई जाती हैं. यह हालात किसी को भी बेचैन नहीं करता तो उसे इस समाज से कोई लेना देना है भी कि नहीं यह सोचने की ज़रूरत है.

भारत के दलितों की भूमिहीनता गरीबी और उसके कारण बनी हुई भारत की राजनैतिक व्यवस्था में उनकी कमजोर हालत, मजदूरों का पूंजीवादी शोषण, महिलाओं का पितृसत्ता के कारण दमन और असमान हालत के कारण बहुत सारे राजनैतिक आन्दोलन शुरू हुए. इसमें गांधीवादी धारा, वामपंथी धारा, अम्बेडकरी धारा के आन्दोलन लगातार चलते रहे हैं.

समाज के अनेकों लोगों को अनुभव आया कि जब वे दमन के खिलाफ समाज को बदलने की कोशिश करते हैं तो दमन करने वाला जो शक्तिशाली है, उसके पास हथियार हैं, गुंडे हैं, पुलिस है, सरकार है और इनकी मदद से यह समाज बदलने की कोशिश करने वालों पर हमला करते हैं, इन्हें मार डालते हैं जेल में डालते हैं. इसलिए अगर इन सशस्त्र अत्याचारियों से लड़ना है तो हमारे पास भी हथियार होने चाहिये.

भारत की हरेक राजनैतिक पार्टी के पास बड़ी तादाद में हथियार हैं. सबसे ज्यादा हथियार आरएसएस और भाजपा के पास हैं. इसलिए सिर्फ नक्सलियों की पार्टी को सशस्त्र कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है.

बंगाल के 1967 नक्सलबाड़ी गांव के किसानों द्वारा ज़मींदारों के अत्याचार के खिलाफ हुए प्रतिकार के कारण इस आन्दोलन को नक्सल आन्दोलन नाम मिला. लेकिन तेलंगाना के इलाके में आज़ादी के पहले से ही किसान आन्दोलन शुरू हो चुका था. इसी के साथ बंगाल का तेभागा आन्दोलन भी किसानों के ज़मींदारों के लूट के खिलाफ सशक्त आन्दोलन था. महात्मा गांधी के हत्यारे गोडसे और नाना आप्टे की फांसी के बाद आज़ाद भारत में आन्ध्र प्रदेश के दो दलित किसानों किश्ते गौड़ा और सिद्धारमैय्या को फांसी की सज़ा हुई थी क्योंकि उन्होंने ज़मींदार को मार कर ज़मीन भूमिहीनों को बांट दी थी.

यानी भारतीय सत्ता के सामने सबसे बड़ी चुनौती दलित किसानों ने पैदा कर दी थी. भगत सिंह के भांजे प्रोफेसर जगमोहन का आकलन है कि कांग्रेस ने इस आन्दोलन से दलितों को अलग करने के लिए पहली बार सन 1971 में बाबा साहब अम्बेडकर की संविधान सीने से चिपकाए संसद की तरफ उंगली दिखाने वाली मूर्तियां लगानी शुरू की थी ताकि उन्हें यह सन्देश दिया जा सके कि आप दलित लोग सत्ता से लड़िये मत इसकी तरफ आइये.

इसके बाद नक्सल आन्दोलन को आदिवासियों की बड़ी संख्या के कारण आदिवासियों का आन्दोलन समझा जाने लगा. हालांकि बिहार में दलितों को ज़मीनों पर कब्ज़ा कराने का शानदार काम नक्सल आन्दोलन ने किया. बाद तक भी अनेकों दलित कामरेड आन्दोलन में अपनी शहादत देते रहे.

1991 में वैश्वीकरण उदारीकरण और निजीकरण के बाद कॉर्पोरेट पूंजी ने जब भारत के आदिवासी इलाकों में खनिजों पर कब्ज़ा करने की कोशिश शुरू की और इसके लिए आदिवासी इलाकों को सैनिकों से भर दिया गया. तब नक्सल आन्दोलन ने आदिवासियों के साथ मिलकर जल, जंगल, ज़मीन बचाने की लड़ाई को तेज़ किया. आखिरकार सरकार ने इनसे बात करने का फैसला किया और 2004 में आंध्र प्रदेश सरकार, पीपुल्स वार और जनशक्ति की बातचीत शुरू हुई. लेकिन ज़मींदारों की ज़मीनें भूमिहीनों को बांटने की मांग ना मानने की जिद के बाद सरकार ने वार्ता खत्म कर दी.

इसी दौरान पीपुल्स वार, जनशक्ति और एमसीसी का विलय हुआ और सीपीआई माओईस्ट पार्टी का गठन किया गया. इसके एक साल बाद छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने माओवादियों के सफाए के नाम पर 2005 में सलवा जुडूम नामक अभियान शुरू किया. इस आन्दोलन के नाम पर सरकार द्वारा आदिवासियों के गांवों को जलाया गया, बड़े पैमाने पर आदिवासी महिलाओं से बलात्कार किये गये आदिवासियों की हत्याएं की गईं. 2011 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस सलवा जुडूम अभियान को गैर संवैधानिक घोषित किया लेकिन यह सब दमन अभी भी जारी है.

मैं अपने साथियों के साथ गांधीवादी तरीके से बस्तर में सरकार की मदद से शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, रोज़गार के मुद्दों पर रचनात्मक काम कर रहा था. जब मैंने आदिवासियों के मानवाधिकारों के इस क्रूर दमन के खिलाफ आवाज़ उठाई तो भाजपा सरकार ने मेरी हत्या की कोशिश की और 2009 में हमारे सोलह एकड़ के गांधीवादी आश्रम पर बुलडोज़र चला दिया और मुझे छत्तीसगढ़ से निकाल दिया.

