‘पुलिस आ रही है, भागो, भागो…’
गांव भर में यह आवाज गूंजी, और हर कोई सिहर उठा. पुलिस रेड जंगल के बीच बसे उस गांव के लिए नई नहीं थी. सिर्फ उसी गांव के लिए नहीं, किसी भी गांव के लिए नई नहीं थी, फिर भी सब डर गए. उस आवाज के पीछे हर बार जो गाली, अपमान और तबाही आती है, उसे अब तो गांव के छोटे बच्चे भी समझने लगे थे. इसलिए यह सिहरन थी.
जिस पल वह आवाज उनके कानों तक पहुंची, जो भी भाग सकता था, भागने लगा.
गांव की औरतें, मर्द, बच्चे सब अपने खेत-खलिहान छोड़कर घरों की ओर दौड़े. हर घर में घरेलू काम, रसोई का काम शुरू हो चुका था. ज्यादातर के पेट भूख से ऐंठ रहे थे. थोड़ी देर बाद हर घर में परिवार एक साथ बैठकर गरमा-गरम चावल खा रहा होता-यह दृश्य आम होता. लेकिन आज उस गांव में ऐसा कोई दृश्य नहीं दिखा. गांव की दिनचर्या आज सामान्य नहीं रहने वाली थी. सिर्फ आज ही नहीं, पिछले कई सालों से न सिर्फ उस गांव की, बल्कि अन्य किसी भी गांव की दिनचर्या सामान्य नहीं रही है. उन्हें लगातार गंभीर झटकों का सामना करना पड़ रहा है.
मंगली दौडती हई घर से बाहर आंगन में झले के पास आई. उसे समझ नही आ रहा था कि क्या करे. उसका पति नहाने के लिए वागु (नदी) गया था.. ‘शायद वहां से ही भाग गया होगा’ उसने सोचा. लेकिन तीन महीने की नन्ही बच्ची को लेकर वह खुद कैसे भागे उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. ऊपर से बच्ची को कल से बुखार भी है.
इसी बीच, सिर पर पानी का मटका लिए उसकी सास संकी बाहर से आती दिखाई दी.
सिर से मटका उतारे बिना ही घबराहट में उसने पूछा- ‘लालू आ गया क्या?’
‘नहीं आया. शायद उधर से ही भाग गया होगा.’
बेटा सुरक्षित भाग गया होगा, इससे सास को कुछ राहत मिली, लेकिन एक पल को भी चैन नहीं पड़ा. अब बहू की चिंता शुरू हो गई.
‘तू क्या करेगी?’ सास ने अधीर होकर पूछा.
‘समझ नहीं आ रहा बीमार बच्ची को लेकर कैसे भागूं?’ मंगली की आवाज बेबस थी.
संकी ने इधर-उधर देखा, वह दुविधा में थी. अगर घर में रहती है, तो जवान बहू को पुलिस क्या कर बैठे- यह डर है, जंगल में भागती है, तो बारिश में भीगकर बुखार से तपती बच्ची का क्या होगा- यह चिंता है.
लेकिन क्या उनके पास सोचने का समय है? पुलिस की दहाड़ें, गालियां, चिल्लाहटें उनके कानों में गूंजने लगीं. संकी झूले के पास दौड़ी, पोती को उठाकर तुरंत बहू को थमाया और इशारे में कहा कि नीचे बैठ जा. ऐसा करने के पीछे सास का यह मकसद था कि पुलिस उसे देखकर तुरंत समझ जाए कि वह बच्ची की मां है, जिसे बहू ने समझ लिया.
बहू के बगल में आकर सास भी आंगन में बैठ गई. पुलिस वाले दूर से नजर आने लगे. कुछ लोग भीतर आते भी दिखे.
सास और बहू दोनों के दिल जोर-जोर से धड़कने लगे.
