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आरएसएस का पर्दाफाश : इतिहास के सबसे बड़े दक्षिणपंथी संगठन की संरचना का ख़ुलासा, भाग – 1

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 3, 2026
in गेस्ट ब्लॉग
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आरएसएस का पर्दाफाश : इतिहास के सबसे बड़े दक्षिणपंथी संगठन की संरचना का ख़ुलासा, भाग - 1
आरएसएस का पर्दाफाश : इतिहास के सबसे बड़े दक्षिणपंथी संगठन की संरचना का ख़ुलासा, भाग – 1

‘संघ किसी पर नियंत्रण नहीं करता, न प्रत्यक्ष और न ही परोक्ष रूप से’, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने इस साल अगस्त के अंत में हुए एक सम्मेलन में यह बात ज़ोर देकर कही. हिंदू दक्षिणपंथ की वैचारिक धुरी और उसके विस्तृत संगठनात्मक संजाल की धुरी में स्थित संघ, इस वर्ष अपनी शताब्दी मना रहा है. इस मील के पत्थर के सम्मान में हुए अनेक सार्वजनिक आयोजनों में, आरएसएस प्रमुख का व्यवहार ऐसा लगा जैसे कोई अभिभावक अपने ही बच्चों से दूरी बनाना चाहता हो. भागवत का कहना था कि संघ से जुड़े संगठन अपने फ़ैसले ख़ुद लेते हैं, स्वतंत्र होते हैं और धीरे-धीरे पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाते हैं. अपनी अनेक सार्वजनिक घोषणाओं में भी संघ बार-बार कहता है कि जिन संगठनों का नाम उसकी तीन दर्जन के क़रीब आधिकारिक इकाइयों में नहीं आता, उनसे उसका कोई सीधा संबंध नहीं है.

हालांकि, यह जगजाहिर है कि संघ का प्रभाव उसके बताए हुए सीमित संगठनों से कहीं ज़्यादा दूर तक फैला हुआ है. भागवत के बयान से कुछ ही दिन पहले, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिल्ली के लाल किला से कहा था कि, ‘आरएसएस दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ है.’ मोदी के बयान ने वही बात साफ़ कर दी जिसे भागवत उलझा कर पेश कर रहे थे. सच यह है कि आरएसएस से जुड़े कई संगठन समाज के अलग-अलग क्षेत्रों में फैले हुए हैं और यही विस्तृत नेटवर्क संघ की शक्ति का असली आधार है.

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अब यह सवाल उठता है कि यह नेटवर्क कितना बड़ा है, कैसा है और कैसे काम करता है? इसकी कोई ठोस जांच आज तक क्यों नहीं हुई? इसकी वजह साफ़ है कि संघ ख़ुद इसे यूं ही धुंधला रखना चाहता है.

यह बात अक्सर सामने आती रही है कि संघ आधिकारिक तौर पर किसी भी रूप में दर्ज नहीं है, न ही किसी एनजीओ के रूप में, न किसी धार्मिक ट्रस्ट के तौर पर और न ही किसी अन्य क़ानूनी संस्था के रूप में. कारवां की जुलाई कवर स्टोरी ‘आरएसएस डज़ नॉट एग्ज़िस्ट’, (जिसका हिंदी संस्करण अक्टूबर-दिसंबर 2025 अंक में पढ़ा जा सकता है) ने दिखाया था कि कागज़ों पर ‘ग़ायब’ रहने की यह रणनीति उसे सुविधा देती है कि वह देश की राजधानी में अपना मुख्यालय बना ले बिना यह बताए कि उसका फंड कहां से आता है और उसके सदस्य कौन हैं. सबसे अहम बात यह है कि संघ अलग-अलग संगठनों और लोगों के ज़रिए काम करता है, लेकिन जब भी उससे ‘माध्यम’ या ‘प्रॉक्सी’ के बारे में पूछा गया कि वह कौन हैं और उनसे उसका संबंध कैसे चलता है, वह इस सवाल को नज़र अंदाज़ कर देता है.