इस समय भारत की केन्द्रीय सत्ता और छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार हैं. भाजपा बिना छिपाए हुए डंके की चोट पर पूंजीवाद समर्थक पार्टी है. पूंजीपतियों को आदिवासी इलाके में मौजूद जल, जंगल, ज़मीन लूटकर बेचने के लिए रास्ता साफ़ करने और विरोध को समाप्त करने के लिए भाजपा सरकार के गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक नक्सलियों के पूर्ण सफाए की घोषणा की है. पिछले दो साल में लगभग दो हज़ार आदिवासियों बच्चों महिलाओं और नक्सली पार्टी के लड़ाकों को मार डाला गया है.

इस खून खराबे को रोकने के लिए कई नक्सली नेता और लड़ाके अब हथियार छोड़ कर निशस्त्र राजनैतिक प्रक्रिया के रास्ते जनता के मुद्दों पर काम करने की घोषणा कर चुके हैं और यह सिलसिला अभी जारी है. अलबत्ता अभी भी माओवादी पार्टी में काफी लोग हैं जो हथियार डालने के लिए अभी भी सहमत नहीं हैं और मरने तक लड़ाई जारी रखने की बात कह रहे हैं.

आज बस्तर टाकीज नामक यूट्यूब चैनेल पर पत्रकार विकास तिवारी के साथ बातचीत में नक्सल नेता रुपेश ने कहा कि वे हथियार छोड़कर जनता के मुद्दों पर काम करने का इरादा कर रहे हैं.

सवाल यह है कि क्या यह संभव है ? क्या भारत में आप सरकार के विरोध में कोई राजनीति कर सकते हैं ? अगर अमित शाह बस्तर में अडानी को ज़मीन सौंपेंगे और यह निशस्त्र नक्सली नेता लोकतान्त्रिक तरीके से उसके विरोध में आदिवासियों का आन्दोलन करेंगे तो क्या अमित शाह उसे सहन कर लेंगे ? भारत में जहां भाजपा विपक्ष मुक्त भारत की खुलेआम घोषणा करती हो वहां क्या वह नक्सली विचारधारा के निशस्त्र आन्दोलनकारियों को बस्तर में काम करने देगी ?

बस्तर के आदिवासी युवाओं का निशस्त्र संगठन ‘मूलवासी बचाओ मंच’ पर सरकार ने बंदिश लगाते हुए आदेश में लिखा कि इस संगठन पर इसलिए प्रतिबन्ध लगाया जा रहा है क्योंकि यह सरकार की आलोचना करता है.

जो सरकार भाजपा की आलोचना करने वाले पत्रकारों, वकीलों, लेखकों प्रोफेसरों को अर्बन नक्सल कह कर कई साल से जेल में डाले हुए हो ऐसे में अब हथियार डालने वाले नक्सली नेताओं को यह आशा बिलकुल नहीं रखनी चाहिए कि उन्हें जनता के बीच काम करने की छूट यह सरकार दे देगी.

ऐसे में सवाल यह है कि अगर इतनी बड़ी संख्या में नक्सली काडर और नेताओं के हथियार डालने को नक्सल आन्दोलन की हार मान भी लिया जाय तो सवाल उठता है कि फिर जीत किसकी हुई ? भाजपा सरकार कहेगी लोकतंत्र की जीत हुई. लेकिन जो सरकार खुद ही वोट चोरी कर अवैध तरीके से बनी हुई गैरकानूनी सरकार हो उसकी जीत को कौन लोकतंत्र की जीत मान सकता है ?

क्या नक्सल आन्दोलन की हार से भारत के किसान की जीत हुई ? क्या मजदूर की जीत हुई ? क्या आदिवासी महिलाओं की जीत हुई ? नहीं, यह जीत है पूंजीपति की और उसकी लूट की. यह जीत है भारत की जल, जंगल, ज़मीन को लूटकर भारत को कंगाल करने वाली ताकतों की. यह जीत है लोकतंत्र की हत्या करने वाली ताकतों की, यह जीत है बलात्कारियों को बचाने वाली सत्ता की.

ऐसे में अब अगर सत्ता की लूट को चुनौती देने वाला एक ताकतवर आन्दोलन हार जायेगा तो उसका स्वाभाविक नतीजा यह होगा कि लूट, दमन और दुःख बढ़ेगा.

और उसका नतीजा यह होगा कि गुस्सा, विरोध, संघर्ष और लड़ाई भी तेज़ होगी. भारत में ऐसे बहुत से तबके हैं लड़ना जिनकी मजबूरी है, ज़रूरत है. वे लड़ेंगे नहीं तो मिट जायेंगे. दलित, आदिवासी, मजदूर, महिलाएं, बेरोजगार युवा छात्र लड़ेंगे नहीं तो मिट जायेंगे. इसलिए ना लड़ाई बंद होगी ना फिर से हथियार उठाने का रास्ता बंद होगा. इसलिए ना किसी की कोई जीत अंतिम है, ना किसी की हार अंतिम है.

संत विनोबा ने कहा था समाज बदलने के तीन रास्ते हैं – कानून, करूणा या कत्ल. विनोबा ने कहा अगर कानून न्याय नहीं देगा और समाज की करूणा जागेगी नहीं तो पीड़ित कत्ल का रास्ता चुन लेगा. इसलिए समाज में करूणा जगाने का काम कर रहा हूं ताकि समाज को कत्ल के रास्ते पर जाने से बचा सकूं.

मैं विनोबा के समीप रह चुका हूं और लम्बे समय तक मैंने देश में पैदल घूमकर विनोबा के विचारों को फ़ैलाने का काम किया है. इसलिए मैं भी जनता की करूणा जगाना चाहता हूं ताकि समाज को कत्ल के रास्ते पर जाने से रोक सकूं.

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