आदिवासी नहीं मानते कि पुलिस भी इंसान होती है. जो लोग जंगली हिंसक जानवरों से निपटने के आदी हो चुके हैं, वे पुलिस की तुलना किसी जानवर से नहीं कर सकते. खासकर महिलाएं, क्योंकि हिंसक जानवरों से जान का डर भले हो, पर बलात्कार का डर नहीं होता.
‘ऐ, कहां गए तुम्हारे घर के मर्द?’ पुलिस की आवाज में वही जबरदस्ती, घमंड, और रूखापन.
‘मर्द कोई नहीं है. एक ही बेटा है. बहन से मिलने गांव गया है…’ संकी ने हिम्मत जुटाकर कहा संकी का पति तीन साल पहले ही मर चुका था, पुलिस ने उसके बारे में नहीं पूछा तो उसने बताने की जरूरत भी नहीं समझी.
‘यह कौन है? तेरी छोटी बेटी?’ दूसरी आवाज. आवाज बदली, पर अंदाज वही था.
‘मेरी बहू है.’
‘बहू? बिना शादी की लड़की को बहू कहकर झूठ बोल रही है?’ इस बार आवाज में अश्लीलता भी घुल गई.
‘झूठ क्यों बोलूंगी? शादी नहीं हुई से क्या मतलब है? वह एक बच्ची की मां है.’ उसका गला करुणा से भर गया.
‘क्या? यह बच्ची की मां है?’ उस आवाज ने फिर पूछा, यकीन न आने के कारण नहीं, बल्कि परेशान करने के इरादे से.
‘हां, देख नहीं रहे, उसकी गोद में नन्हीं बच्ची भी है…’ सास किसी भी तरह बहू को संकट से बचाना चाहती थी.
‘हमें मूर्ख बनाना चाहती हो? किसी और की बच्ची को उठाकर लाई हो और कह रही हो उसकी बच्ची है?’
यह सुनकर सास और बहू दोनों कांपने लगीं.
‘हम किसी और की लड़की क्यों लाएंगे? वह उसी की बच्ची है!’ इस बार संकी की आवाज दयनीय हो गई.
‘उसका चेहरा देख हमें पता नहीं चल जायेगा कि शादी हुई है या नहीं? इतना सलीके से नाटक कर रही है, इसका मतलब यह दल की लड़की है. चलो, चलो, बाहर निकालो…’ एक पुलिसवाला मंगली की गोद से बच्ची को खींचने लगा और दूसरा उसकी बांह पकड़कर उठाने लगा.
इस अप्रत्याशित घटना से मंगली लड़खड़ाकर गिर ही पड़ी. बच्ची को ठीक से न पकड़ने के कारण बच्ची की चीखने लगी.
संकी अचानक उठ खड़ी हो गई और मासूम बच्ची को पुलिसवालों से छीनकर अपने सीने से चिपकाते हुए गुस्से में बोली- ‘अरे क्या कर रहे हो, किस तरह के हो तुम लोग ! छोटी सी बच्ची नहीं दिखाई देती तुम लोगों को? नन्हीं बच्ची की मां से ऐसे व्यवहार किया जाता है?’ संकी के गले में जो अचानक उठे आवेग की लहर थी, वह स्पष्ट रूप से सुनाई दे रही थी.
‘ए बुढ़िया, तू नाटक मत कर! तेरी हिम्मत कैसे हुए हमसे ऐसे बात करने की?’ एक पुलिसवाले ने उसे एक ओर धकेल दिया. दूसरे ने मंगली को उसके घर के बाहर रास्ते पर ढकेलते हुए कहा-‘तू चल इधर.’
मंगली उनके हाथों से छूटने की कोशिश करती हुई बोली- ‘मेरे बच्चे की तबियत ठीक नहीं है… मुझे छोड़ दो’.
