
’माओवादियों के पुतले जलाते लोग’ अपने टैबलेट पर अखबार की हेडलाइन पढ़ते हुए सुधा ने उस खबर को ‘जूम इन’ किया. खबर के नीचे दी गई तस्वीर में काले कपड़े पहने बीएसएफ (सीमा सुरक्षा बल) के कई पुलिसकर्मी और कुछ लोग दिख रहे थे. उनमें से कुछ लोग तख्तियां पकड़े हुए थे, जिन पर लिखा था, ‘माओवादियों, हमारे गांव में मत आओ!’ तस्वीर में सादे कपड़ों में दो आदमी भूसे से बने पुतले पकड़े हुए थे, जिन्हें जैतूनी हरे रंग के कपड़े पहनाए गये थे, जिसे जलाया जा रहा था. उन दो लोगों को पहचानने के लिए उसने तस्वीर को ‘जूम इन’ किया था. लेकिन तस्वीर इतनी धुंधली थी, कि समझ में नहीं आ रहा था कि वे कौन हैं. एक और खबर की हेडलाइन ने उसका ध्यान खींचा ‘माओवादी स्मारक पर लोग तिरंगा झंडा फहरा रहे हैं.’ यह काफी बड़ा स्मारक है. यह कहां स्थित है? उसने अपना चश्मा उतारा, उसे साफ किया और फिर से लगा लिया, ताकि वह साफ-साफ देख सके. स्मारक के सामने कुछ पुलिसवाले और लोगों की एक बड़ी भीड़ थी. उनमें से कोई भी जाना-पहचाना नहीं लग रहा था. जब वह खबर के विस्तार में गई, तब समझ में आया कि यह शहीदों के लिए वह स्मारक था, जिसे ग्रामीणों ने स्वैच्छिक योगदान से सामूहिक रूप से बनवाया था. इसे उस समय बनाया गया था, जब ‘पीपुल्स वार पार्टी’ और आंध्र प्रदेश सरकार के बीच बातचीत चल रही थी. उस समय वहां कोई पुलिस कैंप नहीं था. पांच साल पहले, जब बीएसएफ कैंप की स्थापना हुई, तब पुलिस ने स्मारक पर तिरंगा झंडा फहराया था. अब लोग नया झंडा क्यों फहरा रहे हैं? कैंप के बगल में साप्ताहिक बाजार लगता है. 15 अगस्त के भव्य प्रदर्शन के लिए, बाज़ार आने वाले लोगों को मीडिया के लिए स्मारक के सामने खड़े होने को मजबूर किया जाता है. उसने सोचा- ‘पुतलों का दहन भी शायद इसी तरह का नाटक है’. निराश होकर वह अन्य खबरों की ओर बढ़ गई. तभी उसकी नजर एक और समाचार पर पड़ी.
‘माओवादियों के गढ़ मंजरी पंचायत में सत्तर माओवादी सदस्यों ने आत्मसमर्पण किया. ये लोग माओवादी कैडर, जन संगठन के नेता और मिलिशिया कमांडर के रूप में काम कर रहे थे. सरकार ने उन्हें पकड़ने में मदद करने वालों के लिए प्रति व्यक्ति एक लाख रुपये का ईनाम घोषित कर रखा था. अब आत्मसमर्पण करने वालों की कुल संख्या सात सौ हो गई है.’
समाचार पढ़ते हुए उसने फोटो को ‘जूम इन’ किया. इसमें डीजीपी (पुलिस महानिदेशक), एसपी (पुलिस अधीक्षक), एएसपी (सहायक पुलिस अधीक्षक), बीएसएफ बटालियन कमांडेंट और अन्य अधिकारी दिखाई दे रहे थे. वे अपनी कुर्सियों पर आत्मविश्वास से बैठे हुए थे और उनके चेहरे पर गर्व की झलक थी. एसपी हाथ में माइक्रोफोन थामे हुए पत्रकारों से कुछ कह रहे थे. वे क्या कह रहे थे? शायद यह कुछ ऐसा था- ‘सरकार और पुलिस द्वारा शुरू किए गए विकास कार्यक्रमों की वजह से ये लोग जागरूक हो गए हैं और माओवादियों का विरोध करते हुए आत्मसमर्पण करने का फैसला किया है. सरकार इन सभी को रोजगार के अवसर प्रदान करेगी.’
वही पुरानी कहानी थी, वही धुन जो वे हमेशा गाते हैं.
