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‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 24, 2026
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'हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए' - के. मुरली
‘हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए’ – के. मुरली

साथियो, जिस विषय पर मुझसे बोलने के लिए कहा गया है, वह है नक्सलबाड़ी, यानी नक्सलबाड़ी का रास्ता, उसका प्रयोग तथा उसका परिणाम. तो, उचित होगा कि शुरुआत इस बात से की जाए कि नक्सलबाड़ी की विशिष्टता क्या थी ?

मेरा मानना है कि इसे भारत में मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद के सचेत और स्पष्ट प्रयोग के रूप में चिन्हित करना उचित होगा. नक्सलबाड़ी की यह साफ समझ थी कि किसी भी क्रांति का मूल तत्व, उसका केंद्रीय बिंदु राजनीतिक सत्ता पर कब्ज़ा करना होता है. इसी क्रन्तिकारी समझ के साथ नक्सलबाड़ी का सशस्त्र किसान विद्रोह शुरू हुआ था.

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हम जानते हैं कि जब यह विद्रोह हुआ, उस समय यानी 1967 में, पश्चिम बंगाल में एक गठबंधन सरकार थी, जिसमें सीपीएम, सीपीआई, आरएसपी, एसयूसीआई आदि शामिल थे, और उसका नेतृत्व बांग्ला कांग्रेस कर रही थी. जब यह विद्रोह हुआ, तब इस सरकार ने हरे कृष्ण कोणार को, जो उस समय राजस्व मंत्री थे और साथ ही किसान सभा के नेता भी थे, नक्सलबाड़ी भेजा, ताकि वे क्रांतिकारी किसानों से बातचीत कर सकें.

हरे कृष्ण कोणार ने जो प्रस्ताव रखा वह था कि हमारी सरकार आपको उस सारी जमीन के पट्टे दे देगी, जिस पर आपने कब्ज़ा कर लिया है, लेकिन कृपया अपने हथियार डाल दीजिए—हम आपसे बस यही मांग करते हैं. किसानों ने तुरंत जवाब दिया और कहा कि हमें आपके पट्टों की जरूरत नहीं है, हम सत्ता पर कब्ज़ा करेंगे और उसके बाद ही तय करेंगे कि जमीन के साथ क्या करना है. किसानों के अन्दर यह स्पष्टता उस वैचारिक संघर्ष से आई थी जो सीपीएम के भीतर कामरेड चारू मजूमदार और देशभर के अनेक कॉमरेडों द्वारा लड़ी गयी थी.

मतलब यह है कि नक्सलबाड़ी आन्दोलन में शुरुआत से ही राजनीतिक सत्ता पर कब्ज़ा करने का विचार बहुत स्पष्ट था. बाकी सारी बातें इसी विचार से जुड़ी हुई थीं.

हम जानते हैं कि नक्सलबाड़ी आन्दोलन के दौरान कई उतार-चढ़ाव, असफलताएं, गलतियां आदि हुई. लेकिन अंततः हमारे देश में यह लक्ष्य दंडकारण्य में जनताना सरकार और बिहार-झारखंड क्षेत्र में क्रांतिकारी किसान समितियों के रूप में साकार हुआ. यह हमारे देश में पहली बार था कि एक बहुत ही सचेत प्रयास के माध्यम से जनता ने स्थानीय स्तर पर सत्ता पर कब्ज़ा किया और अपनी राजनीतिक सत्ता स्थापित की. यह पहले भी तेलंगाना में और कुछ समय के लिए शोलापुर में भी हुआ था.

जनताना सरकार और क्रांतिकारी किसान समिति एक सचेत प्रयास के जरिए बनी, और इस स्पष्ट समझ के साथ बनी कि क्रांति का केंद्रीय प्रश्न सत्ता पर कब्ज़ा करना है. यह समझ मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की सही पकड़ से आई थी.

यह बात ज़ोर देकर कहना बहुत ज़रूरी है कि यह सब क्रांतिकारी व्यवहार के माध्यम से सामने आया. क्योंकि आज आप देखिए, रेड स्टार जैसे संशोधनवादी लोगों ने फेसबुक पर कुछ लिखा है, जहां वे यह कहते हैं कि सीपीआई (माओवादी) को जो वर्तमान झटके/पराजय मिल रही हैं, उसका कारण उसका सैन्यवाद (मिलिटेरिज़्म) और वाम अवसरवाद है. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि उनके एक नेता द्वारा लिखी गई उस बात में एक पंक्ति यह भी है कि शुरू से ही, क्रांति-पूर्व दौर में ही, यानी शुरुआत से ही, जब हम गतिविधियां शुरू करें, तभी से हमें स्थानीय जन-सत्ता स्थापित करने के कार्य को अपने काम में जोड़ना चाहिए. लेकिन आप यह “एकीकरण” आखिर करेंगे कैसे? यदि आप सचमुच राजनीतिक सत्ता की बात कर रहे हैं, यदि आप स्थानीय राजनीतिक सत्ता बनाने की बात कर रहे हैं, तो यहां पहले से ही एक सत्ता मौजूद है—और क्या आपको लगता है कि वह सत्ता आपको वहां अपनी जन-सत्ता बनाने देगी?