‘संकी उस पुलिस अफसर के पीछे-पीछे चलने लगी, जो मंगली को घसीट रहा था, अपने गुस्से को दबाकर वह उनसे विनती करने लगी- ‘अरे उस मासूम बच्ची के चेहरे को देखो, थोडा रहम करो ! मेरी बहू को छोड़ दो वह बेचारी बेकसूर है!’ उसकी विनती का मजाक उड़ाते हुए, उन्होंने मंगली को जबरन खींचकर अपनी जीप में डाल दिया और उसे अपने साथ ले गये. रोती हई बच्ची को गोद में उठाए, संकी भी उनके पीछे दौड पडी.
‘रोती हुई बच्ची को लेकर कहां जा रही हो? उसे मुझे दे दो, मैं उसे सुला दूंगी’, पडोस की बूढी महिला पण्डु ने अपने हाथ फैलाए. पुलिस के आने की खबर सुनकर वह भी अपनी जगह से हिली नहीं थी, अपने आंगन में पेड़ के नीचे जमीन पर अडिग बैठी थी. सास-बहू की विनती और अभी तक की सारी बातें उसके कानों में पड़ रही थीं. सिर्फ दुःख और पीड़ा नहीं, बल्कि गुस्से की आग भी उसके दिल को झकझोर रही थी. फिर भी कुछ न कर सकने की बेबसी से वह बस सरापती रही पुलिसवालों को.
पण्डु के हाथों में बच्ची को सौंप कर, संकी पुलिसवालों की जीप के पीछे भागी.
झुंड के झुंड गांव के हर दिशा में फैले पुलिसवालों ने घर-घर में आतंक मचाया और लगभग एक घंटे बाद गांव के बीच में इकट्ठा होने लगे. कुल मिलाकर 70-80 पुलिसवाले थे. उनके पास लगभग दस कैदी थे. उन कैदियों में मंगली के अलावा दो और युवतियां थीं. सभी के चेहरे चिंता और घबराहट से भरे हुए थे. संकी जैसी 10-15 अधेड़ और बूढ़ी औरतें पुलिसवालों के पीछे-पीछे दौड़ती हुई वहां पहुंच गईं.
उनमें से कुछ महिलाएं दयनीय स्वर में कैदियों को छोड़ देने की विनती कर रही थीं. कुछ अन्य गुस्से में पूछ रहीं थीं- “क्यों हर बार हमारे गांव पर ही चढ़ाई करते हो? क्या किया है हमारे लोगों ने जो उन्हें पकड़ कर ले जा रहे हो?”
पुलिसवाले उन्हें डांटते, लाठियां मारते और धक्के देते हुए बंदियों को आगे ले जाने की कोशिश कर रहे थे.
‘अरे यह कैसा अन्याय है! एक छोटी बच्ची की मां को जबरन ले जा रहे हो! उस बच्ची का क्या होगा?’ संकी ने जोर से पुकारा. सभी औरतों की निगाहें मंगली पर जा पड़ीं. सभी के मन में उस मासूम का चेहरा कौंध गया.
‘एक छोटी बच्ची की मां को जबरन ले जा रहे हो? यह कौन सा न्याय है?” औरतें एक के बाद एक यही सवाल पूछती रहीं. बाकी सभी मुद्दों से पहले मंगली को छुड़ाना ही अब उनका सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य बन गया था.
मंगली के लिए सभी औरतों का डटकर खड़े होना देखकर, वहां मौजूद एक पुलिस अधिकारी के मन में एक क्रूर विचार आया. उन्हें जब कोई विचार सूझ जाता है तो फिर सही-गलत की परवाह कहां करते हैं? जनता के साथ जैसा मन हो वैसा बर्ताव करने का अधिकार सरकार उन्हें सौप देती है.
‘अगर यह सच में उस बच्ची की मां है तो हम यहीं उसे छोड देंगे’. उस अधिकारी ने कहा.
मंगली समेत सभी महिलाओं के मन में उम्मीद की एक किरण जागी कि शायद अब उसे छोड़ देंगे.
