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पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 27, 2026
in गेस्ट ब्लॉग
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पाउलो फ्रेरे : 'कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.'
पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

पाउलो फ्रेरे को गिरफ्तार किया गया, निर्वासित किया गया, और उन्हें राष्ट्रीय खतरा घोषित किया गया—क्योंकि उन्होंने गरीब वयस्कों को इस तरह पढ़ना सिखाया कि उन्हें चुपचाप शासित करना असंभव हो गया.

पाउलो फ्रेरे शुरू में क्रांतिकारी नहीं थे. वे एक शिक्षक के रूप में शुरू हुए, जिन्होंने भूख को अपनी आंखों के सामने सीखने की क्षमता को मिटाते देखा. 1950 के दशक के ब्राजील में उन्होंने देखा कि वयस्कों को अशिक्षित होने के लिए दोषी ठहराया जाता है, जबकि वे ऐसे तंत्र में जी रहे थे जो उन्हें चुप रखने के लिए डिज़ाइन किया गया था.

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फ्रेरे ने कुछ खतरनाक बात नोटिस की. लोग स्कूल में असफल नहीं हो रहे थे, स्कूल उन्हें जानबूझकर असफल कर रहा था इसलिए उन्होंने नियम बदल दिए.

अलग-अलग अक्षरों को रटवाने के बजाय, फ्रेरे ने दैनिक अनुभव के माध्यम से पढ़ना सिखाया. शब्द उनके रोज़मर्रा के जीवन से आए. ज़मीन-काम-किराया-भूख-सत्ता.. जैसे-जैसे वयस्क पढ़ना सीखते गए, वे उन ताकतों को नाम देने भी सीख गए जो उनकी ज़िंदगी को आकार दे रही थी. साक्षरता जागरूकता बन गई. जागरूकता एजेंसी (स्वायत्तता) बन गई, यही समस्या थी.

1963 में, फ्रेरे की विधि से मात्र 45 दिनों में 300 गन्ने के मजदूरों को पढ़ना सिखाया गया. ब्राज़ील सरकार ने इस कार्यक्रम का शुरू में समर्थन किया, यह मानते हुए कि साक्षरता देश को आधुनिक बनाएगी. उन्होंने गलत आंकलन किया. नव-साक्षर नागरिक ऐसे सवाल पूछने लगे जो मतपत्रों को खतरनाक बना देते हैं. ज़मीन किसकी है ? चुप्पी से किसका फ़ायदा होता है ? ज्ञान क्या मायने रखता है ? यह किसका फैसला है ?

फौज ने हस्तक्षेप किया. 1964 के तख्तापलट के बाद फ्रेरे को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें विध्वंसक घोषित कर जेल में डाल दिया गया. लोगों को आलोचनात्मक रूप से पढ़ना सिखाना अब वैचारिक युद्ध के रूप में पेश किया जाने लगा. उन्हें रिहा किया गया लेकिन निर्वासन के लिए मजबूर कर दिया गया. वे ब्राज़ील छोड़कर केवल कुछ नोट्स और एक ऐसे विचार के साथ गए जो तानाशाही को डराने के लिए काफी था.

निर्वासन ने उनके काम को और निखारा. चिली में, फिर अफ्रीका और यूरोप में, फ्रेरे ने जो बाद में Pedagogy of the Oppressed बना, उसे परिष्कृत किया. उन्होंने शिक्षा को जमा करने और आज्ञाकारिता के रूप में खारिज कर दिया. उन्होंने इसे ‘बैंकिंग मॉडल’ कहा. शिक्षक जानकारी जमा करते हैं, छात्र उसे ग्रहण करते हैं. सत्ता स्थिर रहती है. फ्रेरे ने इसके बजाय संवाद प्रस्तावित किया. सीखना आपसी जांच के रूप में. शिक्षा मुक्ति के रूप में—या फिर कुछ भी नहीं.

विरोध वैश्विक स्तर पर हुआ. फ्रेरे पर indoctrination (विचारधारा थोपने), कक्षाओं को राजनीतिक बनाने, और तटस्थता को भ्रष्ट करने का आरोप लगाया गया. उन्होंने शांति से जवाब दिया – ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती. पढ़ाना या तो दुनिया को जैसी है वैसी ही बनाए रखता है या लोगों को उसे बदलने के लिए तैयार करता है. इसके विपरीत दिखावा सत्ता की रक्षा करता है.’

विरोधाभास क्रूर था. फ्रेरे ने कभी हिंसा की मांग नहीं की. उन्होंने इसके खिलाफ चेतावनी दी. उन्होंने तर्क दिया कि अमानवीकरण हर किसी को नुकसान पहुंचाता है—यहां तक कि उत्पीड़क को भी. उनका खतरा गुस्सा नहीं था, वह स्पष्टता थी. चुप्पी पर टिकी व्यवस्थाएं उन लोगों के साथ जीवित नहीं रह सकतीं जो पढ़, बोल और साथ में सवाल कर सकें.

दशकों बाद फ्रेरे ब्राज़ील लौटे और साओ पाउलो में शिक्षा सचिव बने. उनके विचार अभी भी विवादित थे. कई जगहों पर प्रतिबंधित थे. अभी भी डराए जाते थे. वह डर उनके दावे की पुष्टि करता था. पाउलो फ्रेरे ने पढ़ना कभी कौशल के रूप में नहीं सिखाया. उन्होंने इसे एक ‘विच्छेद’ (rupture) के रूप में सिखाया.

उन्हें समझ था कि एक बार लोग अपनी वास्तविकता को नाम देना सीख लें, तो वे उन व्याख्याओं को स्वीकार करना बंद कर देते हैं जो उनके लिए लिखी गई हैं. यही कारण था कि शासन ने उन्हें जेल में डाला, स्कूल उनके बारे में बहस करते हैं, और उनका काम आज भी उन जगहों पर फैलता है जहां सत्ता आज्ञाकारिता को समझ से बेहतर मानती है. साक्षरता कभी लक्ष्य नहीं थी.

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