यह बात सीधे-सीधे सशस्त्र संघर्ष के प्रश्न को सामने ले आती है.

अब ध्यान दीजिए—यही लोग सीपीआई (माओवादी) के सैन्यवाद पर हमला कर रहे हैं. उन्होंने इंस्टाग्राम या फेसबुक पर एक कार्ड भी डाला था जिसमें टूटी हुई राइफल दिखाई गई थी, ताकि यह दिखाया जा सके कि सैन्यवाद को पराजित कर दिया गया है. यही वे लोग हैं जो यह भी कह रहे हैं कि शुरुआत से ही स्थानीय जन-सत्ता निर्माण को अपने काम में शामिल करना चाहिए.

मेरा मतलब यह है कि जनताना सरकार किसी कल्पना-लोक या केवल इच्छा-आधारित सोच से नहीं बनी. वे जनता के कठिन संघर्षों और शहीदों के खून से बनी है.

इस तरह वे कम से कम देश के कुछ हिस्सों में जनता का शासन स्थापित करने में, अपनी खुद की सरकार बनाने में, अपना संविधान, नियम, कानून और व्यवस्थाएं स्थापित करने में, और उन्हें कम से कम कुछ दशकों तक लागू करने में सफल हुए.

बेशक, आज वे एक झटके का सामना कर रहे हैं. संभव है कि जो कुछ भी उन्होंने बनाया है, उसे खो दें. लेकिन क्रांति का रास्ता ऐसा ही होता है. यदि हम चीनी क्रांति को देखें, तो हम पाएंगे कि कई बार उन्होंने भी बड़े-बड़े मुक्त क्षेत्र खो दिए थे, जहां उनकी अपनी सरकार थी. उदाहरण के लिए येनान.

तो यहां मुद्दा यह नहीं है कि आप उसे खोते हैं या नहीं. दीर्घकालिक जनयुद्ध में ऐसा होता ही है. मुद्दा यह है कि माओवादी स्थानीय स्तर पर जनता की सत्ता स्थापित कर सके. और यह नक्सलबाड़ी के रास्ते का एक महत्वपूर्ण मुकाम है.

आज यह बात रेखंकित करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि सोनू और रूपेश जैसे लोग माओवादी आन्दोलन पर हमला करते हुए कह रहे हैं कि चुनावों का बहिष्कार करना गलती थी.

मैं जनताना सरकार के विस्तार में नहीं जा रहा हूं. इस पर तेलुगु में कामरेड पानी द्वारा लिखी गई एक बहुत अच्छी किताब है. अंग्रेज़ी में भी कई किताबें आई हैं, जो इस विषय पर जानकारी देती हैं.

लेकिन जनताना सरकार से जुड़े कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिन पर हमें गंभीरता से विचार करना होगा.

मैं शुरुआत करना चाहूंगा उस बात के एक संक्षिप्त उल्लेख से, जिसे आज दुश्मन अपने मीडिया/अखबारों के जरिए प्रचारित कर रहा है. वे दावा कर रहे हैं कि यह पार्टी की पोलित ब्यूरो की एक सर्कुलर से निकाला गया अंश है, जिसमें जनताना सरकार में शामिल लोगों के वर्गीय चरित्र में बदलाव की बात कही गई है. मैंने इसका कोई विस्तृत स्पष्टीकरण नहीं देखा है. और निश्चित रूप से यह भी नहीं कहा जा सकता कि यह दस्तावेज असली और प्रमाणिक है. लेकिन फिर भी, इसका एक महत्व है.

आखिर यह बात किस चीज की ओर संकेत करती है ?