‘यह बच्ची की असली मां ही है’ सभी महिलाओं ने एक स्वर में कहा.
‘इस बात का हमें कैसे यकीन हो?’ उस अधिकारी की आवाज में झलक रहा व्यंग्य सीधी-सादी महिलाएं समझ नहीं सकीं.
‘हम सभी तो कह रहे हैं न?’ उन्होंने कहा.
‘हो सकता है तुम सब भी झूठ बोल रही हो.’ अब उस व्यंग्य में एक ठहाका भी जुड़ गया.
‘आपने भी तो उस बच्ची को देखा था न’ संकी ने फिर से विनती की.
‘कैसे जानें कि वह बच्ची इसी की है?’
‘बच्ची की मां को पकड़ रहे हो, हम कहते हैं, तो विश्वास नहीं करते… फिर आप कैसे मानोगे?’ संकी की आवाज में बेबसी छलकने लगी.
‘हम जो कहेंगे, वह अगर किया जाए तो हम मानेंगे.’
‘क्या करना होगा, बताओ.’
उस पुलिस अधिकारी ने जो कहा, वह सुनकर मंगली समेत सारी महिलाएं स्तब्ध रह गई.
सभी सिपाही ठहाके मार कर हंसने लगे.
‘क्या बकवास कर रहे हो? ऐसा बोलते हुए शर्म नहीं आती?’
‘एक मां की इज्जत छीनते हो? क्या तुम खुद किसी मां की औलाद नहीं हो?’
औरतों ने गुस्से में उसकी इंसानियत को ललकारते हुए सवाल किए.
लेकिन पुलिस अधिकारी जरा भी क्रोधित नहीं हुआ.
‘तुम कह रही हो कि तुम उसकी मां हो, हम कह रहे हैं कि तुम नहीं हो… अगर जैसा हम कह रहे हैं उस तरीके से तुम साबित कर दो, तो अभी यहीं से तुमको छोड़ देंगे, वरना जेल भेज देंगे, आपकी मर्जी’.
यह कहकर वह शांत भाव से आगे बढ़ गया.
‘चलो’ सभी पुलिस वाले कैदियों को आगे धकेलने लगे. उनके पीछे-पीछे आ रही महिलाओं के प्रति उन्होंने और भी अधिक बेरुखी दिखाई और लाठियां भांजने लगे.
मंगली को अपने बच्चे की याद आ गई. अगर उसे जेल भेज दिया गया, तो उस नन्ही मासूम का क्या होगा? वह जीवित भी रह सकेगी?…इस कल्पना से ही एक मां का हृदय कांप उठा.
क्या पुलिस सच में उसे जेल भेज देगी? या उन सारी महिलाओं को कहीं और ले जाकर और भी कुछ बुरा करेगी? कितनी महिलाओं की जिंदगियां ये पुलिस वाले ऐसे ही कुचल डालते हैं?… यह कल्पना ही उसे डराने लगी.
उसके दिमाग में पुलिस अधिकारी की शर्त घूमने लगी. अगर वह वैसा कर दे, जैसा उन्होंने कहा है… यह सोच ही उसे झकझोर देने वाली थी.
बेबस होकर वह फिर से दुख में डूब गई.
उधर संकी सोच रही थी, कि किसी भी तरह से बहू को उनके चंगुल से छुड़ाना होगा, वरना वे उसके जीवन को कितना नुकसान पहुंचाएंगे, उसे कितना सताएंगे. अगर मां नही होगी, तो उसकी पहली धूप सी पोती, वह मासूम बच्ची… उसका क्या होगा? क्या वह जिंदा रहेगी? उसका दिल छटपटा उठा.
