कृष्ण कांत
जो भी देश अमेरिका के इशारे पर नाचने लगा, तबाह हो गया. दुर्भाग्य की बात है कि आज हमारी सरकार यही डरावना काम कर रही है, जो पिछले 75 सालों में कभी नहीं हुआ. अमेरिका हमें आदेश दे रहा है और हमारी सरकार सिर झुकाकर हुकुम बजा रही है.
अमेरिका का डिप्टी सेक्रेटरी क्रिस्टोफर लैंडो रायसीन डायलॉग में शामिल होने दिल्ली आया. जिस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री शामिल हुए, उसी कार्यक्रम में उसने कहा, ‘भारत को समझना चाहिए कि हम वही गलती नहीं करने जा रहे हैं, जो हमने 20 साल पहले चीन के साथ की थी. हम भारत का मार्केट इतना बड़ा नहीं होने देंगे कि भारत भविष्य में हमसे मुकाबला कर सके.’ इस अपमानजनक बात पर भारत ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
14 फरवरी को म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्री एस जयशंकर के सामने अमेरिका के मार्को रुबियो ने कहा- ‘सेकंड वर्ल्ड वॉर से पहले तक पश्चिम ने बड़े-बड़े साम्राज्य बनाए… लेकिन बाद में पश्चिम सिकुड़ने लगा. हमने उपनिवेशवाद का सपना छोड़ा नहीं है और डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में हम इस सपने को पूरा करने जा रहे हैं.’
हमने साम्राज्यवाद का अपमानजनक दंश झेला है, हम उसके पीड़ित रहे हैं, हमने लाखों कुर्बानियां देकर उससे मुक्ति पाई, हमारे सामने कोई देश ऐसी बात कैसे कर सकता है ? लेकिन विदेश मंत्री एस. जयशंकर इसपर एक शब्द नहीं बोले.
रूस से तेल लेने के मसले पर ट्रंप के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने बयान दिया – ‘कल हमारा वित्त विभाग भारत को रूसी तेल खरीदने की अनुमति देने पर सहमत हुआ है. भारतीय अच्छे एक्टर हैं. हमने उनसे रूस से तेल लेना बंद करने को कहा था, उन्होंने ऐसा ही किया. अब हमने उन्हें रूस से तेल खरीदने की ‘इजाजत’ दे दी है.’ ‘अच्छे एक्टर’, ‘इजाजत’ जैसे अपमानजनक शब्दों पर भारत ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
बाकी वह तथ्य तो देश के सामने है ही कि आपरेशन सिंदूर रोकने का ऐलान भारत के प्रधानमंत्री ने नहीं, अमेरिका के राष्ट्रपति ने किया था. भारत रूस से तेल नहीं खरीदेगा, इसका ऐलान अमेरिका के राष्ट्रपति ने किया. भारत अब वेनेजुएला और अमेरिका से तेल खरीदेगा, इसका ऐलान ट्रंप ने किया. ईरान और अमेरिका युद्ध के बाद अमेरिका कह रहा है कि हमने भारत को एक महीने के लिए रूस से तेल खरीदने के इजाजत दे दी है, भारत कुछ नहीं बोला. सवाल उठता है कि भारत लगातार इतने अपमान क्यों झेल रहा है ?
नरेंद्र मोदी की ऐसी कौन सी नस ट्रंप ने दबा रखी है कि वे अमेरिका के सामने रेंगते दिख रहे हैं ? धमकी तो नेहरू को भी मिली थी, धमकी तो शास्त्री जी को भी मिली थी, धमकी तो इंदिरा जी को भी मिली थी, यहां तक कि पाकिस्तान के समर्थन में उन्होंने अपनी सेना रवाना कर दी थी… लेकिन नेहरू जी से लेकर मनमोहन सिंह तक कोई प्रधानमंत्री झुका नहीं.
अमेरिका का इतिहास है कि जो देश उसके आगे झुके, उन्हें उसने बर्बाद कर दिया. अमेरिका को दुनिया भर के व्यापार और संसाधनों पर कब्जा चाहिए. भारत उसके आगे झुका तो आगे क्या होगा, इसकी कल्पना बहुत भयानक है. जापान और कोरिया से लेकर वियतनाम, इराक, अफगानिस्तान, फिलिस्तीन, सीरिया, चिली, ब्राजील, उरुग्वे, पैरागुआ, अर्जेंटीना और ईरान के साथ अमेरिका ने क्या किया, यह सब दुनिया ने देखा है.
क्या कारण है कि आज अमेरिका भारत को आदेश दे रहा है और भारत अपने हितों से समझौता करके उसके आदेश को मान रहा है ? ऐसा क्या हुआ कि हमने अपने किसानों के हितों की कीमत पर, अपने आर्थिक हितों की कीमत पर एक आर्थिक तबाही लाने वाली डील कर ली ? अमेरिका कौन होता है हमारी विदेश और आर्थिक नीति तय करने वाला ? वह ऐसे क्यों व्यवहार कर रहा है जैसे हम उसके उपनिवेश हों ? सरकार अगर ऐसा होने देती है तो हर भारतीय के मन में यह सवाल उठेगा कि क्या भारत गुलामी के नये दौर में प्रवेश कर रहा है ?
मोदी ऐसा क्यों कर रहे हैं ? वे भारत की संप्रभुता की कीमत पर अमेरिका का अपमानजनक व्यवहार बर्दाश्त क्यों कर रहे हैं ? रोज रैली में डींगें हांकने वाले प्रधानमंत्री देश के सम्मान, देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता के साथ समझौता क्यों कर रहे हैं ? अगर वे इसके विरोध में तनकर खड़े नहीं होते तो हमें यही कहना चाहिए कि नरेंद्र मोदी एक कमजोर, नकारा, डरपोक और कायर प्रधानमंत्री साबित हुए हैं जो भारतीय संप्रभुता की रक्षा करने में नाकाम हैं. कहीं ऐसा न हो कि उनकी इस कमजोरी की कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़े !
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