मेरा मानना है कि हमें इस प्रश्न की जांच चीन की सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति से मिले सबक की रोशनी में करने की कोशिश करनी चाहि. हम जानते हैं कि सांस्कृतिक क्रांति 1960 के दशक के मध्य में शुरू हुई थी. इसमें ल्यू शाओची और देंग शियाओ पिंग के नेतृत्व में मौजूद पूंजीवादी रास्ते के समर्थकों (कैपिटलिस्ट रोडर्स) के खिलाफ एक बड़ा संघर्ष छेड़ा गया, और बाद में लिन पियाओ के खिलाफ भी. यदि आप सांस्कृतिक क्रांति के पूरे दौर को देखें, तो आप पाएंगे कि शुरुआती समय में बहुत सारे लेख ल्यू शाओची और देंग शियाओ पिंग पर हमला करते हुए लिखे गए, जिनमें मूलतः यह कहा गया कि शुरू से ही ये लोग खराब थे. कुछ लेखों में तो यह भी कहा गया कि इनमें से कुछ जापानियों या कुओमिनतांग के साथ सहयोग भी करते थे.

लेकिन बाद के दौर में, खासकर जब लिन पियाओ के खिलाफ संघर्ष शुरू हुआ, तब बहुत गहरे विश्लेषणात्मक और वैचारिक लेख सामने आए, जो इस बदलाव की वैचारिक तर्क-प्रणाली और उसके भीतर चल रही धाराओं को समझने की कोशिश करते थे. उदाहरण के लिए, वे यह सवाल उठा रहे थे कि देंग शियाओ पिंग जैसे लोग, जो कुओमिनतांग सरकार के खिलाफ चल रहे क्रांतिकारी संघर्ष के समय क्रांति के महत्वपूर्ण नेता थे [देंग शियाओ पिंग लाल सेना के एक महत्वपूर्ण जनरल थे], तो फिर ऐसे क्रन्तिकारी लोग बाद में पूंजीवादी रास्ते के समर्थक कैसे बन गए? यह परिवर्तन क्यों हुआ? यह रूपांतरण कैसे हुआ?

मैं अब उसी दौरान छपे एक लेख का हिस्सा पढ़ना चाहूंगा जो इस प्रश्न को समझने की कोशिश करता है. वह इस प्रकार है—

‘ल्यू शाओची और देंग शियाओ पिंग जैसे लोगों ने जब पार्टी के न्यूनतम कार्यक्रम अर्थात नव-जनवादी क्रांति के कार्यक्रम को स्वीकार किया तो उन्होंने उसे पार्टी के अधिकतम कार्यक्रम यानी समाजवाद और फिर पूरे विश्व में साम्यवाद की विजय से नहीं जोड़ा. दूसरे शब्दों में, उनका विश्व-दृष्टिकोण सर्वहारा कम्युनिस्ट विश्व-दृष्टिकोण नहीं था, बल्कि एक बुर्जुआ दृष्टिकोण था. यह बुर्जुआ दृष्टिकोण लंबे क्रांतिकारी संघर्षों के दौरान ढलकर पुनर्गठित नहीं हुआ. और जब क्रांति नवजनवादी चरण से आगे बढ़कर समाजवादी क्रांति के चरण में पहुंची, तब उनकी विचारधारा समाजवादी क्रांति की गति के साथ कदम नहीं मिला सकी। यानि भले ही वे शारीरिक रूप से समाजवादी समाज में प्रवेश कर चुके थे, लेकिन वैचारिक रूप से वे अभी भी जनवादी क्रांति के चरण में ही थे. यही चीज समाजवादी क्रांति के साथ उनके अपरिहार्य टकराव और यहां तक कि उसके विरोध को निर्धारित करती है.’ (‘From Bourgeois-Democrats to Capitalist Roaders’)

तो बिंदु यह है कि क्रांति आगे बढ़ रही थी, लेकिन क्रांति के कुछ नेताओं की विचारधारा उसी गति से आगे नहीं बढ़ी. वैचारिक रूप से वे पीछे रह गए.

क्रांति के इस चरण में जो लोग सामंतवाद-साम्राज्यवाद के खिलाफ हैं, जिनमें देशप्रेम की भावना है, वे भी बिना सर्वहारा वर्गीय दृष्टिकोण अपनाए, क्रांति का हिस्सा बन सकते हैं. वे क्रांतिकारी हो सकते हैं. लेकिन उनका दृष्टिकोण पुराना होता है—वह बुर्जुआ दृष्टिकोण होता है, सर्वहारा दृष्टिकोण नहीं. और नव-जनवादी चरण में यह बुर्जुआ दृष्टिकोण भी प्रगतिशील भूमिका निभा सकता है. इसलिए वे क्रांतिकारी आंदोलन का हिस्सा बन जाते हैं.

