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सोनू-रुपेश का जनता को छोड़कर राज्य को हथियार सौंप देना – यही विश्वासघात है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 12, 2025
in गेस्ट ब्लॉग
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सोनू-रुपेश का जनता को छोड़कर राज्य को हथियार सौंप देना - यही विश्वासघात है
सोनू-रुपेश का जनता को छोड़कर राज्य को हथियार सौंप देना – यही विश्वासघात है

माओवादी पार्टी के भीतर डेढ़ महीने से तीव्र घटनाएं घट रही हैं. भारत के सौ साल पुराने कम्युनिस्ट आंदोलन में नक्सलबाड़ी से शुरू हुए क्रांतिकारी आंदोलन में माओवादी पार्टी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. उन्होंने जो परीक्षाएं झेली हैं, उनकी यात्रा, उन्होंने जो सफलताएं हासिल की हैं, उन्होंने जो असाधारण बलिदान दिए हैं – ये सिर्फ़ उनकी पार्टी के नहीं, बल्कि भारतीय समाज के हैं. चार पीढ़ियों के लोगों के. आधुनिक जनसंघर्ष का इतिहास. इसलिए, पार्टी से जुड़ी किसी भी घटना पर पूरा समाज प्रतिक्रिया करता है – समर्थन और विरोध दोनों रूपों में. पार्टी संगठन जितना व्यापक होगा, उसके चारों ओर सहानुभूति, समर्थन और सम्मान की दुनिया उतनी ही व्यापक होगी.

तेलुगु बुद्धिजीवी समुदाय लंबे समय से माओवादी समर्थक और माओवादी विरोधी रुख़ के बीच बहस में उलझा हुआ है. जिस तरह राज्य पार्टी की संगठनात्मक शक्ति को स्वीकार करता है, उसी तरह नागरिक समाज के असहमत बुद्धिजीवी भी मानते हैं कि माओवादियों की वैचारिक शक्ति ही उनकी असली ताकत है. उनके क्रांतिकारी दर्शन, साहस, त्याग, समर्पण – इन्हीं कारणों से उन्होंने पिछले पच्चीस वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय क्रांतिकारी आंदोलन में सम्मान और विश्वसनीयता अर्जित की है. इसके स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद हैं.

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जिस प्रकार इस आंदोलन ने भारतीय लोकजीवन को नए मूल्य, नए विचार, नई चेतना दी है, उसी प्रकार इसने समाज और इतिहास से भी बहुत कुछ ग्रहण किया है. इसने भविष्य के लिए आवश्यक राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक-नैतिक संरचनाओं के निर्माण का प्रयास किया है. कम से कम इसी कारण, यह विभिन्न संकटों के बावजूद इतने लंबे समय तक एक प्रभावशाली शक्ति के रूप में जीवित रहा है. इसने विचारों, संघर्षों, मूल्यों और स्वप्नों के टकराव के एक मिलन बिंदु के रूप में स्वयं को सिद्ध किया है.

ऐसे ही एक आंदोलन के दीर्घकालिक सशस्त्र संघर्ष को त्यागकर, पार्टी के दो वरिष्ठ नेताओं ने सैन्य वर्दी और हथियारों के साथ महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ सरकारों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है. उनके साथ लगभग 250 अन्य कार्यकर्ताओं ने भी आत्मसमर्पण किया है.

स्वाभाविक है, समाज स्तब्ध है. यह सिर्फ़ व्यक्तिगत आत्मसमर्पण ही नहीं है – सार्वजनिक रूप से यह घोषणा भी हो चुकी है कि वे सशस्त्र संघर्ष छोड़ रहे हैं. यह भी घोषणा हो चुकी है कि नक्सलबाड़ी आंदोलन की आग से उपजा संघर्ष का रास्ता ग़लत था, वह अतिवाद है, अब कारगर नहीं रहा. बाकी नेतृत्व ने साफ़ कह दिया है कि यह उनका निजी फ़ैसला है, हम संघर्ष जारी रखेंगे, जनता के साथ विश्वासघात नहीं करेंगे. फिर भी इस आत्मसमर्पण का व्यापक असर हुआ है. बौद्धिक समुदाय जनता की आकांक्षाओं, मुक्ति के मार्ग और भविष्य के विकल्पों को लेकर राजनीतिक-सांस्कृतिक-वैचारिक बहसों के तूफान में है.