उसने पुलिस अधिकारियों के पीछे खड़े लोगों को जूम करके देखा. वहां कई पुरुष और महिलाएं थीं, सभी परिचित चेहरे थे. उनमें वे लोग भी थे, जो आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने में असमर्थ थे. बहुत पहले छोड़ चुके थे, लेकिन दुश्मन के सामने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया था और जन संगठनों और मिलिशिया में काम कर रहे थे. वे जनताना सरकार समितियों के सदस्य, वैकल्पिक जन सत्ता इकाइयों, और पार्टी एरिया कमेटी के सदस्य और प्लाटून पार्टी समिति के सदस्य भी रह चुके थे. इनमें मिलिशिया कमांडर भी मौजूद थे, जिन्होंने हमेशा ही दुश्मनों में ऐसा डर बना रखा था, कि उनका इलाके में प्रवेश करना मुश्किल था. उनमें ऐसी महिलाएं थीं, जो पुरुषों को कहती थीं, कि जब पुलिस गांव में प्रवेश करे, तो वे पीछे रहें. वे चाकू, कुल्हाड़ी और मिर्च पाउडर लेकर सबसे आगे खड़ी होती रहीं, पुलिस को घेर लेती थीं और उन्हें एक कदम भी आगे नहीं बढ़ने देती थीं. वे शेरनियों की तरह पुलिस का सामना करती थी, उनकी बंदूकें छीन लेती, उनके हाथ बांध देती थीं और अपने आदमियों को बचा लेती थीं. इनमें महिला संगठन की दीदियां भी शामिल थीं, जो चाहे कितनी भी व्यस्त क्यों न हों, गांव में प्रवेश करते ही दस्ते के पास दौड़कर जातीं, उनका गर्मजोशी से स्वागत करतीं और जो कुछ भी उनके पास बचा होता, उन्हें दे देतीं- चाहे वह खटाई हो, पका कटहल हो, मकई का दाना हो, या कम से कम उनके पेड़ों का एक अमरूद ही. इनमें महिला संगठन की नेता भी थीं, जो अपनी निजी समस्याओं को अपने माता-पिता की तरह ही दस्ते के साथ साझा करती थीं. उन्होंने उस क्षेत्र की महिलाओं को जागरूक और संगठित किया और उनकी कई समस्याओं का समाधान किया. अब, वे सभी असहाय खड़ी थीं. उनके चेहरों पर कोई भाव ना देखना मुश्किल था. सुधा ने लाइन के अंत में, कोने में किसी को देखा, जो लक्मो जैसी दिख रही थी. उसने फोटो को ‘जूम इन’ किया. यह वास्तव में लक्मो थी. उसका सिर थोड़ा झुका हुआ था. सुधा ने उसके चेहरे को गौर से देखा, और अनुमान लगाने लगी, कि उस समय वह किस आंतरिक उथल-पुथल का अनुभव कर रही होगी. ‘जब मेरे पति यहां थे, तो तुम हमारे इलाके में आने से पहले दो बार सोचते थे… गांव के अन्दर उन्हें पकड़ने में लाचार होकर, तुमने किसी लालची देशद्रोही की मदद ली और जब वे किसी काम से बाहर गए, तो उन पर घात लगाकर हमला किया और उनके हाथ-पैर तोड़ दिए. फिर तुमने हमें धमकाया, कहा कि अगर हम सब आत्मसमर्पण नहीं करेंगे तो तुम उन्हें मार देंगे, हमें इस आत्मसमर्पण के लिए मजबूर किया. तुम कितने कायर हो.’
लक्मो ने निश्चित रूप से यही सोचा होगा. अभी दस दिन पहले ही पुलिस ने लक्मो के पति बिरसु को गिरफ्तार कर लिया था, उसे बहुत यातनाएं दी थीं और फर्जी मुठभेड़ की योजना बनाई थी. जैसे ही गांव वालों और उसके परिवार वालों को पता चला कि उसे पुलिस ने पकड़ लिया है, तो उन्होंने पूरी पंचायत के साथ मिलकर मीडिया को बयान जारी किया और चाकू-कुल्हाड़ी लेकर थाने के सामने प्रदर्शन किया. कोई चारा न देख कर पुलिस ने अपना अंतिम हथियार इस्तेमाल किया, ‘अगर तुम्हारे सारे क्षेत्रीय नेता सरेंडर कर दें, तो हम उसे छोड़ देंगे, नहीं तो हम उसे मार देंगे.’ इसके चलते उन्हें मजबूरन सरेंडर करना पड़ा और उसके बाद ही पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश किया.
अखबारों में यह खबर पढ़ते ही सुधा का दिल दुखने लगा. अनायास ही उसकी आंखों में आंसू आ गए. उसने लोगों पर पड़ने वाले मानसिक दबाव के बारे में सोचा. इस दौरान उनसे न मिल पाने की तकलीफ और कुछ न कर पाने की पीड़ा ने उसे बहुत परेशान कर दिया.
उसने टैबलेट एक तरफ रख दिया, अपना चश्मा उतार दिया और अपनी उंगलियों के पोरों से अपनी कनपटी को धीरे से दबाया. उसने अपनी घड़ी में समय देखा. ‘ओह! ग्यारह बज गये हैं?’ उसने बगल में देखते हुए सोचा. टेंट में सभी लोग गहरी नींद में सो रहे थे. कोई धीरे-धीरे खर्राटे ले रहा था. हालांकि अक्टूबर की शुरुआत थी, फिर भी न जाने क्यों घुटन महसूस हो रही थी. उसने सोचा कि टेंट से बाहर निकलकर थोडी ताजी हवा लेने से अच्छा महसूस होगा. उसने टैबलेट बंद कर दिया, टॉर्च जलाई, झिल्ली के पैताने रखे जूते पहने और तंबू से बाहर निकल गई.
‘कौन है?’ संतरी ड्यूटी पर तैनात साथी ने पूछा.
‘मैं हूं’ उसने दो कदम आगे बढ़ते हुए जवाब दिया और फिर पूछा, ‘क्या तुम संतरी ड्यूटी पर हो?’
‘हां. तुम अभी तक सोई नहीं?’ कोसी, जो संतरी थी, ने पूछा.
‘नहीं! मैं पढ़ रही थी’. उसने कहा और बताते हुए आगे बढ़ गयी कि वह पेशाब के लिए जा रही है.
वापस आकर उसने पूछा- ‘कोसी, तुम्हारे बाद किसकी ड्यूटी है?’
‘मांगी है. मेरी संतरी ड्यूटी अगले आधे घंटे तक है’. कोसी ने अपनी घड़ी देखते हुए जवाब दिया.
‘सब ठीक है, है न? तुम्हारी बंदूक भरी हुई है न? सो मत जाना’.