लेकिन यदि वे अपने विचारों को नए सिरे से नहीं ढालते, अपने चिंतन का पुनर्गठन नहीं करते, तो जब क्रांति समाजवादी चरण में प्रवेश करती है, तब वे उसके साथ कदम नहीं मिला पाते. वे धीरे-धीरे अलग होने लगते हैं और अंततः उसका विरोध करने लगते हैं. वे पूंजीवादी रास्ते के समर्थक बन जाते हैं.

अब, जब हम अपने संदर्भ में इस बात को देखते हैं, तो जैसा कि मैंने पहले कहा, नक्सलबाड़ी का मुख्य बिंदु था राजनीतिक सत्ता पर कब्ज़ा. लेकिन यह राजनीतिक सत्ता किस लिए? आखिर यह राजनीतिक सत्ता है किस उद्देश्य के लिए? क्या यह केवल उस इलाके में, जहां लोग रहते हैं, वहां की कुछ समस्याओं को हल करने के लिए है? या यह केवल हमारे देश में साम्राज्यवाद और सामंतवाद के सवाल को समाप्त करने के लिए है? या यह विश्व सर्वहारा समाजवादी क्रांति, पूरे विश्व के रूपांतरण, और मानवता की मुक्ति की उस प्रक्रिया से जुड़ा है, जो कि सर्वहारा-मुक्ति का मूल सार है?

दरअसल राजनीतिक सत्ता को आप कई स्तरों पर समझ सकते हैं. सत्ता पर कब्ज़ा करने को इस तरह भी समझा जा सकता है कि यहां यह ज़मींदार है, वहां वह आदमी है, हमें इन्हें खत्म करना है, जमीन पर कब्ज़ा करना है और फिर हमारा राज होगा. यह भी एक समझ हो सकती है.

आप इसे देश के स्तर पर भी समझ सकते हैं कि हम साम्राज्यवाद, सामंतवाद और दलाल बुर्जुआजी को हटाएंगे और फिर एक बहुत शक्तिशाली भारत का निर्माण करेंगे. यह दूसरी समझ होगी.

लेकिन उपरोक्त दोनों में से कोई भी समझ सत्ता पर कब्ज़े की कम्युनिस्ट समझ या सर्वहारा समझ नहीं है. सही समझ यह है कि आप राजनीतिक सत्ता पर कब्ज़े को विश्व क्रांति के स्तर पर समझें और उस अवस्था की ओर बढ़ें जहां हम राज्य-सत्ता को भी पार कर जायें और एक वर्ग-विहीन समाज बना सकें, जहां राज्य अनावश्यक हो जाए और धीरे-धीरे समाप्त (wither away) हो जाए. यही सर्वहारा दृष्टिकोण है.

इसी संदर्भ में, जब हम जनताना सरकार, किसान क्रन्तिकारी समितियों के अपने अनुभवों की समीक्षा करते हैं, और उस विशेष संदर्भ को देखते हैं जिसमें यह कहा गया है कि इन संरचनाओं में मौजूद लोगों के वर्गीय चरित्र में बदलाव आया है—तो सवाल उठता है कि यह बदलाव आखिर किस प्रकार का हो सकता है?

हमारे पास इसके विवरण नहीं हैं, इसलिए हम केवल एक हद तक अनुमान ही लगा सकते हैं. जाहिर है, यह निजी संपत्ति बनाने और दूसरों पर मालिक की तरह शासन करने वाला बदलाव नहीं हो सकता. उन इलाकों में यह संभव नहीं था, जहां पार्टी मौजूद है, जहां पीएलजीए मौजूद है, जहां मिलिशिया मौजूद है. किसी के लिए यह संभव नहीं था कि वह जनताना सरकार द्वारा नियंत्रित सामूहिक संपत्ति पर कब्ज़ा कर ले और यह घोषित कर दे कि यह मेरी निजी संपत्ति है.

तो फिर यह वर्गीय चरित्र में बदलाव किस प्रकार का हो सकता है ?

आइए “जल-जंगल-जमीन” के नारे को ही देखें, जिसने निश्चित रूप से किसी न किसी रूप में जनता को सत्ता पर कब्ज़े की लड़ाई में संगठित और प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई होगी. क्योंकि यह नारा उनकी तत्काल जरूरतों से जुड़ा हुआ था.