दरअसल, संघ की अपनी किताबों और दस्तावेज़ों में ही इन संगठनों के बारे में इतनी तरह की परिभाषाएं मिलती हैं कि पाठक उलझ जाए. एक ही किताब में यह बताया जाता है कि ये संगठन ‘सहयोगी’ भी हैं, ‘अंग’ भी हैं, ‘मोर्चे’ भी हैं और ‘संघ की संताने’ भी. राकेश सिन्हा की अंडरस्टैंडिंग आरएसएस (2019) में इन सभी अलग-अलग शब्दों का इस्तेमाल मिलता है. रतन शारदा की किताब आरएसएस 360 (2018) में भी यही हाल है. कभी इन्हें ‘सहयोगी संगठन’ कहा जाता है, कभी ‘संघ-प्रेरित’, कभी ‘परियोजनाएं’, तो कभी ‘बहन संगठन’ या ‘मित्र संगठन’. कहीं लिखा है कि ये ‘संघ से जुड़े’ हैं और कहीं साफ़ कहा गया है कि इन्हें ‘आरएसएस चलाता है’. इतनी अलग-अलग उपाधियां यह दिखाती हैं कि संघ अपने नेटवर्क को एक तय पहचान देने से बचता है और यही बात इसे समझना मुश्किल बनाती है.

इस भाषा की तरलता को देखते हुए, यह आश्चर्य की बात नहीं है कि संघ पर शोध और पत्रकारिता का अधिकांश हिस्सा अस्पष्टता और भ्रम के ही माहौल से जकड़ा रहा है. पत्रकारों और विश्लेषकों को ज़्यादातर मामलों में, संघ के आंतरिक ढांचे तक सार्थक पहुंच नहीं मिल सकी है. इसीलिए उनका अध्ययन आमतौर पर संघ की विचारधारा या उसके मोर्चे पर रहने वाले सहयोगियों- जैसे ‘भारतीय जनता पार्टी’ या ‘विश्व हिंदू परिषद’ तक ही सीमित रह गया है.

इसका परिणाम यह हुआ है कि संघ पर उपलब्ध साहित्य, मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित है कि संघ क्या कहता है, न कि इस पर कि वह क्या करता है. मसलन, जाति पर उसका अस्पष्ट रुख़, मुसलमानों की स्थिति पर उसके द्विअर्थी बयान और राष्ट्रवाद पर उसके भव्य दावे. इसके बजाए उसकी वास्तविक कार्यप्रणाली यानी वह साधारण लेकिन निर्णायक तंत्र जिसके ज़रिए वह एक विशाल, फिर भी छिपे हुए नेटवर्क के माध्यम से शक्ति का निर्माण और विस्तार करता है लगभग पूरी तरह अनछुआ रह गया. यह स्थिति संघ के लिए बेहद फायदेमंद साबित होती है. इससे संगठन को बुनियादी जांच और जवाबदेही से बच निकलने में मदद मिली है, यहां तक कि अपनी शताब्दी के अवसर पर भी, जब वह सत्ता के शिखर पर विराजमान है, तब भी यह स्पष्ट नहीं है कि वह संसाधनों को कैसे संचालित करता है, कहां उसकी वास्तविक पकड़ है और कहां उसका प्रभाव समाप्त हो जाता है.

इसके अलावा, हिंदुत्व से जुड़ी बहसों पर ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान देने का एक और नुक़सान हुआ है. वह यह कि हम हिंदू फ़ार-राइट (धुर दक्षिणपंथ) के वास्तविक संगठनात्मक ढांचे को समग्रता से समझ ही नहीं पाए हैं. इसने यह ग़लत धारणा पैदा कर दी कि सिर्फ़ विचारधारा ही पूरे आंदोलन को जोड़ कर रखती है, और जो भी हिंदुत्व की बात करता है, वह स्वाभाविक रूप से संघ परिवार का हिस्सा है. आम बातचीत में लोग यति नरसिंहानंद, तपन घोष और दत्तात्रेय होसबोले का नाम एक साथ ले लेते हैं, मानो तीनों ही संघ परिवार में बराबर रूप से शामिल हों. लेकिन यह मान लेना कि हर समर्थक एक ही तरह से वैचारिक रूप से समर्पित है, और सिर्फ़ विचारधारा ही इतने बड़े नेटवर्क को बांध सकती है, बार-बार ग़लत साबित होता है. उदाहरण के लिए नरसिंहानंद का संघ से कोई सीधा संबंध नहीं है, और वह अक्सर संघ की आलोचना करते हैं कि वह पर्याप्त रूप से कट्टर नहीं है. जबकि घोष दावा करते हैं कि उनका अब संघ से कोई निकट संबंध नहीं रहा. वहीं दत्तात्रेय होसबोले आरएसएस के शीर्ष पदाधिकारियों में से एक हैं और इसके महासचिव के रूप में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