सुधा ने अपने तंबू में वापस आते हुए कहा लेकिन किसी कारण, उसका अंदर जाने का मन नहीं कर रहा था. उसे फिर से वह समाचार पढ़ने का मन नहीं कर रहा था, और उसे नींद भी नहीं आ रही थी. वह तंबू के पास एक बड़े पेड़ से लगी एक बड़ी चट्टान पर बैठ गई, अपना सिर पेड़ से टिका दिया, और एक पल के लिए अपनी आंखें बंद कर लीं. तुरंत ही उसने आंखें खोली और ऊपर देखा. गोल, ठंडा चांद ऊंचे पेड़ों के बीच से आकाश में चमक रहा था. शायद पूर्णिमा का दिन था. झरती चांदनी मानो आसमान और धरती को मिला रही थी. हल्की हवा उसके चेहरे को छू रही थी, जिससे उसे सुकून का मिल रहा था. कोसी, जो बंदूक लेकर मद्दी के पेड़ की ओट में संतरी की ड्यूटी पर खड़ी थी, चांदनी में भी साफ दिखाई दे रही थी. चूंकि उन्होंने जंगल के किनारे पर डेरा डाला था, इसलिए डेरे के दाहिनी ओर एक खुला मैदान था. गांव उस मैदान के दूसरी तरफ, कुछ दूरी पर था. कुत्तों के भौंकने की कभी-कभार हल्की-सी आवाज आ जाती थी.
दिन में उस खेत में चार खंभों पर टिका एक बड़ा सोलर पैनल बैटरी चार्ज करने के लिए लगाया जाता था और हर शाम उसे उतार दिया जाता था. लेकिन किसी कारण से आज उसे हटाया नहीं गया था. चांदनी उस पर पड़ रही थी और वह चमक रही थी. झींगुर बहुत तेज आवाज कर रहे थे. वे बहुत छोटे कीड़े थे, लेकिन उनकी आवाज बहुत चुभती सी थी. सुधा कई बार देखना चाहती थी कि वे कैसे दिखते हैं, लेकिन उसे अभी तक मौका नहीं मिला था.
चांदनी शहरों, गांवों, कस्बों, मैदानों, जंगलों, पहाड़ियों, पेड़ों, फूलों, खेतों और आदिवासियों की झोपड़ियों पर बिना किसी भेदभाव के समान रूप से पड़ती है, है न? क्या अमीरों के लिए गरीबों से यह चांदनी चुराना संभव है? इस अजीब विचार से वह मुस्कुरा उठी.
‘पूर्णिमा की रोशनी और प्रेम के बीच कुछ अविभाज्य संबंध है. चांदनी भावनाओं को जगाती है’ कहीं पढ़ा हुआ यह उसे याद आया. लेकिन कौन सी भावना? सिर में दर्द के कारण उसका सिर फट रहा था. वह सोच रही थी कि कहीं चांदनी भी असहनीय न हो जाए. अचानक उसे अपने जीवन साथी के शब्द याद आ गए, जिसने कहा था, ‘भावनाओं को भौतिक वास्तविकता से अलग होकर कल्पनाओं में नहीं उड़ना चाहिए.’ अभी वह कहां होगा? क्या कर रहा होगा? क्या वह भी इस चांदनी को देख रहा होगा? अपने साथी, जो आंदोलन की जिम्मेदारियों और जरूरतों के कारण दूर कहीं काम कर रहा था, के बारे में सोचते हुए उसके होठों पर मुस्कान आ गई. लेकिन यह ज्यादा देर तक नहीं रह सकी. अखबार में पढ़ी गई खबरें एक बार फिर उसके दिमाग पर छा गईं.
‘मांगी… मांगी… संतरी ड्यूटी का समय हो गया, उठो!’ कोसी ने मांगी को जगाया. मांगी उठकर संतरी ड्यूटी पर चली गई.
मान्यम जंगल के ऊंचे पहाड़ों, पथरीली चट्टानों और आदिवासी गांवों पर साफ चांदनी पड़ रही है, ठीक वैसे ही जैसे यहाऊ पड़ रही है. आदिवासियों के दिल भी चांदनी की तरह ही पवित्र हैं! दुश्मन इन मासूम लोगों, जो छल-कपट और चालाकी कुछ नहीं जानते, को जहर देने और भ्रष्ट करने के लिए कई तरह की साजिशें रच रहा है. हम उन्हें इस मनोवैज्ञानिक युद्ध का सामना करने के लिए कैसे तैयार करें? सुधा के मन में तरह-तरह के विचार आ रहे थे.
मान्यम जंगल के लोगों के साथ सुधा का रिश्ता दो दशकों का था. जब से वह दस्ते में शामिल हुई थी, तब से वह उस इलाके में काम कर रही थी. क्या वाकई बीस साल हो गए हैं? उसने सोचा. क्या उसने कभी सोचा था कि वह इतने सालों तक जीवित रहेगी? जब वह पहली बार दस्ते में शामिल हुई थी, तो उसने सोचा था कि वह इस युद्ध में केवल दो या तीन साल या अधिकतम दस साल तक जीवित रहेगी. ओह, दस साल बहुत ज्यादा लगते थे, उस समय की इस बात को याद कर अब वह मुस्कुरा रही है. उसे लगा कि सभी अतिरिक्त वर्ष बोनस थे. उसने बीस साल अपने माता-पिता की गोद में बिताए, और बाकी बीस साल जंगल की गोद में. जब उसके बाद क्रांति में शामिल होने वाले, उससे छोटे लोग, और क्रांति में उसके साथ चलने वाले लोग उसकी आंखों के सामने शहीद हो जाते थे, तो एक गहरी, अनकही उदासी उसके दिल को झकझोर देती थी. दो दशकों से अधिक समय तक सुधा ने क्रांतिकारी आंदोलन और अपने निजी जीवन में कई घटनायें देखी.