लेकिन अगर जल-जंगल-जमीन को अलग-थलग करके समझा जाए—जैसा कि मैंने पहले कहा—यदि राजनीतिक सत्ता के सवाल को केवल उस स्थानीय क्षेत्र के दृष्टिकोण से ही समझा जाए, तो फिर यह नारा क्या अर्थ देगा? मैंने अपने लेख में इसे इस प्रकार दर्ज किया है—

‘मान लीजिए राजनीतिक सत्ता स्थानीय स्तर पर अपेक्षाकृत स्थिर रूप से लागू की जा सकती है. उस सत्ता को हासिल करने के संघर्ष में “जल-जंगल-जमीन” पर नियंत्रण का आह्वान निर्णायक भूमिका निभाता है. लेकिन अगर इसे अलग-थलग करके, पूर्ण और अंतिम सत्य की तरह समझ लिया जाए- देशभर में क्रांति आगे बढ़ाने के कार्य से काटकर, विश्व समाजवादी क्रांति से काटकर, और मानवता की सम्पूर्ण मुक्ति के कम्युनिस्ट कार्यभार से काटकर—तो यही नारा नकारात्मक भूमिका निभाने लगेगा.

क्योंकि तब वही नारा, जिसने जनता को संगठित किया था, धीरे-धीरे अपने विपरीत में बदल जाएगा. तब आगे बढ़ने की आवश्यकता दिखाई नहीं देगी. संघर्ष के प्रति एक रूढ़िवादी दृष्टिकोण पैदा हो जाएगा. तब यह सोच बनने लगेगी कि हमने कुछ हासिल कर लिया है, अब हमें बस उसे बचाना है, और जरूरत पड़े तो उसके लिए समझौते भी करने हैं.’

तो वर्गीय चरित्र में यह बदलाव निश्चित रूप से जनयुद्ध के विकास में नकारात्मक भूमिका निभा सकता है.

क्या आज दिखाई दे रहे बड़े पैमाने के आत्मसमर्पण (surrender) को समझने में यह मदद करता है ? क्योंकि आज केवल एक-दो लोग आत्मसमर्पण नहीं कर रहे हैं, बल्कि पूरे-के-पूरे समूह आत्मसमर्पण कर रहे हैं. तो क्या यह इसका एक संभावित कारण हो सकता है, कि वैचारिक समझ उस स्तर तक विकसित नहीं हो पाई, जहां यह स्पष्ट हो कि यह अंतिम मंज़िल नहीं है, हमें और आगे बढ़ना है ?

इसी संदर्भ में मैं यह कहना चाहता हूं कि यह हमें एक और महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर ध्यान दिलाता है, जो पुनः नक्सलबाड़ी से जुड़ा है. मैं उस पर बाद में आऊंगा. वह प्रश्न यह है कि भौतिक वास्तविकता में जो परिवर्तन होते हैं, उनका विचारधारा में क्या प्रतिबिंबन (reflection) होता है ?

उदाहरण के लिए सत्ता पर कब्ज़े के प्रश्न को ही लें. पहले स्थिति यह थी कि आपके पास सत्ता नहीं थी, आप शोषित थे, आप पर विभिन्न शोषकों और उत्पीड़कों का दबदबा था—राज्य, स्थानीय जमींदार, आदिवासी सरदार आदि. अब स्थिति यह है कि आपने उन्हें उखाड़ फेंका है और आप स्वयं सत्ता का प्रयोग कर रहे हैं. इस नई भौतिक परिस्थिति का वैचारिक प्रतिबिंबन क्या होगा ?

जाहिर है, इसमें दो विपरीत प्रवृत्तियां पैदा हो सकती हैं. एक तरफ क्रांति की आवश्यकता अधिक स्पष्ट हो सकती है. दूसरी तरफ एक प्रकार की यथास्थितिवादी (status-quoist) सोच पैदा हो सकती है कि हमने कुछ हासिल कर लिया है, अब हमें बस इसे बचाना है.

इसी को हम सीपीआई (माओवादी) के कुछ दस्तावेजों में आये एक और मुद्दे से जोड़ सकते हैं कि जिन इलाकों में अत्यंत तीव्र सामंत-विरोधी संघर्ष हुए, वहां उत्पादन संबंधों पर वर्ग-संघर्ष का असर पड़ा. जमींदारों को पीछे हटना पड़ा, जमीनें छीनी गईं, कुछ जगहों पर जमीन का वितरण हुआ यानि बहुत सारे बदलाव आए. इससे स्वाभाविक रूप से वर्ग-संबंधों का एक नया पुनर्गठन (reconfiguration) हुआ.

लेकिन इन बदलावों का वैचारिक प्रभाव क्या पड़ा ? यह क्रांतिकारी ताकतों के सामने एक नया सवाल खड़ा करता है. आप इस मुद्दे को वैचारिक और राजनीतिक रूप से कैसे संबोधित करेंगे ?