सभी हिंदुत्व संगठन आरएसएस के अधीन नहीं हैं, ठीक वैसे ही जैसे सभी संघ से जुड़ी संस्थाएं खुल कर वैचारिक नहीं हैं. जब हम हिंदू दक्षिणपंथ की इस व्यवस्था का खुलासा करते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि, अन्य किसी आंदोलन की तरह, यह भी मनुष्यों, ईंट-पत्थरों और उलझे हुए रिश्तों से बना है. संघ के भीतर और उसके बाहर सक्रिय हिंदुत्व संगठनों में संघर्ष पर्याप्त मात्रा में है और संघ इस संघर्ष को संभालने, दिशा देने और नियंत्रित करने में बहुत ऊर्जा ख़र्च करता है.

संघ कई बार अपनी इस अपारदर्शिता से मिलने वाले फ़ायदों को लेकर एक तरह की खुशी जताता दिखा है. जहां मोहन भागवत जैसे सार्वजनिक चेहरे यह दावा करते रहते हैं कि संघ के भीतर ‘प्रेरणा’ के अलावा ढूंढने जैसा कुछ नहीं है, वहीं संघ के आंतरिक पाठक-समूह के लिए तैयार की गई सामग्रियों का स्वर बिल्कुल अलग होता है. उदाहरण के लिए, आरएसएस विचारक रतन शारदा लिखते हैं, ‘आरएसएस के लिए सौभाग्य की बात है और दूसरी संस्थाओं के लिए दुर्भाग्य की, कि किसी ने भी आरएसएस का इस नज़रिए से अध्ययन नहीं किया है’ अर्थात् एक विशाल नेटवर्क की समन्वयक संस्था के रूप में. ‘आरएसएस पर उनकी दृष्टि हमेशा ग़लतियां खोजने की रही है. आरएसएस के लिए, उसके भीतर और उससे जुड़े संगठनों के साथ एक अच्छा तालमेल अत्यंत गंभीर विषय है और यही इस विशाल ‘हिंदू संयुक्त परिवार’ के शांतिपूर्ण अस्तित्व का रहस्य है.’

आरएसएस की हज़ारों अन्य संस्थाओं से रणनीतिक दूरी उसे अनेक प्रकार के लाभ प्रदान करती है. यह उसे कानूनी और वित्तीय जांच से बचने की सुविधा देती है. वह विवादास्पद कार्यों को अन्य संगठनों को सौंप कर, अपने लिए समीचीन अस्वीकार्यता का कवच तैयार कर लेता है. संगठनात्मक तनावों को संतुलित करने के लिए प्रतिस्पर्धी नेतृत्व दावों को व्यवस्थित कर सकता है और अपने संदेश को भागों में बांट कर हर समूह से हर समय उसकी अनुकूल भाषा में संवाद कर सकता है. उसके संगठनों को एक स्विच बोर्ड की तरह चलाया जा सकता है जहां नेटवर्क से उनके संबंध ज़रूरत के अनुसार सक्रिय और अदृश्य किए जा सकते हैं. श्रम का यह मुश्किल लेकिन गुप्त विभाजन ही वह तंत्र है जिसके माध्यम से संघ समाज के भीतर अपनी जड़ें फ़ैलाता है. यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि धुर दक्षिणपंथ की उपस्थिति समाज के अनेक क्षेत्रों में एक साथ बनी रहे, अलग-अलग वर्गों तक पहुंचे, नए मतदाता समूहों के द्वार खोले और संघ के लिए नए भू-राजनीतिक क्षेत्र का निर्माण करे.

लेकिन संघ की रहस्यमयता एक दूसरी, विपरीत दिशा में भी काम करती है : अपने ऊर्जा क्षेत्र और आकार को बढ़ाने के लिए. यह एक ऐसा आभास पैदा करती है कि दक्षिणपंथी राजनीति की वर्तमान शक्ति किसी स्वाभाविक, नीचे से उठे हुए जनमानस का परिणाम है. परंतु वास्तव में जो छिपाया जा रहा है वह संघ की परियोजना के लिए समर्थन नहीं, बल्कि उनका समन्वय है. साक्ष्य बताते हैं कि हम हिंदू राष्ट्रवादी भावनाओं की किसी स्वतःस्फूर्त लहर को नहीं देख रहे हैं जिसने स्वयं को जादुई रूप से संगठित कर लिया हो, बल्कि एक सुविचारित, सुनियोजित नौकरशाही नेटवर्क की सुनियोजित फसल देख रहे हैं. जब संघ का हाथ दिखाई नहीं देता, तब असमय और ग़लत ढंग से यह निष्कर्ष निकालना आसान हो जाता है कि वह हर जगह मौजूद है.