दुर्भाग्य से, यह घटना ऐसे समय में घटी है जब केंद्र और राज्य सरकारें ‘ऑपरेशन कगार’ नाम से माओवादियों के सफाए के लिए युद्ध छेड़े हुए हैं. लाखों सशस्त्र बलों, हवाई हमलों और पूरे इलाके में मुखबिरों के नेटवर्क के दमन से जो हालात पैदा हुए हैं, वे एक तरह के गृहयुद्ध जैसे हैं. यही वह समय था जब संगठन के भीतर से ‘सशस्त्र संघर्ष त्यागने’ और आत्मसमर्पण करने की बात उठी थी.

लेकिन यह माओवादी आंदोलन की आधिकारिक स्थिति नहीं है – इसलिए इसे सशस्त्र संघर्ष का परित्याग नहीं कहा जा सकता. हथियारों के साथ आत्मसमर्पण को आम बोलचाल की भाषा में विद्रोह या विश्वासघात कहा जा सकता है, लेकिन ये शब्द भी मामले को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं करते. हथियार सौंपना तो बस एक प्रतीक है. असली मकसद वर्ग संघर्ष को संघर्षरत जनता की चेतना से अलग करना है. जनता को सत्ता से हटाकर इतिहास बनाना है. क्या यह संभव है ? क्या इतिहास इसे स्वीकार करेगा ? क्या चल रहे वर्ग संघर्ष को एक विशिष्ट राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया में बदले बिना जीवन सार्थक हो सकता है ? जनता के संघर्ष के बिना, क्या इतिहास कभी गुणात्मक परिवर्तन की ओर अग्रसर होगा ?

इन प्रश्नों से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं है.

जब वर्ग संघर्ष तीव्र होता है, तो बलिदान और विश्वासघात दोनों एक सामाजिक चरित्र धारण कर लेते हैं. राजनीतिक रूप से, इन्हें वर्ग संघर्ष से अलग नहीं किया जा सकता. इसलिए, क्रांति को इतिहास और उसके राजनीतिक-सैद्धांतिक आधार के संदर्भ में समझना होगा. क्रांति एक वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और वैचारिक अभ्यास के रूप में भी विकसित होती है. यद्यपि हथियार आवश्यक हैं, हथियार ही सब कुछ नहीं हैं. राजनीति और दर्शन हथियारों को संचालित करते हैं. पिछले पचास वर्षों में, आंदोलन इसी समझ के साथ आगे बढ़ा है. वर्ग संघर्ष केवल कुछ लोगों के हथियार रख देने से समाप्त नहीं होता. सशस्त्र संघर्ष जनता के जीवन से ओझल नहीं होता. जनता की चेतना और राजनीति ही वास्तविक शक्ति है. इसके लिए एक हरावल दस्ते की जरूरत है, एक मार्ग की जरूरत है. इस मार्ग को अस्वीकार करना ही समर्पण का सार है.

इसलिए, इस घटना पर जो भी रुख अपनाए, वह राजनीतिक है. यह वर्ग संघर्ष की अभिव्यक्ति है.

यह तर्क कि सशस्त्र संघर्ष के रास्ते ने संकट पैदा किया, विपक्ष को तब ताकत देता है जब आत्मसमर्पण करने वाले उसे ताकत देते हैं. लेकिन यह तर्क नया नहीं है. दशकों से, आंदोलन ने सिद्ध किया है कि एक दीर्घकालिक जनयुद्ध ही जनता का मार्ग है. इसलिए, आज आंदोलन को गहन समझ के साथ आगे बढ़ना होगा – विश्लेषण नहीं, बल्कि व्यवहार ही इसे सिद्ध करेगा.

अनेक संकटों के बावजूद, दीर्घकालिक जनयुद्ध के मार्ग ने अनेक सफलताएं प्राप्त की हैं. इस मार्ग ने प्रखर चिंतन, सैद्धांतिक संसाधन और रचनात्मक मानवीयता को जन्म दिया है. पिछले पच्चीस वर्षों में, भारतीय माओवादी आंदोलन विश्व क्रांतिकारी क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरा है. इसके मार्ग ने इसे राज्य और साम्राज्यवाद के लिए कांटा बना दिया है.