एक तरफ तो एक नई जमीनी हकीकत है, जिसे आपको संभालना है. लेकिन दूसरी तरफ उसी जमीनी हकीकत का असर आपकी अपनी कतारों पर, आपके अपने कैडर पर, आपके अपने नेतृत्व पर भी पड़ता है. तो इसे कैसे समझा जाए ? इस पर चिंतन कैसे किया जाए ?

हम इसे एक मुद्दे के रूप में, एक चुनौती के रूप में कैसे उठाएं ताकि विचारधारा को लगातार रूपांतरित किया जा सके, उसे लगातार विकसित किया जा सके, ताकि ऐसी नई स्थिति को संभालते हुए आगे बढ़ा जा सके ?

वास्तव में, माओवाद की जो समझ 1960 के दशक की महान बहस (Great Debate) और बाद में सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति के माध्यम से विकसित हुई, उसी ने सीपीएम के भीतर मौजूद क्रांतिकारियों को इस तरह से सक्षम बनाया कि वे अपने विद्रोह को इस स्तर तक तेज कर सकें कि वह केवल संशोधनवाद से ही नहीं, बल्कि केन्द्रवाद (centrism) से भी पूरी तरह विच्छेद (rupture) की स्थिति तक पहुंच जाए. इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है, क्योंकि सीपीएम शुरू में खुलकर संशोधनवादी पार्टी नहीं थी. यदि आप शुरुआती दौर को देखें—उदाहरण के लिए केरल में—सीपीआई से अलग होने के बाद उन्होंने एक पत्रिका प्रकाशित की थी, जिसका नाम था ‘चिंदा’ (Chinda). तमिलनाडु में ‘थीक्काथिर’ (Theekkathir). और चिंदा तथा थीक्काथिर में, और संभवतः देश के अन्य हिस्सों में भी (हालांकि मुझे उसकी जानकारी नहीं है), पेकिंग रिव्यू से सांस्कृतिक क्रांति से संबंधित लेखों के अनुवाद छपते थे. जैसे—16 मई का सर्कुलर. सीपीएम के नेता दावा करते थे कि वे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के लगातार संपर्क में हैं. जबकि वास्तविकता यह थी कि वे सोवियत संघ की पार्टी के साथ—ख्रुश्चेववादियों के साथ—गुप्त रूप से मेलजोल बढ़ा रहे थे. वे भारतीय राज्य के साथ भी तालमेल बिठा रहे थे, यह देखने के लिए कि जनता और पार्टी के आम कार्यकर्ताओं में जो क्रांतिकारी उफान पैदा हो रहा है, उसे कैसे सुरक्षित संसदीय रास्तों में मोड़ा जाए. इसलिए सीपीएम के भीतर मौजूद क्रांतिकारियों के सामने केवल संशोधनवाद पर हमला करने का काम नहीं था, बल्कि उन्हें केन्द्रवाद को भी पहचानना था. केन्द्रवाद भी संशोधनवाद का ही एक रूप है. इसी कारण कामरेड चारू मजूमदार ने सही कहा था कि केन्द्रवाद संशोधनवाद की ओर जाने वाला एक पायदान (stepping stone) है.

मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद, महान बहस और फिर सांस्कृतिक क्रांति के अनुभवों के माध्यम से जो वैचारिक तीक्ष्णता संभव हुआ, उसी ने इन क्रांतिकारियों कामरेड चारू मजूमदार, कान्हाई चटर्जी और अन्य साथियों को सीपीएम से बाहर निकलने के लिए सक्षम बनाया और यह कहने के लिए प्रेरित किया कि नहीं, यह रास्ता काम नहीं करेगा.

और इसी वजह से हम उन साथियों और टी. नागी रेड्डी जैसे लोगों के बीच अंतर देखते हैं, जो अब भी यह कह रहे थे कि हमें सीपीएम के भीतर ही संघर्ष करना चाहिए, उसे भीतर से बदलना चाहिए, उसे सुधारना चाहिए, उसे सही दिशा में लाना चाहिए, आदि-आदि.

आज हम जानते हैं कि वे लोग कहां जाकर पहुंचे. इसलिए सीपीएम से क्रांतिकारी विच्छेद (rupture) के लिए यह वैचारिक तीक्ष्णता अत्यंत निर्णायक था.

मैं जिस वैचारिक दृष्टिकोण पर जोर दे रहा हूं, वह यही है कि आज हम जिस अनुभव से गुजर रहे हैं—झटके, पराजय और इन तमाम परिस्थितियों से—उसके पीछे वैचारिक आधार क्या है? यह क्यों हो रहा है?