परंतु संघ न तो असीमित है और न ही अगम्य. छह वर्षों तक चले एक विशेष अन्वेषण, जिसका नेतृत्व मैंने किया और जिसके आंकड़े अब ‘साइंस पो’ के सेंटर दे फॉर रिसर्चिज़ इंटरनैशनल्स में संरक्षित हैं, तथा ‘कारवां’ द्वारा तथ्य जांचकर प्रकाशित किया जिसने पहली बार संघ का एक नेटवर्क मानचित्र तैयार किया है. इस अध्ययन में 2,500 से अधिक संगठनों की पहचान की गई है, जिनके ठोस, प्रमाणित और भौतिक संबंध सीधे आरएसएस से जुड़े हुए हैं.

यह आंकड़ा मात्र उन संगठनों की सतही सूची नहीं है जिनकी विचारधारा समान है. इसके विपरीत, यह एक भौतिक रूप से जुड़ा हुआ नेटवर्क दर्शाता है ऐसे संगठन जो अक्सर एक ही व्यक्तियों को साझा करते हैं, समान पते से संचालित होते हैं, नियमित रूप से संयुक्त कार्यक्रम आयोजित करते हैं, अपने कार्यक्षेत्रों को परस्पर ओवरलैप करते हैं और जिनके बीच घरेलू और विदेशी दोनों स्तरों पर धन का साझा प्रवाह होता है. यह साक्ष्य संकेत देता है कि ये संगठन किसी ढीले पारिवारिक समूह का हिस्सा नहीं, बल्कि एक एकीकृत इकाई के सघन रूप से जुड़े हुए हिस्से हैं, एक ऐसी समझ जिसे संघ स्वयं अपने आंतरिक प्रकाशनों में स्वीकार करता है.

जब इसे समग्र दृष्टि से देखा जाए, तो ये संगठन जिनकी परस्पर जुड़ाव की वास्तविकता को भागवत निरंतर नकारते हैं और मोदी नियमित रूप से महिमामंडित करते हैं इससे वे यह स्पष्ट करते हैं कि संघ वास्तव में है क्या.

आरएसएस प्रोजेक्ट से वेद मंदिर नेटवर्क का स्क्रीनशॉट. प्रोजेक्ट यहां उपलब्ध है. उदाहरण के लिए, हमारे डाटा संग्रह के दौरान हमें जम्मू के ‘अम्फल्ला’ इलाके में एक ऐसा पता मिला, जहां संघ से संबंध कई संगठन एक ही परिसर से संचालित होते हैं. यह स्थल लगभग 10 एकड़ में फैला हुआ है. दिसंबर 1916 में डोगरा शासक महाराजा प्रताप सिंह ने इसे वेद शिक्षण के प्रसार हेतु धार्मिक नेता चंपा नाथ महाराज को दान में दिया था, साथ ही निर्माण के लिए 10, 000 रुपए की एक अनुदान राशि भी दी गई थी, जिससे वेद मंदिर की स्थापना की जा सके. मंदिर के प्रबंधन हेतु एक वेद मंदिर समिति बनाई गई, जिसे मई 1964 में एक सोसायटी के रूप में पंजीकृत किया गया.

अपने इतिहास के किसी मोड़ पर यह मंदिर, समिति और पूरा परिसर संघ के नियंत्रण में चला गया. आज इस पते से संघ से जुड़े 20 से अधिक संगठन संचालित होते हैं, जो जम्मू-कश्मीर में संघ की लगभग आधी संगठनात्मक उपस्थिति का प्रतिनिधित्व करते हैं. ये हैं :