धीरे-धीरे दिल को मजबूत करके वह जोर से बहू से बोली-
‘बेटी… जैसा वो लोग कह रहे हैं वैसा ही कर लो. तुम्हें कुछ नहीं होगा. उन्हें ही पाप लगेगा… उस मासूम को याद करके करो बेटी… अगर तुम नहीं रहोगी तो वो जिंदा नहीं रह पाएगी.’ उसके गले से दर्द भरी आवाज निकली.
सास के शब्द सुनकर मंगली फफक-फफक कर रोने लगी. आखिरकार वह पुलिस द्वारा थोपे गए अमानवीय और घृणित परीक्षण को सहने के लिए तैयार हो गई, ताकि यह साबित कर सके, कि वही उस बच्चे की मां है. उसे लगा जैसे पुलिस की निगाहें रेंगते कीड़ों की तरह उसके शरीर पर रेंग रही हों. पहली बार उसने अपने औरत होने से घृणा का एहसास हुआ.
शर्म और अपमान से सिर झुकाते हुए उसने अपने स्तन से दूध निचोड़कर दिखाया.
वह दूध नहीं था. वह उस मां के दिल से निकले आंसू थे.
***
‘पुलिस आ रही है. भागो भागो!’ इन शब्दों से गांव में हलचल मच गई. जो भाग सकते थे, वे दौड़ने लगे.
खाना बना रही सोमारी अपने काम को वहीं छोड़कर पालने में पड़े बच्चे को उठाकर भागी. घर पर उस समय कोई नहीं था. खेतों में धान की कटाई चल रही थी. सास-ससुर, देवर, महिलाएं सब वहीं थे. उसका पति बगल वाले गांव में संघ की मीटिंग के लिए गया था.
बच्चे को लेकर कुछ दूर दौड़ी सोमारी, लेकिन सामने से आ रहे पुलिस वालों के हाथ लग गई.
बस, फिर तो खींचते हुए उसे गांव के बाहर ले जाया गया. थोड़ी देर में गांव को चारों ओर से घेर चुके सारे पुलिसवाले वहीं आ पहुंचे. उनके साथ गांव और खेतों से पकड़े गए सभी लोगों को भी खींचते हुए वहीं लाया गया. उनके पीछे-पीछे कैदियों की मांएं, पत्नियां भी आईं. पुलिस की जबरदस्ती, लाठियां, कैदियों की चीखें, उनके रिश्तेदारों की मिन्नतें, गुस्सा, आक्रोश, और नन्हे बच्चों की रुलाई से माहौल बोझिल हो उठा.
‘चलो, चलो, आगे बढ़ो.’ पुलिस अधिकारी चिल्लाया.
अपने कंधे को पकड़े खींचते जा रहे पुलिसवाले को छुड़ाते हुए सोमारी चिल्लाई, ‘क्यों खींच कर ले जा रहे हो? मैंने क्या किया है?’
‘अरे, कोई कुछ नहीं कर रहा, तुम सब गड़बड़ करने वाले लोग हो… परसों बूबी ट्रैप किसने लगाया था? तुम्हारे मिलिशिया के लोगों ने ही ना?’
पुलिसवाले की आवाज में तंज था.
‘अगर मिलिशिया वालों ने लगाया है, तो उन्हें पकड़ो. मुझे क्यों पकड़े हो?’ सोमारी की आवाज एकदम से भयहीन थी.
‘ऐ, ज्यादा बोल मत. मिलिशिया वाले क्या आसमान से गिरते हैं? तुम्हारी उम्र की औरतें सब उसी काम में लगी रहती हैं.’
‘मैं बच्चे को लेकर बैठी हूं और तुम कहते हो कि मैं मिलिशिया का काम करती हूं? तुम्हारी आंखों को ये बच्चा नहीं दिखता क्या?’
‘अच्छी तरह दिखता है. किसी और के बच्चे को पकड़ कर खुद को बचाना चाहती हो?’
‘क्या कह रहे हो? किसी और के बच्चे को में पकड़ लूंगी?’ वह और भी जोर से चिल्लाई.