बेशक, व्यक्तिगत स्तर पर किसी की कायरता, उसकी थकान, उसका आरामदायक जीवन में लौटने का मन—ये सब कारण भी अपनी भूमिका निभाते हैं. लेकिन इसके परे एक वैचारिक पहलू भी है. और खासकर इस समय, जब हम एक गंभीर झटका झेल रहे हैं, हमें इसी वैचारिक पहलू को पहचानना होगा.

और यहां केवल सही और जरूरी राजनीतिक निष्कर्षों को दोहराते रहना ही पर्याप्त नहीं है. उदाहरण के लिए—हां, यह सही है कि भारत आज भी एक अर्ध-सामंती, अर्ध-औपनिवेशिक देश है. लेकिन आज व्यवहार में सामंत-विरोधी संघर्ष का क्या अर्थ है? इसे ठोस रूप से समझने के लिए आज के समाज में अर्ध-सामंतवाद किस रूप में प्रकट हो रहा है, इसकी विशिष्ट विशेषताओं को ध्यान में रखकर विश्लेषण करना जरूरी है. क्योंकि कई क्षेत्रों में पुराने प्रकार के जमींदार अब मौजूद नहीं हैं. या तो उन्हें उखाड़ फेंका गया है, या वर्ग-संघर्ष के दबाव में वे खुद पीछे हट गए हैं, या अन्य कारणों से वे हट गए हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अर्ध-सामंतवाद समाप्त हो गया. फिर सवाल यह है कि आज जो अर्ध-सामंतवाद मौजूद है, वह आखिर किस रूप में मौजूद है? यह बात ठोस विश्लेषण के जरिए समझनी होगी. और जब हम इसे सही ढंग से पकड़ पाएंगे, तभी जो राजनीतिक निष्कर्ष हम सामने रखते हैं, वे आंदोलन को आगे बढ़ाने में वास्तविक अर्थ ग्रहण करेंगे.

इसलिए यह सब हमें फिर से मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की समझ को और गहराई देने की जरूरत की ओर ले जाता है.

इसके अलावा एक दूसरा पहलू भी है—बहुत सारी तकनीकी चीजें हैं जिन्हें हमें समझना होगा. उदाहरण के लिए, यहां फिर से ऑपरेशन कगार का उल्लेख हो रहा है.

यह ध्यान देने योग्य है कि फिलीपींस के साथी भी लगभग इसी प्रकार की परिस्थिति का सामना कर रहे हैं. आप जानते हैं कि वहां का जनयुद्ध एक समय पर बहुत ऊंचे स्तर तक पहुंच गया था, कई मामलों में हमारे देश से भी आगे. लेकिन अब वे रिपोर्ट कर रहे हैं कि उनके नियंत्रण वाले क्षेत्रों और उनकी गतिविधियों में संकुचन आया है. वे नेतृत्व और पंक्तियों में रूढ़िवाद (conservatism) को इसके एक प्रमुख कारण के रूप में चिन्हित करते हैं.

लेकिन वे यह भी बताते हैं कि दुश्मन की रणनीति और कार्यनीति में बदलाव आया है. हवाई बमबारी वहां रोज़मर्रा की घटना बन चुकी है. वह कभी-कभार होने वाली चीज नहीं है, जैसा कि हमने भारत में देखा है. वे बताते हैं कि कैसे विशाल संख्या में दुश्मन सैनिकों के जरिए पूरे इलाकों को घेर लिया जाता है और अभियान लंबे समय तक चलते हैं. एक उदाहरण में वे बताते हैं कि एक अभियान लगभग दो वर्षों तक चला.

हम जानते हैं कि कर्रेगुट्टा के मामले में, बाद में जो रिपोर्टें मिलीं, उनसे पता चलता है कि साथी यह मान रहे थे कि यह अभियान अधिकतम कुछ दिनों तक चलेगा. लेकिन वह लगभग दो महीनों तक चला. और इससे उनके लिए टिके रहना बेहद कठिन हो गया.

तो दुश्मन की इस रणनीति में बदलाव, जिसका निश्चित रूप से कोई न कोई साम्राज्यवादी संबंध है—क्योंकि आप इसे फिलीपींस में देखते हैं, इसे भारत में भी देखते हैं—यह संभवतः अमेरिकी साम्राज्यवाद या किसी ऐसी ही शक्ति द्वारा निर्देशित है. इसलिए यह हमारे सामने एक नई चुनौती है.