  1. द होम फ़ॉर द एज्ड एंड इन्फ़र्म, वृद्धों और रोगियों के लिए आवास केंद्र
  2. जम्मू एंड कश्मीर गौ रक्षा समिति, एक गौशाला
  3. शांति साधना आश्रम, पूजा और ध्यान का स्थल
  4. द इंस्टीट्यूट ऑफ़ नेचुरल हाइजीन, प्राकृतिक चिकित्सा संस्थान
  5. जय कारगिल, जय भारत कोष ट्रस्ट, कारगिल युद्ध के दिग्गज सैनिकों के लिए एनजीओ
  6. दिशा छात्रावास, कटरा स्थित छात्रावास का कार्यालय
  7. वेद मंदिर बाल निकेतन, बालकों के लिए अनाथालय
  8. वेद मंदिर बालिका निकेतन, बालिकाओं के लिए अनाथालय
  9. वेद मंदिर पाठशाला, दोनों अनाथालयों के बच्चों के लिए विद्यालय
  10. वेद मंदिर व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र
  11. होम्योपैथिक औषधालय
  12. स्वामी विवेकानंद मेडिकल मिशन, चैरिटेबल अस्पताल
  13. जम्मू-कश्मीर सहायता समिति, सीमावर्ती क्षेत्रों के निवासियों के लिए सामाजिक संगठन
  14. भारतीय शिक्षा समिति, आरएसएस के शैक्षणिक प्रकोष्ठ विद्या भारती की जम्मू-कश्मीर इकाई
  15. सेवा भारती जम्मू-कश्मीर का कार्यालय, आरएसएस की सेवा शाखा
  16. केसरबेन वेलजी पोपट भवन, बालिकाओं के लिए एक अन्य अनाथालय
  17. पूर्व सैनिक सेवा परिषद, सेवानिवृत्त सैनिकों के लिए आरएसएस से जुड़ा संगठन
  18. माता वैष्णों लोक कल्याण संस्था, तीर्थयात्रियों के लिए त्रिकुटा यात्री निवास चलाने वाली संस्था
  19. जनक मदन गर्ल्स हॉस्टल, सेवा भारती द्वारा संचालित छात्रावास
  20. भारत विकास परिषद, जम्मू शाखा, संघ का एक सामाजिक संगठन
  21. महाराजा प्रताप सिंह वेद विद्यालय, वेद अध्ययन हेतु स्थापित एक शिक्षण संस्थान

इस बात से तो साफ़ दिखता है कि यह पूरा समूह संघ से जुड़ा है, क्योंकि यहां से ही आरएसएस के सेवा और शिक्षा से जुड़े संगठन काम करते हैं. लेकिन ज़रा और गहराई से देखने पर पता चलता है कि इन सभी संगठनों को कुछ ही लोग चलाते हैं और वही लोग अलग-अलग संगठनों में कई पदों पर काम कर रहे हैं.

उदाहरण के लिए, वेद मंदिर बाल निकेतन के चारों पदाधिकारी संघ के कार्यकर्ता हैं. इसके अध्यक्ष गौतम मेंगी जम्मू के संघसंचालक हैं और उनका परिवार लंबे समय से वेद मंदिर परिसर से जुड़ा रहा है. मेंगी संघ की उच्च-स्तरीय बैठक ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ में भी शामिल रहे हैं. इसके उपाध्यक्ष बालकृष्ण गुप्ता, जो वेद मंदिर समिति के सदस्य भी हैं, संघ के कार्यक्रमों में नियमित रूप से उपस्थित रहते हैं. सचिव सुदेश पाल और उपसचिव सतीश मित्तल भी संघ से सक्रिय रूप से जुड़े हैं. मित्तल भारतीय शिक्षा समिति के कोषाध्यक्ष के रूप में भी कार्यरत हैं, जो विद्या भारती की जम्मू-कश्मीर इकाई है.

वेद मंदिर समिति के अध्यक्ष सुरेश चंदर गुप्ता ‘माता वैष्णों लोक कल्याण संस्था’ के अध्यक्ष भी हैं, जबकि समिति की उपाध्यक्ष अमिता शर्मा भारत विकास परिषद, जम्मू की अध्यक्ष हैं. यह परस्पर संबंध स्पष्ट करते हैं कि ये संस्थाएं स्वतंत्र नहीं हैं, बल्कि एक ही नेटवर्क की परस्पर गुंथी हुई इकाइयां हैं.

संघ के ये संबंध जम्मू से आगे, यहां तक कि भारत की सीमाओं से भी परे फैले हुए हैं. उदाहरण के लिए ‘महाराजा प्रताप सिंह वेद विद्यालय’ की स्थापना पुणे स्थित ‘महर्षि वेद व्यास प्रतिष्ठान’ ने की थी, जिसके संस्थापक स्वामी गोविंद देव गिरि आरएसएस के स्वयंसेवक हैं, जो कि रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के ट्रस्टी भी हैं और नागपुर स्थित ‘माधव नेत्रालय’ के सलाहकार मंडल में शामिल हैं जो आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर के नाम पर है. आरएसएस के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइज़र’ के अनुसार, गोविंद देव गिरी के ‘प्रारंभिक संस्कार स्वयंसेवक के रूप में’ प्रतिष्ठान के कार्यों में वर्णित होते हैं.