उसने अनुभव से इस सत्य को महसूस किया कि पदार्थ हमेशा गतिशील रहता है और मात्रात्मक परिवर्तन गुणात्मक परिवर्तन की ओर ले जाता है. मान्यम क्षेत्र के श्रीकाकुलम, विजयनगरम, विशाखापत्तनम और पूर्वी गोदावरी जिलों में और ओडिशा के कोरापुट और मलकानगिरी जिलों में जहां उन्होंने काम किया- उन्होंने सावरा, जटापु, कुव्वी, भगता, कोया, गदाबा, कोंडारेड्डी, नूकाडोरा, वाल्मीकि, राणा, पोराजा, डिडोय और अन्य जैसे आदिवासी समुदायों की संस्कृति, जीवन शैली, दृढ़ संकल्प और जमीन, जंगल, पहचान और आत्म-सम्मान के लिए संघर्ष की ताकत को सीधे-सीधे देखा. उन्होंने उनके बलिदानों को देखा और उनसे बहुत कुछ सीखा. हर बार मुठभेड़ों और हमलों के दौरान जब जनता दस्तों को अपना मानकर रक्षा करती, तो सुधा मन ही मन इन लोगों के लिए, जिन्होंने उन्हें जीवन की नई राह दी थी, अपना जीवन समर्पित करने की कसमें खाती.
इन जंगलों में जन्मे और पीढ़ियों से शोषण और उत्पीड़न झेलने वाले लड़ाकू आदिवासियों के अनुभवों के सामने उसका अनुभव नगण्य लग रहा था. इन लोगों के लिए उसने जो काम किया, वह समुद्र में एक बूंद के समान थी. सुधा के मन में अतीत की यादें उमड़ पड़ीं.
‘सुधा, तुम अभी तक सोई नहीं ? यहां क्यों बैठी हो? क्या हुआ?’ ललिता, जो शौच के लिए उठी थी, ने आश्चर्य और चिंता से पूछा.
‘कुछ नहीं! मैं तो बस शौच के लिए गई थी और यहां बैठ गई,’ सुधा ने जवाब दिया और ललिता ने उसे समझते हुए संतरी को सूचित किया और शौच के लिए चली गई.
‘चलो सुधा, सो जाओ,’ ललिता ने फिर आग्रह किया, जिससे सुधा के पास उठकर तंबू के अंदर जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा.
वह अपनी झिल्ली पर लेट गई, लेकिन उसे नींद नहीं आई. उसके दिमाग में विचार उमड़ते रहे. पिछले दो वर्षों से दुश्मन ने आंदोलन पर क्रूर हमले तेज कर दिए थे. लगातार तलाशी अभियान, मुठभेड़, शहादतें, गिरफ्तारियां, आत्मसमर्पण, जबरन आत्मसमर्पण अभियान, गलत सूचना अभियान और फर्जी सुरक्षा के रूप में पुलिस शिविरों, सड़कों और मोबाइल नेटवर्क की तेजी से स्थापना ने दस्तों की लोगों से पहले की तरह मिलने और संगठनात्मक संरचनाओं को बनाए रखने की क्षमता में बाधा डाली थी. पार्टी और जनता ने पहले भी ऐसी परिस्थितियों का सामना किया था, जब भयंकर दमन और नुकसान को झेलते हुए भी दस्ते जनता के करीब रहे, उन्हें संगठित किया और जन संघर्षों की लहरें उठाई. उन्होंने सही रणनीति के साथ दुश्मन को करारा झटका दिया और फिर से बढ़त हासिल की.
लेकिन अब क्या किया जाए? मौजूदा हालात में वे लोगों से कैसे मिलें? विचारों की दौड़ में ही सुधा के मोबाइल फोन पर अलार्म के तौर पर सेट किया गया उनका पसंदीदा गाना ‘हम देखेंगे’ बजने लगा. अलार्म सुनकर चौंककर उसने अपना फोन उठाया. उन्हें समझ आ गया कि समाचार देखने के लिए वह इसे दोपहर 12:30 बजे सेट करना चाहती थीं, लेकिन गलती से उसने उसे रात यानि एएम के लिए सेट कर दिया था, इसलिए आधी रात को अलार्म बज उठा. अपनी गलती पर हंसते हुए वह फोन बंद करने ही वाली थीं, कि उसने फोन पर तारीख देखी. 13 अक्टूबर था. कॉमरेड साकेत (केंद्रीय समिति के सदस्य) को शहीद हुए एक साल हो चुका है. उसके विचार साकेत की ओर मुड़ गए. उनसे मिलने के लिए वह कितनी उत्सुक थीं. उसे याद आया कि जब वह उनसे मिलने ही वाली थीं, उसके ठीक पहले ही उसने उनकी शहादत की खबर आई थी, जिससे कुछ पलों के लिए उसके दिल ने धड़कना बंद कर दिया. साकेत के शब्द उसके मन में गूंज रहे थे- ‘क्रांतिकारियों के पास आशावादी दृष्टिकोण होना चाहिए, जो उन्हें अंधेरे समय में जुगनू की हल्की रोशनी को भी देखने की क्षमता पैदा करता है.’ उसे एक और घटना भी याद आई जब एक क्लास के दौरान साकेत ने कहा था कि ‘हमारे अंदर इतना लचीलापन होना चाहिए कि आसमान गिरने पर भी हम विचलित न हों. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम हर चीज के प्रति इतने उदासीन हो जायें, जैसे बारिश में खड़ी भैंस. हमारे पास बिजली की गति से प्रतिक्रिया करने की फुर्ती भी होनी चाहिए.’ उनकी बात पर क्लास में सभी के हंसने की याद से उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई.