आज का आंतरिक संकट सिर्फ़ व्यक्तियों का फ़ैसला नहीं है – इसे राज्य की गहरी योजना के एक हिस्से के रूप में भी देखा जा सकता है. हिंदुत्व-फ़ासीवादी राज्य क्रांतिकारी आंदोलन के अस्तित्व से ही नफ़रत करता है. राज्य हथियारों पर केंद्रित एक आख्यान गढ़ रहा है. वह हथियारों के बहाने क्रूर दमन को उचित ठहराने की कोशिश कर रहा है. वह हथियार-केंद्रित दृष्टिकोण से क्रांतिकारी सिद्धांत, संस्कृति और चेतना पर हमला कर रहा है. इसलिए, आत्मसमर्पण का तर्क ऑपरेशन कगार का प्रतिबिंब है.

आंदोलन को खत्म करने की सरकार की योजना का अहम पहलू इसे जनता से अलग-थलग करना है. लेकिन परिस्थितियां कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, उससे निपटने का रास्ता ढूंढ़ना ज़रूरी है – जनता को छोड़कर राज्य को हथियार सौंप देना – यही विश्वासघात है. इन आत्मसमर्पण करने वाले नेताओं ने राज्य की लंबे समय से चली आ रही इच्छा पूरी की – जनता को निहत्था करके क्रांतिकारी राजनीति से दूर करना.

कुछ बुद्धिजीवियों ने भी क्रांति को हथियार-केंद्रित बना दिया है. उन्होंने जनयुद्ध के दीर्घकालिक राजनीतिक-सैद्धांतिक-जनांदोलन की कार्यप्रणाली को केवल हथियारों तक सीमित कर दिया है. उन्होंने राज्य के हथियारों पर कभी सवाल नहीं उठाया – लेकिन उन्होंने क्रांतिकारियों के हथियारों पर सवाल उठाए हैं. वे सोचते हैं कि सशस्त्र संघर्ष ही क्रांति है. शस्त्र पूजा का अर्थ है क्रांति. बलिदान का अर्थ है क्रांति. वास्तव में, वे जनता को निःशस्त्र करने का तर्क दे रहे हैं.

एक अधिनायकवादी राज्य के सामने कोई खाली हाथ नहीं रह सकता. जब जनता की आज़ादी का रास्ता बंद हो जाता है, तो सशस्त्र संघर्ष की ज़रूरत बढ़ जाती है. इसलिए इस रास्ते को सिर्फ़ हथियार के तौर पर देखना ग़लत है. असल बात तो जन-केंद्रित वर्ग संघर्ष है.

इन तर्कों का एक जवाब है – उन्हें व्यवहार से परास्त करना ही एकमात्र उपाय है. आंदोलन अपनी सैद्धांतिक शक्ति पर विश्वास करता है. अनेक संघर्षों और अनेक प्रतिकूलताओं को पार करते हुए यह अपनी वर्तमान स्थिति तक पहुंचा है. तो सवाल यह है कि क्या इतने बड़े आंतरिक संकट के बाद वे फिर से खड़े हो पाएंगे ? राज्य द्वारा घोषित समय सीमा को ध्यान में रखते हुए भी, कुछ उत्साही बुद्धिजीवियों ने माओवादी आंदोलन को पहले ही ‘पराजित’ की सूची में डाल दिया है.

लेकिन एक संगठन के रूप में माओवादी पार्टी से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है चार पीढ़ियों से प्राप्त क्रांतिकारी अनुभव. यह भारत के इतिहास में अद्वितीय है. यह नक्सलबाड़ी-श्रीकाकुलम सहित सभी जनसंघर्षों से ऊंचा और अधिक पूर्ण है. 21वीं सदी के ऐतिहासिक संदर्भ में, यह एक अनूठा क्रांतिकारी मॉडल है. क्या ऑपरेशन कगार से यह नष्ट हो जाएगा ? क्या यह चंद नेताओं के प्रतिक्रियावादी रवैये से ख़त्म हो जाएगा ? क्या इतने विशाल जनसंघर्ष का इतिहास इसे मिटा सकता है ?

चाहे कितने भी संकट आएं, क्या क्रांतिकारी आंदोलन फिर से नहीं उठेगा ? इतिहास कहां जाएगा ? क्रांतिकारी आंदोलन इतिहास को कहां ले जाएगा ?

यह भावना का प्रश्न नहीं है – यह इतिहास-निर्माण के कठोर विश्लेषण का प्रश्न है.

अब समय आ गया है कि हम देखें कि यह आंदोलन किस प्रकार स्वयं को नए परीक्षणों के माध्यम से सिद्ध करता है.

  • पाणि (संपादकीय- अरुणनाथ)

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