एक और पहलू है, जैसे कि शहरीकरण का प्रश्न. यह वैसा नहीं है जैसा कुछ लोग कहते हैं कि शहरीकरण हो गया है और अब शहरी सवाल केंद्रीय सवाल बन गया है. यह बकवास है. क्योंकि हमारे देश में उस अर्थ में शहरीकरण नहीं हुआ है, जैसा हम शहरीकरण को समझते हैं, यानी शहरों का व्यापक विस्तार और मजदूर वर्ग की आबादी का बड़े पैमाने पर बढ़ना.

लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों पर एक शहरी प्रभाव जरूर पड़ा है. इसमें कोई संदेह नहीं है. पहले यह केबल टीवी के जरिए शुरू हुआ और अब स्मार्टफोन के प्रसार के जरिए और अधिक फैल गया है. उपभोक्तावादी संस्कृति अब हर कोने में पहुंच गई है. और ऑनलाइन खरीदारी ने इसे और व्यापक बना दिया है. इससे एक प्रकार की पतनशील संस्कृति भी फैल रही है, इसमें भी कोई शक नहीं. एक उपनिवेशवादी/नव-उपनिवेशवादी संस्कृति आ रही है, जो सामंतवाद के साथ मिलकर फैल रही है.

अभी एक अध्ययन सामने आया है, जिसमें बताया गया है कि एआई [AI] किस तरह जातिगत सोच को मजबूत करता है और उसे पुनरुत्पादित करता है. यह इसका एक बहुत तीखा पर्दाफाश है. उदाहरण के लिए, जब एआई से पूछा जाता है कि किसी उच्च श्रेणी की नौकरी के लिए उपयुक्त व्यक्ति का नाम क्या हो सकता है, तो तुरंत वह कोई सवर्ण नाम सामने लाता है. फिर उपनाम पूछने पर वह पंडित, तिवारी जैसे उपनाम दे देता है. जैसे कि केवल ब्राह्मण या ऊंची जाति का व्यक्ति ही उस नौकरी के लिए उपयुक्त हो. यह जवाब एक एआई चैटबॉट दे रहा है.

आधुनिक तकनीक के माध्यम से जाति व्यवस्था किस तरह पुनः पैदा हो रही है, यह स्पष्ट दिखाई देता है. और इसका प्रभाव लोगों पर पड़ेगा.

लेकिन यही एकमात्र पहलू नहीं है. स्मार्टफोन संचार का साधन तो है ही, लेकिन इसके अलावा वह दुनिया को देश के सबसे दूर-दराज इलाकों तक पहुंचा रहा है.

इस तरह पूरी दुनिया हमारे देश के सबसे दूरस्थ कोनों तक पहुंच रही है. और इससे राजनीतिक चेतना का एक नया दायरा खुल रहा है. राजनीतिक क्षेत्र अब पहले की तुलना में अधिक सक्रिय और जीवंत हो गया है.

यह बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह क्रांतिकारियों के लिए राजनीतिक हस्तक्षेप का एक अवसर भी देता है, सिर्फ सशस्त्र संघर्ष या जनसंघर्ष के माध्यम से नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से भी राजनीतिक घटनाओं पर प्रतिक्रिया व हस्तक्षेप किया जा सकता है.

यह पहले मौजूद नहीं था. और निश्चित रूप से हमें इसे एक सचेत प्रयास के रूप में अपनाना होगा. संभव है कि इसे भी, क्रांति के इस रास्ते को आगे बढ़ाने के संदर्भ में, एक नए “प्रयोग” के रूप में देखा जा सके.

अंत में निष्कर्ष के रूप में मैं फिर से इसी बात पर ज़ोर देना चाहता हूं कि सबसे महत्वपूर्ण चीज़ विचारधारा है.

और आज निर्णायक बात यही है कि हम अपनी विचारधारा को और अधिक धारदार करें, अपनी वैचारिक समझ को और गहरा करें, और जिन झटकों/पराजयों का हम सामना कर रहे हैं, उनके विश्लेषण में वैचारिक-विश्लेषणात्मक चिंतन को लागू करें.

साथ ही, यह भी ज़ोर देकर कहना जरूरी है कि हमें नक्सलबाड़ी के रास्ते पर दृढ़ता से कायम रहना चाहिए.

इसी के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं.

धन्यवाद.

  • ‘विरसम’ के 30 वें सम्मलेन में कॉमरेड के. मुरली द्वारा अंग्रेजी में दिए गए भाषण का लिप्यान्तरण और अनुवाद मनीष आजाद द्वारा किया गया है.

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