उसे दस साल पहले की वह परिस्थिति अच्छी तरह याद है, जब नारायणपटना जन आंदोलन को दबाने के लिए सरकार ने क्रूर दमन किया था. दुश्मन के दुष्प्रचार ने लोगों को भ्रमित कर दिया था, गांवों में जमींदारों ने अफवाह फैला दी थी, कि मुखबिर होने के नाम पर पार्टी आदिवासियों को मार रही है. गांव वाले इतने डरे हुए थे, कि दस्ते के आते ही उन्होंने अपने दरवाजे बंद कर लिए, खाना देने से मना कर दिया और कोई सहयोग नहीं किया. कुछ गांवों में तो लोग दस्ते को देखते ही भाग गए. इन हृदय विदारक स्थितियों के बावजूद दस्ते के सदस्य डटे रहे, भूखे रहकर धैर्यपूर्वक लोगों को पत्र लिखते रहे, पोस्टर चिपकाते रहे, रात भर गांवों में खुले में रहते और दिन के उजाले में लोगों को सच्चाई बताते रहे. आखिरकार वही लोग, जो कभी दस्ते से डरते थे, आंखों में आंसू भरकर उनके गले लग गये. दस्ते के ऐसे तमाम अनुभवों को सुनकर साकेत का दिल लोगों और उस दस्ते के साथियों दोनों के लिए दया से भर गया. साकेत की आंखों में दृढ़ निश्चय की चमक थी जब उन्होंने कहा- ‘अगर हम मुश्किल वक्त में लोगों के करीब रहेंगे, तो हम जरूर जीतेंगे ! जनता ही हमारी शिक्षक है, जनता ही अजेय है. आपको इस अनुभव के बारे में जरूर लिखना चाहिए. हम इसे अपनी ‘बोल्शेविक’ पत्रिका में प्रकाशित करेंगे.’ जब साकेत यह कह रहे थे, उनकी आंखों में जो चमक थी, सुधा उसे कभी भूल नहीं पाई.
‘हममें से कई लोग उस समय भ्रमित हो जाते हैं, जब आंदोलन मुश्किल परिस्थितियों का सामना करता है. हमें संदेह होने लगता है, कि हम जीत पाएंगे या नहीं. ऐसे समय में हमें पलटकर इतिहास को देखना चाहिए और उसे द्वंद्वात्मक दृष्टिकोण से समझना चाहिए. बहादुराना संघर्षों से हासिल अपनी जीत को हमें याद करना चाहिए. इतिहास में लोगों द्वारा लड़े गए सभी न्यायपूर्ण युद्ध जीते गए हैं. हम भी जीतेंगे! हार और असफलताएं केवल अस्थायी हैं. हर हार, जीत की जननी है. हमें प्रतिकूलताओं में भी अवसर तलाशने चाहिए.’ साकेत के साफ, नुकीले शब्दों और इतिहास में उत्पीड़ित लोगों के अनुभवों की याद ने सुधा को साहस और मानसिक सांत्वना दी. जैसे-जैसे उसके दिमाग में योजनाएं आकार लेने लगीं और जैसे-जैसे उसे अपने सवालों का समाधान मिलता गया, सुधा को गहरी नींद आ गई.
***
‘टुबरी…टुबरी ! मैं अरहर के खेत में जा रहा हूं. तुम खाना पकाकर दलिया खेत में ले आना’ दासू ने अपनी कुल्हाड़ी पकड़ी और कहते हुए घर से बाहर निकल गया. जैसे ही वह बाहर निकला, उसने देखा कि पड़ोस के गांव से गासी और काथरू उसके घर की ओर आ रहे हैं. ‘वे इतनी सुबह क्यों आ रहे हैं’, दासू अपने घर की दहलीज पर रुक गया. काथरू जब पास आया तो पूछा-
‘अन्ना, कहां जा रहे हो?’
‘अरहर के खेत में, लेकिन तुम सुबह यहां कैसे?’ दासू ने हैरान होकर जवाब दिया.
बातचीत सुनकर रसोई में बैठी टुबरी बाहर आई.
‘अंदर आओ अन्ना, जाने से पहले थोड़ी काली चाय पी लो,’ उसने उन्हें पानी का एक जग थमाते हुए कहा.
‘नहीं बहन ! हमारे सबसे छोटे बेटे चिन्ना ने कहा है कि वह आज कॉलेज से फोन करेगा. हमने उसे अन्ना का नंबर दिया है. अगर देर कर दी, तो वह चला न जाये. लौटते समय हम आयेंगे.. चलो अन्ना.. तुम्हारे खेत में सिग्नल मिल जाएगा न?’ काथरू ने पूछा और वे तीनों खेत की ओर चल पड़े.
‘अन्ना, हमें एक पत्र मिला है!’ काथरू ने चलते हुए कहा. ‘कौन सा पत्र?’ दासू ने आश्चर्य से रुकते हुए पूछा.
‘यह ‘हमारे’ लोगों का है,’ काथरू ने बताया और अपनी नेकर, जिसे उसने अपनी लुंगी के नीचे पहना हुआ था, की जेब से एक पत्र सावधानीपूर्वक निकाला और दासू को सौंप दिया. तब तक वे खेत पर पहुंच चुके थे. दासू ने यह सुनिश्चित करने के लिए चारों ओर देखा, कि अगल-बगल के खेतों में कोई और तो नहीं है. तीनों कटहल के पेड़ के नीचे रखे पत्थर के पाटे पर बैठ गए
‘मैं पढ़ता हूं, लेकिन तुम दोनों ध्यान रखना’ दासू ने पत्र खोलते हुए कहा.
‘ठीक है, ठीक है,’ उन्होंने सहमति जताई, लेकिन उनकी निगाहें पत्र पर टिकी थीं, यह जानने के लिए उत्सुक कि इसमें क्या लिखा है. दासू भी किसी और चीज पर ध्यान देने की स्थिति में नहीं था, वह भी इसे पढ़ने के लिए उतना ही उत्सुक था. धीरे-धीरे, उसने पढ़ना शुरू किया.
‘प्रिय ग्राम संगठन के नेताओं और लोगों, लाल सलाम !’
परिचित लिखावट और अभिवादन से यह स्पष्ट हो गया कि पत्र किसने लिखा था.