सोमारी और उसके आस-पास के पुलिस वालों के बीच का यह झगडा अकेला नहीं था. ऐसे ही कई वाद-विवाद वहां चल रहे थे.
लेकिन सोमारी के जोर से चिल्लाने पर सारे झगड़े शांत हो गए. सबकी निगाहें उसकी ओर टिक गई. कुछ और महिलाएं भी सोमारी के पास आ गईं.
‘नवजात की मां को तुम लोग कहां ले जा रहे हो?’
‘न तुम दूधमुंहे बच्चे को देखते हो, न बूढ़ी औरतों देखते हो.. आखिर तुम हम पर अत्याचार क्यों कर रहे हो?’
‘हमारे गांवों में आकर हमें सताने का अधिकार तुम्हें किसने दिया?’
औरतें एक के बाद एक बोलती चली गई.
पुलिसवालों ने चाहे डांटा हो, धमकाया हो या मारा हो, लेकिन औरतों की आवाजें कम नहीं हुई.
‘ये लोग कह रहे हैं मैं मिलिशिया के लिए काम कर रही हूं, और यह मेरा बच्चा नहीं है.. ये कहते हैं मैं किसी और का बच्चा लेकर पुलिस से खुद को बचाने की कोशिश कर रही हूं.’
यह कहकर सोमारी ने औरतों के गुस्से को और भड़का दिया.
‘यह कैसी बेहूदी बात है? उसके अपने बच्चे को किसी और का बच्चा बता रहे हैं’
सोमारी के बगल में खड़ी महिला की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि एक पुलिसवाला बीच में बोल पड़ा- ‘हां, बिल्कुल हो सकता है कि ये उसका बच्चा न हो, कौन जानता है?… क्या उसके चेहरे पर लिखा है कि वह उसका बेटा है?’
सोमारी क्रोध से उबल पड़ी और गोद में चिपके बेटे को उसने पास खड़ी महिला को सौंप दिया.
उसके हाथ बिजली की गति से तेजी से हिले. वह क्या करने जा रही है, किसी को समझ में आने से पहले ही उस पुलिस वाले के चेहरे पर दूध की धार छिटक गई.
उसे ऐसा लगा मानो उस महिला ने उसके चेहरे पर थूक दिया हो.
सब चुप हो गए. एकदम स्तब्ध.
सोमारी के चेहरे पर न कोई घबराहट थी, न शर्म, न डर.
उसकी आंखों में, उसके चेहरे पर उसकी सीधे खड़ी मुद्रा में, उसके हावभावों में, उसकी हर नस में बस एक ही भाव झलक रहा था.
‘थू! धिक्कार!’
- अरुणतारा, जनवरी 2019 में प्रकाशित
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नोट:- इस कहानी की लेखिका का असली नाम रेणुका है, जिनके मुठभेड़ में मारे जाने की खबर 31 मार्च 2025 को आई. बाद में यह तथ्य सामने आया कि पुलिस ने उन्हें एक आदिवासी गांव से पकड़कर यातना देकर मारा था. वे लॉ ग्रजूएट थीं और माओवादियों के प्रकाशन का काम देखती थीं. उनके सिर पर राज्य का कुल 45 लाख का ईनाम था. वे गोंडी भाषा के शब्द ‘मिडको’ नाम से लिखती थीं, जिसका अर्थ ‘जुगनू होता है, इस संग्रह में उनकी दो अन्य कहानियां इसी नाम से हैं. लेकिन उनकी मौत के बाद पता चला कि वे कई अन्य नामों से भी लिखा करती थीं, जिसमें एक नाम ‘आसिफा’ भी है. 3 अप्रैल को उनका अंतिम संस्कार तेलंगाना में जब किया गया, तो उसमें बहुत बड़े पैमाने पर मानवाधिकार संगठनों, लेखकों, छात्रों और वहां की जनता ने भागीदारी की.
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