उसी परिसर में एक और संस्था, ‘केसर बेन वेलजी पोपट भवन’, भी संचालित होती है. इसकी स्थापना उन निधियों से हुई थी जो अमेरिका के मैरीलैंड में स्थित ‘इंडिया डेवलपमेंट एंड रिलीफ़ फ़ंड’ ने जुटाई थीं—यह संगठन लंबे समय से संघ से जुड़ा माना जाता है. बाद में इसे ‘वीएचपी ऑफ़ अमेरिका’ ने भी अपने ‘सपोर्ट ए चाइल्ड’ प्रोजेक्ट के तहत वित्तीय सहायता दी. इसी प्रकार, ‘जनक मदन गर्ल्स हॉस्टल’ को ‘सेवा इंटरनेशनल कनाडा’ ने प्रायोजित किया है.

यह परस्पर जुड़े संगठनों का नेटवर्क संघ के हाशिए पर नहीं, बल्कि उसके केंद्रीय ढांचे का हिस्सा है. किसी छोटे छात्रावास के संचालन में एक संघचालक जो आरएसएस की सर्वोच्च निर्णय-प्रक्रियाओं तक पहुंच रखने वाला व्यक्ति होता है उसकी भागीदारी यह दर्शाती है कि ये फ्रंट ऑर्गेनाइज़ेशंस संघ की सत्ता-प्राप्ति की व्यापक रणनीति का कोई परिशिष्ट नहीं हैं. बल्कि, यही वे मार्ग हैं जिनके माध्यम से संघ विस्तार करता है, समाज से जुड़ता है, नए सदस्यों की भर्ती करता है और स्वयं को सामाजिक जीवन की धमनियों में प्रवाहित करता है.

हमारे शोध से यह भी सामने आया कि वेद मंदिर परिसर पूरे जम्मू-कश्मीर में संघ की गतिविधियों का केंद्र बन चुका है. संघ प्रकाशनों में इस परिसर को ‘केशव भवन’ कहा गया है. यह उस परंपरा का हिस्सा है, जिसमें स्थानीय संघ कार्यालयों का नाम संघ संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार के नाम पर रखा जाता है. यही परिसर मोहन भागवत जैसे शीर्ष पदाधिकारियों की यात्राओं के दौरान नियमित रूप से उनके प्रवास और बैठकों का स्थल भी बनता है.

स्थानीय प्रकाशनों में इस स्थान को संघ के ‘मुख्य तंत्रिका केंद्र’ के रूप में स्पष्ट रूप से वर्णित किया गया है :

‘केशव भवन, वेद मंदिर में सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए हैं, जहां आरएसएस प्रमुख ठहरेंगे और जम्मू-कश्मीर संघ तथा उसकी शाखा-संस्थाओं जैसे विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, सनातन धर्म सभा, संस्कार भारती, विद्या भारती, सेवा भारती, हिंदू जागरण मंच, भारतीय मज़दूर संघ, अधिवक्ता परिषद, स्वदेशी जागरण मंच आदि के शीर्ष पदाधिकारियों के साथ बंद-दरवाज़े की बैठकों में शामिल होंगे. संघ प्रमुख इन संस्थाओं के कार्यों की समीक्षा करेंगे और उनकी कार्यप्रणाली पर फीडबैक लेंगे.’

इसके अतिरिक्त, यही परिसर संघ परिवार के विविध आयोजनों का स्थल भी रहा है : संस्कृत भारती द्वारा आयोजित वैदिक विद्वानों के सम्मेलनों से लेकर स्थानीय उत्सवों और स्वास्थ्य-संवर्धन कार्यक्रमों तक. वर्ष 2012 में, सेवा भारती जम्मू-कश्मीर द्वारा आयोजित एक बड़े कार्यक्रम में इस परिसर ने पूरे राज्य के संघ पारिस्थितिक तंत्र को एकत्रित किया. संघ के प्रकाशन ‘संवाद’ के अनुसार, इस आयोजन में लगभग 50 संगठन शामिल हुए थे.

  • लेख का आगे का हिस्सा भाग दो में पढ़िए
    लेखक फीलिक्स पाल, यूनिवर्सिटी ऑफ़ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया में राजनीतिक विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लेक्चरर हैं.
    कारवां पत्रिका से साभार
    11 December, 2025

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