‘हमें बहुत खेद है कि दुश्मन द्वारा पैदा की गई बाधाओं के कारण हम पिछले एक साल से सीधे नहीं मिल पाए हैं. हम जानते हैं कि आप हमारा कितना इंतजार कर रहे हैं. इस दौरान कई बदलाव हुए हैं… कई साथी शहीद हो गए हैं.. कई अन्य गिरफ्तार हो गए हैं और जेलों में कठोर यातनाएं झेल रहे हैं. लेकिन कुछ लोगों ने जनता पर विश्वास खो दिया है और कायरता के कारण दुश्मन के साथ चले गए हैं. हमारे क्षेत्र में सरकार, पुलिस, जनविरोधी तत्व और जमींदार बड़े पैमाने पर झूठ फैला रहे हैं कि पार्टी मन्याम के जंगलों से पूरी तरह से खत्म हो गई है और अब अस्तित्व में नहीं है और अब कभी भी वापस नहीं आएगी. इस प्रचार के साथ, वे लोगों की भावनाओं को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं और उन्हें डरा-धमका कर आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर रहे हैं. हमने आपके आरपीसी (क्रांतिकारी जन समिति) के आत्मसमर्पण के बारे में अखबारों में खबर देखी. हम समझ सकते हैं कि आप कितने भारी दबाव और कठिनाइयों का सामना कर रहे होंगे… दासू रुक गया और कुछ देर चुप रहा गांव के मुखिया, सरपंच और पुलिस द्वारा उन्हें आत्मसमर्पण करवाने के लिए किए गए प्रयासों, धमकियों और दबाव की यादें उसके दिमाग में घूम गईं. उसे याद आया कि कैसे उस दौरान उन्होंने पार्टी से मिलने की कोशिश की और उन्हें विश्वास था कि वह किसी तरह उनसे संपर्क कर लेगी. लेकिन दबाव का सामना करने में असमर्थ होकर उसने भी ग्रामीणों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया था. भारी मन से दासू ने फिर से पढ़ना शुरू किया.
‘दुश्मन ने चाहे जितना भी दबाव डाला हो, तुम्हें आत्मसमर्पण करने से बचना चाहिए था. यही समय है जब हमें दृढ़ और साहसी होकर खड़े रहना चाहिए. यही समय है जंगल, जमीन, सत्ता और संघर्ष की जीत की रक्षा करने का, जो कई शहीदों के खून से जीती गई है.”
पढ़ते समय दासू की आवाज दर्द से कांप उठी. ‘धिक्कार है! हमें आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए था. हमें डटे रहना चाहिए था,’ उसने जोर से कहा, उसकी आवाज में पछतावा साफ झलक रहा था. गासी और काथरू ध्यान से सुन रहे थे, और सहमति में सिर हिला दिया.
‘साथियों, हमारे सामने दो ही रास्ते हैं. क्या हमें आत्मसमर्पण कर देना चाहिए और गुलामों की तरह जीना चाहिए, या हमें अपने जंगल, अपनी जमीन और अपने लोगों की ताकत की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्प होकर लड़ना चाहिए? जरा सोचिए ! पार्टी सिर्फ व्यक्तियों से नहीं बनती. पार्टी मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद के मार्गदर्शक सिद्धांतों से आकार लेने वाली अजेय जनशक्ति है. जनयुद्ध व्यक्तियों द्वारा लड़ा जाने वाला युद्ध नहीं है. यह सभी उत्पीड़ित लोगों द्वारा अपने अधिकारों के लिए लड़ा जाने वाला न्यायपूर्ण युद्ध है. इसलिए, दुश्मन के लिए पार्टी या जनयुद्ध को पूरी तरह से मिटाना असंभव है. व्यक्ति मर सकते हैं, गिरफ्तार हो सकते हैं या आत्मसमर्पण कर सकते हैं. दुश्मन अनगिनत सैनिकों को तैनात कर सकता है और लोगों पर बर्बर दमन कर सकता है. लेकिन इनमें से कोई भी लाखों उत्पीड़ित लोगों की शक्ति, आकांक्षाओं और न्यायपूर्ण अधिकारों को नष्ट नहीं कर सकता. आज हम कमजोर हो सकते हैं, लेकिन ये हार अस्थायी हैं. यह दमन अस्थायी है. हमारे मान्यम के लोगों के पास इससे भी अधिक कठोर दमन को हराने का एक लंबा इतिहास है…’
पत्र में विपरीत परिस्थितियों में दृढ़ता, साहस और एकता के महत्व पर जोर दिया गया था, तथा ग्रामीणों से आग्रह किया गया है कि वे अपने सामने आने वाली भारी चुनौतियों के बावजूद अपने उद्देश्य के प्रति दृढ़ और प्रतिबद्ध रहें.
‘इसलिए, निराश न हों. हमें एक बार फिर दुश्मन की साजिशों का सही आकलन करना चाहिए, सही रणनीति के साथ अपनी ताकत जुटानी चाहिए और गुप्त रूप से काम करना चाहिए. हमें लोगों के दुश्मनों पर नजर रखनी चाहिए, दुश्मन की कमजोरियों का पता लगाना चाहिए और अवसर आने पर हमला करना चाहिए. लोगों की न्यायोचित आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए, जंगलों पर अपने अधिकार के लिए और उत्पीड़ित लोगों को सत्ता दिलाने के लिए हमें साहस और दृढ़ संकल्प होकर जनयुद्ध में आगे बढ़ना चाहिए, हरेक बाधा को पार करना चाहिए.’
जब तक पत्र समाप्त हुआ, तब तक उनके दिल दर्द, दुख और खुशी की मिश्रित भावनाओं से भारी हो चुके थे. उन्हें ऐसा लग रहा था मानो दस्ता खुद उनके सामने खड़ा है और बोल रहा है, उन्हें हिम्मत दे रहा है. उनके आत्मसमर्पण को पार्टी कैसे देखेगी या समझेगी, इस बारे में उनके मन में जो भी संदेह था, वह पूरी तरह से दूर हो चुका था. वे उत्साहपूर्वक चर्चा करने लगे कि पार्टी द्वारा बताई गई इन बातों को कैसे, किसे और कब बताना है, किस पर नजर रखनी है, अगली बार जब वे गांव में आएं तो दस्ते को सुरक्षित रूप से कहां ठहराना है, उन्हें भोजन कैसे उपलब्ध कराना है, संतरी कहां तैनात करने हैं, इत्यादि. हालांकि, जब उन्होंने टुबरी को पहाड़ी पर चढ़ते देखा, तो उन्होंने अपनी बातचीत रोक दी, उसके सिर पर दलिया का बर्तन था और उसकी गोद में बच्चा था.
‘चिन्ना ने अन्ना को बुलाया है क्या?’ उसने बच्चे को दासु को सौंपने के बाद दोनों हाथों से बर्तन जमीन पर रखते हुए पूछा.
‘हां, हां, उसने बुलाया था, बहन. उसे फीस भरने के लिए पैसे चाहिए. कल, तुम्हारी भाभी और मैं जाकर उसे पैसे देंगे,’ गासी ने टुबरी से कहां फिर गासी और काथरू दोनों यह कहते हुए उठे, ‘अब हम निकलेंगे, अन्ना.’
‘अरे! जाने से पहले थोड़ा दलिया खा लो, अन्ना, टुबरी ने कटोरे में डालते हुए कहां गासी और काथरू ने टुबरी का दिया गया दलिया पिया और पहाड़ी से नीचे उतरते हुए अपनी चर्चाओं और किए जाने वाले कामों को याद करने लगे. दासु उन्हें तसल्ली के साथ देख रहा था.
***
‘अक्का ! मैं पिछले दस दिनों के समाचार पत्र और अन्य डाउनलोड भेज रहा हूं. उन्हें कॉपी करके पेन ड्राइव वापस कर दें.’ कंप्यूटर ऑपरेटर वेन्नेला द्वारा भेजे गए पत्र को पढ़ने के बाद, सुधा ने पेन ड्राइव का आकार जांचा, फाइलों को अपने टैब पर कॉपी किया, और एक छोटा सा नोट लिखा, ‘डाउनलोड भेजने के लिए धन्यवाद’ और पेन ड्राइव को वेन्नेला को वापस भेज दिया.
हालांकि सुधा उन अखबारों को देखने के लिए उत्सुक थी, जिनकी उसने कॉपी की थी, उसे बताया गया कि शाम 5 बजे एक मीटिंग है. यह सोचकर कि शायद कल के कार्यक्रम की योजना पर चर्चा करने के लिए मीटिंग हो, उसने अपनी घड़ी देखी. केवल दस मिनट बचे थे. उसने टैब बंद किया, अपना पाउच पकड़ा, अपनी बंदूक कंधे पर लटकाई और अपने गार्ड को आवाज दी, ‘ललिता ! हमें मीटिंग में जाना है. चलो मुख्यालय की ओर चलें.’ ललिता जो किताब पढ़ रही थी, उसे बंद किया और सुधा के साथ चल पड़ी.
बैठक रात 8 बजे तक चली. ललिता ने खाना खा लिया था और सुधा के लिए एक बर्तन में खाना रख दिया था. जब सुधा अपने टेंट में लौटी और पढ़ने के लिए अपना टैब निकालने ही वाली थी, तभी ललिता ने स्नेहपूर्वक कहा, ‘खाना पहले ही ठंडा हो चुका है. तुम खाने के बाद भी तो पढ़ सकती हो न?’ उसे चिंता थी कि पढ़ने में मगन रहने की आदत के कारण सुधा कहीं रात का खाना खाना ही न भूल जाय. सुधा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, ‘ठीक है, कॉमरेड, मैं खा लेती हूं. उसने टैब एक तरफ रख दिया, हाथ धोया और ललिता द्वारा परोसा गया खाना खत्म किया.
सुधा ने उसके कहने के तुरंत बाद खाना खा लिया, इस पर थोड़ा गर्व और खुशी महसूस करते हुए, ललिता ने अपनी किताब निकाली और पढ़ने के लिए अपने कोने में बैठ गई. उसने टॉर्चलाइट को अपने कान के पास रखा और उसे दुपट्टे से अपने सिर पर सुरक्षित तरीके से बांध लिया, ताकि रोशनी किताब पर पड़े. उसे देखकर सुधा ने मुस्कुराते हुए पूछा- ‘सिंगरेनी के खनिकों की तरह अपने सिर पर लाइट क्यों बांधी है और इतनी देर तक क्यों पढ़ रही? रात के 9 बज रहे हैं. तुम सो क्यों नहीं रही ललिता?’
ललिता ने सिर उठाकर उसकी ओर देखा और मासूमियत से पूछा, ‘सिंगरेनी के खनिक कैसे दिखते हैं?’
हंसते हुए सुधा ने कहा, ‘वे भी तुम्हारी तरह अपने सिर पर लाइट बांधते हैं.’ फिर वह अपने कोने में बैठ गई और अपना टैब खोला. ललिता ने उत्सुकता से पूछा, ‘क्या वे भी अपने सिर पर लाइट लगाकर पढ़ते हैं?’
सुधा जोर से हंस पड़ी और बोली, ‘अरे यार, यह बात अभी तुम्हारे सामने उठाना मेरी भूल थी. अभी मेरे पास कुछ काम है, सिंगरेनी खनिकों के बारे में मैं तुम्हें कल बताऊंगी.’
ललिता बिना कोई और सवाल पूछे अपनी किताब में लौट गई. सुधा ने एक-एक करके अखबार पलटना शुरू किया, क्रमानुसार. राज्य विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे थे. अखबारों में सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं और विधायकों द्वारा ‘गड़पा गड़पाकु’ (घर-घर) कार्यक्रम आयोजित करने के बारे में लेख भरे पड़े थे. एक विशेष समाचार ने उसका ध्यान खींचा ‘माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्र मंजरी पंचायत में कड़ी पुलिस सुरक्षा के बीच ‘गड़पा गड़पाकु’ कार्यक्रम आयोजित करने की कोशिश करते समय विधायकों को कदम-कदम पर बाधाओं का सामना करना पड़ा.’ तब तक वह बेफिक्री से अखबार पलट रही थी, लेकिन अब उसने अधिक ध्यान देना शुरू कर दिया. ‘लोगों ने मुख्यमंत्री और विधायकों के पुतले जलाकर ‘गड़पा गड़पाकु’ कार्यक्रम में बाधा डाली’, ‘ग्रामीणों ने ‘गड़पा गड़पाकु’ कार्यक्रम में आए मंत्रियों से पूछा कि उन्होंने अपने कार्यकाल में उनके गांवों में क्या विकास किया है’, और ‘महिलाओं ने झाडू और खाली बर्तनों के साथ विरोध प्रदर्शन किया’ जैसी सुर्खियों ने सुधा को उत्साह के साथ समाचार देखने पर मजबूर कर दिया.
पूर्वी गोदावरी जिले के नाथवरम मंडल में, पांच पंचायतों के लोग नकली मालिकों के नाम पर लेटराइट की आड़ में बॉक्साइट की ढुलाई के विरोध में सड़क पर बैठ गए. लोगों ने पांच टिपर और सात ट्रैक्टरों में आग लगा दी. मोटे अक्षरों में एक और शीर्षक था, ‘चित्रकोंडा पुलिस स्टेशन पर हमला. वह चौंक गई और जो कुछ भी वह देख रही थी उस पर विश्वास नहीं कर पाई, सुधा ने अपनी आंखें चौड़ी और अखबार को जूम इन किया. हमला! वहां किसने हमला किया? अखबार आगे कहता है, ‘जब अपने मुद्दों पर रैली निकालने वाले लोगों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया, तो नौ आदिवासी घायल हो गए. घटना से गुस्साए लोगों ने चित्रकोंडा पुलिस स्टेशन में घुसकर कुर्सियां, टेबल और फाइलें नष्ट कर दीं. उन्होंने परिसर में खड़ी छह बाइकों में भी आग लगा दी.’ तस्वीर में साफ तौर पर चित्रकोंडा पुलिस स्टेशन का बोर्ड आधा जला हुआ और उल्टा लटका हुआ दिख रहा था. अगली हेडलाइन में लिखा था, “अरकू मंडल में चीनी मिट्टी खनन के खिलाफ लोगों द्वारा किए जा रहे विरोध प्रदर्शन को रोकने की कोशिश में पुलिस और लोगों के बीच झड़प. झड़प में दो कांस्टेबल घायल हो गए और स्थानीय एसआई कीचड़ के गड्ढे में गिर गया.” रिपोर्टर ने कीचड़ में पड़े एसआई की तस्वीर साफ-साफ कैद कर ली थी. सुधा को उसी इलाके में हुई पिछली घटनाएं याद आ गई, जब लोगों ने विधायक किदारी से भिड़ंत की थी और बाद में उसी सड़क पर लोगों के सामने किदारी और सिवेरी सोमा को सजा दी थी. सुधा ने जब ये खबरें पढ़ीं, तो उसे बेहद खुशी महसूस हुई. बड़ी मुश्किल से उन्होंने अपने बगल में सो रहे लोगों को जगाने और रोमांचक खबर साझा करने की इच्छा को दबाया.
राख के नीचे सुलगती आग धीरे-धीरे भड़क रही थी. इसे कौन रोक सकता था? यह एक बड़ी ज्वाला बन जाएगी. एक छोटी सी चिंगारी जंगल में आग लगा सकती है. इतिहास हमेशा आगे बढ़ता है… हमेशा आगे ! समय के पहिये को कौन पीछे मोड़ सकता है? मात्रात्मक परिवर्तन को गुणात्मक परिवर्तन में बदलने से कौन रोक सकता है? ऐसे विचारों को मन में दौड़ाते हुए, सुधा उत्साह और खुशी से भर गई. जब वह बहुत खुश होती है, तो उसे नींद नहीं आती, इसलिए उसने टैब को अलग रख दिया और तंबू से बाहर निकल गई. शायद अमावस्या की रात थी, क्योंकि बाहर घना अंधेरा था. अंधेरे में जगह-जगह जुगनू चमक रहे थे. आसमान में तारे चमक रहे थे. पूर्णिमा की रात को वे फीके पड़ जाते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे नहीं हैं! लोग भी ऐसे ही होते हैं. दमन से और अधिक विद्रोह ही होता है. लोग अपना उज्ज्वल भविष्य खुद बनाएंगे. कम्युनिस्ट पार्टी का काम लोगों को एमएलएम (मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद) विचारधारा से जगाना और इस सुलगती आग की लपटों को हवा देना है! उसके मन में ऐसे विचार तीव्र हो रहे थे, जो जनक्रांति को जन्म दे सकते थे. अंधेरे में सुधा के चेहरे पर मुस्कान फैल गई.
समाप्त
चरित्र मुनमुन्दुके’ का अनुवाद. (वसंथा मेघम में पहली बार प्रकाशित, 1 दिसंबर, 2023)
शब्द –
- मद्दी – बड़ा भारतीय लॉरेल वृक्ष (हिन्दी में साज)
- मान्यम – आंध्र प्रदेश राज्य के श्रीकाकुलम, वजयनगरम, विशाखापत्तनम और पूर्वी गोदावरी जिले का जंगल
नोट- इस कहानी की लेखका का असली नाम चैतन्य उर्फ अरूणा है, जो 18 जून 2025 को विशाखापत्तनम में हुए एनकाउंटर में केन्द्रीय कमेटी सदस्य उदय के साथ शहीद गयीं. उनकी दो कहानियां इस संग्रह में हैं.
- अंकिता (हिन्दी अनुवाद – सीमा आजाद)
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